महादेवजी कहते हैं-
स्कन्द ! 'ॐ हूं हं सः'– इस मन्त्रसे मृत्युरोग आदि शान्त हो जाते हैं। इस मन्त्रद्वारा दूर्वाकी एक लाख आहुतियाँ दी जायँ तो उससे साधक शान्ति तथा पुष्टिका भी साधन कर सकता है। षडानन! अथवा केवल प्रणव (ॐ) अथवा माया (ह्रीं) के जपसे ही दिव्य, अन्तरिक्षगत तथा भूमिगत उत्पातोंकी शान्ति होती है। उत्पातवृक्षके शमनका भी यही उपाय है ॥ १-२॥
(गङ्गा सम्बन्धी वशीकरणमन्त्र )
ॐ नमो भगवति गङ्गे कालि कालि महाकालि महाकालि मांसशोणितभोजने रक्तकृष्णमुखि वशमानय मानुषान् स्वाहा।'—
इस मन्त्रका एक लाख जप करके दशांश आहुति देकर मनुष्य सम्पूर्ण कर्मोंमें सिद्धि पा सकता है। इन्द्र आदि देवताओंको भी वशमें ला सकता है, फिर इन साधारण मनुष्योंको वशमें लाना कौन बड़ी बात है ? यह विद्या अन्तर्धानकरी, मोहनी, जृम्भनी, शत्रुओंको वशमें लानेवाली तथा शत्रुकी बुद्धिको मोहमें डाल देनेवाली है। यह कामधेनुविद्या सात प्रकारकी कही गयी है ॥ ३ - ५६ ॥
अब मैं 'मन्त्रराज' का वर्णन करूँगा, जो शत्रुओं तथा चोर आदिको मोह लेनेवाला है। यह साक्षात् शिव (मेरे) द्वारा पूजित है। इसका सभी महान् भयके अवसरोंपर स्मरण करना चाहिये। एक लाख जप करके तिलोंद्वारा हवन करनेसे यह मन्त्र सिद्ध होता है। अब इसका उद्धार सुनो ॥ ६-७॥
'ॐ हले शूले एहि ब्रह्मसत्येन विष्णुसत्येन
रुद्रसत्येन रक्ष मां वाचेश्वराय स्वाहा ॥८॥
भगवती शिवा दुर्गम संकटसे तारती - उद्धार - करती है, इसलिये 'दुर्गा' मानी गयी है ॥ ९॥
'ॐ ह्रीं चण्डकपालिनि दन्तान् किट किट क्षिट क्षिट गुह्ये फट् हीम् ॥ १० ॥ –
इस मन्त्रराजके जपपूर्वक चावल धोकर उसको इस मन्त्रके तीस बार जपद्वारा अभिमन्त्रित करे। फिर वह चावल चोरोंमें बँटवा दे। उस चावलको दाँतोंसे चबानेपर उनके श्वेत दन्त गिर जाते हैं तथा वे मनुष्य चोरीके पापसे मुक्त एवं शुद्ध हो जाते हैं ॥ ११-१२॥
(क्षेत्रपालबलि मन्त्र )
“ॐ ज्वलल्लोचन कपिलजटाभारभास्वर विद्रावण त्रैलोक्यडामर डामर दर दर भ्रम भ्रम आकट्ट आकट्ट तोटय तोटय मोटय मोटय दह दह पच पच एवं सिद्धिरुद्रो ज्ञापयति यदि ग्रहोऽपगतः स्वर्गलोकं देवलोकं वाऽऽरामविहाराचलं तथापि तमावर्तयिष्यामि बलिं गृह्ण गृह्ण ददामि स्वाहा । इति" ॥ १३ ॥
– इस मन्त्रसे क्षेत्रपालको बलि देकर न्यास करनेसे अनिष्ट ग्रह रोता हुआ चला जाता है। साधकके शत्रु नष्ट हो जाते हैं तथा रणभूमिमें शत्रु समुदायका विनाश हो जाता है ॥ १४ ॥
'हंस' बीजका न्यास करके साधक तीन प्रकारके विष अथवा विघ्नका निवारण कर देता है। अगुरु, चन्दन, कुष्ठ (कूट), कुङ्कुम, नागकेसर, नख तथा देवदारु — इन सबको सममात्रामें कूट - पीसकर धूप बना ले। फिर इसमें मधुमक्खीके शहदका योग कर दे। उसकी सुगन्धसे शरीर तथा वस्त्र आदिको धूपित या वासित करनेसे मनुष्य विवाद, स्त्रीमोहन, शृंगार तथा कलह आदिके अवसरपर शुभ फलका भागी होता है। कन्यावरण तथा भाग्योदय सम्बन्धी