अग्निदेव कहते हैं-
मेष (न) सर्गि विष - विसर्ग युक्त मकार (मः ) षसे पहलेका अक्षर श और उसके साथ अक्षि - इकार ( शि) दीर्घोदक (वा) मरुत् ( य )– यह पञ्चाक्षर मन्त्र ( नमः शिवाय ('शारदातिलक' तथा 'श्रीविद्यार्णवतन्त्र' के अनुसार पञ्चाक्षर मन्त्रका विनियोग इस प्रकार है- 'अस्य श्रीशिवपञ्चाक्षरमन्त्रस्य (षडक्षरमन्त्रस्य वा) वामदेव ऋषिः पङ्क्तिश्छन्दः सदाशिवो देवता चतुर्विधपुरुषार्थसिद्धये जपे विनियोगः । इसका न्यास यों होगा 'वामदेवाय ऋषये नमः शिरसि पच्छिन्दसे नमः मुखे श्रीसदाशिवदेवतायै नमः हृदि।')) शिवस्वरूप तथा शिवप्रदाता है। इसके आदिमें ॐ लगा देनेपर यह षडक्षर मन्त्र हो जाता है। इसका अर्चन (भजन) करके मनुष्य देवत्व आदि उत्तम फलोंको प्राप्त कर लेता है ॥ १३ ॥
ज्ञानस्वरूप परब्रह्म ही परम बुद्धिरूप है। वही सबके हृदयमें शिवरूपसे विराजमान है। वह शक्तिभूत सर्वेश्वर ही ब्रह्मा आदि मूर्तियोंके भेदसे भिन्न-सा प्रतीत होता है । मन्त्रके अक्षर पाँच हैं, भूतगण भी पाँच हैं तथा उनके मन्त्र और विषय भी पाँच हैं। प्राण आदि वायु पाँच हैं । ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ भी पाँच-पाँच हैं। ये सब की सब वस्तुएँ पञ्चाक्षर- ब्रह्मरूप हैं। इसी - - प्रकार यह सब कुछ अष्टाक्षर मन्त्ररूप भी है ॥ २-४॥
दीक्षा स्थानका मन्त्रोच्चारणपूर्वक पञ्चगव्यसे - प्रोक्षण करे। फिर वहाँ समस्त आवश्यक सामग्रीका
| संग्रह करके विधिपूर्वक शिवकी पूजा करे । तत्पश्चात् मूलमन्त्र, इष्ट मूर्तिसम्बन्धी मन्त्र तथा - अङ्गसम्बन्धी मन्त्रों द्वारा अक्षत छींटते हुए भूतापसारणपूर्वक रक्षात्मक क्रिया सम्पादित करे । फिर दूधमें चरु पकाकर उसके तीन भाग करे उनमेंसे एक भाग तो इष्टदेवताको निवेदित कर दे, दूसरे भागकी आहुति दे और तीसरा शिष्यसहित स्वयं ग्रहण करे। फिर आचमन एवं सकलीकरण करके आचार्य शिष्यको हृदय मन्त्रसे अभिमन्त्रित - एक दन्तधावन दे, जो दूधवाले वृक्ष आदिका काष्ठ हो। उससे दाँतोंका शोधन करके, उसे चीरकर उसके द्वारा जीभ साफ करनेके बाद धोकर पृथ्वीपर फेंक दे ॥५- ८॥
यदि पूर्वदिशासे फेंकनेपर वह दन्तकाष्ठ उत्तर या पश्चिम दिशाकी ओर जाकर गिरे तो शुभ होता है, अन्यथा अशुभ होता है। पुनः अपने सम्मुख आते हुए शिष्यको शिखाबन्धके (मूलमन्त्रसे सजातीय शिखामन्त्र, यथा-'शि शिखायै वषट्' द्वारा अथवा अघोरादि मन्त्रोंद्वारा गुरु शिष्यकी शिखा बाँध दे। यही 'शिखाबन्धाभिरक्षण' अथवा शिष्यको शिखाबन्धके द्वारा रक्षित करना है। ('शारदातिलक की व्याख्या))
