अग्नि महा पुराण

[ वर-वधूके गुण और विवाहादि संस्कारोंके कालका विचार; शत्रुके वशीकरण एवं स्तम्भन सम्बन्धी मन्त्र; ग्रहण दान; सूर्य संक्रान्ति एवं ग्रहोंकी महादशा ]

अग्निदेव कहते हैं-

मुने! अब मैं शुभ अशुभका विवेक प्रदान करनेवाले संक्षिप्त ज्यौतिष शास्त्रका वर्णन करूँगा, जो चार लक्ष श्लोकवाले विशाल ज्यौतिषशास्त्रका सारभूत अंश है, जिसे जानकर मनुष्य सर्वज्ञ हो सकता है। यदि कन्याकी राशिसे वरकी राशिसंख्या परस्पर छः आठ, नौ-पाँच और दो-बारह हो तो विवाह शुभ नहीं होता है। शेष दस-चार, ग्यारह-तीन । और सम सप्तक (सात-सात) हो तो विवाह शुभ होता है। यदि कन्या और वरकी राशिके स्वामियों में परस्पर मित्रता हो या दोनोंकी राशियोंका एक ही स्वामी हो, अथवा दोनोंकी ताराओं (जन्म नक्षत्रों) में मैत्री हो तो नौ पाँच तथा दो बारहका दोष होनेपर भी विवाह कर लेना चाहिये; किंतु षडष्टक (छ: आठ) के दोषमें - तो कदापि विवाह नहीं हो सकता(नारदपुराण, पूर्वभाग, द्वितीयपाद अध्याय ५६, श्लोक ५०४ में भी यही बात कही गयी है।)। गुरु-शुक्रके अस्त रहनेपर विवाह करनेसे वधूके पतिका निधन | हो जाता है। गुरु क्षेत्र (धनु, मीन) में सूर्य हो एवं सूर्यके क्षेत्र (सिंह) में गुरु हो तो विवाहको अच्छा नहीं मानते हैं; क्योंकि वह विवाह कन्याके लिये वैधव्यकारक होता है ॥ १-५॥

(संस्कार मुहूर्त) बृहस्पतिके वक्र रहनेपर तथा अतिचारी होनेपर विवाह तथा उपनयन नहीं करना चाहिये। आवश्यक होनेपर अतिचारके समय त्रिपक्ष अर्थात् डेढ़ मास तथा वक्र होनेपर चार मास छोड़कर शेष समयमें विवाह उपनयनादि - शुभ संस्कार करने चाहिये। चैत्र पौषमें, रिक्ता तिथिमें, भगवान्‌के सोनेपर, मङ्गल तथा रविवारमें, चन्द्रमाके क्षीण रहनेपर भी विवाह शुभ नहीं होता है। संध्याकाल (गोधूलि समय) शुभ होता - है। रोहिणी, तीनों उत्तरा, मूल, स्वाती, हस्त, रेवती- इन नक्षत्रोंमें, तुला लग्नको छोड़कर मिथुनादि द्विस्वभाव एवं स्थिर लग्नोंमें विवाह करना शुभ होता है। विवाह, कर्णवेध, उपनयन तथा पुंसवन संस्कारों में, अन्न- प्राशन तथा प्रथम चूड़ाकर्ममें विद्धनक्षत्रको ( विद्धनक्षत्रके परिज्ञानके लिये नारदपुराण, अध्याय ५६ के श्लोक ४८३-८४ में पञ्चशलाका वेधका इस प्रकार वर्णन है-पाँच रेखाएँ पड़ी और पाँच रेखाएँ खड़ी खींचकर दो-दो रेखाएँ कोणोंमें खींचने (बनाने) से पञ्चशलाका चक्र बनता है। इस चक्रके ईशानकोणवाली दूसरी रेखामें कृत्तिकाको लिखकर आगे प्रदक्षिणक्रमसे रोहिणी आदि अभिजितसहित सम्पूर्ण नक्षत्रोंका उल्लेख करे। जिस रेखामें ग्रह हो, उसी रेखाकी दूसरी ओरवाला नक्षत्र विद्ध समझा जाता है। इस विषयको भलीभाँति समझने के लिये निम्नाङ्कित चक्रपर दृष्टिपात करें―) त्याग देना चाहिये ॥ ६ - ९॥

