अग्निदेव कहते हैं-
ब्रह्मन् ! 'अग्निपुराण' ब्रह्मस्वरूप है, मैंने तुमसे इसका वर्णन किया। इसमें कहीं संक्षेपसे और कहीं विस्तारके साथ 'परा' और 'अपरा' – इन दो विद्याओंका प्रतिपादन किया गया है। यह महापुराण है। ऋक्, यजुः, साम और अथर्व-नामक वेदविद्या, विष्णु-महिमा, संसार सृष्टि, छन्द, शिक्षा, व्याकरण, निघण्टु (कोष), ज्यौतिष, निरुक्त, धर्मशास्त्र आदि, मीमांसा, विस्तृत न्यायशास्त्र, आयुर्वेद, पुराण विद्या, धनुर्वेद, गन्धर्ववेद, अर्थशास्त्र, वेदान्त और महान् (परमेश्वर) श्रीहरि - यह सब 'अपरा विद्या' है तथा परम अक्षर तत्त्व 'परा विद्या' है। (इस पुराणमें इन दोनों विद्याओंका विषय वर्णित है।) 'यह सब कुछ विष्णु ही है'– ऐसा जिसका भाव हो, उसे कलियुग बाधा नहीं पहुँचाता। बड़े-बड़े यज्ञोंका अनुष्ठान और पितरोंका श्राद्ध न करके भी यदि मनुष्य भक्तिपूर्वक श्रीकृष्णका पूजन करे तो वह पापका भागी नहीं होता। विष्णु सबके कारण हैं। उनका निरन्तर ध्यान करनेवाला पुरुष कभी कष्टमें नहीं पड़ता। यदि परतन्त्रता आदि दोषोंसे प्रभावित होकर तथा विषयोंके प्रति चित्त आकृष्ट हो जानेके कारण मनुष्य पाप कर्म कर बैठे तो भी गोविन्दका ध्यान करके वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। दूसरी दूसरी बहुत सी बातें बनानेसे क्या लाभ ? 'ध्यान' वही है, जिसमें गोविन्दका चिन्तन होता हो, 'कथा' वही है, जिसमें केशवका कीर्तन हो रहा हो और 'कर्म' वही है, जो श्रीकृष्णकी प्रसन्नता के लिये किया जाय। (तद् ध्यानं यत्र गोविन्दः सा कथा यत्र केशवः। तत्कर्म यत्तदर्थीर्य किमन्यैर्वहुभाषितैः ॥ (३८३८)) वसिष्ठजी! जिस परमोत्कृष्ट परमार्थतत्त्वका उपदेश न तो पिता पुत्रको और न गुरु शिष्यको कर सकता है, वही इस अग्निपुराणके रूपमें मैंने आपके प्रति किया है। द्विजवर! संसारमें भटकनेवाले पुरुषको स्त्री, पुत्र और धन वैभव मिल सकते हैं तथा अन्य अनेकों सुहृदोंकी भी प्राप्ति हो सकती है, परंतु ऐसा उपदेश नहीं मिल सकता। स्त्री, पुत्र, मित्र, खेती-बारी और बन्धुबान्धवोंसे क्या लेना है? यह उपदेश ही सबसे बड़ा बन्धु है; क्योंकि यह संसारसे मुक्ति दिलानेवाला है ॥ १- ११॥ प्राणियोंकी सृष्टि दो प्रकारकी है- 'दैवी' और 'आसुरी'। जो भगवान् विष्णुकी भक्ति में लगा हुआ है, वह 'दैवी सृष्टि के अन्तर्गत है तथा जो भगवान्से विमुख है, वह 'आसुरी सृष्टि का मनुष्य है- असुर है। यह अग्निपुराण, जिसका मैंने तुम्हें उपदेश किया है, परम पवित्र, आरोग्य एवं धनका साधक, दुःस्वप्नका नाश करनेवाला, मनुष्योंको सुख और आनन्द देनेवाला तथा भव बन्धनसे मोक्ष दिलानेवाला है। जिनके घरों में हस्तलिखित अग्निपुराणकी पोथी मौजूद होगी, वहाँ उपद्रवोंका जोर नहीं चल सकता जो मनुष्य प्रतिदिन अग्निपुराण श्रवण करते हैं, उन्हें तीर्थ सेवन, गोदान, यज्ञ तथा उपवास