अग्निदेव कहते हैं—
वसिष्ठ ! अब मैं मन्त्र, ध्यान और ओषधिके द्वारा साँपके द्वारा डॅसे हुए मनुष्यकी चिकित्साका वर्णन करता हूँ। 'ॐ नमो भगवते नीलकण्ठाय' इस मन्त्रके जपसे विषका नाश होता है ('सुश्रुत में मन्त्रग्रहणकी विधि इस प्रकार बतायी गयी है- 'स्त्री, मांस और मधु (मद्य) का सेवन छोड़कर, मिताहारी और पवित्र होकर मन्त्र ग्रहण करना चाहिये। मन्त्र-साधकको कुशके आसनपर बैठना और सोना चाहिये। मन्त्री सिद्धि के लिये वह 'यत्नपूर्वक गन्ध, माल्य, उपहार, बलि, जप और होमके द्वारा देवताओंका पूजन करे। अविधिपूर्वक उच्चारित अथवा स्वरवर्णसे छीन मन्त्र सिद्धिप्रद नहीं होते हैं। इसलिये मन्त्रप्रयोग के साथ-साथ औषध-उपचार आदिका क्रम भी चालू रखना चाहिये।'(सुश्रुत, उत्तर तन्त्र, कल्पस्थान ५।१३)) । घृतके साथ गोबरके रसका पान करे। यह ओषधि साँपके डसे हुए मनुष्यके जीवनकी रक्षा करती है। विष दो प्रकारके कहे जाते हैं- 'जङ्गम' विष, जो सर्प और मूषक आदि प्राणियों में पाया जाता है एवं दूसरा 'स्थावर' विष, जिसके अन्तर्गत शृङ्ग (सिंगिया) आदि विषभेद हैं ॥ १-२ ॥
शान्तस्वरसे युक्त ब्रह्मा (क्षौं), लोहित (ह्रीं), तारक (ॐ) और शिव (हौं) – यह चार अक्षरोंका वियति सम्बन्धी नाममन्त्र है (इन चारों अक्षरोंका उद्धार 'तन्त्राभिधानकोष के अनुसार किया गया है।) । इसे शब्दमय तार्क्ष्य (गरुड) माना गया है ॥ ३-४ ॥
ॐ ज्वल महामते हृदयाय नमः, गरुड विशाल शिरसे स्वाहा, गरुड शिखायै वषद्, गरुडविषभञ्जन प्रभेदन प्रभेदन वित्रासय वित्रासय विमईय विमईय कवचाय हुम्, उग्ररूपधारक सर्वभयंकर भीषय भीषय सर्वं दह दह भस्मीकुरु कुरु स्वाहा, नेत्रत्रयाय वौषट् । अप्रतिहतशास वं हूं फट् अस्त्राय फट् ।'
मातृकामय कमल बनावे। उसके आठों दिशाओं में आठ दल हों। पूर्वादि दलोंमें दो - दोके क्रमसे समस्त स्वरवर्णोंको लिखे। कवर्गादि सात वर्गोंके अन्तिम दो-दो अक्षरोंका भी प्रत्येक दलमें उल्लेख करे। उस कमलके केसरभागको वर्गके आदि अक्षरोंसे अवरुद्ध करे तथा कर्णिकामें अग्निबीज 'रं' लिखे। मन्त्रका साधक उस कमलको हृदयस्थ करके बायें हाथकी हथेलीपर उसका चिन्तन करे। अङ्गुष्ठ आदिमें वियति मन्त्रके - वर्णोंका न्यास करें और उनके द्वारा भेदित कलाओंका भी चिन्तन करे। तदनन्तर चौकोर 'भू-पुर' नामक मण्डल बनावे, जो पीले रंगका हो और चारों ओरसे वज्रद्वारा चिह्नित हो। यह मण्डल इन्द्रदेवताका होता है। अर्धचन्द्राकार वृत्त जलदेवता सम्बन्धी है। कमलका आधा भाग शुक्लवर्णका है। उसके देवता वरुण हैं। फिर स्वस्तिक चिह्नसे युक्त त्रिकोणाकार तेजोमय - वह्निदेवताके मण्डलका चिन्तन करे। वायुदेवताका मण्डल बिन्दुयुक्त एवं वृत्ताकार है। वह कृष्णमाला सुशोभित है, ऐसा चिन्तन करे ॥ ५- ८ ॥
