पुष्कर कहते हैं-
परशुराम ! प्रत्येक वेदके श्रीसूक्त' को जानना चाहिये। वह लक्ष्मीकी वृद्धि करनेवाला है। 'हिरण्यवर्णा हरिणों' इत्यादि पंद्रह ऋचाएँ ऋग्वेदीय श्रीसूक्त हैं। 'रथे० ' (२९-४३) 'अक्षराजाय०', (३०।१८) 'वाज: ०', ( १८ । ३४) एवं 'चतस्त्र: ० ' ( १८ । ३२ ) - ये चार मन्त्र यजुर्वेदीय श्रीसूक्त हैं। 'श्रावन्तीय-साम' सामवेदीय श्रीसूक्त है तथा 'श्रियं धातर्मयि धेहि' यह अथर्ववेदका श्रीसूक्त कहा गया है। जो भक्तिपूर्वक श्रीसूक्तका जप एवं होम करता है, उसे निश्चय ही लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है। श्रीदेवीकी प्रसन्नताके लिये कमल, बेल, घी अथवा तिलकी आहुति देनी चाहिये ॥ १-३॥
प्रत्येक वेदमें एक ही 'पुरुषसूक्त' मिलता है, जो सब कुछ देनेवाला है। जो स्नान करके 'पुरुषसूक्त 'के एक-एक मन्त्रसे भगवान् श्रीविष्णुको एक-एक जलाञ्जलि और एक-एक फूल समर्पित करता है, वह पापरहित होकर दूसरोंके भी पापका नाश करनेवाला हो जाता है। स्नान करके इस सूक्तके एक-एक मन्त्रके साथ श्रीविष्णुको फल समर्पित करके पुरुष सम्पूर्ण कामनाओंका भागी होता है। 'पुरुषसूक्त 'के जपसे महापातकों और उपपातकोंका नाश हो जाता है। कृच्छ्रव्रत करके शुद्ध हुआ मनुष्य स्त्रानपूर्वक 'पुरुषसूक्त' का जप एवं होम करके सब कुछ पा लेता है ॥ ४–६६ ॥
अठारह शान्तियों में समस्त उत्पातोंका उपसंहार करनेवाली अमृता, अभया और सौम्या - ये तीन शान्तियाँ सर्वोत्तम हैं। 'अमृता शान्ति' सर्वदैवत्या, 'अभया' ब्रह्मदैवत्या एवं 'सौम्या' सर्वदैवत्या है। इनमें से प्रत्येक शान्ति सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाली है। भृगु श्रेष्ठ! 'अभया' शान्तिके लिये वरुणवृक्षके मूलभागकी मणि बनानी चाहिये। 'अमृता' शान्तिके लिये दूर्वामूलकी मणि एवं 'सौम्या' शान्तिके लिये शङ्खमणि धारण करे। इसके लिये उन उन शान्तियों के देवताओंसे सम्बद्ध मन्त्रोंको सिद्ध करके मणि बाँधनी चाहिये। ये शान्तियाँ दिव्य, आन्तरिक्ष एवं भौम उत्पातोंका शमन करनेवाली हैं। 'दिव्य', 'आन्तरिक्ष' और 'भौम'– यह तीन प्रकारका अद्भुत उत्पात बताया जाता है, सुनो। ग्रहों एवं नक्षत्रों की विकृतिसे होनेवाले उत्पात 'दिव्य' कहलाते हैं। अब 'आन्तरिक्ष उत्पातका वर्णन सुनो। उल्कापात, दिग्दाह, परिवेश, सूर्यपर घेरा पड़ना, गन्धर्व नगरका दर्शन एवं विकारयुक्त वृष्टि- ये अन्तरिक्ष सम्बन्धी उत्पात हैं। भूमिपर एवं जंगम प्राणियोंसे होनेवाले उपद्रव तथा भूकम्प–ये भौम' उत्पात हैं। इन त्रिविध उत्पातोंके दीखनेके बाद एक सप्ताह के भीतर यदि वर्षा हो जाय तो वह 'अद्भुत' निष्फल हो जाता है। यदि तीन वर्षतक अद्भुत उत्पातकी शान्ति नहीं की गयी तो वह लोकके लिये भयकारक होता है। जब देवताओंकी प्रतिमाएँ नाचती, काँपती, जलती, शब्द करती, रोती, पसीना बहाती या हँसती हैं, तब प्रतिमाओंके इस विकारकी शान्तिके लिये उनका पूजन एवं प्राजापत्य होम करना चाहिये। जिस राष्ट्रमें बिना जलाये ही घोर शब्द करती हुई। आग जल उठती है और इन्धन डालनेपर भी प्रज्वलित नहीं होती, वह राष्ट्र राजाओंके द्वारा पीड़ित होता है ॥ ७ – १६ ॥