कार्यमें भी - उसे सफलता प्राप्त होती है। मायामन्त्र (ह्रीं) से मन्त्रित हो, रोचना, नागकेसर, कुङ्कुम तथा मैनसिलका तिलक ललाटमें लगाकर मनुष्य जिसकी ओर देखता है, वही उसके वशमें हो जाता है। शतावरीके चूर्णको दूधके साथ पीया जाय तो वह पुत्रकी उत्पत्ति करानेवाला होता है। नागकेसरके चूर्णको घीमें पकाकर खाया जाय तो वह भी पुत्रकारक होता है। पलाशके बीजको पीसकर पीनेसे भी पुत्रकी प्राप्ति होती है ॥ १५ - २० ॥
( वशीकरणके लिये सिद्ध विद्या)
'ॐ उत्तिष्ठ चामुण्डे जम्भय जम्भय मोहय मोहय (अमुकं) वशमानय स्वाहा' ॥ २१ ॥
– यह छब्बीस अक्षरोंवाली 'सिद्ध विद्या' है। (यदि किसी स्त्रीको वशमें करना हो तो) नदीके तीरकी मिट्टीसे लक्ष्मीजीकी मूर्ति बनाकर धतूरके रससे मदारके पत्तेपर उस अभीष्ट स्त्रीका नाम लिखे। इसके बाद मूत्रोत्सर्ग करनेके पश्चात् शुद्ध हो उक्त मन्त्रका जप करे। यह प्रयोग अभीष्ट स्त्रीको अवश्य वशमें ला सकता है ॥ २२-२३ ॥
( महामृत्युंजय )
'ॐ जूं सः वषट् ॥ २४ ॥
– यह 'महामृत्युंजय मन्त्र' है, जो जप तथा - होमसे पुष्टिकारक होता है ॥ २५ ॥
( मृतसंजीवनी )
'ॐ हं सः हूं हूं सः, हः सौः ॥ २६ ॥
- यह आठ अक्षरवाली 'मृतसंजीवनी विद्या' है, जो रणभूमिमें विजय दिलानेवाली है। 'ईशान' आदि मन्त्र भी धर्म काम आदिको देनेवाले हैं ।। २७ ।।
( ईशान आदि मन्त्र )
(ॐ) ईशानः सर्वविद्यानामीश्वरः सर्वभूतानां ब्रह्माधिपतिर्ब्रह्मणोऽधिपतिर्ब्रह्मा शिवो मे अस्तु सदाशिवोम् (ईशान आदि मन्त्रोंके अर्थ जो सम्पूर्ण विद्याओंके ईश्वर, समस्त भूतोंके अधीश्वर ब्रह्म वेदके अधिपति, ब्रह्म-बल वीर्यके प्रतिपालक तथा साक्षात् ब्रह्मा एवं परमात्मा हैं, वे सच्चिदानन्दमय नित्य कल्याणस्वरूप शिव मेरे बने रहें ॥ २८ ॥)॥ २८ ॥
(ॐ) तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि । तन्नो रुद्रः प्रचोदयात् (तत्पदार्थ – परमेश्वररूप अन्तर्यामी पुरुषको हम जानें, उन महादेवका चिन्तन करें; वे भगवान् रुद्र हमें सद्धर्मके लिये प्रेरित करते रहें ॥ २९ ॥) ॥ २९ ॥
(ॐ) अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यः सर्वतः सर्वशर्वेभ्यो नमस्तेऽस्तु रुद्ररूपेभ्यः (जो अघोर हैं, घोर हैं, घोरसे भी घोरतर हैं, उन सर्वव्यापी, सर्वसंहारो रुद्ररूपोंकि लिये जो आपके ही स्वरूप हैं, साक्षात् आपके लिये मेरा नमस्कार हो ॥ ३० ॥) ॥ ३० ॥
(ॐ) वामदेवाय नमो ज्येष्ठाय नमः श्रेष्ठाय नमो रुद्राय नमः कालाय नमः कलविकरणाय नमो बलविकरणाय नमो बलाय नमो बलप्रमथनाय नमः सर्वभूतदमनाय नमो मनोन्मनाय नमः (प्रभो! आप ही वामदेव, ज्येष्ठ श्रेष्ठ, रुद्र, काल, कलविकरण, बलविकरण, बल, बलप्रमथन, सर्वभूतदमन तथा मनोन्मन आदि नामोंसे प्रतिपादित होते हैं इन सभी नाम-रूपोंमें आपके लिये मेरा बारंबार नमस्कार है ॥ ३१ ॥)॥ ३१ ॥