आदिकी क्या आवश्यकता है? जो प्रतिदिन एक प्रस्थ तिल और एक माशा सुवर्ण दान करता है तथा जो अग्निपुराणका एक ही श्लोक सुनता है, उन दोनोंका फल समान है। श्लोक सुनानेवाला पुरुष तिल और सुवर्ण-दानका फल पा जाता है। इसके एक अध्यायका पाठ गोदानसे बढ़कर है। इस पुराणको सुननेकी इच्छामात्र करनेसे दिन रातका किया हुआ पाप नष्ट हो जाता है। वृद्धपुष्कर तीर्थमें सौ कपिला गौओंका दान करनेसे जो फल मिलता है, वही अग्निपुराणका पाठ करनेसे मिल जाता है। 'प्रवृत्ति' और 'निवृत्ति' रूप धर्म तथा 'परा' और 'अपरा' नामवाली दोनों विद्याएँ इस 'अग्निपुराण' नामक शास्त्रकी समानता नहीं कर सकतीं। वसिष्ठजी ! प्रतिदिन अग्निपुराणका पाठ अथवा श्रवण करनेवाला भक्त मनुष्य सब पापोंसे छुटकारा पा जाता है। जिस घरमें अग्निपुराणकी पुस्तक रहेगी, वहाँ विघ्न-बाधाओं, अनर्थों तथा चोरों आदिका भय नहीं होगा। जहाँ अग्निपुराण रहेगा, उस घरमें गर्भपातका भय न होगा, बालकोंको ग्रह नहीं सतायेंगे तथा पिशाच आदिका भय भी निवृत्त हो जायगा। इस पुराणका श्रवण करनेवाला ब्राह्मण वेदवेत्ता होता है, क्षत्रिय पृथ्वीका राजा होता है, वैश्य धन पाता है, शूद्र नीरोग रहता है। जो भगवान् विष्णुमें मन लगाकर सर्वत्र समानदृष्टि रखते हुए ब्रह्मस्वरूप अग्निपुराणका प्रतिदिन पाठ या श्रवण करता है, उसके दिव्य, आन्तरिक्ष और भौम आदि सारे उपद्रव नष्ट हो जाते हैं। इस पुस्तकके पढ़ने-सुनने और पूजन करनेवाले पुरुषके और भी जो कुछ पाप होते हैं, उन सबको भगवान् केशव नष्ट कर देते हैं। जो मनुष्य हेमन्त ऋतुमें गन्ध और पुष्प आदिसे पूजा करके श्रीअग्निपुराणका श्रवण करता है, उसे अग्निष्टोम यज्ञका फल मिलता है। शिशिर ऋतुमें इसके श्रवणसे पुण्डरीकका तथा वसन्त ऋतु में - अश्वमेध यज्ञका फल प्राप्त होता है। गर्मीमें वाजपेयका, वर्षामें राजसूयका तथा शरद् ऋतुमें इस पुराणका पाठ और श्रवण करनेसे एक हजार गोदान करनेका फल प्राप्त होता है। वसिष्ठजी ! जो भगवान् विष्णुके सम्मुख बैठकर भक्तिपूर्वक अग्निपुराणका पाठ करता है, वह मानो ज्ञानयज्ञके द्वारा श्रीकेशवका पूजन करता है। जिसके घरमें हस्तलिखित अग्निपुराणकी पुस्तक पूजित होती है, उसे सदा ही विजय प्राप्त होती है तथा भोग और मोक्ष- दोनों ही उसके हाथमें रहते हैं - यह बात पूर्वकालमें कालाग्निस्वरूप श्रीहरिने स्वयं ही मुझसे बतायी थी आग्नेय पुराण ब्रह्मविद्या एवं अद्वैतज्ञान रूप है ॥ १२ - ३१ ॥
वसिष्ठजी कहते हैं—
