अग्नि महा पुराण

334- समवृत्तका वर्णन

अग्निदेव कहते हैं –

'यति' नाम है विच्छेद या विरामका [पादके अन्तमें श्लोकार्ध पूरा होनेपर तथा कहीं-कहीं पादके मध्य में भी 'यति' होती है। जिसके प्रत्येक चरणमें क्रमश: तगण और यगण हों, उसका नाम 'तनुमध्या'(उदाहरण धन्या त्रिषु नीचा कन्या तनुमध्या श्रोणीस्तनगुर्बो रामा रमणीया ॥) है । [ यह गायत्री छन्दका वृत्त है। ] जिसके प्रत्येक चरणमें जगण, सगण और एक गुरु हो, उसे 'कुमारललिता'(उदाहरण यदीह पतिसेवारता भवति योषा कुमारललितासौ सदैव नमनीया ॥) कहते हैं। [ यह उष्णिक् छन्दका वृत्त है। इसमें तीन, चार अक्षरोंपर विराम होता है। ] दो भगण और दो गुरुसे जिसके चरण बनते हों, वह 'चित्रपदा' (उदाहरण यस्य मुखे प्रियवाणी चेतसि सज्जनता च चित्रपदापि च लक्ष्मीस्तं पुरुषं न जहाति ॥)है। [ यह अनुष्टुप् छन्दका वृत्त है, इसमें पादान्तमें ही यति होती है। ] जिसके प्रत्येक पादमें दो मगण और दो गुरु हों, उसका नाम 'विद्युन्माला' (उदाहरण विद्युन्मालालोलान् भोगान् मुक्त्वा मुक्तौ यत्नं कुर्यात्। ध्यानोत्पन्नं निस्सामान्यं सौख्यं भोक्तुं यद्याकाङ्क्षेत् ॥) है। [ इसमें चार-चार अक्षरोंपर विराम होता है। यह भी अनुष्टुप्का ही वृत्त है।] जिसके प्रत्येक चरणमें भगण, तगण, एक लघु और एक गुरु हो, उसको 'माणवकाक्रीडितक' (उदाहरण माणवकाक्रीडितकं यः कुरुते वृद्धवयाः हास्यमसौ याति जने भिक्षुरिव स्त्रीचपलः ॥)कहते हैं। [इसमें भी चार-चार अक्षरोंपर विराम होता है। ] जिसके प्रति चरणमें रगण, नगण और सगण हो, वह 'हलमुखी' (उदाहरण – गण्डयोरतिशयकृशं यन्मुखं प्रकटदशनम् । आयतं कलहनिरतं तो स्त्रियं त्यज हलमुखीम् ॥)नामक छन्द है। [इसमें तीन, पाँच, छः अक्षरोंपर विराम होता है, यह बृहती छन्दका वृत्त है । ] ॥ १-२॥ है।

