पुष्कर कहते हैं-
अब मैं वानप्रस्थ और संन्यासियोंके धर्मका जैसा वर्णन करता हूँ, सुनो। सिरपर जटा रखना, प्रतिदिन अग्निहोत्र करना, धरतीपर सोना और मृगचर्म धारण करना, वनमें रहना, फल, मूल, नीवार (तिन्नी) आदिसे जीवन निर्वाह करना, कभी किसीसे कुछ भी दान न लेना, तीनों समय स्नान करना, ब्रह्मचर्यव्रतके पालनमें तत्पर रहना तथा देवता और अतिथियोंकी पूजा करना - यह सब वानप्रस्थीका धर्म है। गृहस्थ पुरुषको उचित है कि अपनी संतानकी संतान देखकर वनका आश्रय ले और आयुका तृतीय भाग वनवासमें ही बितावे। उस आश्रम में वह अकेला रहे या पत्नीके साथ भी रह सकता है। (परंतु दोनों ब्रह्मचर्यका पालन करें।) गर्मीके दिनों में पञ्चाग्निसेवन करे। वर्षाकालमें खुले आकाशके नीचे रहे। हेमन्त ऋतुमें रातभर भीगे कपड़े ओढ़कर रहे। (अथवा जलमें रहे।) शक्ति रहते हुए वानप्रस्थीको इसी प्रकार उग्र तपस्या करनी चाहिये। वानप्रस्थसे फिर गृहस्थ आश्रम में न लौटे। विपरीत या कुटिल गतिका आश्रय न लेकर सामनेकी दिशाकी ओर जाय अर्थात् पीछे न लौटकर आगे बढ़ता रहे (तात्पर्य यह कि पौछे गृहस्थकी ओर न लौटकर आगे संन्यासकी दिशा में बढ़ता चले।)॥ १-५॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'वानप्रस्थाश्रमका वर्णन' नामक एक सौ साठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६० ॥
Summary of chapter 162 of the Agni Mahā Purana is as follows:
The broad scope of dharmaśāstra as a human-regulating science rooted in the Vedas is surveyed. Agni situates the Smṛtis of Manu, Yājñavalkya, Parāśara, and others as Veda-derived and therefore authoritative, while acknowledging that their specific injunctions may vary by yuga and region. The chapter summarizes key areas of dharmaśāstra: vyavahāra (litigation and civil law), rājanīti (royal governance), and the resolution of contradictions between different smṛtis by the principle that the more restrictive rule prevails. Dharmaśāstra is declared to be the śāstra most beneficial to human society because it governs collective life in accordance with the divine order.