(ॐ) सद्योजातं प्रपद्यामि सद्योजाताय वै नमो नमो भवे भवे नातिभवे भवस्व मां भवोद्भवाय नमः (मैं सद्योजात शिवकी शरण लेता हूँ सद्योजातको मेरा नमस्कार है। किसी जन्म या जगत्में मेरा अतिभव- पराभव न करें। आप भवोद्भवको मेरा नमस्कार है ॥ ३२ ॥) ॥ ३२ ॥
अब मैं 'पञ्चब्रह्म' के छः अङ्गोंका वर्णन करूँगा, जो भोग तथा मोक्ष प्रदान करनेवाला है ॥ ३३ ॥ (ॐ) नमः परमात्मने पराय कामदाय परमेश्वराय योगाय योगसम्भवाय सर्वकराय कुरु कुरु सद्य सद्य भव भव भवोद्भव वामदेव सर्वकार्यकर पापप्रशमन सदाशिव प्रसन्न नमोऽस्तु ते (स्वाहा) ॥ ३४ ॥
-यह सतहत्तर अक्षरोंका हृदय मन्त्र है, जो सम्पूर्ण मनोरथों को देनेवाला है। [कोष्ठकमें दिये गये अक्षरोंको छोड़कर गिननेपर सतहत्तर अक्षर होते हैं।] ॥ ३५ ॥
(इस मन्त्रको पढ़कर 'हृदयाय नमः' बोलकर हृदयका स्पर्श करना चाहिये ।)
'ॐ शिव शिवाय नमः ।' यह शिरोमन्त्र है, अर्थात् इसे पढ़कर 'शिरसे स्वाहा' बोलकर दाहिने हाथसे सिरका स्पर्श करना चाहिये। ॐ शिवहृदये ज्वालिनी स्वाहा, शिखायै वषट्' बोलकर शिखाका स्पर्श करे ।
'ॐ शिवात्मक महातेजः सर्वज्ञ प्रभो संवर्तय महाघोरकवच पिङ्गल आयाहि पिङ्गल नमो महाकवच शिवाज्ञया हृदयं बन्ध बन्ध घूर्णय घूर्णय चूर्णय चूर्णय सूक्ष्मासूक्ष्म वज्रधर वज्रपाशधनुर्वनाशनिवज्रशरीर मच्छरीरमनुप्रविश्य सर्वदुष्टान् स्तम्भय स्तम्भय हुम् (पाठान्तर 'हूम्'।) ॥ ३६ ॥
- यह एक सौ पाँच अक्षरोंका कवच-मन्त्र है। अर्थात् इसे पढ़कर 'कवचाय हुम्' बोलते हुए दोनों हाथोंसे एक साथ दोनों भुजाओंका स्पर्श करे ॥ ३७॥
ॐ ओजसे नेत्रत्रयाय वौषट्' ऐसा बोलकर दोनों नेत्रोंका स्पर्श करे। इसके बाद निम्नाङ्कित मन्त्र पढ़कर अस्त्रन्यास करे- 'ॐ ह्रीं स्फुर स्फुर प्रस्फुर प्रस्फुर घोरघोरतरतनुरूप चट चट प्रचट प्रचट कह कह वम वम बन्ध बन्ध घातय घातय हुं फट् ।' यह ( प्रणवसहित बावन अक्षरोंका) 'अघोरास्त्र मन्त्र' है ॥ ३८ ॥
इस प्रकार आदि आग्रेय महापुराणमें अनेकविध मन्त्रोंके साथ ईशान आदि मन्त्र तथा छः अङ्गसहित अघोरास्त्रका कथन' नामक तीन सौ तेईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३२३ ॥
Summary of chapter 325 of the Agni Mahā Purana is as follows:
Temple architecture (prāsāda-nirūpaṇa) is expounded as sacred science rooted in the Vāstu tradition. Agni describes the selection and purification of the building site, the orientation of the structure relative to the cardinal directions, and the layout of the vāstupuruṣamaṇḍala — the cosmic diagram that underlies all sacred construction. The classification of prāsādas into vairāja, puṣpaka, kailāsa, maṇika, triviṣṭapa, and other types is given along with their proportional specifications. The chapter details the placement of the garbhagṛha, maṇḍapa, and gopura, and the deities presiding over each sector of the sacred complex.