जिसके प्रत्येक चरणमें दो नगण और एक मगण हो, वह 'भुजङ्गशिशुभृता' (उदाहरण- इयमधिकतरं रम्या विकचकुवलयश्यामा रमयति हृदयं यूनां भुजगशिशुभृता नारी ॥)  नामक छन्द है। [ इसमें सात और दो अक्षरोंपर विराम है। यह भी बृहतीमें ही है। ] मगण, नगण और दो गुरुसे युक्त पादवाले छन्दको 'हंसरुत' (उदाहरण- अभ्यागामिशिशुलक्ष्मीमीराणिततुल्यम्। तीरे राजति नदीनां रम्यं हंसरुतमेतत् ॥)  कहते हैं। जिसके प्रत्येक चरणमें मगण, सगण, जगण और एक गुरु हों, वह 'शुद्धविराट्' (विश्व तिष्ठति कुक्षिकोटरे वक्त्रे यस्य सरस्वती सदा अस्मद्वंशपितामहो गुरुर्ब्रह्मा शुद्धविराट् पुनातु नः ॥) नामक छन्द कहा गया है। [ यहाँसे इन्द्रवज्राके पहलेतकके छन्द पङ्क्ति छन्दके अन्तर्गत हैं; इसमें पादान्तमें विराम होता है।] जिसके प्रत्येक पादमें मगण, नगण, यगण और एक गुरु हों, वह 'पणव' (मीमांसारसममृतं पीत्वा शास्त्रोक्तिः पटुरितरा भाति एवं संसदि विदुषां मध्ये जल्पामो जयपणवन्धत्वात् ॥) नामक छन्द है। [ इसमें पाँच-पाँचपर विराम होता है।] रगण, जगण, रगण और एक गुरुयुक्त चरणवाले छन्दका नाम 'मयूरसारिणी' (उदाहरण या बनान्तराण्युपैति कृष्णं द्रष्टुमुत्सुका शिखण्डमौलिम्। बहिणं विलोक्य राधिका मे सा मयूरसारिणी प्रणम्या) है। [इसमें पादान्तमें विराम होता है। ] मगण, भगण, सगण और एक गुरुयुक्त चरणवाला छन्द 'मत्ता' (उदाहरण स्वैरालापैः श्रुतिपुटपेयैगतिः शौरेश्वरित विशेषैः। श्यामप्रेम्णा व्रजवनितानां मध्ये मत्ता विलसति कापि ॥)कहलाता है। [इसमें चार छः पर विराम होता है।] जिसके प्रत्येक पादमें तगण, दो जगण और एक गुरु हो, उसका नाम 'उपस्थिता' (उदाहरण एषा जगदेकमनोहरा कन्या कनकोञ्ज्वलदीधितिः । लक्ष्मीरिव दानवसूदनं पुण्यैर्नरनाथमुपस्थिता ॥) है। [इसमें दो आठपर विराम होता है।] भगण, मगण, सगण और एक गुरुसे युक्त पादवाला छन्द 'रुक्मवती' (उदाहरण पादतले पद्योदरगीरे राजति यस्या ऊर्ध्वगरेखा सा भवति स्त्री लक्षणयुक्ता रुक्मवती सौभाग्यवती च ॥) कहलाता है। [इसमें पादान्तमें विराम होता है। जिसके प्रत्येक चरणमें दो तगण, एक जगण और दो गुरु हों उसका नाम 'इन्द्रवज्रा' (उदाहरण- ये दुष्टदैत्या इह भूमिलोके द्वेषं व्यधुर्गोद्विजदेवसंभे तानिन्द्रवज्रादपि दारुणाङ्गानजीयतद् यः सततं नमस्ते ॥) है। [इसमें पादान्त में विराम होता है। यहाँसे 'वंशस्थ के पहलेतक के छन्द बृहतीके अन्तर्गत हैं।] जगण, तगण, जगण और दो गुरुसे युक्त पादोंवाला छन्द 'उपेन्द्रवज्रा' (उदाहरण भवन्नखाः कुन्ददलश्रियो ये नमन्ति लक्ष्मीस्तनलेखनेऽपि । उपेन्द्रवज्राधिककर्कशत्वं कथं गतास्ते रिपुदारणायाम् ॥) कहलाता है। [इसमें भी पादान्तमें विराम होता है । ] जब एक ही छन्दमें इन्द्रवज्रा और उपेन्द्रवज्रा दोनोंके चरण लक्षित हों, तब उस छन्दका नाम 'उपजाति' (उदाहरण— तत्रोपजातिर्विविधा विदग्धैः संयोज्यते तु व्यवहारकाले। अतः प्रयत्नः प्रथमं विधेयो नृपेण पुंरत्नपरीक्षणाय ॥)होता है। [इन दोनोंके मेलसे जो उपजाति बनती है, उसके प्रस्तारसे चौदह भेद होते हैं। इसी प्रकार 'वंशस्थ' और 'इन्द्रवज्रा' तथा 'शालिनी' और 'वातोर्मी के मेलसे भी उपजाति छन्द होता है । ] ॥ ३ - ५ ॥

तीन भगण और दो गुरुसे युक्त पादवाले वृत्तका नाम 'दोधक' (दोधकमर्थविरोधकमां स्त्रीचपलं युधि कातरचित्तम् ।