व्यास! यह अग्निपुराण 'परा अपरा' दोनों विद्याओंका स्वरूप है। इसे विष्णुने ब्रह्मासे तथा अग्निदेवने समस्त देवताओं और मुनियोंके साथ बैठे हुए मुझसे जिस रूपमें सुनाया, उसी रूपमें मैंने तुम्हारे सामने इसका वर्णन किया है। अग्निदेवके द्वारा वर्णित यह 'आग्नेय पुराण' वेदके तुल्य माननीय है तथा यह सभी विषयोंका ज्ञान करानेवाला है। व्यास ! जो इसका पाठ या श्रवण करेगा, जो इसे स्वयं लिखेगा या दूसरोंसे लिखायेगा, शिष्योंको पढ़ायेगा या सुनायेगा अथवा इस पुस्तकका पूजन या धारण करेगा, वह सब पापोंसे मुक्त एवं पूर्णमनोरथ | होकर स्वर्गलोकमें जायगा जो इस उत्तम पुराणको लिखाकर ब्राह्मणों को दान देता है, वह ब्रह्मलोकमें जाता है तथा अपने कुलकी सौ पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है जो एक श्लोकका भी पाठ करता है, उसका पाप-पङ्कसे छुटकारा हो जाता है। इसलिये व्यास! इस सर्वदर्शनसंग्रहरूप पुराणको तुम्हें श्रवणकी इच्छा रखनेवाले शुकादि मुनियोंके साथ अपने शिष्योंको सदा सुनाते रहना चाहिये। अग्निपुराणका पठन और चिन्तन अत्यन्त शुभ तथा भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाला है। जिन्होंने इस पुराणका गान किया है, उन अग्निदेवको नमस्कार है ॥ ३२-३८ ॥
व्यासजी कहते हैं-
सूत ! पूर्वकालमें वसिष्ठजीके मुखसे सुना हुआ यह अग्निपुराण मैंने तुम्हें सुनाया है। 'परा' और 'अपरा' विद्या इसका स्वरूप है। यह परम पद प्रदान करनेवाला है। आग्नेय पुराण परम दुर्लभ है, भाग्यवान् पुरुषोंको ही यह प्राप्त होता है। 'ब्रह्म' या 'वेद स्वरूप' इस अग्निपुराणका चिन्तन करनेवाले पुरुष श्रीहरिको प्राप्त होते हैं। इसके चिन्तनसे विद्यार्थियों को विद्या और राज्यकी इच्छा रखनेवालोंको राज्यकी प्राप्ति होती है। जिन्हें पुत्र नहीं है, उन्हें पुत्र मिलता है तथा जो लोग निराश्रय हैं, उन्हें आश्रय प्राप्त होता है। सौभाग्य चाहनेवाले सौभाग्यको तथा मोक्षकी अभिलाषा रखनेवाले मनुष्य मोक्षको पाते हैं। इसे लिखने और लिखानेवाले लोग पापरहित होकर लक्ष्मीको प्राप्त होते हैं। सूत! तुम शुक और पैल आदिके साथ अग्निपुराणका चिन्तन करो, इससे तुम्हें भोग और मोक्ष- दोनोंकी प्राप्ति होगी- इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। तुम भी अपने शिष्यों और भक्तोंको यह पुराण सुनाओ ॥ ३९-४४॥
सूतजी कहते हैं-
शौनक आदि मुनिवरो! मैंने श्रीव्यासजीकी कृपासे श्रद्धापूर्वक अग्निपुराणका श्रवण किया है। यह अग्निपुराण ब्रह्मस्वरूप है। आप सब लोग श्रद्धायुक्त होकर इस नैमिषारण्यमें भगवान् श्रीहरिका यजन करते हुए निवास करते हैं, अतः (आपको सर्वोत्तम अधिकारी समझकर) | मैंने आपसे इस पुराणका वर्णन किया है। 'अग्निदेव' इस पुराणके वक्ता हैं, अतएव यह आग्नेय पुराण' कहलाता है। इसे वेदोंके तुल्य माना गया है। यह 'ब्रह्म' और 'विद्या'– दोनोंसे युक्त है। भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाला श्रेष्ठ साधन है। इससे बढ़कर सर्वोत्तम सार, इस उत्तम सुहृद्, इससे श्रेष्ठ ग्रन्थ तथा इससे उत्कृष्ट कोई गति नहीं है। इस पुराणसे बढ़कर शास्त्र नहीं है, इससे उत्तम श्रुति नहीं है, इससे श्रेष्ठ ज्ञान नहीं है तथा इससे उत्कृष्ट कोई स्मृति नहीं है । इससे श्रेष्ठ आगम, इससे श्रेष्ठ विद्या, इससे श्रेष्ठ सिद्धान्त और इससे श्रेष्ठ मङ्गल नहीं है। इससे बढ़कर वेदान्त भी नहीं है। यह पुराण सर्वोत्कृष्ट है। इस पृथ्वीपर अग्निपुराणसे बढ़कर श्रेष्ठ और दुर्लभ वस्तु कोई नहीं है ॥ ४५-५१ ॥