द्वारा रक्षित करके ज्ञानी गुरु वेदीपर उसके साथ कुशके बिस्तरपर सो जाय। शिष्य सोते समय रातमें जो स्वप्र देखे, उसे प्रातःकाल अपने गुरुको सुनावे ॥ ९-१०॥
यदि स्वप्र शुभ एवं सिद्धिसूचक हुए तो उनसे मन्त्र तथा इष्टदेवके प्रति भक्ति बढ़ती है। तत्पश्चात् पुनः मण्डलार्चन करना चाहिये । 'सर्वतोभद्र' आदि मण्डल पहले बताये गये हैं। उन्होंमेंसे किसी एकका पूजन करना चाहिये। पूजित हुआ मण्डल सम्पूर्ण सिद्धियोंका दाता है ॥ ११ ॥
पहले स्नान और आचमन करके मन्त्रोच्चारणपूर्वक देहमें मिट्टी लगाये। फिर पूर्ववत् कल्पित शिवतीर्थमें साधक अघमर्षण मन्त्र जपपूर्वक स्नान करे । फिर विद्वान् पुरुष हस्ताभिषेक (करशुद्धिका एक प्रकार यह भी है- अङ्गुष्ठ आदि सभी अंगुलियोंमें, दोनों हाथोंके अन्तर्भागमें, बाह्यभागमें तथा दोनों हाथोंके पार्श्वभागमें अस्त्रमन्त्र (फट्) का व्यापकन्यास किया जाय।)(हाथोंकी शुद्धि) करके पूजागृहमें प्रवेश करे। मूलमन्त्रसे योगपीठपर कमलासनका न्यास (चिन्तन) करे। मूलसे ही पूरक, कुम्भक तथा रेचक प्राणायाम करे ॥ १२ १३ ।।
(सुषुम्णा नाड़ीके मार्गसे) जीवात्माको ऊपर ब्रह्मरन्ध्रस्थित सहस्त्रारचक्रमें ले जाकर परमात्मामें योजित (स्थापित) कर दे। सिरसे लेकर शिखापर्यन्त जो बारह अङ्गल विस्तृत स्थान है, वही 'ब्रह्मरन्ध्र' है। उसीमें स्थित परमात्मा के भीतर जीवको ('हंसः सोऽहम्'- इस मन्त्रद्वारा) संयोजित करनेके पश्चात् (यह चिन्तन करे कि सम्पूर्ण भूतोंके तत्त्व बीजरूपसे अपने-अपने कारणमें संहारक्रमसे विलीन हो गये हैं। इस प्रकार प्रकृतिपर्यन्त समस्त तत्त्वोंका परमात्मामें लय हो गया है। तदनन्तर) वायुबीज (यकार) - के द्वारा वायुको प्रकट करके उसके द्वारा अपने शरीरको सुखा दे। इसके बाद अग्निबीज (रकार) - से अग्नि प्रकट करके उसके द्वारा उस समस्त शुष्क शरीरको जलाकर भस्म कर दे। (उसमें से दग्ध हुए पापपुरुषके भस्मको विलगाकर) अपने शरीरके भस्मको अमृतबीज (वकार) से प्रकट अमृतकी धारासे आप्लावित कर दे ॥ १४ ॥
(इसके बाद विलीन हुए प्रत्येक तत्त्वके बीजको अपने-अपने स्थानपर पहुँचाकर दिव्य शरीरका निर्माण करे। ) दिव्य स्वरूपका ध्यान करके जीवात्माको पुनः ले आकर हृदयकमलमें स्थापित कर दे। ऐसा करनेसे आत्मशुद्धि सम्पादित होती है। तदनन्तर न्यास करके पूजन आरम्भ करे ॥ १५ ॥