स्वार्थपरं मतिहीनममात्यं मुखति यो नृपतिः स सुखी स्यात् ॥) है। [इसमें पादान्त में विराम होता है।] जिसके प्रत्येक चरणमें भगण, तगण, तगण और दो गुरु हों, उसका नाम 'शालिनी' (शस्त्रश्यामा स्निग्धमुग्धायताक्षी पीन श्रोणिदक्षिणावर्तनाभिः ।

मध्ये क्षामा पीवरोरुस्तनी या श्लाच्या भर्तुः शालिनी कामिनी सा॥) है। इसमें चार और सात अक्षरोंपर विराम होता है। जिसके प्रत्येक पादमें मगण, भगण, तगण एवं दो गुरु हों, उसे 'वातोर्मी' (यात्युत्सेकं सपदि प्राप्य किंचित् स्याद् वा यस्याचपला चित्तवृत्तिः । या दीर्घाङ्गी स्फुटशब्दागृहासा त्याच्या सा स्त्री द्रुतवातोर्मिमाला ॥) छन्द नाम दिया गया है। इसमें भी चार-सातपर विराम होता है। प्रत्येक चरणमें मगण, भगण, तगण, नगण, एक लघु और एक गुरु होनेसे भ्रमरीविलसिता (किं ते वक्त्रं चलदलकचितं किं वा पद्मं भ्रमरविलसितम्। इत्येवं मे जनयति मनसि भ्रान्ति कान्ते परिसर सरसि ॥) (या भ्रमरविलसिता) नामक छन्द होता है। इसमें भी चार और सात अक्षरोंपर ही विराम होता है। जिसके प्रति पादमें रगण, नगण, रगण, एक लघु और गुरु हों, उसे 'रथोद्धता' (या करोति विविधैनरैः समं संगति परगृहे रता च या म्लानयत्युभयतोऽपि बान्धवान् मार्गधूलिरिव सा रथोद्धता ॥) कहते हैं। इसमें भी पूर्ववत् चार और सात अक्षरोंपर विराम होता है। रगण, नगण, भगण और दो गुरुसे युक्त पादवाले छन्दको 'स्वागता' (आहवं प्रविशतो यदि राहुः पृष्ठत श्चरति वायुसमेतः । प्राणवृत्तिरपि यस्य शरीर स्वागता भवति तस्य जयश्रीः ॥)कहते हैं। [इसमें पादान्तमें विराम होता है।] जिसके प्रत्येक पादमें दो नगण, सगण और दो गुरु हों, उसे 'वृत्ता' (द्विजगुरुपरिभवकारी यो नरपतिरतिधनलुब्धात्मा ध्रुवमिह निपतति पापोऽसौ फलमिव पवनहतं वृन्तात् ) (या 'वृन्ता) कहते हैं। [ इसमें चार-सातपर विराम होता है।] जिसके चरण रगण, जगण, रगण, एक लघु और एक गुरुसे युक्त हों, उसे 'श्येनी' (क्रूरदृष्टिरायताग्रनासिका चञ्चला कठोरतीक्ष्णनादिनी । युद्धकाङ्क्षिणी सदामिषप्रिया श्येनिकेव सा विगर्हिताङ्गना ॥) नामक छन्द कहा गया है। [इसमें पादान्तमें विराम होता है।] जगण, रगण, जगण एवं दो गुरुसे युक्त चरणवाले छन्दका नाम 'रम्या' (विलासिनीविलासमोहितानां नृणां हृदि क्व सत्त्वशालि धैर्यम्। स उर्वशीवशीकृतो नरेन्द्रस्तदर्थमुन्मना चचार भूमौ ॥) एवं 'विलासिनी' है। [यहाँ पादान्तमें ही विराम होता है ] ॥ ६ - ८॥