इस अग्निपुराणमें सब विद्याओंका प्रदर्शन ( परिचय ) कराया गया है। भगवान्के मत्स्य आदि सम्पूर्ण अवतार, गीता और रामायणका भी इसमें वर्णन है। 'हरिवंश' और 'महाभारत का भी परिचय है। नौ प्रकारकी सृष्टिका भी दिग्दर्शन कराया गया है। वैष्णव-आगमका भी गान किया गया है। देवताओंकी स्थापनाके साथ ही दीक्षा तथा पूजाका भी उल्लेख हुआ है। पवित्रारोहण आदिकी विधि, प्रतिमाके लक्षण आदि तथा मन्दिरके लक्षण आदिका वर्णन है। साथ ही भोग और मोक्ष देनेवाले मन्त्रोंका भी उल्लेख है। शैव-आगम और उसके प्रयोजन, शाक्त-आगम, सूर्यसम्बन्धी आगम, मण्डल, वास्तु और भाँति-भाँतिके मन्त्रोंका वर्णन है। प्रतिसर्गका भी परिचय कराया गया है। ब्रह्माण्ड मण्डल तथा भुवनकोषका भी वर्णन है। द्वीप, वर्ष आदि और नदियोंका भी उल्लेख है। गङ्गा तथा प्रयाग आदि तीर्थोकी महिमाका वर्णन किया गया है। ज्योतिश्चक्र (नक्षत्र-मण्डल), ज्यौतिष आदि विद्या तथा युद्धजयार्णवका भी निरूपण है। मन्वन्तर आदिका वर्णन तथा वर्ण और आश्रम आदिके धर्मोका प्रतिपादन किया गया है। साथ ही अशौच, द्रव्यशुद्धि तथा प्रायश्चित्तका भी ज्ञान कराया गया है। राजधर्म, दानधर्म, भाँति-भाँतिके व्रत, व्यवहार, शान्ति तथा ऋग्वेद आदिके विधानका भी वर्णन है। सूर्यवंश, सोमवंश, धनुर्वेद, वैद्यक, गान्धर्व वेद, अर्थशास्त्र, मीमांसा, न्यायविस्तार, पुराण- संख्या, पुराण-माहात्म्य, छन्द, व्याकरण, अलंकार, निघण्टु, शिक्षा और कल्प आदिका भी इसमें निरूपण किया गया है ॥ ५२-६१ ॥
नैमित्तिक, प्राकृतिक और आत्यन्तिक लयका वर्णन है। वेदान्त, ब्रह्मज्ञान और अष्टाङ्गयोगका निरूपण है। स्तोत्र, पुराण महिमा और अष्टादश विद्याओंका प्रतिपादन है। ऋग्वेद आदि अपरा विद्या, परा विद्या तथा परम अक्षरतत्त्वका भी निरूपण है। इतना ही नहीं, इसमें ब्रह्मके सप्रपञ्च (सविशेष) और निष्प्रपञ्च (निर्विशेष) रूपका वर्णन किया गया है। यह पुराण पंद्रह हजार श्लोकोंका है। देवलोकमें इसका विस्तार एक अरब श्लोकों में है। देवता सदा इस पुराणका पाठ करते हैं। सम्पूर्ण लोकोंका हित करनेके लिये अग्निदेवने इसका संक्षेपसे वर्णन किया है। शौनकादि मुनियो! आप इस सम्पूर्ण पुराणको ब्रह्ममय ही समझें। जो इसे सुनता या सुनाता, पढ़ता या पढ़ाता, लिखता या लिखवाता तथा इसका पूजन और कीर्तन करता है, वह परम शुद्ध हो सम्पूर्ण मनोरथोंको प्राप्त करके कुलसहित स्वर्गको जाता है || ६२-६६ ई ॥