पञ्चाक्षर मन्त्रके न, म आदि पाँच वर्ण क्रमशः कृष्ण, श्वेत, श्याम, रक्त और पीत कान्तिवाले हैं। नकारादि अक्षरोंसे क्रमशः अङ्गन्यास करे। उन्हीं अङ्गोंमें तत्पुरुष आदि पाँच मूर्तियोंका भी न्यास करना चाहिये (इसका प्रयोग इस प्रकार है। पहले निम्नाङ्कित रूपसे मूर्तिसहित करन्यास करे–'नं तत्पुरुषाय नमः तर्जन्यो । मं अघोराय नमः मध्यमयोः । शिं सद्योजाताय नमः कनिष्ठिकयोः । वां वामदेवाय नमः अनामिकयोः। यं ईशानाय नमः अनुष्ठयोः । तत्पश्चात् अङ्गन्याससहित मूर्तिन्यास करे। यथा- 'नं तत्पुरुषाय हृदयाय नमः। मं अघोराय शिरसे स्वाहा। शिं सद्योजातय शिखायै वषट् वां वामदेवाय कवचाय हुम्। यं ईशानाय अस्त्राय फट्।' करन्यासमें यहाँ मध्यमाके बाद कनिष्ठा, फिर अनामिका, तत्पश्चात् अङ्गुष्ठका क्रम श्रीविद्यार्णवतन्त्र' के तीसवें श्वास तथा 'शारदातिलक' के अठारहवें पटलके अनुसार है।)॥ १६ ॥
तदनन्तर अनुष्ठसे कनिष्ठापर्यन्त पाँच अँगुलियोंमें क्रमशः अङ्गमन्त्रों का सर्वतोभावेन न्यास(प्रयोग इस प्रकार है-नं अनुष्ठाभ्यां नमः । मं तर्जनीभ्यां स्वाहा शिं मध्यमाभ्यां वषट् । वाँ अनामिकाभ्यां हुम्। यं कनिष्ठिकाभ्यां फट् ।) करके पाद, गुह्य, हृदय, मुख तथा मूर्धामें मन्त्राक्षरोंका न्यास (नं पादयोः न्यस्यामि मं गुह्ये न्यस्यामि शिं हृदये न्यस्यामि वां मुखे न्यस्यामि यं मूर्धनि न्यस्यामि) करे। इसके बाद मूर्धा, मुख, हृदय, गुह्य और पाद- इन अङ्गों में व्यापक न्यास (व्यापकन्यास 'श्रीविद्यार्णवतन्त्र' (श्वास ३०) तथा 'शारदातिलक' (पटल १८) में इस प्रकार कहा गया है नमोऽस्तु स्थाणुभूताय ज्योतिर्लिङ्गामृतात्मने। चतुर्मूर्तिवपुरछाया भासिताङ्गाय शम्भवे ॥ इति मन्त्रेण मूर्धादिपादपर्यन्तं व्यापकं न्यसेत् ।) करके मूलमन्त्रके अक्षरोंका तथा अङ्गमन्त्रोंका भी वहीं न्यास करे (नं मूर्ध्न नमः । मं वक्त्राय स्वाहा। शिं हृदयाय वषट् । वां गुह्याय हुम् । यं पादाभ्यां फट् ।)। फिर अग्नि आदि कोणोंमें प्रकट पीठके धर्म आदि पादोंका, जो क्रमशः रक्त, पीत, श्याम और श्वेत वर्णके हैं, चिन्तन करके उनमें साध्यमन्त्रके अक्षरोंका न्यास करे तथा पूर्वादि दिशाओं में स्थित अधर्म आदिका चिन्तन करके उनमें अङ्गमन्त्रोंका न्यास (नं धर्माय नमः (अग्निकोणपादे)। मं ज्ञानाय नमः (नैर्ऋत्यपादे) | शिं वैराग्याय नमः (वायव्यपादे) वां यं ऐश्वर्याय नमः (ऐशानपादे)। अधर्माय नमः (पूर्वे)। अज्ञानाय स्वाहा (दक्षिणे)। अवैराग्याय वषट् (पश्चिमे)। अनैश्चर्याय हुं फट् (उत्तरे)।) करे। इस प्रकार योगपीठका चिन्तन करके उसके ऊपर अष्टदल कमलका और सूर्यमण्डल, सोममण्डल तथा अग्रिमण्डल - इन तीन मण्डलोंका एवं सत्त्वादि गुणोंका चिन्तन करे ॥ १७ - १९ ॥