श्रवण, मूल, पुष्य - इन नक्षत्रोंमें, रवि, मङ्गल, बृहस्पति – इन वारों में तथा कुम्भ, सिंह, मिथुन - इन लग्नोंमें पुंसवन-कर्म करनेका विधान है। हस्त, मूल, मृगशिरा और रेवती नक्षत्रों में बुध और शुक्र वारमें बालकोंका निष्कासन शुभ होता है। रवि, सोम, बृहस्पति तथा शुक्र— इन दिनों में, मूल नक्षत्रमें प्रथम बार ताम्बूल-भक्षण करना चाहिये। शुक्र तथा बृहस्पति वारको, मकर और मीन लग्नमें, हस्तादि पाँच नक्षत्रोंमें, पुष्यमें तथा कृत्तिकादि तीन नक्षत्रों में अन्नप्राशन करना चाहिये। अश्विनी, रेवती, पुष्य, हस्त, ज्येष्ठा, रोहिणी और श्रवण नक्षत्रोंमें नूतन अन्न और फलका भक्षण शुभ होता है। स्वाती तथा मृगशिरा नक्षत्र में औषध सेवन करना शुभ होता है।

( रोग-मुक्त-स्नान) तीनों पूर्वा, मघा, भरणी, स्वाती तथा श्रवणसे तीन नक्षत्रों में, रवि, शनि और मङ्गल - इन वारोंमें रोग-विमुक्त व्यक्तिको स्नान करना चाहिये ॥ १० - १४६ ॥

( यन्त्र प्रयोग ) मिट्टीके चौकोर पट्टपर आठ दिशाओंमें आठ 'ह्रीं' कार और बीचमें अपना नाम लिखे अथवा पार्थिव पट्ट या भोजपत्रपर आठों दिशाओं में 'ह्रीं' लिखकर मध्यमें अपना नाम गोरोचन तथा कुङ्कुमसे लिखे। ऐसे यन्त्रको वस्त्रमें लपेटकर गलेमें धारण करनेसे शत्रु निश्चय ही वशमें हो जाते हैं। इसी तरह गोरोचन तथा कुङ्कुमसे 'श्रीं' 'ह्रीं' मन्त्रद्वारा सम्पुटित नामको आठ भूर्जपत्र खण्डपर लिखकर पृथ्वी में गाड़ दे तो शीघ्र विदेश गया हुआ व्यक्ति वापस आता है और उसी यन्त्रको हल्दीके रस से शिलापट्टपर लिखकर नीचे मुख करके पृथ्वीपर रख दे तो शत्रुका स्तम्भन होता है। 'ॐ' 'हूं' 'सः' मन्त्रसे सम्पुटित नाम गोरोचन तथा कुङ्कुमसे आठ भूर्जपत्रोंपर लिखकर रखा जाय तो मृत्युका निवारण होता है। यह यन्त्र एक, पाँच और नौ बार लिखनेसे परस्पर प्रेम होता है। दो, छः या बारह बार लिखनेसे वियुक्त व्यक्तियोंका संयोग होता है और तीन, सात या ग्यारह बार लिखनेसे लाभ होता है और चार, आठ और बारह बार लिखनेसे परस्पर शत्रुता होती है ॥ १५ - २०॥ ( भाव और तारा) मेषादि लग्नोंसे तनु, धन, सहज, सुहत्, सुत, रिपु, जाया, निधन, धर्म, कर्म, आय व्यय- ये बारह भाव होते हैं। अब नौ ताराओंका बल बतलाता हूँ। जन्म, संपत्, विपत् क्षेम, प्रत्यरि, साधक, मृत्यु, मैत्र और अतिमैत्र- ये नौ तारे होते हैं। बुध, बृहस्पति, शुक्र, रवि तथा सोम वारको और माघ आदि छः मासोंमें प्रथम क्षौर कर्म (बालकका मुण्डन) कराना शुभ कहा गया है। बुधवार तथा गुरुवारको एवं पुष्य, श्रवण और चित्रा नक्षत्र में कर्णवेध-संस्कार शुभ होता है। पाँचवें वर्षमें प्रतिपदा, षष्ठी, रिक्ता और पूर्णिमा तिथियोंको एवं मङ्गलवारको छोड़कर शेष वारोंमें सरस्वती, विष्णु और लक्ष्मीका पूजन करके अध्ययन (अक्षरारम्भ) करना चाहिये। माघसे लेकर छः मासतक अर्थात् आषाढतक उपनयन संस्कार शुभ होता है। चूडाकरण आदि कर्म श्रावण आदि छः मासोंमें प्रशस्त नहीं माने गये हैं। गुरु तथा शुक्र अस्त हो गये हों और चन्द्रमा क्षीण हों तो यज्ञोपवीत संस्कार करनेसे बालककी मृत्यु अथवा - जडता होती है, ऐसा संकेत कर दे। क्षौरमें कहे हुए नक्षत्रोंमें तथा शुभ ग्रहके दिनों में समावर्तन संस्कार करना शुभ होता है ॥ २१ - २८ ॥