राजाको चाहिये कि संयमशील होकर पुराणके वक्ताका पूजन करे। गौ, भूमि तथा सुवर्ण आदिका दान दे, वस्त्र और आभूषण आदिसे तृप्त करते हुए वक्ताका पूजन करके मनुष्य पुराण-श्रवणका पूरा-पूरा फल पाता है। पुराण श्रवणके पश्चात् निश्चय ही ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये। जो इस पुस्तकके लिये शरयन्त्र (पेटी), सूत, पत्र (पन्ने), काठकी पट्टी, उसे बाँधनेकी रस्सी तथा वेष्टन वस्त्र आदि दान करता है, वह स्वर्गलोकको जाता है। जो अग्निपुराणकी पुस्तकका दान करता है, वह ब्रह्मलोकमें जाता है। जिसके घरमें यह पुस्तक रहती है, उसके यहाँ उत्पातका भय नहीं रहता। वह भोग और मोक्षको प्राप्त होता है। मुनियो! आपलोग इस अग्निपुराणको ईश्वररूप मानकर सदा इसका स्मरण रखें ॥ ६७-७१ ३ ॥
व्यासजी कहते हैं –
तत्पश्चात् सूतजी मुनियोंसे - पूजित हो वहाँसे चले गये और शौनक आदि । महात्मा भगवान् श्रीहरिको प्राप्त हुए ॥ ७२ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'अग्निपुराणमें वर्णित संक्षिप्त विषय तथा इस पुराणके माहात्म्यका वर्णन' नामक तीन सौ तिरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३८३ ।।
॥ अग्निपुराण सम्पूर्ण ॥
गीताप्रेस, गोरखपुरसे प्रकाशित पुराण- साहित्य
श्रीमद्भागवतमहापुराण, व्याख्यासहित (कोड 26, 27 ) ग्रन्थाकार - श्रीमद्भागवत भारतीय वाङ्मयका मुकुटमणि है। भगवान् शुकदेवद्वारा महाराज परीक्षित्को सुनाया गया भक्तिमार्गका तो मानो सोपान ही है। इसके प्रत्येक श्लोकमें श्रीकृष्ण प्रेमकी सुगन्धि है। यह सम्पूर्ण ग्रन्थरत्न मूलके साथ हिन्दी-अनुवाद, पूजन विधि, भागवत-माहात्म्य, आरती, पाठके विभिन्न प्रयोगोंके साथ दो खण्डोंमें उपलब्ध है। विशिष्ट संस्करण (कोड 1535, 1536) सचित्र, सजिल्द, (कोड 1552, 1553) गुजराती, (कोड 1678, 1735) सानुवाद, मराठी, (कोड 1739, 1740), कन्नड़, (कोड 1577, 1744) बँगला (कोड 564, 565) अंग्रेजी अनुवाद (कोड 25 ) केवल हिन्दी बृहदाकार, बड़े टाइपमें, (कोड 1190, 1191 ) बड़ा टाइप, दो खण्डोंमें, केवल हिन्दी, (कोड 1490) (वि० सं०) केवल हिन्दी (कोड 1159, 1160) वि० सं०, केवल अंग्रेजी अनुवाद (कोड 28) केवल हिन्दी, (कोड 1608) केवल गुजराती, (कोड 29) मूल, मोटा टाइप, संस्कृत ग्रन्थाकार (कोड 1573) मूल, मोटा टाइप, तेलुगु, ग्रन्थाकार (कोड 124) मूल मझला आकार (कोड 1855) विशिष्ट सं० मूल, मझला संस्कृतमें भी। संक्षिप्त शिवपुराण, मोटा टाइप (कोड 789 ) ग्रन्थाकार – इस पुराणमें परात्पर ब्रह्म शिवके कल्याणकारी - स्वरूपका तात्त्विक विवेचन, रहस्य, महिमा और उपासनाका विस्तृत वर्णन है। सचित्र, सजिल्द, विशिष्ट संस्करण ( कोड 1468) हिन्दी एवं (कोड 1286) गुजरातीमें भी उपलब्ध। संक्षिप्त पद्मपुराण (कोड 44 ) ग्रन्थाकार – इस पुराणमें भगवान् विष्णुकी विस्तृत महिमाके साथ, भगवान्. श्रीराम तथा श्रीकृष्णके चरित्र, विभिन्न तीर्थोका माहात्म्य, शालग्रामका स्वरूप, तुलसी