महादेवजी कहते हैं-
स्कन्ध ! अब मैं 'कल्पाघोर शिवशान्ति' का वर्णन करता हूँ। भगवान् अघोर शिव सात करोड़ गणोंके अधिपति हैं। तथा ब्रह्महत्या आदि पापोंको नष्ट करनेवाले हैं। उत्तम और अधम - सभी सिद्धियोंके आश्रय तथा सम्पूर्ण रोगोंके निवारक हैं। भौम, दिव्य तथा अन्तरिक्ष - सभी उत्पातोंका मर्दन करनेवाले हैं। विष, ग्रह और पिशाचोंको भी अपना ग्रास बना लेनेवाले तथा सम्पूर्ण मनोरथोंको पूर्ण करनेवाले हैं। पापसमूहको पीड़ा देकर दूर भगानेके लिये वे उस प्रबल प्रायश्चित्तके प्रतीक हैं, जो दुर्भाग्य तथा दुःखका विनाशक है ॥ १-३॥
'एकवीर' का सर्वाङ्गमें न्यास करके सदा पञ्चमुख शिवका ध्यान करे ( विभिन्न कर्मोंमें उनके विभिन्न शुक्ल-कृष्ण आदि वर्णोंका ध्यान किया जाता है। यथा -) शान्ति तथा पुष्टि कर्ममें भगवान् शिवका वर्ण शुक्ल है, ऐसा चिन्तन करे वशीकरणमें उनके रक्तवर्णका, स्तम्भनकर्ममें पीतवर्णका, उच्चाटन तथा मारणकर्ममें धूम्रवर्णका, आकर्षणमें कृष्णवर्णका तथा मोहन कर्ममें कपिलवर्णका चिन्तन करना चाहिये। (अघोरमन्त्र बत्तीस अक्षरोंका मन्त्र बताया गया है।) वे बत्तीस अक्षर वेदोक्त अघोरशिवके रूप हैं। अतः उतने अक्षरोंके मन्त्रस्वरूप अघोरशिवकी अर्चना करनी चाहिये। इस मन्त्रका (बत्तीस) या तीस लाख जप करके उसका दशांश होम करे। यह होम गुग्गुलमिश्रित घीसे होना चाहिये। इससे मन्त्र सिद्ध होता और साधक सिद्धार्थ' हो जाता है। वह सब कुछ कर सकता है। अघोरसे बढ़कर दूसरा कोई मन्त्र भोग तथा मोक्ष देनेवाला नहीं है। इसके जपसे अब्रह्मचारी ब्रह्मचारी होता तथा अस्नातक स्नातक हो जाता है। अघोरास्त्र तथा अघोर-मन्त्र- दोनों मन्त्रराज हैं। इनमें से कोई भी मन्त्र जप, होम तथा पूजनसे युद्धस्थलमें शत्रुसेनाको रौंद सकता है ॥ ४-८॥
अब मैं कल्याणमयी रुद्रशान्ति का वर्णन करता हूँ, जो सम्पूर्ण मनोरथोंको सिद्ध करनेवाली है। पुत्रकी प्राप्ति, ग्रहबाधाके निवारण, विष एवं व्याधिके विनाश, दुर्भिक्ष तथा महामारीकी शान्ति, दुःस्वप्रनिवारण, बल आदि तथा राज्य आदिकी प्राप्ति और शत्रुओंके संहारके लिये इस 'रुद्रशान्ति का प्रयोग करना चाहिये। यदि अपने बगीचेके किसी वृक्षमें असमयमें फल लग जाय तो यह भी अनिष्टकारक है; अतः उसकी शान्तिके लिये तथा समस्त ग्रहबाधाओंका नाश करनेके लिये भी उक्त शान्तिका प्रयोग किया जा सकता है। पूजन-कर्ममें मन्त्रके अन्तमें 'नमः' बोलना चाहिये तथा हवन कर्ममें 'स्वाहा'। आप्यायन (तृप्ति) में मन्त्रान्तमें 'वषट्' पदका प्रयोग करे और पुष्टि कर्ममें 'वौषद्' पदका । मन्त्रमें जो दो जगह 'च' का प्रयोग है, वहाँ आवश्यकताके अनुसार 'नमः', 'स्वाहा' आदि जातिका योग करना चाहिये ॥ ९-१२ ॥
रुद्रशान्ति-मन्त्र
ॐ रुद्राय च ते ॐ वृषभाय नमोऽविमुक्ताया सम्भवाय पुरुषाय च पूज्यायेशानाय पौरुषाय पञ्च पञ्चोत्तरे विश्वरूपाय करालाय विकृतरूपायाविकृतरूपाय ॥ १३ ॥
उत्तरवर्ती कमलदलमें नियतितत्त्वकी स्थिति है, जल (वरुण) की दिशा पश्चिमके कमलदलमें - कालतत्त्व है और नैर्ऋत्यकोणवर्ती दलमें मायातत्त्व अवस्थित है; उन सबमें देवताओंकी पूजा होती है। 'एकपिङ्गलाय श्वेतपिङ्गलाय कृष्णपिङ्गलाय नमः । मधुपिङ्गलाय नमः – मधुपिङ्गलाय ।' – इन ―सबकी पूजा नियतितत्त्वमें होती है। 'अनन्तायाद्रय शुष्काय पयोगणाय ( नमः ) – इनकी पूजा कालतत्त्वमें करे। 'करालाय विकरालाय (नमः ) ।' - इन दोकी पूजा मायातत्त्वमें करे। 