नारदजी कहते हैं-
मुनिवरो! साधकको चाहिये कि वह देव मन्दिर आदिमें मन्त्रकी साधना करे। घरके भीतर शुद्ध भूमिपर मण्डलमें परमेश्वर श्रीहरिका विशेष पूजन करके चौकोर क्षेत्रमें मण्डल आदिकी रचना करे। दो सौ छप्पन कोष्ठोंमें 'सर्वतोभद्र मण्डल' लिखे। (क्रम यह है कि पूर्वसे पश्चिमकी ओर तथा उत्तरसे दक्षिणकी ओर बराबर सत्रह रेखाएँ खींचे। ऐसा करनेसे दो सौ छप्पन कोष्ठ हो जायेंगे। उनमेंसे बीचके छत्तीस कोष्ठोंको एक करके उनके द्वारा कमल बनावे, अथवा उसे कमलका क्षेत्र निश्चित करे। इस कमलक्षेत्र के बाहर चारों ओरकी एक-एक पंक्तिको मिटाकर उसके द्वारा पीठकी कल्पना करे, अथवा उसे पीठ समझे। फिर पीठसे भी बाहरकी दो-दो पंक्तियोंका मार्जन करके, उनके द्वारा 'वीथी' की कल्पना करे फिर चारों दिशाओं में द्वार निर्माण करे। पूर्वोक्त पद्मक्षेत्रमें सब ओर बाहरके बारहवें भागको छोड़ दे और सर्व मध्य स्थानपर सूत्र रखकर, पद्म निर्माणके लिये विभागपूर्वक समान अन्तर रखते हुए, सूत घुमाकर, तीन वृत्त बनावे। इस तरह उस चौकोर क्षेत्रको वर्तुल (गोल) बना दे। इन तीनोंमेंसे प्रथम तो कर्णिकाका क्षेत्र है, दूसरा केसरका क्षेत्र है और तीसरा दल संधियोंका क्षेत्र है। शेष चौथा अंश दलाग्रभागका स्थान है। कोणसूत्रोंको फैलाकर कोणसे दिशाके मध्यभागतक ले जाय तथा केसरके अग्रभागमें सूत रखकर दल संधियोंको चिह्नित करे ॥ १-६३ ॥
फिर सूत गिराकर अष्टदलोंका निर्माण करे। दलोंके मध्यगत अन्तरालका जो मान है, उसे मध्यमें रखकर उससे दलाग्रको घुमावे। तदनन्तर उसके भी अग्रभागको घुमावे। उनके अन्तराल मानको उनके पार्श्वभागमें रखकर बाह्यक्रमसे एक-एक दलमें दो-दो केसरोंका उल्लेख करे। यह सामान्यतः कमलका चिह्न है। अब द्वादशदल कमलका वर्णन किया जाता है। कर्णिकार्धमानसे पूर्व दिशाकी ओर सूत रखकर क्रमशः सब ओर घुमावे। उसके पार्श्वभागमें भ्रमणयोगसे छः कुण्डलियाँ होंगी और बारह मत्स्यचिह्न बनेंगे। उनके द्वारा द्वादशदल कमल सम्पन्न होगा। पञ्चदल आदिकी सिद्धिके लिये भी इसी प्रकार मत्स्यचिह्नों से कमल बनाकर, आकाशरेखासे बाहर जो पीठभाग है, वहाँके कोष्ठोंको मिटा दे। पीठभागके चारों कोणोंमें तीन-तीन कोष्ठकोंको उस पीठके पायोंके रूपमें कल्पित करे। अवशिष्ट जो चारों दिशाओं में दो-दो जोड़े, अर्थात् चार-चार कोष्ठक हैं, उन सबको मिटा दे। वे पीठके पाटे हैं। पीठके बाहर चारों दिशाओंकी दो-दो पंक्तियोंको वीथी (मार्ग) - के लिये सर्वथा लुप्त कर दे (मिटा दे); तदनन्तर चारों दिशाओं में चार द्वारोंकी कल्पना करे। (वीथीके बाहर जो दो पंक्तियाँ शेष हैं, उनमें से भीतरवाली पंक्तिके मध्यवर्ती दो-दो कोष्ठ और बाहरवाली पंक्तिके मध्यवर्ती चार-चार कोष्ठोंको एक करके द्वार बनाने चाहिये। ) ॥ ७ - १४ ॥
