पुष्कर कहते हैं-
जब मनुष्योंका चित्त परस्त्रीगमन, परस्वापहरण एवं जीवहिंसा आदि पापोंमें प्रवृत्त होता है, तो स्तुति करनेसे उसका प्रायश्चित्त होता है। (उस समय निम्नलिखित प्रकारसे भगवान् श्रीविष्णुकी स्तुति करे-) "सर्वव्यापी विष्णुको सदा नमस्कार है। श्रीहरि विष्णुको नमस्कार है। मैं अपने चित्तमें स्थित सर्वव्यापी, अहंकारशून्य श्रीहरिको नमस्कार करता हूँ। मैं अपने मानसमें विराजमान अव्यक्त, अनन्त और अपराजित परमेश्वरको नमस्कार करता हूँ। सबके पूजनीय, जन्म और मरणसे रहित, प्रभावशाली श्रीविष्णुको नमस्कार है। विष्णु मेरे चित्तमें निवास करते हैं, विष्णु मेरी बुद्धिमें विराजमान हैं, विष्णु मेरे अहंकारमें प्रतिष्ठित हैं और विष्णु मुझमें भी स्थित हैं। वे श्रीविष्णु ही चराचर प्राणियोंके कर्मोंके रूपमें स्थित हैं, उनके चिन्तन मेरे पापका विनाश हो जो ध्यान करनेपर पापोंका हरण करते हैं और भावना करनेसे स्वप्नमें दर्शन देते हैं, इन्द्रके अनुज, शरणागतजनोंका दुःख दूर करनेवाले उन पापापहारी श्रीविष्णुको मैं नमस्कार करता हूँ। मैं इस निराधार जगत्में अज्ञानान्धकारमें डूबते हुएको हाथका सहारा देनेवाले परात्परस्वरूप श्रीविष्णुके सम्मुख प्रणत होता हूँ। सर्वेश्वरेश्वर प्रभो ! कमलनयन परमात्मन् ! हृषीकेश! आपको नमस्कार है। इन्द्रियोंके स्वामी श्रीविष्णो! आपको नमस्कार है। नृसिंह !अनन्तस्वरूप गोविन्द ! समस्त भूत-प्राणियोंकी सृष्टि करनेवाले केशव! मेरे द्वारा जो दुर्वचन कहा गया हो अथवा पापपूर्ण चिन्तन किया गया हो, मेरे उस पापका प्रशमन कीजिये; आपको नमस्कार है। केशव! अपने मनके वशमें होकर मैंने जो न करनेयोग्य अत्यन्त उग्र पापपूर्ण चिन्तन किया है, उसे शान्त कीजिये परमार्थपरायण ब्राह्मणप्रिय गोविन्द ! अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले जगन्नाथ! जगत्का भरण-पोषण करनेवाले देवेश्वर! मेरे पापका विनाश कीजिये। मैंने मध्याह्न, अपराह्न, सायंकाल एवं रात्रिके समय, जानते हुए अथवा अनजाने, शरीर, मन एवं वाणीके द्वारा जो पाप किया हो, 'पुण्डरीकाक्ष', 'हृषीकेश', 'माधव'- आपके इन तीन नामोंके उच्चारणसे मेरे वे सब पाप क्षीण हो जायँ। कमलनयन लक्ष्मीपते! इन्द्रियोंके स्वामी माधव! आज आप मेरे शरीर एवं वाणीद्वारा किये हुए पापोंका हनन कीजिये। आज मैंने खाते, सोते, खड़े, चलते अथवा जागते हुए मन, वाणी और शरीरसे जो भी नीच योनि एवं नरककी प्राप्ति करानेवाला सूक्ष्म अथवा स्थूल पाप किया हो, भगवान् वासुदेवके नामोच्चारणसे वे सब विनष्ट हो जायँ। जो परब्रह्म, परमधाम और परम पवित्र हैं, उन श्रीविष्णुके संकीर्तनसे मेरे पाप लुप्त हो जायँ। जिसको प्राप्त होकर ज्ञानीजन पुनः लौटकर नहीं आते, जो गन्ध, स्पर्श आदि तन्मात्राओंसे रहित है; श्रीविष्णुका वह परमपद मेरे पापोंका शमन करे
(विष्णवे विष्णवे नित्यं विष्णवे विष्णवे नमः । नमामि विष्णुं चित्तस्थमहंकारगतिं हरिम् ॥ चित्तस्थमीशमव्यक्तमनन्तमपराजितम् विष्णुश्चित्तगतो यन्मे विष्णुर्बुद्धिगतश्च । विष्णुमीडयमशेषेण अनादिनिधनं यत् । यच्चाहंकारगो विभुम् ॥ विष्णुर्यद्विष्णुर्मथि संस्थितः ॥ करोति कर्मभूतोऽसौ स्थावरस्य चरस्य च । तत् पापं नाशमायातु तस्मिन्नेव हि चिन्तिते ॥ ध्यातो हरति यत् पापं स्वप्ने दृष्टस्तु भावनात् । तमुपेन्द्रमहं विष्णुं प्रणतार्तिहरं हरिम् ॥ जगत्यस्मिन्निराधारे मज्जमाने तमस्यधः हस्तावलम्बनं विष्णुं प्रणमामि परात्परम् ॥ सर्वेश्वरेश्वर विभो परमात्मन्नधोक्षज । हृषीकेश हृषीकेश हृषीकेश नमोऽस्तु ते ॥ नृसिंहा गोविन्द यन्मया चिन्तित दुष्ट भूतभावन केशव दुरुक्तं दुष्कृतं ध्यातं शमयाचं नमोऽस्तु ते ॥ स्वचित्तवशवर्तिना । अकार्य महदत्युग्रं तच्छमं नय केशव ॥ ब्रह्मण्यदेव गोविन्द परमार्थपरायण जगन्नाथ जगद्धातः पापं प्रशमयाच्युत ॥ यथापराहे सायाहे मध्याहे च तथा निशि कायेन मनसा वाचा कृतं पापमजानता ॥ जानता हृषीकेश पुण्डरीकाक्ष माधव नामत्रयोच्चारणतः पापं यातु मम क्षयम् ॥ च शरीरं मे हृषीकेश पुण्डरीकाक्ष माधव पापं प्रशमयाद्य त्वं वाक्कृतं मम माधव ॥ यद् भुञ्जन् यत् स्वपंस्तिष्ठन् गच्छन् जाग्रद् यदास्थितः । कृतवान् पापमद्याहं कायेन मनसा गिरा ॥ यत् स्वल्पमपि यत् स्थूलं कुयोनिनरकावहम् । तद् यातु प्रशमं सर्वं वासुदेवानुकीर्तनात् ॥ परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं च यत् । तस्मिन् प्रकीर्तिते विष्णौ यत् पापं तत् प्रणश्यतु । यत् प्राप्य न निवर्तन्ते गन्धस्पर्शादिवर्जितम् । सूरयस्तत् पदं विष्णोस्तत् सर्वं शमयत्वघम् ॥ (अग्निपुराण १७२।२-१८)) ॥ १- १८॥
जो मनुष्य पापोंका विनाश करनेवाले इस स्तोत्रका पठन अथवा श्रवण करता है, वह शरीर, मन और वाणीजनित समस्त पापोंसे छूट जाता है एवं समस्त पापग्रहोंसे मुक्त होकर श्रीविष्णुके परमपदको प्राप्त होता है। इसलिये किसी भी पापके हो जानेपर इस स्तोत्रका जप करे। यह स्तोत्र पापसमूहोंके प्रायश्चित्तके समान है। कृच्छ्र आदि व्रत करनेवालेके लिये भी यह श्रेष्ठ है। स्तोत्र-जप और व्रतरूप प्रायश्चित्तसे सम्पूर्ण पाप नष्ट हो जाते हैं। इसलिये भोग और मोक्षकी सिद्धिके लिये इनका अनुष्ठान करना चाहिये (पापप्रणाशन स्तोत्रं यः पठेच्छृणुयादपि । शारीरैर्मानसैर्वाग्जैः कृतैः पापैः प्रमुच्यते ॥ सर्वपापग्रहादिभ्यो याति विष्णोः परं पदम् । तस्मात् पापे कृते जप्यं स्तोत्रं सर्वाधमर्दनम् ॥ प्रायश्चित्तमघौघानां स्तोत्रं व्रतकृते वरम् । प्रायश्चित्तैः स्तोत्रजपैर्व्रतैर्नश्यति पातकम् ॥ (अग्निपुराण १७२।१९-२१))) ॥ १९ - २१ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'समस्तपापनाशक स्तोत्रका वर्णन' नामक एक सौ बहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७२ ।।
Summary of chapter 174 of the Agni Mahā Purana is as follows:
Agni describes expiations for specific lapses and accidents in temple worship and ritual performance. If the worshipper misses the daily pūjā of the installed deity, 108 repetitions of the mūla-mantra and a double pūjā the following day are required; if an impure person touches the sacred image, a purification homa of 100 āhutis with the pañcopaniṣad-mantra must follow. Should the deity's image fall from the worshipper's hands, an upavāsa combined with 100 fire oblations is prescribed; if a sacred kumbha breaks inside the temple, one hundred repetitions of the nāma-japa restore ritual integrity. The chapter concludes with praise of the Agni Purāṇa as the sovereign text for removing pāpa, and identifies Viṣṇu as the essence of all eighteen vidyās including jyotiṣa, purāṇas, smṛtis, dharmaśāstra, and the Vedāṅgas.