ये चार भूत अङ्गुष्ठ, तर्जनी, मध्यमा और अनामिका – इन चार अँगुलियोंके मध्यपर्वों में - स्थित अपने निवासस्थानों में विराजमान हैं और सुवर्णमय नागवाहनसे इनके वासस्थान आवेष्टित हैं। इस प्रकार चिन्तनपूर्वक क्रमशः पृथ्वी आ तत्त्वों का अङ्गुष्ठ आदिके मध्यपर्वमें न्यास करे। साथ ही वियति मन्त्रके चार वर्णोंको भी क्रमशः उन्हींमें विन्यस्त करे। इन वर्णोंकी कान्ति उनके सुन्दर मण्डलोंके समान है। इस प्रकार न्यास करनेके पश्चात् रूपरहित शब्दतन्मात्रमय शिवदेवताके आकाशतत्त्वका कनिष्ठाके मध्यपर्वमें चिन्तन करके उसके भीतर वेदमन्त्रके प्रथम अक्षरका न्यास करे। पूर्वोक्त नागोंके नामके आदि अक्षरोंका उनके अपने मण्डलोंमें न्यास करे। पृथ्वी आदि भूतोंके आदि अक्षरोंका अङ्गुष्ठ आदि अँगुलियोंके अन्तिम पर्वोपर न्यास करें तथा विद्वान् पुरुष गन्धतन्मात्रादिके गन्धादि गुणसम्बन्धी अक्षरोंका पाँचों अँगुलियोंमें न्यास करे ॥ ९ - १२ ॥
इस प्रकार न्यास - ध्यानपूर्वक तार्क्ष्य मन्त्रसे रोगीके हाथका स्पर्शमात्र करके मन्त्रज्ञ विद्वान् उसके स्थावर जंगम दोनों प्रकारके विषोंका नाश कर देता है। विद्वान् पुरुष पृथ्वीमण्डल आदिमें विन्यस्त वियति मन्त्रके चारों वर्णोंका अपनी श्रेष्ठ दो अंगुलियों द्वारा शरीरके नाभिस्थानों और पर्वोंमें न्यास करे। तदनन्तर गरुडके स्वरूपका इस प्रकार ध्यान करे–'पक्षिराज गरुड दोनों घुटनोंतक सुनहरी आभासे सुशोभित हैं। घुटनोंसे लेकर नाभितक उनकी अङ्गकान्ति बर्फके समान सफेद है। वहाँसे कण्ठतक वे कुङ्कुमके समान अरुण प्रतीत होते हैं और कण्ठसे केशपर्यन्त उनकी कान्ति असित (श्याम) है। वे समूचे ब्रह्माण्डमें व्याप्त हैं। उनका नाम चन्द्र है और वे नागमय आभूषणसे विभूषित हैं। उनकी नासिकाका अग्रभाग नीले रंगका है और उनके पंख बड़े विशाल हैं।' मन्त्रज्ञ विद्वान् अपने-आपका भी गरुडके रूपमें ही चिन्तन करे। इस तरह गरुडस्वरूप मन्त्रप्रयोक्ता पुरुषके वाक्यसे मन्त्र विषपर अपना प्रभाव डालता है। गरुडके हाथकी मुट्ठी रोगीके हाथमें स्थित हो तो वह उसके अङ्गुष्ठ में स्थित विषका विनाश कर देती है । मन्त्रज्ञ पुरुष अपने गरुडस्वरूप हाथको ऊपर उठाकर उसकी पाँचों अँगुलियोंके चालनमात्रसे विषसे उत्पन्न होनेवाले मदपर दृष्टि रखते हुए उस विषका स्तम्भन आदि कर सकता है ॥ १३ - १७३ ॥