यहाँसे 'जगती' छन्दका अधिकार आरम्भ होता है [ और 'प्रहर्षिणी' के पहलेतक रहता है] । जिसके प्रत्येक चरणमें जगण, तगण, जगण और रगण हों, उस छन्दका नाम 'वंशस्था' (विशुद्धवंशस्थमुदार  गुणप्रियं मित्रमुपात्तसज्जनम् । विपत्तिमप्रस्थ करावलम्बनं करोति य: प्राणपरिक्रयेण सः।।) है। [ यहाँ पादान्तमें विराम होता है। ] दो तगण, जगण तथा रगणसे युक्त चरणोंवाले छन्दको 'इन्द्रवंशी' (कुर्वीत यो देवगुरुद्विजन्मनामुर्वीपतिः पालनमर्थलिप्सया तस्येन्द्रवंशेऽपि गृहीतजन्मनः संजायते श्रीः प्रतिकूलवर्तिनी ॥)  कहते हैं। [ यहाँ भी पादान्तमें ही विराम होता है।] जिसके प्रत्येक पादमें चार सगण हों, उसका नाम 'तोटक' (अमुना यमुनाजलकेलिकृता सहसा तरसा परिरभ्य धृता। हरिणा हरिणाकुलनेत्रवती न यौ नवयौवनभारवती ॥) बताया गया है। जिसके प्रत्येक पादमें नगण, भगण, भगण और रगण हों, उसका नाम 'द्रुतविलम्बित' (द्रुतगतिः पुरुषो धनभाजनं भवति मन्दगतिक सुखोचितः । द्रुतविलम्बितखेलगतिर्नृपः सकलराज्यसुखं प्रियमश्नुते ॥)है। ['तोटक' और 'द्रुतविलम्बित' दोनों में पादान्त - विराम ही माना गया है। जिसके सभी चरणों में दो-दो नगण, एक-एक मगण तथा एक-एक यगण हों, उस छन्दका नाम 'श्रीपुट है। इसमें आठ और चार अक्षरोंपर विराम होता है। जगण, सगण, जगण, सगणसे युक्त पादोंवाले छन्दको 'जलोद्धतगति' कहते है। इसमें छः छः अक्षरोंपर विराम होता है। दो नगण, एक मगण तथा एक रगणसे युक्त चरणवाले छन्दका नाम 'तत है। नगण, यगण, नगण, यगणसे युक्त पादवाला छन्द "कुसुमविचित्रा" कहलाता है। [इसमें भी छः-छः अक्षरोंपर विराम होता है।] जिसके प्रत्येक चरणमें दो नगण और दो रगण हों, उसका नाम 'चञ्चलाक्षिका' है। [इसके भीतर सात-पाँचपर विराम होता है। प्रत्येक पादमें चार यगण होनेसे 'भुजंगप्रयात' और चार रगण होनेसे 'स्त्रग्विणी नामक छन्द होता है। [इन दोनों में पादान्तविराम माना गया है। जिसके प्रत्येक चरणमें सगण, जगण तथा दो सगण हों, उसकी 'प्रमिताक्षरा' संज्ञा होती है। [इसमें भी पादान्तविराम ही अभीष्ट है।] भगण, मगण, सगण, मगणसे युक्त चरणोंवाले छन्दको 'कान्तोत्पीडा' कहते हैं। [इसमें भी पादान्त विराम माना गया है। ] - दो मगण और दो यगणयुक्त चरणवाले छन्दको 'वैश्वदेवी' नाम दिया गया है। इसमें पाँच-सात अक्षरोंपर विराम होता है। यदि प्रत्येक पादमें नगण, जगण, भगण और यगण हों तो उस छन्दका नाम 'नवमालिनी' होता है। यहाँतक 'जगती' छन्दका अधिकार है ॥ ९-१३॥

[अब 'अतिजगती' छन्दके अवान्तर भेद बतलाते हैं – ] जिसके प्रत्येक चरणमें मगण, नगण, जगण, रगण तथा एक गुरु हों, उसकी 'प्रहर्षिणी' संज्ञा है। इसमें तीन और दस अक्षरोंपर विराम होता है। जगण, भगण, सगण,जगण तथा एक गुरुसे युक्त चरणवाले छन्दका नाम 'रुचिरा' है। इसमें चार तथा नौ अक्षरोंपर विराम माना गया है। मगण, तगण, यगण, सगण और एक गुरुयुक्त पादवाले छन्दको 'मत्तमयूर' कहते हैं। इसमें चार और नौ अक्षरोंपर विराम होता है। तीन नगण, एक सगण और एक गुरुसे युक्त पादवाले छन्दकी 'गौरी' संज्ञा है।