( विविध मुहूर्त - ) लग्नमें शुभ ग्रहोंकी राशि हो और लग्नमें शुभ ग्रह बैठे हों या उसे देखते हों तथा अश्विनी, मघा, चित्रा, स्वाती, भरणी, तीनों उत्तरा, पुनर्वसु और पुष्य नक्षत्र हों तो ऐसे समयमें धनुर्वेदका आरम्भ शुभ होता है। भरणी, आर्द्रा, मघा, आश्लेषा, कृत्तिका, पूर्वाफाल्गुनी - इन नक्षत्रों में जीवनकी इच्छा रखनेवाला पुरुष नवीन वस्त्र धारण न करे। बुध, बृहस्पति तथा शुक्र— इन दिनों में वस्त्र धारण करना चाहिये। विवाहादि माङ्गलिक कार्योंमें वस्त्र

धारणके लिये नक्षत्रादिका विचार नहीं करना चाहिये। रेवती, अश्विनी, धनिष्ठा और हस्तादि पाँच नक्षत्रोंमें चूड़ी, मूँगा तथा रत्नोंका धारण करना शुभ होता है ॥ २९-३२ ॥

( क्रय विक्रय मुहूर्त –) भरणी, आश्लेषा, धनिष्ठा, तीनों पूर्वा और कृत्तिका - इन नक्षत्रों में खरीदी हुई वस्तु हानिकारक (घाटा देनेवाली) होती है और बेचना लाभदायक होता है। अश्विनी, स्वाती, चित्रा, रेवती, शतभिषा, श्रवण – इन - नक्षत्रों में खरीदा हुआ सामान लाभदायक होता है और बेचना अशुभ होता है। भरणी, तीनों पूर्वा, आर्द्रा, आश्लेषा, मघा, स्वाती, कृत्तिका, ज्येष्ठा और विशाखा – इन नक्षत्रों में स्वामीकी सेवाका - आरम्भ नहीं करना चाहिये। साथ ही इन नक्षत्रों में दूसरेको द्रव्य देना, ब्याजपर द्रव्य देना, थाती या धरोहरके रूपमें रखना आदि कार्य भी नहीं करने चाहिये। तीनों उत्तरा, श्रवण और ज्येष्ठा- इन नक्षत्रों में राज्याभिषेक करना चाहिये । चैत्र, ज्येष्ठ, भाद्रपद, आश्विन, पौष और माघ इन मासोंको छोड़कर शेष मासोंमें गृहारम्भ शुभ होता है। अश्विनी, रोहिणी, मूल, तीनों उत्तरा, मृगशिरा, स्वाती, हस्त और अनुराधा - ये नक्षत्र और मङ्गल तथा रविवारको छोड़कर शेष दिन गृहारम्भ, तड़ाग, वापी एवं प्रासादारम्भके लिये शुभ होते हैं। गुरु सिंह राशिमें हों तब, गुर्वादित्यमें - ( अर्थात् जब सिंह राशिके गुरु और धन एवं मीन राशिओंके सूर्य हों,) अधिक मासमें और शुक्रके बाल, वृद्ध तथा अस्त रहनेपर गृह सम्बन्धी कोई कार्य नहीं करना चाहिये। श्रवणसे पाँच नक्षत्रों में तृण तथा काष्ठोंके संग्रह करनेसे अग्निदाह, भय, रोग, राजपीड़ा