अग्नि महा पुराण

357- उणादिसिद्ध शब्दरूपोंका दिग्दर्शन

कुमार स्कन्द कहते हैं-

कात्यायन ! अब 'उणादि' प्रत्यय बताये जाते हैं, जो धातुसे परे होते हैं। 'कृवापाजिमिस्वदिसाध्यशूभ्य उण् ।' (१) – इस सूत्रके अनुसार 'कृ' आदि धातुओं से 'उण्' प्रत्यय होता है। 'करोतीति कारुः ।' (जो शिल्पकर्म करता है, वह 'कार' कहलाता है।

लोकभाषामें उसे 'शिल्पी' या 'कारीगर' कहते हैं)। 'कृ' धातुसे 'उण्' प्रत्यय होनेपर अनुबन्धलोप, वृद्धि तथा विभक्तिकार्य किये जाते हैं। इससे 'कारु: '– इस पदकी सिद्धि होती है। 'जि' धातुसे 'उण्' होनेपर 'जायुः' रूप बनता है। 'जायुः' का अर्थ है- औषध। इसकी व्युत्पत्ति इस प्रकार समझनी चाहिये-'जयति रोगान् इत जायुः'। 'मि' धातुसे वही (उण्) प्रत्यय करनेपर 'मायुः '– यह पद सिद्ध होता है। 'मायुः 'का अर्थ है- 'पित्त'। इसकी व्युत्पत्ति इस प्रकार है- 'मिनोति'– प्रक्षिपति देहे ऊष्माणम् इति मायुः ।' इसी प्रकार 'स्वदते- रोचते इति स्वादुः ।', 'साध्नोति परकार्यमिति साधुः ।' इत्यादि प्रयोग सिद्ध होते हैं। गोमायुः, आयुः – इत्यादि - प्रयोग भी इसी तरह सिद्ध होते हैं। 'गोमायु' का अर्थ है- गीदड़ तथा 'आयुः' शब्द आयुर्वेदके लिये भी प्रयुक्त होता है। 'उणादयो बहुलम् । '— (३ | ३ | १) इस सूत्रके अनुसार 'उण्' आदि बाहुल्येन होते हैं। कहीं होते हैं, कहीं नहीं होते। 'आयुः', 'स्वादुः' तथा 'हेतु' आदि शब्द भी उणादिसिद्ध हैं। 'किंशारु' नाम है- धान्यके शूकका 'किं शृणातीति किंशारुः'। यहाँ 'किं' पूर्वक 'शृ' धातुसे 'ञण्' होता है। 'ञ्' तथा 'ण्' अनुबन्ध हैं। किंशृ+उ वृद्धि होकर 'किंशारु: ' बनता है। 'कृकवाकुः' का अर्थ है- मुर्गा या मोर 'कृकेन गलेन वक्तीति कृकवाकुः ।' 'कृके वचः कश्च' – इस उणादिसूत्रसे 'गुण' प्रत्यय होनेपर कृक+वच् + ञण् - इस अवस्था में अनुबन्धलोप, चकारको ककार और अ उपधायाः ।' (पा० सू० ७ १२ ११६ ) से वृद्धि होती है। 'भरति बिभर्ति वा भरुः ।' 'भृ' धातु से 'उ' प्रत्यय, गुण; विभक्तिकार्य भरुः । इसका - अर्थ है- भर्ता (स्वामी) । मरु: जलहीन देश मृ+उ गुणादेश, विभक्तिकार्य मरुः । शी+उ शयुः । इसका अर्थ है- सोया पड़ा रहनेवाला अजगर । त्सर + उ त्सरु: अर्थात् खड्गकी मूठ 'स्वर्यन्ते प्राणा अनेन' इस लौकिक विग्रहमें 'उ' प्रत्यय होता है। फिर गुण होकर 'स्वरुः' पद बनता है । 'स्वरु' का अर्थ है- वज्र । त्रप् + उ त्रपु । 