आकाशसे लेकर भू-बीजपर्यन्त जो पाँच बीज हैं, उन्हें 'पञ्चाक्षर मन्त्रराज' कहा गया है। (उसका स्वरूप इस प्रकार है- हं, यं, रं, वे, लं।) अत्यन्त विषका स्तम्भन करना हो तो इस मन्त्रके उच्चारणमात्रसे मन्त्रज्ञ पुरुष विषको रोक देता है। यह 'व्यत्यस्तभूषण' बीजमन्त्र है। अर्थात् इन बीजोंको उलट-फेरकर बोलना इस मन्त्रके लिये भूषणरूप है। इसको अच्छी तर साध लिया जाय और इसके आदिमें 'संप्लवं प्लावय प्लावय' – यह वाक्य जोड़ दिया जाय - तो मन्त्र प्रयोक्ता पुरुष इसके प्रयोगसे विषका - संहार कर सकता है ॥ १८-१९ ॥
इस मन्त्रके भलीभाँति जपसे अभिमन्त्रित जलके द्वारा अभिषेक करनेमात्रसे यह मन्त्र अपने प्रभावद्वारा उस रोगीसे डंडा उठवा सकता है, अथवा मन्त्रजपपूर्वक की गयी शङ्खभेर्यादिकी ध्वनिको सुननेमात्रसे यह प्रयोग रोगीके विषको अवश्य ही दग्ध कर देता है। यदि भू-बीज 'लं' तथा तेजोबीज 'रं' को उलटकर रखा जाय, अर्थात् 'हं, यं, लं, वं, रं- इस प्रकार मन्त्रका स्वरूप कर दिया जाय तो उसका प्रयोग भी उपर्युक्त फलका साधक होता है। अर्थात् उस भी विषका दहन हो जाता है। भू-बीज और वायु-बीजका व्यत्यय करनेसे जो मन्त्र बनता है। वह (हं लं रं वं यं) विषका संक्रामक होता है, अर्थात् उसका अन्यत्र संक्रमण करा देता है। मन्त्र प्रयोक्ता पुरुष रोगीके समीप बैठा हो या - अपने घरमें स्थित हो, यदि गरुडके स्वरूपका चिन्तन तथा अपने आपमें भी गरुडकी भावना करके 'रं वं, इन दो ही बीजोंका उच्चारण (जप) करे तो इस कर्मको सफल बना सकता है। गरुड और वरुणके मन्दिरमें स्थित होकर उक्त मन्त्रका जप करनेसे मन्त्रज्ञ पुरुष विषका नाश कर देता है। 'स्वधा' और श्रीके बीजोंसे युक्त करके यदि इस मन्त्रको बोला जाय तो इसे 'जानुदण्डिमन्त्र' कहते हैं। इसके जपपूर्वक स्नान और जलपान करनेसे साधक सब प्रकारके विष, ज्वर, रोग और अपमृत्युपर विजय पा लेता है ॥ २० - २४ ॥
१ पक्षि पक्षि महापक्षि महापक्षि वि वि स्वाहा ।
२ पक्षि पक्षि महापक्षि महापक्षि क्षि क्षि स्वाहा ॥
—ये दो पक्षिराज गरुडके मन्त्र हैं। इनके द्वारा अभिमन्त्रण करने, अर्थात् इनके जपपूर्वक रोगीको झाड़नेसे ये दोनों मन्त्र विषके नाशक होते हैं ॥ २५-२६ ॥
'पक्षिराजाय विग्रहे पक्षिदेवाय धीमहि तन्नो गरुडः प्रचोदयात्।'— यह गरुड-गायत्रीमन्त्र है ॥ २७ ॥
उपर्युक्त दोनों पक्षिराज-मन्त्रोंको '२' बीजसे आवृत्त करके उनके पार्श्वभागमें भी '' बीज जोड़ दे। तदनन्तर दन्त, श्री, दण्डि, काल और लाङ्गलीसे उन्हें युक्त कर दे और आदिमें पूर्वोक्त 'नीलकण्ठ मन्त्र' जोड़ दे। इस प्रकार बताये गये मन्त्रका वक्षःस्थल, कण्ठ और शिखामें न्यास करे। उक्त दोनों मन्त्रोंका संस्कार करके उन्हें स्तम्भमें अङ्कित करे ॥ २८ ॥
इसके पश्चात् निम्नाङ्कित रूपसे न्यास करे -
