भगवान् शिव कहते हैं-
स्कन्द ! अब मैं पूजासहित गौरीकी प्रतिष्ठाका वर्णन करूँगा, सुनो। पूर्ववत् मण्डप आदिकी रचना कर देवीकी स्थापना एवं शय्याधिवासन करे। पूर्वोक्त मन्त्रों और मूर्त्यादिकोंका न्यास करके आत्म तत्त्व, विद्यातत्त्व और शिवतत्त्वका परमेश्वरमें स्थापन करे। तदनन्तर पराशक्तिका न्यास, होम और जप पूर्ववत् करके क्रियाशक्तिस्वरूपिणी पिण्डीका संधान करे। सर्वव्यापिनी पिण्डीका ध्यान करके वहाँ रत्न आदिका न्यास करे। इस विधि से पिण्डीकी स्थापना करके उसके ऊपर देवीको स्थापित करे ॥ १-४॥
वे देवी परमशक्तिस्वरूपा हैं। उनका अपने ही मन्त्रसे सृष्टि-न्यासपूर्वक स्थापन करे। तदनन्तर पीठमें क्रियाशक्तिका और देवीके विग्रहमें ज्ञानशक्तिका न्यास करे। इसके बाद सर्वव्यापिनी शक्तिका आवाहन करके देवीकी प्रतिमामें उसका नियोजन करे। फिर 'शिवा' नामवाली अम्बिका देवीका स्पर्शपूर्वक पूजन करे (पाठान्तरके अनुसार 'अमुकेशी' इत्यादि नामसे उनका स्पर्शपूर्वक पूजन करे। यथा-'रामेश्वर्यै नमः। कृष्णेश्यै नमः।' इत्यादि।)॥ ५-६ ॥
पूजाके मन्त्र इस प्रकार हैं- 'ॐ आं आधारशक्तये नमः। ॐ कूर्माय नमः । ॐ कन्दाय नमः । ॐ ह्रीं नारायणाय नमः । ॐ ऐश्वर्याय नमः । ॐ अधश्छदनाय नमः । ॐ पद्मासनाय नमः । तदनन्तर केसरोंकी पूजा करे। तत्पश्चात् 'ॐ ह्रीं
कर्णिकायै नमः । ॐ क्षं पुष्कराक्षेभ्यो नमः ।'— इन मन्त्रोंद्वारा कर्णिका एवं कमलाक्षोंका पूजन करे। इसके बाद 'ॐ हां पुष्ट्यै नमः' । ॐ ह्रीं ज्ञानायै नमः । ॐ हं क्रियायै नमः ।' – इन मन्त्रोंद्वारा पुष्टि, ज्ञाना एवं क्रियाशक्तिका पूजन करे ॥ ७ - १०॥ ॐ नालाय नमः । ॐ रं धर्माय नमः । ॐ रुं ज्ञानाय नमः । ॐ वैराग्याय नमः । ॐ अधर्माय नमः । ॐ रं अज्ञानाय नमः । ॐ अवैराग्याय नमः । ॐ अनैश्वर्याय नमः ।– इन मन्त्रों द्वारा नाल आदिकी पूजा करे। ॐ हूं वाचे नमः । ॐ हूं रागिण्यै नमः । ॐ हूं ज्वालिन्यै नमः । ॐ ह्रीँ शमायै नमः । ॐ हूं ज्येष्ठायै नमः । ॐ ह्रौं रौं क्रौं नवशक्त्यै नमः । – इन मन्त्रों द्वारा वाक् आदि शक्तियोंकी पूजा करे। 'ॐ गाँ गौर्यासनाय नमः । ॐ गाँ गौरीमूर्तये नमः ।' अब गौरीका मूलमन्त्र बताया जाता है 'ॐ ह्रीं सः महागौरि रुद्रदयिते स्वाहा गौर्यै नमः । ॐ गां हृदयाय नमः, ॐ गीं शिरसे स्वाहा । ॐ गूं शिखायै वषट् । ॐ मैं कवचाय हुम् । ॐ गौं नेत्रत्रयाय वौषट् । ॐ मः अस्त्राय फट् । ॐ गौं विज्ञानशक्तये नमः । - इन मन्त्रों से शिखा आदिकी पूजा करे ॥ ११ - १५ ॥