'त्रपु' नाम है शीशेका। फल्ग् + उ = फल्गु : – सारहीन । - अभिकाङ्क्षार्थक 'गृथ्' धातुसे 'सुसुधागृधिभ्यः क्रन्', (१९२ ) – इस सूत्रके अनुसार 'क्रन्' प्रत्यय होनेपर गृध्+क्रन्, ककार-नकारकी इत्संज्ञा गृधः' अर्थात् गीध पक्षी। मदि+ किरच्-मन्दिरम् । तिमि किरच्-तिमिरम्। 'मन्दिर' का अर्थ गृह + तथा 'तिमिर' का अर्थ अन्धकार है। 'सलिकल्य निमहिभडिभण्डिशण्डिपिण्डितुण्डिकुकिभूभ्य इलच् ।' (५७) – इस उणादि सूत्रके अनुसार गत्यर्थक 'षल्' धातुसे 'इलच्' प्रत्यय करनेपर 'सलिलम्' यह रूप बनता है। 'सलति गच्छति निम्नमिति सलिलम्'– यह इसकी व्युत्पत्ति है। 'सलिल' शब्द वारि-जलका वाचक है। (इसी प्रकार उक्त सूत्रसे ही कलिलम्, अनिलः, महिला- पृषोदरादित्वात् महेला - इत्यादि शब्द निष्पन्न होते हैं । ) भण्डि इलच्-भण्डिलम् । हैं इसका अर्थ है-कल्याण। 'भण्डिल' शब्द दूतके अर्थमें भी आता है। ज्ञानार्थक 'विद्' धातुसे औणादिक 'क्वसु' प्रत्यय होनेपर विद् + क्वसु इस अवस्थामें लशक्वतद्धिते।' (१।३ । ८) से ककारकी इत्संज्ञा तथा उपदेशेऽजनुनासिक इत्।' ( १ | ३ | २) से उकारकी इत्संज्ञा होती है; तत्पश्चात् विभक्ति कार्य करनेपर 'विद्वान्'– यह रूप बनता है। 'विद्वान् का अर्थ है- बुध या पण्डित । 'शेरतेऽस्मिन् राजबलानि इति शिविरम्।'– इस व्युत्पत्तिके अनुसार 'शीङ्' धातुसे 'किरच्' प्रत्यय, 'शीङ्' से 'वुक्' का आगम तथा 'शी' के दीर्घ ईकारके स्थानमें ह्रस्व आदेश होनेपर 'शिविर' शब्दकी सिद्धि होती है। 'शिविर' कहते हैं- सेनाकी छावनीको । अग्निपुराणके अनुसार गुप्त निवासस्थानको 'शिविर' कहते हैं ॥ १-५॥

'अव्' धातुसे 'सितनिगमिमसि ।' (७२) इत्यादि सूत्रके अनुसार 'तुङ्' प्रत्यय होनेपर वकार 'स्थानमें 'ऊठ्' होकर गुण होनेसे 'ओतु' शब्दकी सिद्धि होती है। 'ओतु' कहते हैं- बिलावको। - अभिधानमात्रसे उणादि प्रत्यय होते हैं। 'कृ' धातुसे 'न' प्रत्यय करनेपर गुण होता है और नकारका णकारादेश हो जानेपर 'कर्ण' शब्दकी सिद्धि होती है। 'कर्ण का अर्थ है- कान अथवा कन्यावस्थामें कुन्तीसे उत्पन्न सूर्यपुत्र कर्ण 'वस्' धातुसे 'तुन्' प्रत्यय, अगार अर्थमें उसका 'णित्व' होकर वृद्धि होनेसे 'वास्तु' शब्द बनता है। 'वास्तु' का अर्थ है- गृहभूमि। 'जीव' शब्दसे 'आतृकन्' प्रत्यय और वृद्धि होकर 'जैवातृक' शब्दकी सिद्धि होती है। 'जैवातृक' का अर्थ है- चन्द्रमा । 'अनः शकटं वहति ।'– इस लौकिक - विग्रहमें 'वह' धातुसे 'क्विप्' प्रत्यय, 'अनस् 'के सकारका डकार आदेश तथा 'वह' के वकारका सम्प्रसारण होनेपर 'अनडुह्' शब्द बनता है, उसके सुबन्तमें अनड्वान्, अनड्वाहौ इत्यादि रूप होते हैं। 