इसके बाद अष्टदल कमलके पूर्वादि दलोंपर वामा आदि आठ शक्तियोंका तथा कर्णिकाके ऊपर नवीं (मनोन्मनी) शक्तिका न्यास या चिन्तन करे। इन शक्तियों के नाम इस प्रकार हैं-वामा, ज्येष्ठा, रौद्री, काली, कलविकारिणी, बलविकारिणी, बलप्रमथनी, सर्वभूतदमनी तथा नवीं मनोन्मनी । ये शक्तियाँ ज्वालास्वरूपा हैं और इनकी कान्ति क्रमशः श्वेत, रक्त, सित, पीत, श्याम, अग्नि-सदृश, असित, कृष्ण तथा अरुण वर्णकी है। इस प्रकार इनका चिन्तन करे ॥ २० - २२ ॥
तदनन्तर 'अनन्तयोगपीठाय नमः 'से योगपीठकी पूजा करके हृदयकमलमें शिवका आवाहन करे। यथा स्फटिकाभं चतुर्बाहुं फालशूलधरं शिवम् । साभयं वरदं पञ्चवदनं च त्रिलोचनम् ॥
'जिनकी कान्ति स्फटिकमणिके समान श्वेत है, जो चार भुजाओंसे सुशोभित हैं और उन हाथोंमें फाल, शूल तथा अभय एवं वरद मुद्राएँ। धारण करते हैं, जिनके पाँच मुख और प्रत्येक मुखके साथ तीन-तीन नेत्र हैं, उन भगवान् शिवका मैं ध्यान एवं आवाहन करता हूँ।' इसके बाद कमलदलों में तत्पुरुषादि पञ्चमूर्तियोंकी स्थापना करे। यथा - नं तत्पुरुषाय नमः (पूर्वे)। मं अघोराय नमः (दक्षिणे)। शिं सद्योजाताय नमः ( पश्चिमे) । वां वामदेवाय नमः (उत्तरे)। यं ईशानाय नमः ( ईशाने) ।तत्पुरुष चतुर्भुज हैं। उनका वर्ण श्वेत है। उनका स्थान कमलके पूर्ववर्ती दलमें है। अघोरके आठ भुजाएँ हैं और उनकी अङ्गकान्ति असित (श्याम) है। इनका स्थान दक्षिणदलमें है। सद्योजातके चार मुख और चार ही भुजाएँ हैं। उनका पीत वर्ण है और स्थान पश्चिमदलमें है। वामदेव विग्रह स्त्री (देवी पार्वती) के साथ विलसित होता है। उनके भी मुख तथा भुजाएँ चार-चार ही हैं। कान्ति अरुण है। इनका स्थान उत्तरवर्ती कमलदलमें है। ईशानके पाँच मुख हैं। वे ईशान दलमें स्थित हैं। उनका वर्ण गौर है तथा वे सब कुछ देनेवाले हैं ॥ २३ - २६ ॥
तत्पश्चात् इष्टदेवके अङ्गोंका यथोचित पूजन करे।(उनके षडङ्ग-पूजनका क्रम यों है- द्वितीय अष्टदलकमलके केसरोंमें - ॐ हृदयाय नमः (देवस्य रक्षाग्रकेसरे) । नं शिरसे स्वाहा (वामाग्रकेसरे ईशाने) । मं शिखायै वषट् (पृष्ठदक्षिणे)। शिं कवचाय हुम् (पृष्ठवामे) । वां नेत्रत्रयाय वौषट् (अग्रे)। यं अस्त्राय फट् (अग्रादिचतुर्दिक्षु) । (श्रीविद्यार्णवतन्त्र)) फिर अनन्त, सूक्ष्म, सिद्धेश्वर (अथवा शिवोत्तम) और एकनेत्रका पूर्वादि दिशाओंमें ( नाममन्त्रसे) पूजन करे। एकरुद्र, त्रिनेत्र, श्रीकण्ठ तथा शिखण्डीका ईशान आदि कोणोंमें पूजन करे। ये सब के सब विद्येश्वर हैं और कमल । इनका आसन है। इनकी अङ्गकान्ति क्रमशः श्वेत, पीत, सित, रक्त, धूम्र, रक्त, अरुण और नील है। ये सभी चतुर्भुज हैं और चार हाथोंमें शूल, वज्र, बाण और धनुष लिये रहते हैं। इनके मुख भी चार-चार ही हैं। इसके बाद तृतीय अष्टदल कमलमें उत्तरादि दलोमें प्रदक्षिण-क्रमसे उमा, चण्डेश, नन्दीश्वर, महाकाल, गणेश्वर, वृषभ, भृङ्गिरिटि तथा स्कन्दका पूजन करे ॥ २७-३०॥
तत्पश्चात् पूर्वादि दिशाओं में चतुरस्त्र रेखापर इन्द्रादि दिक्पालों तथा उनके अस्त्र-वज्र, शक्ति, दण्ड, खड्ग, पाश, ध्वज, गदा, शूल, चक्र और पद्मका पूजन करे (श्रीविद्यार्णवतन्त्र' में पूजनके मन्त्र इस प्रकार दिये गये हैं 'देवाग्रभागमारभ्य लं इन्द्राय सुराधिपतये पीतवर्णाय वज्रहस्ताय - ऐरावतवाहनाय नमः । ई अग्नये तेजोऽधिपतये रक्तवर्णाय शक्तिहस्ताय मेषवाहनाय नमः । हं यमाय प्रेताधिपतये कृष्णवर्णाय दण्डहस्ताय महिषवाहनाय नमः । क्षं नेत्रत्रये रक्षोऽधिपतये धूम्रवर्णाय खड्गहस्ताय प्रेतवाहनाय नमः । वं वरुणाय यादसाम्पतये शुक्लवर्णाय पाशहस्ताय मकरवाहनाय नमः । यं वायवे प्राणाधिपतये धूम्रवर्णाय अङ्कुशहस्ताय मृगवाहनाय नमः। हों ईशानाय विद्याधिपतये स्फटिकवर्णाय शूलहस्ताय वृषभवाहनाय नमः । इति सम्पूज्य इन्द्रेशानयोर्मध्ये-आं ब्रह्मणे लोकाधिपतये रक्तवर्णाय पद्महस्ताय हंसवाहनाय नमः । निर्ऋतिवरुणयोर्मध्ये – ह्रीं अनन्ताय नागाधिपतये गौरवर्णाय चक्रहस्ताय गरुडवाहनाय नमः । इति सम्पूज्य द्वितीयवीच्याम् वज्राय नमः । - शक्तये० । दण्डाय० । खङ्गाय० । पाशाय० । अङ्कुशाय० । गदायै० । त्रिशूलाय० । पद्माय० । चक्राय० । इस प्रकार इन-इन आयुधोंका उन उन दिक्पालोंके निकटवर्ती स्थानमें पूजन करना चाहिये।')। इस प्रकार छः आवरणोंसहित इष्टदेवताकी पूजा करके गुरु अधिवासित शिष्यको पञ्चगव्यपान कराये। फिर आचमन कर लेनेपर उसका प्रोक्षण करे। इसके बाद नेत्रान्त अर्थात् नूतन शुक्ल वस्त्रकी पट्टीसे नेत्र-मन्त्र (वौषट्) का उच्चारण करते हुए गुरु शिष्यके नेत्रोंको बाँध दे। फिर उस शिष्यको मण्डपके दक्षिणद्वार में प्रवेश कराये। वहाँ आसन आदि या कुशपर बैठे हुए शिष्यका गुरु शोधन करे। पूर्वोक्त रीति से शरीर आदि पाञ्चभौतिक तत्त्वोंका क्रमशः संहार करके शिष्यका