'ॐ गूं क्रियाशक्तये नमः । इस मन्त्रसे क्रियाशक्तिकी पूजा करे। पूर्वादि दिशाओं में इन्द्रादि देवताओंका पूजन करे। इनके मन्त्र पहले बताये गये हैं। 'ॐ सुं सुभगायै नमः' – इससे सुभगाका, 'ॐ ह्रीं ललितायै नमः ।' से ललिताका पूजन करे। 'ॐ ह्रीं कामिन्यै नमः । ॐ हूं काममालिन्यै नमः ।'— इन मन्त्रोंसे गौरीकी प्रतिष्ठा, पूजा और जप करनेसे उपासक सब कुछ पा लेता है ( 'सोमशम्भुकी 'कर्मकाण्ड क्रमावली' में इन मन्त्रोंके स्वरूप और बीज कुछ भिन्न रूपमें मिलते हैं। अतः उन्हें अविकल रूपमें यहाँ उद्धृत किया जाता है— ॐ आं आधारशक्तये नमः । ॐ ई कन्दराय नमः । ॐ ॐ नालाय नमः । ॐ ऋ धर्माय नमः। ॐ ऋं ज्ञानाय नमः । ॐ लूं वैराग्याय नमः । ॐ लूं ऐश्वर्याय नमः । ॐ ऋ अधर्माय नमः । ॐ ॐ अज्ञानाय नमः । ॐ लूं अवैराग्याय नमः । ॐ लूं अनैश्वर्याय नमः । ॐ अः ऊर्ध्वच्छदनाय नमः । ॐ हां पद्माय नमः । ॐ हं केसरेभ्यो नमः । ॐ हं कर्णिकायै नमः । ॐ पुष्करेभ्यो नमः । ॐ हं प्राञ्यै नमः । ॐ ह्रीं ज्ञानवत्यै नमः । ॐ हूं क्रियायै नमः । ॐ लूं वामायै नमः । ॐ हलं वागीश्वर्यै नमः। ॐ ह्रीं स्वालिन्यै नमः । ॐ हों ज्येष्ठायै नमः। ॐ हाँ रौद्रयै नमः इति सर्वशक्तयः । ॐ गां गौर्यासनाय नमः । ॐ ग गौरीमूर्तये नमः । ॐ ह्रीं सः महागौरि रुद्रदयिते स्वाहा । इति मूलमन्त्रः। गां हृदयाय नमः । गीं शिरसे स्वाहा गूं शिखायै वषट् । गँ कवचाय हुम् । गाँ नेत्रेभ्यो वौषट् गः अस्त्राय फट् । ॐ सीं ज्ञानशक्तये नमः । ॐ सूं क्रियाशक्तये नमः । लोकपालमन्त्रास्तु पूर्वोक्ताः। ऐं स्टैं सुभगायै नमः। ॐ हैं ललितायै नमः। ॐ हं कामिन्यै नमः । ॐ हाँ काममालिन्यै नमः । इत्येता गौरीसमानसख्यः।' ) ॥ १६-१७॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'गौरी प्रतिष्ठा विधिका वर्णन' नामक अट्ठानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९८ ॥
Summary of chapter 99 of the Agni Mahā Purana is as follows:
The ninety-ninth chapter presents the installation procedure for the image of Bhagavān Sūrya. The standard template of maṇḍapa construction, snāna, and preliminary rites is applied, but the specific threefold tattva nyāsa (ātma, vidyā, śiva) in the image uses the ĀkāśĀdi pañcabūta (the five elements beginning with ākāśa) as the theological framework rather than the purely Śaiva kalā framework. The pīṭha is purified and consecrated using the sarvatomukhī (all-faced) śakti mantra. The guru installs Sūrya using his specific mantra while visualizing the deity's blazing form, and the name of Sūrya's attendant deities is given the suffix "svāmin" or "pāda" to complete the mantra form. The chapter's brevity reflects that Sūrya installation follows the same general procedures already described — the chapter serves primarily to specify the Sūrya-specific variations rather than to repeat the entire protocol.