'जीव्' धातुसे 'जीवेरातुः '। (८२) - इस सूत्रके अनुसार 'आतु' प्रत्यय करनेपर 'जीवातु' शब्दकी सिद्धि होती है। 'जीवातु' नाम है- संजीवन औषधका। प्रापणार्थक 'वह' धातुसे 'वहिश्रिश्रुयुगुग्लाहात्वरिभ्यो नित् ।' (५०१ ) - इस सूत्रके अनुसार 'नित्' प्रत्यय करनेपर विभक्तिकार्यके पश्चात् 'वह्निः '– इस रूपकी - सिद्धि होती है। (इसी प्रकार श्रेणिः, श्रोणिः, योनिः, द्रोणिः, ग्लानिः, हानिः, तूर्णिः बाहुलकात् म्लानिः — इत्यादि पदोंकी सिद्धि होती है।) 'ह' धातुसे 'इनच्' प्रत्यय होनेपर और अनुबन्धभूत चकारका लोप कर देनेपर 'ह+इन', गुण तथा विभक्ति-कार्य-हरिणः- इस रूपकी सिद्धि होती है। 'श्यास्त्याहृविभ्य इनच् ।' (२१३) - इस औणादिक सूत्रसे यहाँ 'इनच्' प्रत्यय हुआ है। 'हरिण' कहते हैं- मृगको यह शब्द कामी तथा पात्रविशेषके लिये भी प्रयुक्त होता है। 'अण्डन् कृसृभृवृञः ।' (१३४) – इस सूत्रके अनुसार 'कृ' - आदि धातुओंसे 'अण्डन्' प्रत्यय करनेपर क्रमश: करण्डः, सरण्डः, भरण्डः, वरण्डः – ये रूप सिद्ध होते हैं। 'करण्ड' शब्द भाजन और भाण्डका वाचक है। मेदिनीकोशके अनुसार यह शहदके छत्तेके लिये भी प्रयुक्त होता है। 'सरण्ड' शब्द चौपायेका वाचक है। कुछ विद्वान् 'सरण्ड' का अर्थ पक्षी मानते हैं। 'बाहुलकात् तृ प्लवनतरणयोः ।' इस धातुसे भी अण्डन्' प्रत्यय होकर 'तरण्ड' पदकी सिद्धि होती है। 'तरण्ड' शब्द काठके बेड़ेके लिये प्रयुक्त होता है। कुछ लोग मछली फँसानेके लिये बनायी गयी बंसीके डोरेको भी 'तरण्ड' कहते हैं। 'वरण्ड' शब्द सामवेदके लिये प्रयुक्त होता है। कुछ लोग 'साम' और 'यजुष्'- दो वेदोंके लिये इसका प्रयोग मानते हैं। कुछ लोगोंके मतमें 'वरण्ड' शब्द मुखसम्बन्धी रोगका वाचक है। 'स्फायितञ्चिवञ्चि० (१७८) ।' इत्यादि सूत्रसे वृद्ध्यर्थक 'स्फायि' धातुसे 'रक्' प्रत्यय होनेपर 'स्फार' पदकी सिद्धि होती है। 'स्फार' शब्दका अर्थ होता है- प्रभूत अर्थात् अधिक। 'मेदिनीकोश के अनुसार 'स्फार' शब्द विकट अर्थमें आता है और करका या करवा आदि पात्रके भरते समय पानीमें जो बुलबुले उठते हैं, उनका वाचक भी 'स्फार शब्द है। 'शुसिचिमीनां दीर्घश्च (१९३) ।' इस सूत्रसे 'क्रन्' प्रत्यय और पूर्व हस्वस्वरके स्थानमें दीर्घ कर देनेपर क्रमशः शूरः, सीरं, चीरं, मीरः - ये प्रयोग बनते हैं। 'चीर' शब्द गायके थन, वस्त्रविशेष तथा वल्कलके अर्थमें प्रयुक्त होता है। 