'सहस्त्रशीषय सहस्त्रवक्त्राय सहस्त्रकरचरणाय सहस्त्रलिङ्गाय ( नमः ) ।' – इनकी अर्चना विद्यातत्त्वमें करे । वह इन्द्रसे दक्षिण दिशाके दलमें स्थित है। वहीं छः पदोंसे युक्त षड्विध रुद्रका पूजन करे । यथा- 'एकजटाय द्विजटाय त्रिजटाय स्वाहाकाराय स्वधाकाराय वषट्काराय षड्द्राय।' स्कन्द ! अग्निकोणवर्ती दलमें ईशतत्त्वकी स्थिति है। उसमें क्रमश: 'भूतपतये पशुपतये उमापतये कालाधिपतये (नमः) ।' बोलकर भूतपति आदिकी पूजा करे । पूर्ववर्ती दल सदाशिव तत्त्वमें छ: पूजनीयोंकी - स्थिति है, जिनका निम्नाङ्कित मन्त्रमें नामोल्लेख है। यथा – 'उमायै कुरूपधारिणि ॐ कुरु कुरु - रुहिणि रुहिणि रुद्रोऽसि देवानां देवदेव विशाख हन हन दह दह पच पच मथ मथ तुरु तुरु अरु अरु मुरु मुरु रुद्रशान्तिमनुस्मर कृष्णपिङ्गल अकाल पिशाचाधिपति विद्येश्वराय नमः ।' कमलकी कर्णिकामें शिवतत्त्वकी स्थिति है। उसमें भगवान् उमा महेश्वर पूजनीय हैं। मन्त्र इस प्रकार है - ॐ व्योमव्यापिने व्योमरूपाय सर्वव्यापिने शिवायानन्ताय नाथायानाश्रिताय शिवाय' (प्रणवको अलग गिननेपर इस मन्त्रमें कुल नौ पद हैं) – शिवतत्त्वमें व्योमव्यापी नामवाले शिवके नौ पदोंका पूजन करना चाहिये ॥ १४- २४ ॥
तदनन्तर योगपीठपर विराजमान शिवका नौ पदोंसे युक्त नाम बोलकर पूजन करे । मन्त्र इस प्रकार है- 'शाश्वताय योगपीठसंस्थिताय नित्ययोगिने ध्यानाहाराय नमः । ॐ नमः शिवाय सर्वप्रभवे शिवाय ईशानमूर्धाय तत्पुरुषाय पञ्चवक्त्राय ।' स्कन्द ! तत्पश्चात् 'सद्' नामक पूर्वदल में नौ पदोंसे युक्त शिवका पूजन करे ।। २५-२६॥
'अघोरहृदयाय वामदेवगुह्याय सद्योजातमूर्तये ॐ नमो नमः । गुह्यातिगुह्याय गोप्वेऽनिधनाय सर्वयोगाधिकृताय ज्योतीरूपाय ॥ २७ ॥ १ ॥
अग्निकोणवर्ती ईशतत्त्वमें तथा दक्षिणदिशावर्ती विद्यातत्त्वमें 'परमेश्वराय अचेतनाचेतन व्योमन् व्यापिन्नरूपिन् प्रमथतेजस्तेजः । इस मन्त्रसे परमेश्वर शिवकी अर्चना करे ॥ २७ ॥ २ ॥
नैर्ऋत्यकोणवर्ती मायातत्त्व तथा पश्चिमदिग्वर्ती कालतत्त्वमें निम्नाङ्कित मन्त्रद्वारा पूजन करे -
'ॐ धृ धृ वां वां अनिधान निधनोद्भव शिव सर्व परमात्मन् महादेव सद्भावेश्वर महातेज योगाधिपते मुच मुच प्रमथ प्रमथ ॐ सर्व सर्व ॐ भव भव ॐ भवोद्भव सर्वभूतसुखप्रद ॥ २८- ३० ॥
वायुकोण तथा उत्तरवर्ती दलोंमें स्थित नियति एवं पुरुष - इन दोनों तत्त्वों में निम्नाङ्कित नौकी पूजा करे -
'सर्वासांनिध्यकर ब्रह्मविष्णुरुद्रपरानचितास्तुत स्तुत साक्षिन् साक्षिन् तुरु तुरु पतङ्ग पतङ्ग पिङ्ग पिङ्ग ज्ञान ज्ञान । शब्द शब्द सूक्ष्म सूक्ष्म शिव शिव सर्वप्रद सर्वप्रद ॐ नमः शिवाय ॐ नमो नमः शिवाय ॐ नमो नमः ॥ ३१ ॥
ईशानवर्ती प्राकृततत्त्वमें 'शब्द' से लेकर 'नमः' तकका मन्त्र पढ़कर पूजन, जप और होम करे । यह 'रुद्रशान्ति' ग्रहबाधा, रोग आदि तथा त्रिविध पीडाका शमन करनेवाली तथा सम्पूर्ण मनोरथोंकी साधिका है ॥ ३२ ॥
इस प्रकार आदि आग्रेय महापुराणमें 'रुद्रशान्ति-विधान-कथन' नामक तीन सौ चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३२४ ॥
Summary of chapter 326 of the Agni Mahā Purana is as follows:
The rites for consecrating village deities and protective divinities are described. Agni explains the distinction between the great temple deities installed with full āgamic rites and the protective village deities (kṣetrapāla, grāma-devatā) installed at the boundaries of settlements. The materials for the mūrti — wood, stone, clay, or metal — and the appropriate forms for each deity class are specified. The prāṇapratiṣṭhā ceremony, in which life-force is ritually infused into the image, is outlined step by step, along with the subsequent daily pūjā obligations of the community. The chapter stresses that a properly installed deity protects the village from drought, disease, and invasion.