[अब शक्करीके अन्तर्गत विविध छन्दोंका वर्णन किया जाता है-] जिसके प्रत्येक पादमें मगण, तगण, नगण, सगण तथा दो गुरु हों और पाँच एवं नौ अक्षरोंपर विराम होता हो, उसका नाम 'असम्बाधा' है। जिसके प्रतिपादमें दो नगण, रगण, सगण और एक लघु और एक गुरु हों तथा सात-सात अक्षरोंपर विराम होता हो, वह 'अपराजिता' नामक छन्द है। दो नगण, भगण, नगण, एक लघु और एक गुरुसे युक्त पादवाले छन्दको 'प्रहरणकलिता' कहते हैं। इसमें सात-सातपर विराम होता है। तगण, भगण, दो जगण और दो गुरुसे युक्त पादवाले छन्दकी 'वसन्ततिलका' (उद्धर्षिणी जनदृशां स्तनभारगुर्वी नीलोत्पलद्युतिमलिम्लुचलोचना च सिंहोन्नतत्रिकतटी कुटिलालकान्ता कान्ता वसन्ततिलका नृपवल्लभासौ ॥) संज्ञा है। [इसमें पादान्तमें विराम होता है। ] किसी-किसी मुनिके मतमें इसका नाम 'सिंहोन्नता' और 'उद्धर्षिणी' भी है ।। १४–१७ ।।

[ इसके आगे 'अतिशक्करी' का अधिकार है।] जिसके प्रत्येक पादमें चार नगण और एक सगण हों, उसका नाम 'चन्द्रावती' (पटुजवपवनचलितजललहरीतरलितविहगनिचयरवमुखरम् विकसितकमलसुरभिशुचिसलिलं विचरति पथिकमनसि शरदि सरः ॥) है। [ इसमें सात - आठपर विराम होता है। ] इसीमें जब छः और नौ अक्षरोंपर विराम हो तो इसका नाम 'माला' (नवविकसितकुवलयदलनयनं अमृतमधुररसमयमृदुवचनम् । मधुरिपुरुचिरजलयुगवरणं परिसर शरणममशरणशरणम् ॥) होता है। आठ और सातपर विराम होनेसे यह छन्द 'मणिगणनिकर' (कथमपि निपतितमतिमहति पदे नरमनुसरति न फलमनुपचितम् । अपि चरयुवतिषु कुचतरनिहतः स्पृशति न वपुरिह मणिगणनिकरः ॥) कहलाता है। दो नगण, मगण और दो यगणसे युक्त चरणोंवाले छन्दको 'मालिनी' (अतिविपुलललाटं पीवरोर: कपाटं सुघटितदशनोष्ठं व्याघ्रतुल्यप्रकोष्ठम्।

पुरुषमशनिलेखालक्षणं वीरलक्ष्मीरतिसुरभियशोभिर्मालिनीवाभ्युपैति)कहते हैं। इसमें भी आठ और सात अक्षरोंपर ही विराम होता है। भगण, रगण, तीन नगण और एक गुरुसे युक्त चरणवाले छन्दको 'ऋषभगजविलसित' (आयतबाहुदण्डमुपचित पृथुहृदयं पीनकटिप्रदेशमृपभगजविलसितम् ॥