'भी' धातुसे 'भियः क्रुकन्' - (१९९) इस सूत्रसे 'क्रुकन्' प्रत्यय करनेपर 'भीरुक: ' – इस - पदकी सिद्धि होती है। इसके पर्यायवाची शब्द हैं—'भीरु' और 'कातर'। 'उच समवाये' – इस धातुसे 'रन्' प्रत्यय करनेपर 'उग्र' पदकी सिद्धि होती है। 'उग्र' का अर्थ है- प्रचण्ड 'वहियूभ्यां णित् ।' – इस सूत्रके अनुसार णित् असच्' प्रत्यय करनेपर 'वाहसः', 'यावसः '— ये दो रूप सिद्ध होते हैं। 'वाहसः' का अर्थ है- अजगर और 'यावसः 'का अर्थ है- तृणसमूह। 'वर्तमाने पृषबृहन्महद्जगच्छत्रिवच्च ।' – इस सूत्रके अनुसार 'गम्' धातुसे 'अत्' प्रत्ययका निपातन हुआ। 'गम्' के स्थानमें 'जग्' आदेश हुआ। इस प्रकार 'जगत्' शब्दकी सिद्धि हुई। 'जगत्' का अर्थ है- भूलोक । 'ऋतन्यञ्जिवन्यज्यर्षि०' इत्यादि (४५०) सूत्रके अनुसार 'कृश' धातुसे 'आनुक्' प्रत्यय करनेपर 'कृशानुः '– इस पदकी सिद्धि होती है। - 'कृशानुः 'का अर्थ है- अग्नि । द्योतते इति ज्योतिः । 'द्युतेरिसिन्नादेशश्च जः । (२७५ ) - इस सूत्रके अनुसार 'द्युत्', धातुसे 'इसिन्' प्रत्यय द्यकारका जकारादेश तथा गुण होनेपर 'ज्योतिः' इस पदकी सिद्धि होती है। ज्योतिः' का अर्थ है- अग्नि और सूर्य 'अर्च' धातुसे कृदाधारार्चिकलिभ्यः।' (३२७) - इस सूत्रके अनुसार 'क' प्रत्यय होनेपर 'अर्कः' पदकी सिद्धि होती है। 'अर्क एवं अर्ककः'। स्वार्थे कः । 'अर्कः' पद सूर्यका वाचक है। 'कृगृशृवृञ्चतिभ्यः ष्वरच् ।' (२८६ ) - इस सूत्रके अनुसार वरणार्थक 'वृ' धातुसे तथा याचनार्थक 'चते' धातुसे 'ष्वरच्' प्रत्यय करनेपर क्रमशः 'वर्वरः', 'चत्वरम्' – इन दो पदोंकी सिद्धि होती है। 'वर्वर' का अर्थ है- प्राकृत जन अथवा कुटिल मनुष्य। 'हसिमृग्रिण्वाऽमिदमिलूपूधूर्विभ्यस्तन् ।' (३७३) - इस सूत्रके अनुसार हिंसार्थक 'धूर्वि' धातुसे 'तन्' प्रत्यय करनेपर धूर्त्तः' इस पदकी सिद्धि होती है। 'धूर्त' शब्दका अर्थ है – शठ। 'चत्वरम्' का अर्थ है- चौराहा। 'लित्वरचत्वरधीवर' इत्यादि औणादिक सूत्रसे 'चीवरम्' इस पदका निपातन हुआ है। 'चीवरम्' का अर्थ है- चिथड़ा अथवा भिक्षुकका वस्त्र । स्नेहनार्थक 'जिमिदा' अथवा 'मिद्' धातुसे 'अमिचिमिदिशसिभ्यः कत्रः ।' (६१३) – इस सूत्रके अनुसार 'का' प्रत्यय हुआ। ककारका इत्यसंज्ञालोप हुआ— 'मिद+त्र मित्र । विभक्ति कार्य करनेपर 'मित्र: ' – इस पदकी सिद्धि हुई। 'मित्र' का अर्थ है सूर्य नपुंसकलिङ्गमें इसका अर्थ - सुहृद् होता है। 