अग्निदेव कहते हैं-
वसिष्ठ ! तुर्वसुके पुत्र वर्ग और वर्गके पुत्र गोभानु हुए। गोभानुसे त्रैशानि, त्रैशानिसे करंधम और करंधमसे मरुत्तका जन्म हुआ। उनके पुत्र दुष्यन्त हुए। दुष्यन्तसे वरूथ और वरूथसे गाण्डीरकी उत्पत्ति हुई। गाण्डीरसे गान्धार हुए। गान्धारके पाँच पुत्र हुए, जिनके नामपर गन्धार, केरल, चोल, पाण्ड्य और कोल इन पाँच देशोंकी प्रसिद्धि हुई। ये सभी महान् बलवान् थे। दुह्युसे बध्रुसेतु और बभ्रुसेतुसे पुरोवसुका जन्म हुआ। उनसे गान्धार नामक पुत्रोंकी उत्पत्ति हुई। गान्धारोंने धर्मको जन्म दिया और धर्मसे घृत उत्पन्न हुए। घृतसे विदुष और विदुषसे प्रचेता हुए। प्रचेताके सौ पुत्र हुए, जिनमें अनडु, सुभानु, चाक्षुष और परमेषु- ये प्रधान थे। सुभानुसे कालानल और कालानलसे सृञ्जय उत्पन्न हुए। सृञ्जयके पुरज्जय और पुरञ्जयके पुत्र जनमेजय थे। जनमेजयके पुत्र महाशाल और उनके पुत्र महामना हुए। ब्रह्मन्! महामनासे उशीनरका जन्म हुआ और महामनाकी 'नृगा' नामवाली पत्नी के गर्भसे राजा नृगका जन्म हुआ। नृगकी 'नरा' नामक पत्नीसे नरकी उत्पत्ति हुई और कृमि नामवाली स्त्रीके गर्भसे कृमिका जन्म हुआ। इसी प्रकार नृगके दशा नामकी पत्नीसे सुव्रत और दृषद्वती शिवि उत्पन्न हुए। शिविके चार पुत्र हुए- पृथुदर्भ, वीरक, कैकेय और भद्रक - इन चारों के नामसे श्रेष्ठ जनपदोंकी प्रसिद्धि हुई। उशीनर पुत्र तितिक्षु हुए, तितिक्षुसे रुषद्रथ, रुषद्रथसे पैल और पैलसे सुतपा नामक पुत्रोंकी उत्पत्ति हुई। सुतपासे महायोगी बलिका जन्म हुआ। बलिसे अङ्ग, बङ्ग, मुख्यक, पुण्ड्र और कलिङ्ग नामक पुत्र उत्पन्न हुए। ये सभी 'बालेय' कहलाये। बलि योगी और बलवान् थे। अङ्गसे दधिवाहन, दधिवाहनसे राजा दिविरथ और दिविरथसे धर्मरथ उत्पन्न हुए। धर्मरथके पुत्रका नाम चित्ररथ हुआ। चित्ररथके सत्यरथ और उनके पुत्र लोमपाद हुए। लोमपादका पुत्र चतुरङ्ग और चतुरङ्गका पुत्र पृथुलाक्ष हुआ। पृथुलाक्षसे चम्प, चम्पसे हर्यङ्ग और हर्यनसे भद्ररथ हुआ। भद्ररथके पुत्रका नाम बृहत्कर्मा था। बृहत्कर्मासे बृहद्भानु, बृहद्भानुसे बृहात्मवान् उनसे जयद्रथ और जयद्रथसे बृहद्रथकी उत्पत्ति हुई। बृहद्रथसे विश्वजित् और विश्वजित्का पुत्र कर्ण हुआ। कर्णका वृषसेन और वृषसेनका पुत्र पृथुसेन था। ये अङ्गवंशमें उत्पन्न राजा बतलाये गये। अब मुझसे पूरुवंशका वर्णन सुनो ॥ १-१७॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'राजवंशका वर्णन' नामक दो सौ सतहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २७७ ॥
Summary of chapter 278 of the Agni Mahā Purana is as follows:
The Puru lineage — from which both the Kauravas and Pāṇḍavas descend — is narrated in full. The line passes through Janmejaya, Prācīnvān, Manasyu, Vītamaya, Śandhu, Bahuvidhā, and Saṃyāti to Duṣyanta, who fathers Bharata upon Śakuntalā. Bharadvāja is given as a son by the Maruts. Ajamīḍha's lineage gives Jahnu → Kuśika → Gādhi → Viśvāmitra. Ṛkṣa → Saṃvaraṇa → Kuru, who establishes the sacred field of Kurukṣetra. Kuru's descendants through Śantanu, Bhīṣma (Gaṅgā's son), Pāṇḍu, and Dhṛtarāṣṭra lead to the full Pāṇḍava genealogy — Yudhiṣṭhira, Bhīma, Arjuna, Nakula, Sahadeva — and their sons including Abhimanyu and Parīkṣit. The Jarāsandha lineage from Bṛhadratha is also traced.