वीरमुदारसत्त्वमतिशयगुणरसिकं श्रीरतिचञ्चलापि न परिहरति पुरुषम् ॥) नाम दिया गया है। इसमें सात-नौ अक्षरोंपर विराम होता है। [ यह 'अष्टि' छन्दके अन्तर्गत है।] यगण, मगण, नगण, सगण, भगण, एक लघु तथा एक गुरुसे युक्त चरणोंवाले छन्दको 'शिखरिणी' (यशः शेषीभूते जगति नरनाथे गुणनिधी प्रवृत्ते वैराग्ये विषयरसनिष्क्रान्तमनसाम्। इदानीमस्माकं घनतरुलतां निर्झरवतीं तपस्ततुं चेतो भवति गिरिमालां शिखरिणोम्)कहते हैं। इसमें छः तथा ग्यारह अक्षरोंपर विराम होता है। जिसके प्रत्येक चरणमें जगण, सगण, जगण, सगण, यगण, एक लघु और एक गुरु हों तथा आठ-नौ अक्षरोंपर विराम हो उसका नाम 'पृथ्वी' (हताः समिति शत्रवत्रिभुवने प्रकीर्ण यशः कृतश्च गुणिनां गृहे निरवधिर्महानुत्सवः । त्वया कृतपरिग्रहे क्षितिपवीर सिंहासने नितान्तनिरवग्रहा फलवती च पृथ्वी कृता ॥)है - यह पूर्वकालमें आचार्य पिङ्गलने कहा है। मगण, रगण, नगण, भगण, नगण, एक लघु तथा एक गुरुसे युक्त पदवाले छन्दको 'वंशपत्रपतित' कहते हैं। इसमें दस सातपर विराम होता है। जिसके प्रत्येक चरणमें नगण, सगण, मगण, रगण, सगण, एक लघु तथा एक गुरु हों और छः, चार एवं सात अक्षरोंपर विराम हो, उसका नाम 'हरिणी' है। [शिखरिणीसे मन्दाक्रान्तातकका छन्द 'अत्यष्टि' के अन्तर्गत है। ] मगण, भगण, नगण, दो तगण तथा दो गुरुसे युक्त पादोंवाले छन्दको 'मन्दाक्रान्ता' कहते हैं। इसमें चार छः और सात अक्षरोंपर विराम होता है। जिसके पादोंमें मगण, तगण, नगण तथा तीन यगण हों, वह 'कुसुमितलतावेल्लिता र छन्द है। [ यह 'धृति' छन्दके अन्तर्गत है।] इसमें पाँच, छः तथा सात अक्षरोंपर विराम होता है। जिसके प्रत्येक चरणमें मगण, सगण, जगण, भगण, दो तगण और एक गुरु हों, उसका नाम 'शार्दूलविक्रीडित' है । इसमें बारह तथा सात अक्षरोंपर विराम होता है। [ यह छन्द 'अतिधृति के अन्तर्गत है] ॥ १८-२३ ।।

'सुवदना' छन्द 'कृति के अन्तर्गत है। इसके प्रत्येक पादमें मगण, रगण, भगण, नगण, यगण, भगण, एक लघु और एक गुरु होते हैं। इसमें सात, सात, छः पर विराम होता है। जब कृतिके प्रत्येक पादमें क्रमशः गुरु और लघु अक्षर हों तो उसे 'वृत्त छन्द कहते हैं। मगण, रगण, भगण, नगण और तीन यगणसे युक्त चरणोंवाले छन्दका नाम 'स्रग्धरा है। इसमें सात-सातके तीन विराम होते हैं। [ यह 'प्रकृति' छन्दके अन्तर्गत है । ] जिसके प्रत्येक चरणमें भगण, रगण, नगण, रगण, नगण, रगण, नगण तथा एक गुरु हों और दस-बारह अक्षरोंपर विराम होता हो, उसे सुभद्रक छन्द कहते हैं। [यह 'आकृति' छन्दके अन्तर्गत है।] नगण, जगण, भगण, जगण, भगण, जगण, भगण, एक लघु और एक गुरुसे युक्त पादवाले छन्दकी 'अश्वललिता' संज्ञा है। इसमें ग्यारह बारहपर विराम होता है। [यह - 'विकृति' के अन्तर्गत है ] ॥ २४-२५३ ॥