तथा धन-क्षति होती है। (गृह प्रवेश -) धनिष्ठा, तीनों उत्तरा, - शतभिषा – इन नक्षत्रों में गृहप्रवेश करना चाहिये । - (नौका निर्माण -) द्वितीया, तृतीया, पञ्चमी, - सप्तमी, त्रयोदशी - इन तिथियों में नौका बनवाना शुभ होता है। (नृपदर्शन —) धनिष्ठा, हस्त, रेवती, अश्विनी-इन नक्षत्रों में राजाका दर्शन करना शुभ होता है। ( युद्धयात्रा -) तीनों पूर्वा, धनिष्ठा, आर्द्रा, कृत्तिका, मृगशिरा, विशाखा, आश्लेषा और अश्विनी– इन नक्षत्रोंमें की हुई युद्धयात्रा सम्पत्ति लाभपूर्वक सिद्धिदायिनी होती है। (गौओंके गोष्ठसे बाहर ले जाने या गोष्टके भीतर लानेका मुहूर्त -) अष्टमी, सिनीवाली (अमावास्या) तथा चतुर्दशी तिथियों में तीनों उत्तरा, रोहिणी, श्रवण, हस्त और चित्रा - इन नक्षत्रों में बेचनेके लिये गोशालासे पशुको बाहर नहीं ले जाना चाहिये और खरीदे हुए पशुओंका गोशालामें प्रवेश भी नहीं कराना चाहिये। (कृषि कर्म मुहूर्त) स्वाती, तीनों उत्तरा, रोहिणी, मृगशिरा, मूल, पुनर्वसु, पुष्य, हस्त तथा श्रवण - इन नक्षत्रों में सामान्य कृषि कर्म करना चाहिये। पुनर्वसु, तीनों उत्तरा, स्वाती, पूर्वाफाल्गुनी, मूल, ज्येष्ठा और शतभिषा इन नक्षत्रोंमें, रवि, सोम,गुरु तथा शुक्र— इन वारोंमें, वृष, मिथुन, कन्या - इन लग्नोंमें, द्वितीया, पञ्चमी, दशमी, सप्तमी, तृतीया और त्रयोदशी - इन तिथियों में (हल प्रवहणादि) कृषि कर्म करना चाहिये।

रेवती, रोहिणी, ज्येष्ठा, कृत्तिका, हस्त, अनुराधा, तीनों उत्तरा- इन नक्षत्रोंमें, शनि एवं मङ्गलवारोंको छोड़कर दूसरे दिनोंमें सभी सम्पत्तियों की प्राप्ति लिये बीज- वपन करना चाहिये।

( धान्य काटने तथा घरमें रखनेका मुहूर्त —) रेवती, हस्त, मूल, श्रवण, पूर्वाफाल्गुनी, - अनुराधा, मघा, मृगशिरा — इन नक्षत्रों में तथा - मकर लग्नमें धान्य छेदन (धान काटनेका) मुहूर्त शुभ होता है और हस्त, चित्रा, पुनर्वसु, स्वाती, रेवती तथा श्रवणादि तीन नक्षत्रों में भी धान्य छेदन शुभ है। स्थिर लग्न तथा बुध, गुरु, शुक्रवारों में, भरणी, पुनर्वसु, मघा, ज्येष्ठा, तीनों उत्तरा- इन नक्षत्रों में अनाजको डेहरी या बखार आदिमें रखे ॥ ३३-५१ ॥