द्वारोंके पार्श्वभागों में विद्वान् पुरुष आठ शोभा स्थानों की कल्पना करे और शोभाके पार्श्वभागमें उपशोभा स्थान बनाये। उपशोभाओंकी संख्या भी उतनी ही बतायी गयी है, जितनी कि शोभाओंकी। उपशोभाओंके समीपके स्थान 'कोण' कहे गये हैं। तदनन्तर चारों दिशाओंमें दो-दो मध्यवर्ती कोष्ठकोंका और उससे बाह्य पंक्तिके चार-चार मध्यवर्ती कोष्ठकोंका द्वारके लिये चिन्तन करे। उन सबको एकत्र करके मिटा दे - इस तरह चार द्वार बन जाते हैं। द्वारके दोनों पार्श्वोमें क्षेत्रकी बाह्य-पंक्तिके एक-एक और भीतरी पंक्तिके तीन-तीन कोष्ठोंको 'शोभा' बनानेके लिये मिटा दे। शोभाके पार्श्वभागमें उसके विपरीत करनेसे, अर्थात् क्षेत्रकी बाह्य पंक्तिके तीन-तीन और भीतरी पंक्तिके एक-एक कोष्ठको मिटानेसे उपशोभाका निर्माण होता है। तत्पश्चात् कोणके भीतर और बाहरके तीन-तीन कोष्ठोंका भेद मिटाकर - एक करके चिन्तन करे ( श्रीविद्यार्णवतन्त्र, बारहवें श्वासमें इस सर्वतोभद्रमण्डलका स्पष्टीकरण इस प्रकार किया गया है- चौकोर क्षेत्र में पूर्वसे पश्चिमको सत्रह रेखाएँ खाँचकर, उनके ऊपर उत्तरसे दक्षिणको और उतनी ही रेखाएँ खाँचे। इस तरह दो सौ छप्पन कोष्ठोंका चतुरस्र मण्डल तैयार होगा। उनमें बीचके छत्तीस कोठों को एक करके उनके बाहरको एक-एक पंक्तिको चारों दिशाओं में मिटाकर पीठकी कल्पना करे। पीठके बाहर चारों दिशाओंको दो-दो पंक्तियोंको एक करके सम्मार्जनपूर्वक चोथौकी कल्पना करे। बीचके छत्तीस कोष्ठोंको जो एक किया गया है, वह कमलका क्षेत्र है; उस क्षेत्र में ही बाहरकी औरसे बारहवाँ भाग खाली छोड़ दे। अर्थात् यदि वह क्षेत्र बारह अङ्गुल लम्बा-चौड़ा है तो चारों ओरसे एक-एक अङ्गुलको खाली छोड़ दे। शेष भागमें सबसे बौचके केन्द्रमें सूत रखकर क्रमशः तीन गोल रेखाएँ खाँचे। ये तीनों एक-दूसरीसे समान अन्तरपर हो। इतर भागोंमें विभक करे और उसके चिह्नका अवलम्बन करते हुए दूसरे बाहरको वीथीको केसरका स्थान हों। इनमें सबसे भीतरी कैसरका मानकर उस कैसरस्थानको सोलह बीचके वृत्तको कमलकी कर्णिका माने। उससे और तीसरे वृत्तोंमें अन्तराल-मानसूत्रके मानसे गुरुकी बतायी हुई युक्तिद्वारा सोलह अर्धचन्द्रोंकी कल्पना करे। उनके द्वारा आठ दलोंका निर्माण करके तृतीय वृत्तसे बाहर छोड़े हुए एक अंशके खाली स्थानसे बोचके चिह्नका अवलम्बन करते हुए एक और वृत्त बनावे। वहाँ गुरुकी बतायी युक्तिसे दलाग्रोंका निर्माण करे। एक-एक दलके मूलमें जिस तरह दो-दो केसर दीख पढ़ें, उस तरहको रचना करके कमलको साङ्गोपाङ्ग सम्पन्न करके