'हर हर स्वाहा हृदयाय नमः । कपर्द्दिने स्वाहा शिरसे स्वाहा । नीलकण्ठाय स्वाहा शिखायै वषट् । कालकूटविषभक्षणाय हुं फट् कवचाय हुम्।' इससे भुजाओं तथा कण्ठका स्पर्श करे । 'कृत्तिवाससे नेत्रत्रयाय वौषट् नीलकण्ठाय स्वाहा अस्त्राय फट्' (यह अङ्गन्यास 'शारदातिलक' और 'श्रीविद्यार्णवतन्त्र में इसी प्रकार उपलब्ध है।)॥ २९ ॥
जिनके पूर्व आदि मुख क्रमशः श्वेत, पीत, अरुण और श्याम हैं, जो अपने चारों हाथों में क्रमशः अभय, वरद, धनुष तथा वासुकि नागको धारण करते हैं, जिनके गलेमें यज्ञोपवीत शोभा पाता है और पार्श्वभागमें गौरीदेवी विराजमान हैं, वे भगवान् रुद्र इस मन्त्रके देवता हैं। दोनों पैर, दोनों घुटने, गुह्यभाग, नाभि, हृदय, कण्ठ और मस्तक-इन अङ्गोंमें मन्त्रके अक्षरोंका न्यास करके दोनों हाथोंमें अङ्गुष्ठ आदि अँगुलियों में अर्थात् तर्जनीसे लेकर तर्जनीपर्यन्त अँगुलियोंमें मन्त्राक्षरोंका न्यास करके सम्पूर्ण मन्त्रका अङ्गुष्ठोंमें न्यास करे ॥ ३०-३२३ ।।
इस प्रकार ध्यान और न्यास करके शीघ्र ही बँधी हुई शूलमुद्राद्वारा विषका संहार करे। कनिष्ठा अँगुली ज्येष्ठासे बँध जाय और तीन अन्य अँगुलियाँ फैल जायँ तो 'शूलमुद्रा' होती है। विषका नाश करनेके लिये बायें हाथका और अन्य कार्यमें दक्षिण हाथका प्रयोग करना चाहिये ॥ ३३-३४॥
ॐ नमो भगवते नीलकण्ठाय चिः । अमलकण्ठाय चिः । सर्वज्ञकण्ठाय चिः । क्षिप क्षिप ॐ स्वाहा। अमलनीलकण्ठाय नैकसर्पविषापहाय। नमस्ते रुद्र मन्यवे - इस मन्त्रको पढ़कर झाड़नेसे विष नष्ट हो जाता है, इसमें संदेह नहीं है। रोगीके कानमें जप करनेसे अथवा मन्त्र पढ़ते हुए जूतेसे रोगीके पासकी भूमिपर पीटनेसे विष उतर जाता है। रुद्रविधान करके उसके द्वारा नीलकण्ठ महेश्वरका यजन करे। इससे विष-व्याधिका विनाश हो जाता है ॥ ३५-३६ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'दष्ट चिकित्साका कथन' नामक दो सौ पंचानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २९५॥
Summary of chapter 296 of the Agni Mahā Purana is as follows:
Treatment of snakebite through the Pañcāṅga-Rudra — the five-limbed worship of Rudra — is presented. The five aṅgas of the Rudra mantra-system are: the Śiva-saṃkalpa Sūkta as the hṛdaya, the Puruṣa Sūkta as the śiras, "Ādbhyaḥ Saṃbhūtaḥ" as the śikhā, "Āśuḥ Śiṣānaḥ" as the kavacha, and the Śata-Rudrīya as the astra. The Veda citations for each aṅga — their ṛṣi, chandas, and devatā — are detailed. Additional mantras such as the Trailokya-mohana mantra "Iṃ Śrīṃ Hrīṃ Hrūṃ Trailokya-mohanāya Viṣṇave namaḥ" and the Narasiṃha-anūṣṭubh are also prescribed for neutralizing venom. The dvādaśākṣara and aṣṭākṣara mantras of Viṣṇu are declared equally effective.