परमात्मामें लय किया जाय; फिर सृष्टिमार्गसे देशिक शिष्यका पुनरुत्पादन करे। इसके बाद उस शिष्यके दिव्य शरीरमें न्यास करके उसे प्रदक्षिणक्रमसे पश्चिमद्वारपर लाकर उसके द्वारा पुष्पाञ्जलिका क्षेपण कराये। जिस देवताके ऊपर वे फूल गिरें, उसके नामको आदिमें रखते हुए शिष्यके नामका निर्देश करे। तत्पश्चात् (नेत्रका बन्धन खोलकर) यज्ञभूमिके पार्श्वभागमें सुन्दर नाभि और मेखलासे युक्त खुदे हुए कुण्डमें शिवाग्निको प्रकट कराकर, स्वयं उसका पूजन करके, फिर शिष्यसे भी उसकी अर्चना कराये। फिर ध्यानद्वारा आत्मसदृश शिष्यको संहारक्रमसे अपनेमें लीन करके पुनः उसका सृष्टिक्रमसे उत्पादन करे। तदनन्तर उसके हाथमें अभिमन्त्रित कुश दे और हृदयादि मन्त्रों द्वारा पृथिवी आदि तत्त्वोंके लिये आहुति प्रदान करे ।। ३१-३८ ।।
पृथ्वी, जल, तेज और वायु - इनमें से प्रत्येकके लिये इनके नाम मन्त्रसे सौ-सौ आहुतियाँ देकर आकाशतत्त्वके लिये मूलमन्त्र ( ॐ नमः शिवाय ) - से सौ आहुतियाँ दे। इस प्रकार हवन करके उसकी पूर्णाहुति करे। फिर अस्त्र-मन्त्र (फद्) का उच्चारण करके आठ आहुतियाँ दे। तत्पश्चात् विशेष शुद्धिके लिये प्रायश्चित्त (होम या गोदान) करे। अभिमन्त्रित कलशका पूजन कर पीठस्थित शिष्यका अभिषेक करे। फिर गुरु शिष्यको समयाचार सिखावे शिष्य स्वर्ण मुद्रा आदिके द्वारा अपने गुरुका पूजन करे। इस प्रकार यहाँ 'शिवपञ्चाक्षर' मन्त्रकी दीक्षा बतायी गयी। इसी तरह विष्णु आदि देवताओंके मन्त्रोंकी भी दीक्षा दी जाती है ॥ ३९-४१॥
इस प्रकार आदि आग्रेय महापुराणमें 'पञ्चाक्षरमन्त्रकी दीक्षाके विधानका वर्णन' नामक तीन सौ चारवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३०४॥
Summary of chapter 305 of the Agni Mahā Purana is as follows:
This chapter enumerates the chief medicinal plants, roots, bark, leaves, fruits, and seeds used in Āyurvedic formulation, along with their rasa, guṇa, vīrya, and vipāka. The ten great roots (daśamūla) and the great triad (trikaṭu, triphalā, trikatu) are listed with their indications. Methods of preparation — decoction (kvātha), paste (kalka), juice (svarasa), powder (cūrṇa), and medicated oils — are explained. The chapter stresses that correct preparation preserves the prabhāva of the drug and that adulteration or incorrect processing destroys its efficacy.