पद्मक्षेत्र से बाहर जो एक पंक्तिरूप चतुरस पीठ है, उसके चारों कौणोंमें तीन-तीन कोष्ठोंको पीठके । एकीकृत शेष कष्टोको पाये माने और पीठके अन्य अङ्ग होनेकी कल्पना करे। पीठके बाहरकी वीथीरूप दो-दो पंक्तियोंका भलीभाँति मार्जन करके वीथीके बाहरकी एक पंक्तिमें चारों दिशाओंके जो मध्यवर्ती दो-दो कोड हैं, उनको एक करके सबसे बाहरी पंक्तिमें भी चारों दिशाओं के मध्यवर्ती चार-चार कोष्ठोंको मिटाकर चार द्वार निर्माण करे इन द्वारोंके उभयपाश्रमें दोनों पंक्तियोंके कोष्ठोंमेंसे भीतरी पंतिके तीन और बाहरी पंक्तिके एक-इन चार कोष्ठोंको एक करके 'शोभा' बनावे। शोभाकै पार्श्वभागोंमें भीतरी पंक्तिका एक और बाहरी पंडिके तीन-इन चार कोष्ठोंको एक करके 'उपशोभा' बनावे अवशिष्ट जो छः-छ: फोष्ठ हैं, उनके द्वारा चारों कोणोंकी कल्पना करे। इस प्रकार सर्वतोभद्रमण्डलका निर्माण करके, कमलकी कर्णिका, कैसर, दलाप्रपीठ, वीथी, द्वार, शोभा, उपशोभा और कोण-स्थानोंको पाँच प्रकारके रंगसे रक्षित करके उक्त मण्डलकी शोभा बढ़ावे)॥ १५-१८॥
इस प्रकार सोलह सोलह कोष्ठोंसे बननेवाले दो सौ छप्पन कोष्ठवाले मण्डलका वर्णन हुआ। इसी तरह दूसरे मण्डल भी बन सकते हैं। बारह बारह कोष्ठोंसे (एक सौ चौवालीस) कोष्ठकोंका जो मण्डल बनता है, उसमें भी मध्यवर्ती छत्तीस पदों (कोष्ठों) का कमल होता है। इसमें वीथी नहीं होती। एक पंक्ति पीठके लिये होती है। शेष दो पंक्तियोंद्वारा पूर्वव द्वार और शोभाकी कल्पना होती है। इसमें उपशोभा नहीं देखी जाती। अवशिष्ट छः पदोंद्वारा कोणोंकी कल्पना करनी चाहिये।) एक हाथके मण्डलमें बारह अङ्गुलका कमल क्षेत्र होता है। दो हाथ मण्डलमें कमलका स्थान एक हाथ लंबा-चौड़ा होता है। तदनुसार वृद्धि करके द्वार आदिके साथ मण्डलकी रचना करे दो हाथका पीठ-रहित चतुरस्रमण्डल हो तो उसमें चक्राकार कमल (चक्राब्ज) का निर्माण करे। नौ अङ्गुलोंका 'पद्मार्ध' कहा गया है। तीन अङ्गुलोंकी 'नाभि' मानी गयी है। आठ अङ्गुलोंके 'अरे' बनावे और चार अङ्गलोंकी 'नेमि'। क्षेत्रके तीन भाग करके, फिर भीतरसे प्रत्येकके दो भाग करे भीतरके जो पाँच कोष्ठक हैं, उनको अरे या आरे बनानेके लिये आस्फालित (मार्जित) करके उनके ऊपर 'अरे' अङ्कित करे। वे अरे इन्दीवरके दलोंकी सी आकृतिवाले हों, अथवा मातुलिङ्ग (बिजौरा नीबू) के आकारके हों या कमलदलके समान विस्तृत हों, अथवा अपनी इच्छाके अनुसार उनकी आकृति अङ्कित करे। अरोंकी संधियोंके बीचमें सूत रखकर उसे बाहरकी नेमितक ले जाय और चारों ओर घुमावे। अरेके मूलभागको उसके संधि स्थानमें सूत रखकर घुमावे तथा अरेके मध्यमें सूत्र स्थापन करके उस मध्यभागके सब ओर समभावसे सूतको घुमावे। इस तरह घुमानेसे मातुलिङ्गके समान 'अरे' बन जायँगे ॥ १९–२६ ॥
