अग्निदेव कहते हैं-
मुनीश्वर! सम्पाताहुतिसे पवित्राओंका सेचन करके उनका अधिवासन करना चाहिये। नृसिंह मन्त्रका जप करके उन्हें अभिमन्त्रित करे और अस्त्रमन्त्र (अस्त्राय फट्।) से उन्हें सुरक्षित रखे। पवित्राओंमें वस्त्र लपेटे हुए ही उन्हें पात्रमें रखकर अभिमन्त्रित करना चाहिये। बिल्व आदिके सम्पर्कसे युक्त जलद्वारा मन्त्रोच्चारणपूर्वक उन सबका एक या दो बार प्रोक्षण करना चाहिये। गुरुको चाहिये कि कुम्भपात्र में पवित्राओंको रखकर उनकी रक्षाके उद्देश्य से उस पात्रसे पूर्व दिशामें संकर्षण मन्त्रद्वारा दन्तकाष्ठ और आँवला, दक्षिण दिशामें प्रद्युम्न मन्त्रद्वारा भस्म और तिल, पश्चिम दिशामें अनिरुद्ध मन्त्रद्वारा गोबर और मिट्टी तथा उत्तर दिशामें नारायण मन्त्रद्वारा कुशोदक डाले। तदनन्तर अग्निकोणमें हृदय मन्त्रसे कुङ्कुम तथा रोचना, ईशानकोणमें शिरोमन्त्रद्वारा धूप, नैर्ऋत्यकोणमें शिखामन्त्रद्वारा दिव्य मूलपुष्प तथा वायव्यकोणमें कवच-मन्त्रद्वारा चन्दन, जल, अक्षत, दही और दूर्वाको दोनेमें रखकर छीटे। मण्डपको त्रिसूत्रसे आवेष्टित करके पुनः सब ओर सरसों बिखेरे ॥ १६ ॥
देवताओंकी जिस क्रमसे पूजा की गयी हो, उसी क्रमसे, उनके लिये उनके अपने-अपने नाम मन्त्रोंसे गन्धपवित्रक (१. सूत्रको केवल त्रिगुणित करके पवित्रा बनायी जाय तो उसे 'गन्धपवित्रक' कहते हैं। इसमें एक गाँठ होती है और थोड़ेसे तन्तु कोई-कोई इसे 'कनिष्ठसंख्य' भी कहते हैं। जैसा कि वचन है
'त्रिसूत्री गन्धसूत्रे स्यात्।'
तत्र गन्धपवित्रं स्यादेकग्रन्थ्यल्पतन्तुकम्। कनिष्ठसंख्यमित्येके त्रिसूत्रेण विनिर्मितम् ॥
(ईशानशिव गुरुदेवपद्धति क्रियापाद २१ पटल १२, ३६))देना चाहिये। द्वारपाल आदिको नाम मन्त्रोंसे ही गन्धपवित्रक अर्पित करे। इसी क्रमसे कुम्भमें भगवान् विष्णुको सम्बोधित करके पवित्रक दे- 'हे देव ! यह आप भगवान् विष्णुके ही तेजसे उत्पन्न रमणीय तथा सर्वपातकनाशन पवित्रक है। यह सम्पूर्ण मनोरथोंको देनेवाला है, इसे मैं आपके अङ्गमें धारण कराता हूँ।' धूप-दीप आदिके द्वारा सम्यक् पूजन करके मण्डपके द्वारके समीप जाय तथा गन्ध, पुष्प और अक्षतसे युक्त वह पवित्रक स्वयंको भी अर्पित करे अपनेको अर्पण करते समय इस प्रकार कहे – 'यह पवित्रक भगवान विष्णुका तेज है और बड़े-बड़े पातकोंका नाश करनेवाला है; मैं धर्म, अर्थ और कामकी सिद्धिके लिये इसे अपने अङ्गमें धारण करता हूँ।' आसनपर भगवान् श्रीहरिके परिवार आदिको एवं गुरुको पवित्रक दे। गन्ध, पुष्प और अक्षत आदिसे भगवान् श्रीहरिकी पूजा करके गन्ध पुष्पादिसे पूजित पवित्रक श्रीहरिको अर्पित करे। उस समय 'विष्णुतेजोभवम्' इत्यादि मूलमन्त्रका उच्चारण करे ॥ ७ - १२ ॥
तदनन्तर अग्निमें अधिष्ठातारूपसे स्थित भगवान् विष्णुको पवित्रक अर्पित करके उन परमेश्वरसे यों प्रार्थना करे– 'केशव! आपका श्रीविग्रह क्षीरसागरमें महानाग (अनन्त) की शव्यापर शयन करनेवाला है। मैं प्रातः काल आपकी पूजा करूँगा; आप मेरे समीप पधारिये।' इसके बाद इन्द्र आदि दिक्पालोंको बलि अर्पित करके श्रीविष्णु पार्षदोंको भी बलि भेंट करे। इसके बाद भगवान्के सम्मुख युगलवस्त्र भूषित तथा रोचना, कर्पूर, केसर और गन्ध आदिके जलसे पूरित कलशको गन्ध पुष्प आदिसे विभूषित करके मूलमन्त्रसे उसकी पूजा करे फिर मण्डपसे बाहर आकर पूर्व दिशामें लिये हुए मण्डलत्रयमें पञ्चगव्य, चरु और दन्तकाष्ठका क्रमशः सेवन करे( बहिर्निर्गत्य प्राचीनेषु त्रिषु मण्डलेषु दीक्षोकमार्गेण पञ्चगव्यं चरुं दन्तधावनं च भजेत्। (ईशानशिव गुरुदेवपद्धति, उत्तरार्ध, क्रियापद २१व पटल))। रातमें पुराणश्रवण तथा स्तोत्रपाठ करते हुए जागरण करे। पर प्रेषक बालकों, स्त्रियों तथा भोगीजनोंके उपयोगमें आनेवाले गन्धपवित्रकको छोड़कर शेषका तत्काल अधिवासन करे ॥ १३ - १८ ॥
इस प्रकार आदि आग्रेय महापुराणमें 'पवित्राधिवासन-विधिका वर्णन' नामक पैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३५॥
Summary of chapter 36 of the Agni Mahā Purana is as follows:
The thirty-sixth chapter addresses āpaddharma — the modified conduct permissible for all varṇa-s in times of extreme distress and danger. The principle that dharma is universal but its application must be sensitive to circumstances (deśa, kāla, pātra) is established. A brāhmaṇa, if starving, may accept food from anyone including a śūdra; a kṣatriya in exile may take up a merchant's trade; these are not violations of varṇa dharma but emergency accommodations that should be abandoned as soon as the crisis passes. The stories of ancient sages and kings who adopted alternative means of livelihood during adversity and then returned to their own dharma are cited as precedents. The chapter also addresses conduct during natural calamities, enemy invasion, and epidemic, affirming that even in extremity the path of ahiṃsā and truthfulness should be abandoned only under the most severe compulsion.