भृगुनन्दन ! अनि सम्बन्धी विकृतिकी शान्तिके लिये अग्रिदैवत्य मन्त्रोंसे हवन बताया गया है। जब वृक्ष असमयमें ही फल देने लगें तथा दूध और रक्त बहावें तो वृक्षजनित भौम-उत्पात होता है। वहाँ शिवका पूजन करके इस उत्पातकी शान्ति करावे। अतिवृष्टि और अनावृष्टि- दोनों ही दुर्भिक्षाका कारण मानी गयी हैं। वर्षा ऋतु सिवा अन्य ऋतुओंमें तीन दिनतक अनवरत वृष्टि होनेपर उसे भयजनक जानना चाहिये। पर्जन्य, चन्द्रमा एवं सूर्यके पूजनसे वृष्टि सम्बन्धी वैकृत्य - (उपद्रव) का विनाश होता है। जिस नगरसे नदियाँ दूर हट जाती हैं या अत्यधिक समीप चली आती हैं और जिसके सरोवर एवं झरने सूख जाते हैं, वहाँ जलाशयोंके इस विकारको दूर करनेके लिये वरुणदेवता सम्बन्धी मन्त्रका जप करना चाहिये। - जहाँ स्त्रियाँ असमयमें प्रसव करें, समयपर प्रसव न करें, विकृत गर्भको जन्म दें या युग्म-संतान आदि उत्पन्न करें, वहाँ स्त्रियोंके प्रसव सम्बन्धी - वैकृत्यके निवारणार्थ साध्वी स्त्रियों और ब्राह्मण आदिका पूजन करे ।। १७ - २२३ ॥
जहाँ घोड़ी, हथिनी या गौ एक साथ दो बच्चों को जनती हैं या विकारयुक्त विजातीय संतानको जन्म देती हैं, छः महीनोंके भीतर प्राणत्याग कर देती हैं अथवा विकृत गर्भका प्रसव करती हैं, उस राष्ट्रको शत्रुमण्डलसे भय होता है। पशुओंके इस प्रसव सम्बन्धी उत्पातकी शान्तिके उद्देश्यसे होम, जप एवं ब्राह्मणोंका पूजन करना चाहिये । जब अयोग्य पशु सवारीमें आकर जुत जाते हैं, योग्य पशु यानका वहन नहीं करते हैं एवं आकाशमें तूर्यनाद होने लगता है, उस समय महान् भय उपस्थित होता है। जब वन्यपशु एवं पक्षी ग्राममें चले जाते हैं, ग्राम्यपशु वनमें चले जाते हैं, स्थलचर जीव जलमें प्रवेश करते हैं, जलचर जीव स्थलपर चले जाते हैं, राजद्वारपर गीदड़ियाँ आ जाती हैं, मुर्गे प्रदोषकालमें शब्द करें, सूर्योदयके समय गीदड़ियाँ रुदन करें, कबूतर घरमें घुस आवें, मांसभोजी पक्षी सिरपर मँडराने लगें, साधारण मक्खी मधु बनाने लगें, कौए सबकी आँखों के सामने मैथुनमें प्रवृत्त हो जायँ, दृढ़ प्रासाद, तोरण, उद्यान, द्वार, परकोटा और भवन अकारण ही गिरने लगें, तब राजाकी मृत्यु होती है। जहाँ धूल या धुएँसे दशों दिशाएँ भर जायँ, केतुक उदय, ग्रहण, सूर्य और चन्द्रमामें छिद्र प्रकट होना- ये सब ग्रहों और नक्षत्रों के विकार हैं। ये विकार जहाँ प्रकट होते हैं, वहाँ भयकी सूचना देते हैं। जहाँ अग्नि प्रदीप्त न हो, जलसे भरे हुए घड़े अकारण ही चूने लगें तो इन -उत्पातोंके फल मृत्यु, भय और महामारी आदि होते हैं। ब्राह्मणों और देवताओंकी पूजा से तथा जप एवं होमसे इन उत्पातोंकी शान्ति होती है ॥ २३-३३ ॥
इस प्रकार आदि आग्रेय महापुराणमें 'उत्पात शान्तिका कथन' नामक दो सौ तिरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २६३ ।।
Summary of chapter 265 of the Agni Mahā Purana is as follows:
The Āgama tradition — the revealed scriptural basis for temple worship and tantra — is introduced. Agni describes the twenty-eight Śaiva Āgamas and the Pāñcarātra Saṃhitās as the twin pillars of the Āgamic tradition, complementary to the Vedic tradition rather than opposed to it. The chapter explains the four pādas of the Āgama: Vidyā (doctrine), Yoga (discipline), Kriyā (ritual action), and Caryā (behavioral conduct). Agni declares that all temple worship in Bhārata follows the Āgamic protocols.