चौदह पदोंके क्षेत्रको सात भागों में बाँटकर पुनः दो-दो भागों में बाँटे अथवा पूर्वसे पश्चिम तथा उत्तरसे दक्षिणकी ओर पंद्रह-पंद्रह समान रेखाएँ खींचे। ऐसा करनेसे एक सौ छियानबे कोष्ठक सिद्ध होंगे। वे जो कोष्ठक हैं, उनमें से बीचके चार कोष्ठोंद्वारा 'भद्रमण्डल' लिखे। उसके चारों ओर वीथीके लिये स्थान छोड़ दे। फिर सम्पूर्ण दिशाओंमें कमल लिखे। उन कमलोंके चारों ओर वीथीके लिये एक-एक कोष्ठका मार्जन कर दे। तत्पश्चात् मध्यके दो-दो कोष्ठ ग्रीवाभागके लिये विलुप्त कर दे। फिर बाहरके जो चार कोष्ठ हैं, उनमेंसे तीन-तीनको सब ओर मिटा दे। बाहरका एक एक कोष्ठ ग्रीवाके पार्श्वभागमें शेष रहने दे उसे द्वार-शोभाकी संज्ञा दी गयी है।
बाह्य कोणोंमें सातको छोड़कर भीतर-भीतरके तीन-तीन कोष्ठोंका मार्जन कर दे। इसे 'नवनाल' या 'नवनाभ-मण्डल' कहते हैं। उसकी नौ नाभियोंमें नवव्यूहस्वरूप श्रीहरिका पूजन करे। पचीस व्यूहोंका जो मण्डल है, वह विश्वव्यापी है, अथवा सम्पूर्ण रूपोंमें व्याप्त है। बत्तीस हाथ अथवा कोष्ठवाले क्षेत्रको बत्तीससे ही बराबर बराबर विभक्त कर दे; अर्थात् ऊपरसे नीचेको तैंतीस रेखाएँ खींचकर उनपर तैंतीस आड़ी रेखाएँ खींचे। इससे एक हजार चौबीस कोष्ठक बनेंगे। उनमेंसे बीचके सोलह कोष्ठोंद्वारा 'भद्रमण्डल' की रचना करे। फिर चारों ओरकी एक-एक पंक्ति छोड़ दे। तत्पश्चात् आठों दिशाओं में सोलह कोष्ठकोंद्वारा आठ भद्रमण्डल लिखे। इसे 'भद्राष्टक' की संज्ञा दी गयी है ॥ २७-३४॥
उसके बादकी भी एक पंक्ति मिटाकर पुनः पूर्ववत् सोलह भद्रमण्डल लिखे। तदनन्तर सब ओरकी एक-एक पंक्ति मिटाकर प्रत्येक दिशामें तीन-तीनके क्रमसे बारह द्वारोंकी रचना करे।
बाहरके छः कोष्ठ मिटाकर बीचके पार्श्वभागोंके चार मिटा दे। फिर भीतरके चार और बाहरके दो कोष्ठ 'शोभा' के लिये मिटावे। इसके बाद उपद्वारकी सिद्धि के लिये भीतरके तीन और बाहरके पाँच कोष्ठोंका मार्जन करे। तत्पश्चात् पूर्ववत् 'शोभा' की कल्पना करे। कोणोंमें बाहर के सात और भीतरके तीन कोष्ठ मिटा दे। इस प्रकार जो पञ्चविंशतिका व्यूहमण्डल तैयार होता है, उसके भीतरकी कमलकर्णिकामें परब्रह्म परमात्माका यजन करे। फिर पूर्वादि दिशाओंके कमलों में क्रमश: वासुदेव आदिका पूजन करे। तत्पश्चात् पूर्ववर्ती कमलपर भगवान् वराहका पूजन करके क्रमशः सम्पूर्ण (अर्थात् पचीस) व्यूहोंकी पूजा करे। यह क्रम तबतक चलता रहे, जबतक छब्बीसवें तत्त्व- परमात्माका पूजन न सम्पन्न हो जाय। इस विषयमें प्रचेताका मत यह है कि एक ही मण्डलमें इन सम्पूर्ण कथित व्यूहोंका