अग्निदेव कहते हैं-
मुनिश्रेष्ठ! अब मैं भोग एवं मोक्षप्रद द्वादशी सम्बन्धी व्रत कहता हूँ। द्वादशी तिथिको मनुष्य रात्रिको एक समय भोजन करे और किसीसे कुछ नहीं माँगे । उपवास करके भी भिक्षा ग्रहण करनेवाले मनुष्यका द्वादशीव्रत सफल नहीं हो सकता। चैत्र मासके शुक्लपक्षकी द्वादशी तिथिको 'मदनद्वादशी' का व्रत करनेवाला भोग और मोक्षकी इच्छासे कामदेव-रूपी श्रीहरिका अर्चन करे। माघके शुक्लपक्षकी द्वादशीको 'भीमद्वादशी का व्रत करना चाहिये और 'नमो नारायणाय ।' मन्त्रसे श्रीविष्णुका पूजन करना चाहिये। ऐसा करनेवाला मनुष्य सब कुछ प्राप्त कर लेता है। फाल्गुनके शुक्लपक्ष में 'गोविन्दद्वादशी का व्रत होता है। आश्विनमें 'विशोकद्वादशी का व्रत करनेवालेको श्रीहरिका पूजन करना चाहिये। मार्गशीर्षके शुक्लपक्षी द्वादशीको श्रीकृष्णका पूजन करके जो मनुष्य लवणका दान करता है, वह सम्पूर्ण रसोंके दानका फल प्राप्त करता है। भाद्रपदमें 'गोवत्सद्वादशी का व्रत करनेवाला गोवत्सका पूजन करे। माघ मासके व्यतीत हो जानेपर फाल्गुनके कृष्णपक्षकी द्वादशी, जो श्रवणनक्षत्र संयुक्त हो, उसे 'तिलद्वादशी' कहा गया है। इस दिन तिलोंसे ही स्नान और होम करना चाहिये तथा तिलके लड्डुओंका भोग लगाना चाहिये । मन्दिरमें तिलके तेलसे युक्त दीपक समर्पित करना चाहिये तथा पितरोंको तिलाञ्जलि देनी चाहिये। ब्राह्मणोंको तिलदान करे। होम और उपवाससे ही 'तिलद्वादशी' का फल प्राप्त होता है। 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ।' मन्त्रसे श्रीविष्णुकी पूजा करनी चाहिये। उपर्युक्त विधि छः बार 'तिलद्वादशी का व्रत करनेवाला कुलसहित स्वर्गको प्राप्त करता है। फाल्गुनके शुक्लपक्ष में मनोरथद्वादशी का व्रत करनेवाला श्रीहरिका पूजन करे। इसी दिन 'नामद्वादशी का व्रत करनेवाला 'केशव' आदि नामोंसे श्रीहरिका एक वर्षतक पूजन करे। वह मनुष्य मृत्युके पश्चात् स्वर्गमें ही जाता है। वह कभी नरकगामी नहीं हो सकता। फाल्गुनके शुक्लपक्षमें 'सुमतिद्वादशी' का व्रत करके विष्णुका पूजन करे। भाद्रपद मासके शुक्लपक्षमें 'अनन्तद्वादशी का व्रत करे। माघ शुक्लपक्षमें आश्लेषा अथवा मूलनक्षत्रसे युक्त 'तिलद्वादशी' करनेवाला मनुष्य 'कृष्णाय नमः ।' मन्त्रसे श्रीकृष्णका पूजन करे और तिलोंका होम करे। फाल्गुनके शुक्लपक्षमें 'सुगतिद्वादशी' का व्रत करनेवाला 'जय कृष्ण नमस्तुभ्यम्' मन्त्रसे एक वर्षतक श्रीकृष्णकी पूजा करे। ऐसा करने से मनुष्य भोग और मोक्ष दोनों प्राप्त कर लेता है। पौषके शुक्लपक्षकी द्वादशीको 'सम्प्राप्ति द्वादशी का व्रत करे ॥ १- १४ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'द्वादशीके व्रतोंका वर्णन' नामक एक सौ अठासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८८ ॥
Summary of chapter 190 of the Agni Mahā Purana is as follows:
The Akhaṇḍa-dvādaśī vrata performed on Mārgaśīrṣa-śukla-dvādaśī is described as the remedy for all previously undertaken vratas that were interrupted, incomplete, or improperly observed. Agni prescribes upavāsa, Viṣṇu pūjā, and pāraṇa with pañcagavya the following morning. The distinctive prayer states: "For seven births my vratas have been left incomplete—O Puruṣottama, make them whole by your grace." The vrata is also performed as a four-month discipline from Āṣāḍha to Āśvayuja with the giving of a saktu-pātra (container of roasted grain) monthly. It bestows āyus, ārogya, saubhāgya, and rājya upon the performer.