( धान्य वृद्धि के लिये मन्त्र-) 'ॐ धनदाय सर्वधनेशाय देहि मे धनं स्वाहा।'― 'ॐ नवे वर्षे इलादेवि! लोकसंवद्धिनि! कामरूपिणि! देहि मे धनं स्वाहा।'– इन मन्त्रोंको पत्ते या भोजपत्रपर लिखकर धान्यकी राशिमें रख दे तो धान्यकी वृद्धि होती है। तीनों पूर्वा, विशाखा, धनिष्ठा और शतभिषा - इन छः नक्षत्रों में बखारसे धान्य निकालना चाहिये। (देवादि प्रतिष्ठा मुहूर्त - ) सूर्यके उत्तरायणमें रहनेपर देवता, बाग, तड़ाग, वापी आदिकी प्रतिष्ठा करनी चाहिये । भगवान्‌के शयन, पार्श्व परिवर्तन और जागरणका उत्सव - ) मिथुन राशिमें सूर्यके - रहनेपर अमावास्याके बाद जब द्वादशी तिथि होती है, उसीमें सदैव भगवान् चक्रपाणिके शयनका उत्सव करना चाहिये। सिंह तथा तुला राशिमें सूर्यके रहनेपर अमावास्याके बाद जो दो द्वादशी तिथियाँ होती हैं, उनमें क्रमसे भगवान्का पार्श्व परिवर्तन तथा प्रबोधन (जागरण) होता है। कन्या - राशिका सूर्य होनेपर अमावास्याके बाद जो अष्टमी तिथि होती है, उसमें दुर्गाजी जागती हैं।

(त्रिपुष्करयोग - ) जिन नक्षत्रोंके तीन चरण दूसरी राशिमें प्रविष्ट हों (जैसे कृत्तिका, पुनर्वसु, उत्तराफाल्गुनी, विशाखा, उत्तराषाढ़ा और पूर्वभाद्रपदा- इन नक्षत्रों में जब भद्रा द्वितीया, सप्तमी और द्वादशी तिथियाँ हों एवं रवि, शनि तथा मङ्गलवार हों तो त्रिपुष्करयोग होता है। (चन्द्र- बल-) प्रत्येक व्यावहारिक कार्यमें चन्द्र तथा ताराकी शुद्धि देखनी चाहिये। जन्मराशि में तथा जन्मराशिसे तृतीय, षष्ठ, सप्तम, दशम, एकादश स्थानोंपर स्थित चन्द्रमा शुभ होते हैं। शुक्ल पक्ष में द्वितीय, पञ्चम, नवम चन्द्रमा भी शुभ होता है।

( तारा शुद्धि -) मित्र, अतिमित्र, साधक, सम्पत् और क्षेम आदि ताराएँ शुभ हैं। 'जन्म तारा' से मृत्यु होती है, 'विपत्ति-तारा से धनका विनाश होता है, 'प्रत्यरि' और 'मृत्युतारा' में निधन होता है। (अतः इन ताराओं में कोई नया काम या यात्रा नहीं करनी चाहिये ।) ( क्षीण और पूर्ण चन्द्र ) कृष्ण पक्षकी अष्टमीसे शुक्ल पक्षकी अष्टमी तिथितक चन्द्रमा क्षीण रहता है; इसके बाद वह पूर्ण माना जाता है।

( महाज्येष्ठी -) वृष तथा मिथुन राशिका सूर्य हो, - गुरु मृगशिरा अथवा ज्येष्ठा नक्षत्रमें हो और गुरुवारको पूर्णिमा तिथि हो तो वह पूर्णिमा 'महाज्येष्ठी' कही जाती है। ज्येष्ठामें गुरु तथा चन्द्रमा हों, रोहिणीमें सूर्य हो एवं ज्येष्ठ मासकी पूर्णिमा हो तो वह पूर्णिमा 'महाज्येष्ठी' कहलाती है। स्वाती नक्षत्रके आनेसे पूर्व ही यन्त्रपर इन्द्रदेवका पूजन करके उनका ध्वजारोपण करना चाहिये; श्रवण अथवा अश्विनीमें या सप्ताहके अन्तमें उसका विसर्जन करना चाहिये ॥ ५२-६४ ॥

