शंकरजी कहते हैं-
अब मैं 'कोटचक्र' का वर्णन करता हूँ - पहले चतुर्भुज लिखे, उसके भीतर दूसरा चतुर्भुज, उसके भीतर तीसरा चतुर्भुज और उसके भीतर चौथा चतुर्भुज लिखे। इस तरह लिख देनेपर 'कोटचक्र' बन जाता है। कोटचक्रके भीतर तीन मेखलाएँ बनती हैं, जिनका नाम क्रमसे 'प्रथम नाड़ी', 'मध्यनाड़ी' और 'अन्तनाड़ी' है। कोटचक्रके ऊपर पूर्वादि दिशाओंको लिखकर मेषादि राशियोंको भी लिख देना चाहिये। (कोटचक्रमें नक्षत्रोंका न्यास कहते हैं-) पूर्व भागमें कृत्तिका, अग्निकोणमें आश्लेषा, दक्षिण में मघा, नैर्ऋत्यमें विशाखा, पश्चिममें अनुराधा, वायुकोणमें श्रवण, उत्तरमें धनिष्ठा, ईशानमें भरणीको लिखे। इस तरह लिख देनेपर बाह्य नाड़ीमें अर्थात् प्रथम नाड़ीमें आठ नक्षत्र हो जायँगे। इसी तरह पूर्वादि दिशाओंके अनुसार रोहिणी, पुष्य, पूर्वाफाल्गुनी, स्वाती, ज्येष्ठा, अभिजित्, शतभिषा, अश्विनी-ये आठ नक्षत्र, मध्यनाड़ीमें हो जाते हैं। कोटके भीतर जो अन्तनाड़ी है, उसमें भी पूर्वादि दिशाओंके अनुसार पूर्वमें मृगशिरा, अग्निकोणमें पुनर्वसु, दक्षिणमें उत्तराफाल्गुनी, नैर्ऋत्यमें चित्रा, पश्चिममें मूल, वायव्यमें उत्तराषाढ़ा, उत्तरमें पूर्वाभाद्रपदा और ईशानमें रेवतीको लिखे। इस तरह लिख देनेपर अन्तनाड़ीमें भी आठ नक्षत्र हो जाते हैं। आर्द्रा, हस्त, पूर्वाषाढ़ा तथा उत्तराभाद्रपदा - ये चार नक्षत्र कोटचक्रके मध्यमें स्तम्भ होते हैं।(आर्द्रा हस्तस्तथापाढा तुर्यमुत्तरभाद्रकम् । मध्ये स्तम्भचतुष्कं तु दद्यात् कोटस्य कोटरे ॥ (अग्निपु० १२८१९) ग्रन्थान्तरमें भी ऐसा ही वर्णन है। 'नृपतिजयचर्या' नामक ग्रन्थमैं समचतुरस्त्र कोटचक्रके प्रकरणमें २३ वें श्लोकमें स्तम्भ-चतुष्टयका वर्णन इस प्रकार किया गया है पूर्वे रौद्रं यमे हस्तं पूर्वाषाढा च बारुणे। उत्तरे चोत्तराभाद्रा एतत् स्तम्भचतुष्टयम् ॥ )इस तरह चक्रको लिख देनेपर बाहरका स्थान दिशाके स्वामियोंका होता है ( दिशाओंके स्वामीके लिये रामाचार्य 'मुहूर्त चिन्तामणि' नामक ग्रन्थके यात्रा प्रकरणमें लिखते हैं - सूर्यः सितो भूमिसुतोऽथ राहुः शनिः शशी ज्ञश्च बृहस्पतिश्च प्राच्यादितो दिक्षु विदिक्षु चापि दिशामधीशाः क्रमतः प्रदिष्टाः ॥ (११ ४७) 'पूर्वके सूर्य, अग्निकोणके शुक्र, दक्षिणके मङ्गल, नैर्ऋत्यके राहु, पश्चिमके शनि, वायव्य के चन्द्र, उत्तरके बुध, ईशानके बृहस्पति – इस प्रकार क्रमशः दिशाओंके स्वामी कहे गये हैं।)
विशेष – भरणी, कृत्तिका, आश्लेषा, मघा, विशाखा, अनुराधा, श्रवण, धनिष्ठा ये आठ नक्षत्र बाह्य (प्रथम नाड़ी) हैं। अश्विनी, - रोहिणी, पुष्य, पू० फा०, स्वाती, ज्येष्ठा, अभि०, शतभिषा- ये मध्यनाड़ीके आठ नक्षत्र हैं। रेवती, मृगशिरा, पुनर्वसु, उत्तराफाल्गुनी, चित्रा, मूल, उत्तराषाढ़ा, पूर्वाभाद्रपदा- ये आठ नक्षत्र अन्तनाड़ीके हैं। मध्य तथा अन्तनाड़ीके नक्षत्रों को 'मध्यके नक्षत्र' कहते हैं। दिशाके नक्षत्रको 'प्रवेशक्ष' कहते हैं। उसके विरुद्ध दिशाके नक्षत्रको 'निर्गम' कहते हैं जैसे पूर्व प्रवेश तो पश्चिम निर्गम होगा।
आगन्तुक योद्धा जिस दिशामें जो नक्षत्र है, उसी नक्षत्रमें उसी दिशासे कोटमें यदि प्रवेश करता है तो उसकी विजय होती है। कोटके बीचमें जो नक्षत्र हैं, उन नक्षत्रोंमें जब शुभ ग्रह आये, तब युद्ध करनेसे मध्यवालेकी विजय तथा चढ़ाई करनेवालेकी पराजय होती है। प्रवेश करनेवाले नक्षत्र में प्रवेश करना तथा निर्गमवाले नक्षत्र में निकलना चाहिये। शुक्र, मङ्गल और बुध - ये जब नक्षत्रके अन्तमें रहें, तब यदि युद्ध आरम्भ किया जाय तो आक्रमणकारीकी पराजय होती है। प्रवेशवाले चार नक्षत्रों में यदि युद्ध छेड़ा जाय तो वह दुर्ग वशमें हो जाता है - इसमें कोई आश्चर्यकी बात नहीं है ॥ १-१३ ॥ (विशेष प्रथम नाड़ीके आठ नक्षत्र दिशाके नक्षत्र हैं, उन्हींको 'बाह्य' भी कहते हैं। मध्य तथा अन्त नाड़ीवाले नक्षत्रोंको कोटके मध्यका समझना चाहिये । )
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'कोटचक्रका वर्णन' नामक एक सौ अट्ठाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२८ ॥
Summary of chapter 130 of the Agni Mahā Purana is as follows:
The construction and significance of ritual maṇḍalas drawn on purified earth or floor are described. Agni explains the geometric principles—the saptavyūha-maṇḍala, the aṣṭadala-padma-maṇḍala, and the navakhaṇḍa-maṇḍala—according to the purpose of the rite. Deities are assigned specific positions within the maṇḍala corresponding to the cardinal and intermediate directions. The use of powders of five colours (white, red, yellow, black, green) drawn from natural substances is prescribed. The maṇḍala is treated as a temporary sacred precinct in which the invoked deity truly resides during the pūjā.