क्रमशः पूजन-यज्ञ सम्पन्न होना चाहिये। परंतु 'सत्य' का कथन है कि मूर्तिभेदसे भगवान्के व्यक्तित्वमें भेद हो जाता है; अतः सबका पृथक् पृथक् पूजन करना उचित है। बयालीस कोष्ठवाले मण्डलको आड़ी रेखाद्वारा क्रमशः विभक्त करे । पहले एक-एकके सात भाग करे; फिर प्रत्येक के तीन-तीन भाग और उसके भी दो-दो भाग करे। इस प्रकार एक हजार सात सौ चौंसठ कोष्ठक बनेंगे। बीचके सोलह कोष्ठोंसे कमल बनावे । पार्श्वभागमें वीथीकी रचना करे। फिर आठ भद्र और वीथी बनावे। तदनन्तर सोलह दलके कमल और वीथीका निर्माण करे। तत्पश्चात् क्रमशः चौबीस दलके कमल, वीथी, बत्तीस दल के कमल, वीथी, चालीस दलके कमल और वीथी बनावे। तदनन्तर शेष तीन पंक्तियोंसे द्वार, शोभा और उपशोभाएँ बनेंगी। सम्पूर्ण दिशाओंके मध्यभागमें द्वारसिद्धिके लिये दो, चार और छः कोष्ठकोंको मिटावे। उसके बाह्यभागमें शोभा तथा उपद्वारकी सिद्धिके लिये पाँच, तीन और एक कोष्ठ मिटावे द्वारोंके पार्श्वभागोंमें भीतरकी ओर क्रमशः छ तथा चार कोष्ठ मिटावे और बीचके दो-दो कोष्ठ लुप्त कर दे। इस तरह छः उपशोभाएँ बन जायँगी। एक-एक दिशामें चार-चार शोभाएँ और तीन-तीन द्वार होंगे। कोणोंमें प्रत्येक पंक्तिके पाँच-पाँच कोष्ठ छोड़ दे। वे कोण होंगे। इस तरह रचना करनेपर सुन्दर अभीष्ट मण्डलका निर्माण होता है ॥ ३५-५० ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'सर्वतोभद्र आदि मण्डलके लक्षणका वर्णन' नामक उन्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २९ ॥
Summary of chapter 30 of the Agni Mahā Purana is as follows:
Expanding on the previous chapter, this chapter provides a comprehensive manual for Śrāddha — the ceremony of offerings to the departed ancestors performed on specific lunar tithis, at eclipses, at sacred tīrtha-s, and especially during the Pitṛ Pakṣa fortnight. The preparation of ritual foods — piṇḍa (balls of cooked rice mixed with sesame, honey, and milk) — and the sequence of their offering to the three generations of paternal and maternal ancestors are described. The categories of brāhmaṇas to be invited to the śrāddha feast and those who must be excluded are enumerated. The belief that ancestral spirits, however far removed in time, receive the essence of whatever is offered through the ritual is affirmed. The extraordinary merit of śrāddha — removing the pitṛ-s from suffering states and ensuring the flourishing of the living family — is celebrated.