महेश्वर कहते हैं-
देवि! अब मैं नक्षत्र-सम्बन्धी त्रिनाडी-चक्रका वर्णन करूँगा, जो यात्रा आदिमें फलदायक होता है। अश्विनी आदि नक्षत्रों में तीन नाडियोंसे भूषित चक्र अङ्कित करे । पहले अश्विनी, आर्द्रा और पुनर्वसु अङ्कित करे; फिर उत्तराफाल्गुनी, हस्त, ज्येष्ठा, मूल, शतभिषा और पूर्वभाद्रपद - इन नक्षत्रोंको लिखे। यह प्रथम नाडी कही गयी है। दूसरी नाडी इस प्रकार है – भरणी, मृगशिरा, पुष्य, पूर्वाफाल्गुनी, चित्रा, अनुराधा, पूर्वाषाढा, धनिष्ठा तथा उत्तराभाद्रपदा । तीसरी नाडीके नक्षत्र ये हैं— कृत्तिका, रोहिणी, आश्लेषा, मघा, स्वाती, विशाखा, उत्तराषाढ़ा, श्रवण तथा रेवती (अग्निपुराणकी ही भाँति नारदपुराण, पूर्व भाग, द्वितीय पाद, अध्याय ५६ के ५०९ वें श्लोकमें भी त्रिनाडी-चक्रका वर्णन है। यथा-त्रिनाडी -) ॥ १-४॥
इन तीन नाडियोंके नक्षत्रों द्वारा सेवित ग्रहके अनुसार शुभाशुभ फल जानना चाहिये। इस 'त्रिनाडी' नामक चक्रको 'फणीश्वर-चक्र' कहा गया है। इस चक्रगत नक्षत्रपर यदि सूर्य, मङ्गल, शनैश्चर एवं राहु हों तो वह अशुभ होता है । इनके सिवा, अन्य ग्रहोंद्वारा अधिष्ठित होनेपर वह नक्षत्र शुभ होता है। देश, ग्राम, भाई और भार्या आदि अपने नामके आदि अक्षरके अनुसार एक नाडीचक्रमें पड़ते हों तो वे शुभकारक होते है ॥५-६॥
अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिरा, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, आश्लेषा, मघा, पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाती, विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल, पूर्वाषाढा, उत्तराषाढा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वभाद्रपदा, उत्तराभाद्रपदा तथा रेवती- ये सत्ताईस नक्षत्र यहाँ जानने योग्य हैं ॥ ७-८ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'नक्षत्रचक्र-वर्णन' नामक एक सौ छत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३६ ॥
Summary of chapter 138 of the Agni Mahā Purana is as follows:
The six classical tantric operations (ṣaṭkarman) are defined: śānti (pacification), vasīkaraṇa (attraction), stambhana (immobilization), vidveṣaṇa (sowing enmity), uccāṭana (uprooting), and māraṇa (causing death). Agni provides the general mantra-framework and ritual conditions for each, noting that only śānti and puṣṭi prayogas are freely permissible; the remaining four are hedged with strict conditions and warnings. The appropriate deities, colours, directions, and samidhs for each operation are listed. The text emphasizes that ṣaṭkarma used for adharmic ends results in the practitioner suffering the intended effect.