'कुवोह्रस्वश्च । इस सूत्रके अनुसार 'पुनातीति' इस लौकिक विग्रहमें 'पू' धातुसे 'कत्र' प्रत्यय और दीर्घके स्थानमें ह्रस्व होनेपर 'पुत्र' शब्दकी सिद्धि होती है। 'पुत्र' का अर्थ है- बेटा। 'सुवः कित्।' (३२८) – इस सूत्रके - अनुसार प्राणिप्रसवार्थक 'षूङ्' धातुसे 'नु' प्रत्यय होता है और वह 'कित्' माना जाता है। धातुके आदि षकारको सकारादेश हो जाता है। इस प्रकार 'सूनु' शब्दकी सिद्धि होती है। विभक्तिकार्य होनेपर 'सूनुः' पद बनता है। 'विश्वकोश' के अनुसार इसका अर्थ पुत्र और सूर्य है। 'नसृनेष्टत्वष्ट होतृ०' (२६०) इत्यादि सूत्रके अनुसार 'पितृ' शब्द निपातित होता है। 'पातीति पिता'। 'पा' धातुसे 'तृच्' होकर आकारके स्थानमें इकार हो जाता है। पिता, पितरौ, पितरः इत्यादि इसके रूप हैं। जन्मदाता या बापको 'पिता' कहते हैं। विस्तारार्थक 'तन्' धातुसे 'वुतनिभ्यां दीर्घश्च।' इस सूत्रके अनुसार 'तन्' प्रत्यय तथा ह्रस्वके स्थानमें दीर्घ होनेपर 'तात' शब्दकी सिद्धि होती है। यहाँ अनुनासिक लोप हुआ है। 'तात' शब्द कृपापात्र तथा पिताके लिये प्रयुक्त होता है। कुत्सितशब्दार्थक 'पर्द' धातुसे 'काकु' प्रत्यय होता है और वह 'नित्' माना जाता है। धातुके रेफका सम्प्रसारण और अकारका लोप हो जाता है। जैसा कि सूत्र है–'पर्देर्नित् सम्प्रसारणमल्लोपश्च।' (३६७) 'काकु' प्रत्ययके आदि ककारका 'लशक्वतद्धिते।' (१।३।८) - इस सूत्रसे लोप हो जाता है। इस प्रक्रियासे 'पृदाकु' शब्दकी सिद्धि होती है। पर्दते – कुत्सितं 'शब्दं करोति इति पृदाकुः ।' इसका अर्थ है- सर्प, बिच्छू या व्याघ्र 'हसिमृग्रिण्वाऽमिद-मिलूपूधूर्विभ्यस्तन् ।' (३७३) इस सूत्रके द्वारा 'गृ' धातुसे 'तन्' प्रत्यय और गुणादेश करनेपर 'गर्त्त' शब्दकी सिद्धि होती है। यह 'अवट' अर्थात् गड्ढेका वाचक है। 'भृमृशितृ०' इत्यादि (७) सूत्रके अनुसार 'भृ' धातुसे 'अतच्' प्रत्यय तथा गुणादेश करनेपर 'भरत' शब्द निष्पन्न होता है। जो भरण-पोषण करे, वह 'भरत' है। 'नमतीति नटः ' – इस व्युत्पत्तिके अनुसार 'जनिदाच्युसृवृमदि०' इत्यादि (५५४) सूत्र द्वारा 'नम' धातुसे 'डट्' प्रत्यय करनेपर 'टि' लोप होनेके पश्चात् 'नट' शब्द बनता है। इसका अर्थ है - वेषधारी अभिनेता। ये थोड़े-से उणादि प्रत्यय यहाँ प्रदर्शित किये गये। इनके अतिरिक्त भी बहुत-से उणादि प्रत्यय होते हैं ॥ ६ - १२ ॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'उणादिसिद्ध रूपोंका वर्णन' नामक तीन सौ सत्तावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३५७ ॥