महिमा, गीता माहात्म्य, विष्णुसहस्रनाम, उपासना विधि तथा विभिन्न व्रतोंका सुन्दर वर्णन है। सचित्र सजिल्द संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण (कोड 539) ग्रन्थाकार- भगवतीकी विस्तृत महिमाका परिचय देनेवाले इस पुराणमें दुर्गासप्तशतीकी कथा एवं माहात्म्य, हरिश्चन्द्रकी कथा, मदालसा चरित्र, अत्रि-अनसूयाकी कथा, दत्तात्रेय चरित्र आदि अनेक सुन्दर कथाओंका विस्तृत वर्णन है। सचित्र सजिल्द ।
श्रीविष्णुपुराण, अनुवादसहित (कोड 48 ) ग्रन्थाकार इसके प्रतिपाद्य भगवान् विष्णु हैं, जो सृष्टिके आदिकारण, नित्य, अक्षय, अव्यय तथा एकरस हैं। इसमें आकाश आदि भूतोंका परिमाण, समुद्र, सूर्य आदिका परिमाण, पर्वत, देवतादिकी उत्पत्ति, मन्वन्तर कल्प-विभाग, सम्पूर्ण धर्म एवं देवर्षि तथा राजर्षियोंके चरित्रका विशद वर्णन है। सचित्र सजिल्द (कोड 1364) केवल हिन्दी अनुवादमें भी उपलब्ध। संक्षिप्त नारदपुराण (कोड 1183) ग्रन्थाकार- इसमें सदाचार-महिमा, वर्णाश्रम धर्म, भक्ति तथा भक्तके लक्षण, देवपूजन, तीर्थ-माहात्म्य, दान-धर्मके माहात्म्य और भगवान् विष्णुकी महिमाके साथ अनेक भक्तिपरक उपाख्यानोंका विस्तृत वर्णन किया गया है। सचित्र सजिल्द ।
संक्षिप्त स्कन्दपुराण (कोड 279) ग्रन्थाकार - यह पुराण कलेवरको दृष्टिसे सबसे बड़ा है तथा इसमें
लौकिक और पारलौकिक ज्ञानके अनन्त उपदेश भरे हैं। इसमें भगवान् शिवकी महिमा, सती-चरित्र, शिव
पार्वती विवाह, कार्तिकेय-जन्म, तारकासुर वध एवं धर्म, सदाचार, योग, ज्ञान तथा भक्तिके सुन्दर विवेचन के साथ-साथ अनेक साधु-महात्माओंके सुन्दर चरित्र पिरोये गये हैं। सचित्र सजिल्द । संक्षिप्त ब्रह्मपुराण (कोड 1111 ) ग्रन्थाकार – इस पुराणमें सृष्टिकी उत्पत्ति, पृथुका पावन चरित्र, सूर्य एवं - चन्द्रवंशका वर्णन श्रीकृष्णचरित्र, कल्पान्तजीवी मार्कण्डेय मुनिका चरित्र, तीर्थोका माहात्म्य एवं अनेक भक्तिपरक आख्यानों की सुन्दर चर्चा की गयी है। सचित्र, सजिल्द ।
संक्षिप्त गरुडपुराण – ( कोड 1189) ग्रन्थाकार- इस पुराणके अधिष्ठातृ देव भगवान् विष्णु हैं। इसमें ज्ञान, भक्ति, वैराग्य, सदाचार, निष्काम कर्मकी महिमाके साथ यज्ञ, दान, तप, तीर्थ आदि शुभ कर्मोंमें सर्व-साधारणको प्रवृत्त करनेके लिये अनेक लौकिक एवं पारलौकिक फलोंका वर्णन किया गया है। सचित्र, सजिल्द ।
संक्षिप्त भविष्यपुराण- (कोड 584) ग्रन्थाकार- यह पुराण विषय वस्तु एवं वर्णन शैलीकी दृष्टि से अत्यन्त उच्च कोटिका है। इसमें धर्म, सदाचार, नीति, उपदेश, अनेक आख्यान, व्रत, तीर्थ, दान, ज्योतिष एवं आयुर्वेदशास्त्रके विषयोंका अद्भुत संग्रह है। वेताल विक्रम संवादके रूपमें कथा प्रबन्ध इसमें अत्यन्त रमणीय है। इसके अतिरिक्त इसमें नित्यकर्म, सामुद्रिक शास्त्र, शान्ति तथा पौष्टिक कर्मका भी वर्णन है। सचित्र, सजिल्द ।