( ग्रहणमें दानका महत्त्व - ) सूर्यके राहुद्वारा ग्रस्त होनेपर अर्थात् सूर्यग्रहण लगनेपर सब प्रकारका दान सुवर्ण-दानके समान है, सब ब्राह्मण ब्रह्माके समान होते हैं और सभी जल गङ्गाजलके समान हो जाते हैं। (संक्रान्तिका कथन - ) सूर्यकी संक्रान्ति रविवारसे लेकर शनिवारतक किसी-न-किसी दिन होती है। इस क्रमसे उस संक्रान्तिके सात भिन्न-भिन्न नाम होते हैं। यथा - घोरा, ध्वाङ्क्षी, महोदरी, मन्दा, मन्दाकिनी, युता (मिश्रा) तथा राक्षसी कौलव, शकुनि और किंस्तुघ्न करणोंमें सूर्य यदि संक्रमण करे तो लोग सुखी होते हैं। गर, वव, वणिक्, विष्टि और बालव-इन पाँच करणोंमें यदि सूर्य संक्रान्ति बदले तो प्रजा राजाके दोषसे सम्पत्तिके साथ पीड़ित होती है। चतुष्पात्, तैतिल और नाग-इन करणोंमें सूर्य यदि संक्रमण करे तो देशमें दुर्भिक्ष होता है, राजाओं में संग्राम होता है तथा पति-पत्नीके जीवनके लिये भी संशय उपस्थित होता है ॥ ६६ - ७० ॥

( रोगकी स्थितिका विचार -) जन्म नक्षत्र या आधान (जन्मसे उन्नीसवें) नक्षत्र में रोग उत्पन्न हो जाय, तो अधिक क्लेशदायक होता है। कृत्तिका नक्षत्र में रोग उत्पन्न हो तो नौ दिनतक, रोहिणीमें उत्पन्न हो तो तीन राततक तथा मृगशिरा में हो तो पाँच राततक रहता है। आर्द्रामें रोग हो तो प्राणनाशक होता है। पुनर्वसु तथा पुष्य नक्षत्रों में रोग हो तो सात राततक बना रहता है। आश्लेषाका रोग नौ राततक रहता है। मघाका रोग अत्यन्त घातक या प्राणनाशक होता है। पूर्वाफाल्गुनीका रोग दो मासतक रहता है। उत्तराफाल्गुनीमें उत्पन्न हुआ रोग तीन दिनोंतक रहता है। हस्त तथा चित्राका रोग पंद्रह दिनोंतक पीड़ा देता है । स्वातीका रोग दो मासतक, विशाखाका बीस दिन, अनुराधाका रोग दस दिन और ज्येष्ठका पंद्रह दिन रहता है। मूल नक्षत्रमें रोग हो तो वह छूटता ही नहीं है। पूर्वाषाढ़ाका रोग पाँच दिन रहता है। उत्तराषाढ़ाका रोग बीस दिन, श्रवणका दो मास, धनिष्ठाका पंद्रह दिन और शतभिषाका रोग दस दिनोंतक रहता है। पूर्वाभाद्रपदाका रोग छूटता ही नहीं। उत्तराभाद्रपदाका रोग सात दिनोंतक रहता है ('बुध्नार्यमेज्यादितिधातृभे नगाः' (मुहू० चिन्ता०, नक्ष० प्रक० ४६) के अनुसार उत्तराभाद्रपदामें उत्पन्न रोग सात दिन रहता है।)। रेवतीका रोग दस रात और अश्विनीका रोग एक दिन-रात मात्र रहता है; किंतु भरणीका रोग प्राणनाशक होता है। (रोग-शान्तिका उपाय - ) पञ्चधान्य तिल और घृत आदि हवनीय सामग्रीद्वारा गायत्री मन्त्रसे हवन करनेपर रोग छूट जाता है और शुभ फलकी प्राप्ति होती है तथा ब्राह्मणको दूध देनेवाली गौका दान करनेसे रोगका शमन हो जाता है। ॥ ७१ - ७७ ॥

(अष्टोत्तरी-क्रमसे) सूर्यकी दशा छः वर्षकी होती है। इसी प्रकार चन्द्रदशा पंद्रह वर्ष, मङ्गलकी आठ वर्ष, बुधकी सत्रह वर्ष, शनिकी दस वर्ष, बृहस्पतिकी उन्नीस वर्ष, राहुकी बारह वर्ष और शुक्रकी इक्कीस वर्ष महादशा चलती है ॥ ७८-७९ ॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'ज्योतिषशास्त्रका कथन' नामक एक सौ इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२१ ॥