जिसके प्रत्येक चरणमें दो मगण, एक तगण, चार नगण, एक लघु और एक गुरु हों तथा आठ और पंद्रहपर विराम हो, उसे 'मत्तक्रीडा' [ या मत्ताक्रीडा ] कहते हैं। [यह भी 'विकृति में ही है । ] जिसके पृथक्-पृथक् सभी पादोंमें भगण, तगण, नगण, सगण, फिर दो भगण, नगण और यगण हों तथा पाँच, सात, बारहपर विराम होता हो, उसकी 'तन्वी' संज्ञा है। [यह 'संस्कृति' छन्दके अन्तर्गत है। ] जिसके प्रत्येक चरण में भगण, मगण, सगण, भगण, चार नगण और एक गुरु हों तथा पाँच-पाँच, आठ और सातपर विराम होता हो, उस छन्दका नाम 'क्रौञ्चपदा' (या कपिलाक्षी पिङ्गलकेशी कलिरुचिरनुदिनमनुनयकठिना दीर्घतराभिः स्थूलशिराभिः परिवृतवपुरतिशयकुटिलगतिः । आयतजा निम्नकपोला लघुतरकुचयुगपरिचितइदया सा परिहार्या क्रौञ्चपदा स्त्री ध्रुवमिह निरवधिसुखमभिलषिता ॥) है। [यह 'अभिकृति' के अन्तर्गत है।] जिसके प्रतिपादमें दो मगण, तगण, तीन नगण, रगण, सगण, एक लघु और एक गुरु हों तथा आठ, ग्यारह और सातपर विराम होता हो, उस छन्दको 'भुजंगविजृम्भित' (ये संनद्धानेकानीकैनंरतुरगकरिपरिवृतैः समं तब शत्रवो युद्धश्रद्धालुब्धात्मानस्त्वदभिमुखमपगतभियः पतन्ति धृतायुधाः । ये त्वां दृष्ट्वा संग्रामाग्रे नृपतिवर कृपणमनस चलन्ति दिगन्तरं किं वा सोदुं शक्यन्ते कैर्बहुभिरपि सविषविषमं भुजंगविजृम्भितम् ॥) कहते हैं। [यह 'उत्कृति' छन्दके अन्तर्गत है।] जिसके प्रत्येक पादमें एक मगण, छः नगण, एक सगण और दो गुरु हों तथा नौ, छः छः एवं पाँच अक्षरोंपर विराम होता हो, उसको 'अपहाव' (श्रीकण्ठं त्रिपुरदहनममृतकिरणशकलललितशिरसं रुद्रं भूतेशं हतमुनिमखमखिलभुवननमितचरणयुगमीशानम् । सर्वज्ञं वृषभगमनमहिपतिकृतवलयरुचिरकरमाराध्यं तं वन्दे भवभयभिदमभिमतफलवितरणगुरुमुमया युक्तम् ।।) या 'उपहाव' नाम दिया गया है। [ यह भी 'उत्कृति में ही है ] ॥ २६ - २८ ।।

[ अब 'दण्डक' ( दण्डकका उदाहरण: इह हि भवति दण्डकारण्यदेशे स्थितिः पुण्यभाजां मुनीनां मनोहारिणी त्रिदशविजयिवीर्य दृष्यद्दशग्रीवलक्ष्मीविरामेण रामेण संसेविते । जनकयजनभूमिसम्भूतसीमन्तिनीसीमसीतापदस्पर्शपूताश्रये भुवननिमितपादपद्माभिनानाम्बिकातीर्थयात्रागतानेकसिद्धाकुले ॥) जातिका वर्णन किया जाता है-] जिसके प्रत्येक चरणमें दो नगण और सात रगण हों, उसका नाम 'दण्डक' है; इसको 'चण्डवृष्टिप्रपात' भी कहते हैं। [इसमें पादान्त में विराम होता है। ] उक्त छन्दमें दो नगणके सिवा रगणमें वृद्धि करनेपर 'व्याल', 'जीमूत' आदि नामवाले 'दण्डक' बनते हैं। 'चण्डप्रपात के बाद अन्य जितने भी भेद होते हैं, वे सभी दण्डक प्रस्तार 'प्रचित' (प्रचित दण्डकका उदाहरण: प्रथमकथितदण्डकश्चण्डवृष्टि प्रपाताभिधानो मुनेः पिङ्गलाचार्यनानोमतः प्रचित इति ततः परं दण्डकानामियं जातिरेकैकरेफाभिवृद्ध्या यथेष्टं भवेत् । स्वरुचिविरचितसंज्ञया तद्विशेषैरशेषैः पुनः काव्यमन्येऽपि कुर्वन्तु वागीश्वराः । भवति यदि समानसंख्याक्षरैयंत्र पादव्यवस्था ततो दण्डकः पूज्यतेऽसौ जनैः ॥) कहलाते हैं। अब 'गाथा - प्रस्तार का वर्णन करते हैं ॥ २९-३० ॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'समवृत्तनिरूपण' नामक तीन सौ चौंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३३४ ॥