अग्निदेव कहते हैं-
ब्रह्मन् जब युधिष्ठिर राजसिंहासनपर विराजमान हो गये, तब धृतराष्ट्र गृहस्थ आश्रमसे वानप्रस्थ आश्रम में प्रविष्ट हो वनमें चले गये। [अथवा ऋषियोंकि एक आश्रमसे दूसरे आश्रमों में होते हुए वे वनको गये।] उनके साथ देवी गान्धारी और पृथा (कुन्ती) भी थीं। विदुरजी दावानलसे दग्ध हो स्वर्ग सिधारे इस प्रकार भगवान् विष्णुने पृथ्वीका भार उतारा और धर्मकी स्थापना तथा अधर्मका नाश करनेके लिये पाण्डवोंको निमित्त बनाकर दानव दैत्य आदिका संहार किया। तत्पश्चात् भूमिका भार बढ़ानेवाले यादवकुलका भी ब्राह्मणोंके शापके बहाने मूसलके द्वारा संहार कर डाला। अनिरुद्धके पुत्र वज्रको राजाके पदपर अभिषिक्त किया। तदनन्तर देवताओंके अनुरोधसे प्रभासक्षेत्र में श्रीहरि स्वयं ही स्थूल शरीरकी लीलाका संवरण करके अपने धामको पधारे ॥ १४॥
वे इन्द्रलोक और ब्रह्मलोकमें स्वर्गवासी देवताओंद्वारा पूजित होते हैं। बलभद्रजी शेषनागके स्वरूप थे; अतः उन्होंने पातालरूपी स्वर्गका आश्रय लिया अविनाशी भगवान् श्रीहरि ध्यानी पुरुषोंके ध्येय हैं। उनके अन्तर्धान हो जानेपर समुद्रने उनके निजी निवासस्थानको छोड़कर शेष द्वारकापुरीको अपने जलमें डुबा दिया। अर्जुनने मरे हुए यादवोंका दाह संस्कार करके उनके लिये जलाञ्जलि दी और धन आदिका दान किया। भगवान् श्रीकृष्णकी रानियोंको, जो पहले अप्सराएँ थीं और अष्टावक्र के शापसे मानवीरूपमें प्रकट हुई थीं, लेकर हस्तिनापुरको चले मार्गमें डंडे लिये हुए ग्वालोंने अर्जुनका तिरस्कार करके उन सबको छीन लिया। यह भी अष्टावक्रके शापसे ही सम्भव हुआ था। इससे अर्जुनके मनमें बड़ा शोक हुआ। फिर महर्षि व्यासके सान्त्वना देनेपर उन्हें यह निश्चय हुआ कि भगवान् श्रीकृष्णके समीप रहनेसे ही मुझमें बल था।' हस्तिनापुर में आकर उन्होंने भाइयोंसहित राजा युधिष्ठिरसे, जो उस समय प्रजावर्गका पालन करते थे, यह सब समाचार निवेदन किया। वे बोले-'भैया! वही धनुष है, वे ही बाण हैं, वही रथ है और वे ही घोड़े हैं; किंतु भगवान् श्रीकृष्णके बिना सब कुछ उसी प्रकार नष्ट हो गया, जैसे अश्रोत्रियको दिया हुआ दान। यह सुनकर धर्मराज युधिष्ठिरने राज्यपर परीक्षितको स्थापित कर दिया ॥५- ११ ॥
इसके बाद बुद्धिमान् राजा संसारकी अनित्यताका विचार करके द्रौपदी तथा भाइयोंको साथ ले महाप्रस्थानके पथपर अग्रसर हुए मार्गमें वे श्रीहरिके अष्टोत्तरशत नामोंका जप करते हुए यात्रा करते थे। उस महापथमें क्रमशः द्रौपदी, सहदेव, नकुल, अर्जुन और भीमसेन एक-एक करके गिर पड़े। इससे राजा शोकमग्न हो गये। तदनन्तर वे इन्द्र के द्वारा लाये हुए रथपर आरूढ़ हो [दिव्यरूपधारी] भाइयोंसहित स्वर्गको चले गये। वहाँ उन्होंने दुर्योधन आदि सभी धृतराष्ट्रपुत्रों को देखा। तदनन्तर [उनपर कृपा करनेके लिये अपने धामसे पधारे हुए] भगवान् वासुदेवका भी दर्शन किया। इससे उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई। यह मैंने तुम्हें महाभारतका प्रसङ्ग सुनाया है जो इसका पाठ करेगा, वह स्वर्गलोकमें सम्मानित होगा ॥ १२–१५॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'आश्रमवासिक पर्वसे लेकर स्वर्गारोहण पर्यन्त महाभारत संक्षिप्त वर्णन' नामक पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५ ॥
Summary of chapter 16 of the Agni Mahā Purana is as follows:
The sixteenth chapter traces the genealogy of the Solar dynasty (Sūryavaṃśa) from Brahmā through Kaśyapa, Vivasvat (Sūrya), and Manu, down through the great kings who established the foundations of dharmic kingship. Key figures in the lineage — Ikṣvāku, Māndhātā, Sagara, Bhagīratha who brought the Gaṅgā to earth, and ultimately Rāma of the Raghu lineage — are listed in succession. The chapter serves as a genealogical backbone for the Rāmāyaṇa narrative and demonstrates how divine lineage sustains the quality of kingship over successive generations. The virtues and achievements of notable kings in this dynasty are briefly noted, framing kingship itself as a sacred trust inherited from the solar light of Bhagavān.