अग्निदेव कहते हैं-
मुने! अब मैं धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष - इन चारों पुरुषार्थोकी सिद्धि के - लिये 'त्रैलोक्यमोहन' नामक मन्त्रका वर्णन करूँगा ॥ १ ॥
ॐ श्रीं ह्रीं हूं ओम्, ॐ नमः पुरुषोत्तम पुरुषोत्तमप्रतिरूप लक्ष्मीनिवास सकलजगत्क्षोभण सर्वस्त्रीहृदयदारण त्रिभुवनमदोन्मादकर सुर मनुजसुन्दरीजनमनांसि तापय तापय दीपय दीपय शोषय शोषय मारय मारय स्तम्भय स्तम्भय द्रावय द्रावयाकर्षयाकर्षय परमसुभग सर्वसौभाग्यकर कामप्रदामुकं (शत्रुम्) हन हन चक्रेण गदया खङ्गेन सर्वबाणैर्भिन्द भिन्द पाशेन कट्ट कट्ट अङ्कुशेन ताडय ताडय त्वर त्वर किं तिष्ठसि यावत्तावत् समीहितं मे सिद्धं भवति हुं फट्, नमः ( इस मन्त्रका अर्थ यों है— ॐ श्रीं ह्रीं हूं ओम् सच्चिदानन्दस्वरूप पुरुषोत्तम । पुरुषोत्तमप्रतिरूप। लक्ष्मीनिवास! आप अपने सौन्दर्यसे सम्पूर्ण जगत्को क्षुब्ध कर देनेमें समर्थ हैं। समस्त स्त्रियोंके हृदयको दरण- उन्मथित कर देनेवाले हैं। त्रिभुवनको मदोन्मत्त कर देनेकी शक्ति रखते हैं। देवसुन्दरियों तथा मानवसुन्दरियोंके मनको (प्रीति अग्निमें) तपाइये, तपाइये; उनके रागको उद्दीप्त कीजिये, उद्दीप्त कीजिये; सोखिये, सोखिये; मारिये, मारिये उनका स्तम्भन कीजिये; स्तम्भन कीजिये; द्रवित कीजिये, द्रवित कीजिये; आकर्षित कीजिये, आकर्षित कीजिये। परम सौभाग्यनिधे सर्वसौभाग्यकारी प्रभो। आप सबकी मनोवाञ्छित कामना पूर्ण करनेवाले हैं। मेरे अमुक शत्रुका हनन कीजिये, हनन कीजिये। चक्रसे, गदासे और खड़से; समस्त बाणोंसे बेधिये, बेधिये। पाशसे आवृत कीजिये, बाँध लीजिये। अङ्कुशसे ताडित कीजिये, ताडित कीजिये। जल्दी कीजिये, जल्दी कीजिये। क्यों रुकते या ठहरते हैं? जबतक मेरा सारा मनोरथ पूर्ण न हो जाय, तबतक यत्नशील रहिये। हुं फट् नमः ॥) ॥२॥
ॐ पुरुषोत्तम त्रिभुवनमदोन्मादकर हुं फट् हृदयाय नमः । सुरमनुजसुन्दरीमनांसि तापय तापय शिरसे स्वाहा । दीपय दीपय शोषय शोषय मारय मारय स्तम्भय स्तम्भय द्रावय द्रावय कवचाय हुम् । आकर्षयाकर्षय महाबल हुं फट् नेत्रत्रयाय वौषट् । त्रिभुवनेश्वर सर्वजनमनांसि हन हन दारय दारय ॐ मम वशमानयानय हुं फट् अस्त्राय फट् । त्रैलोक्यमोहन हृषीकेशाप्रतिरूप सर्वस्त्री हृदयाकर्षण आगच्छ-आगच्छ नमः । (सर्वाङ्गे) व्यापकम् ॥ ३ ॥
इस प्रकार मूलमन्त्रयुक्त व्यापक न्यास बताया गया। फिर पूजन तथा पचास हजारकी संख्या में जप करके अभिषेक करे। तत्पश्चात् वैदिक विधि स्थापित कुण्डाग्निमें सौ बार आहुति दे। दही, घी,खीर, सघृत चरु तथा औटाये हुए दूधकी पृथक् पृथक् बारह बारह आहुतियाँ मूलमन्त्रसे दे। फिर - अक्षत, तिल और यवकी एक हजार आहुतियाँ देनेके पश्चात् त्रिमधु, पुष्प, फल, दही तथा समिधाओंकी सौ-सौ बार आहुतियाँ दे ॥ ४–६॥
तदनन्तर पूर्णाहुति - होम करके हुतावशिष्ट सघृत चरुका प्राशन करे-कराये। फिर ब्राह्मण भोजन कराकर आचार्यको उचित दक्षिणा आदिसे संतुष्ट करे। यों करनेसे मन्त्र सिद्ध होता है। स्नान करके विधिवत् आचमन करे और मौनभावसे यागमन्दिरमें जाकर पद्मासनसे बैठे और तान्त्रिक विधिके अनुसार शरीरका शोषण करे। पहले राक्षसों तथा विघ्नकारक भूतोंका दमन करनेके लिये सम्पूर्ण दिशाओं में सुदर्शनका न्यास करे। साथ ही यह भावना करे कि वह सुदर्शन अस्त्र पाँच क्लेशोंके बीजभूत, धूम्रवर्ण एवं प्रचण्ड अनिलरूप मेरे सम्पूर्ण पापको, जो नाभिमें स्थित है, शरीरसे अलग कर रहा है। फिर हृदयकमलमें स्थित 'रं' बीजका स्मरण करके ऊपर, नीचे तथा अगल-बगलमें फैली हुई अग्रिकी ज्वालाओंसे उस पाप-पुञ्जको जलाकर भस्म कर दे। फिर मूर्धा (ब्रह्मरन्ध्र) में अमृतका चिन्तन करके सुषुम्णानाड़ीके मार्गसे आती हुई अमृतकी धाराओंसे अपने शरीरको बाहर और भीतरसे भी आप्लावित करे ॥ ७ - ११ ॥
इस प्रकार शुद्धशरीर होकर मूलमन्त्रसे तीन बार प्राणायाम करे। फिर मस्तक और मुखपर तथा गुह्यभाग, ग्रीवा, सम्पूर्ण दिशा, हृदय, कुक्षि एवं समस्त शरीरमें हाथ रखकर उनमें शक्तिका न्यास करे। इसके बाद सूर्यमण्डलसे सम्परात्माका आवाहन करके ब्रह्मरन्ध्रके मार्गसे हृदय-कमलमें लाकर चिन्तन करे। वे परात्मा समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न हैं। प्रणवका उच्चारण करते हुए परात्माका स्मरण करना चाहिये ॥ १२-१४॥
उनके स्मरणके लिये गायत्री मन्त्र इस प्रकार है – ' त्रैलेक्यमोहनाय विद्महे स्मराय धीमहि । तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्। इति।' परात्माका अर्चन करनेके पश्चात् यज्ञसम्बन्धी द्रव्यों और शुद्ध पात्रका प्रोक्षण करे। विधिपूर्वक आत्मपूजा करके वेदीपर उसकी अर्चना करे ॥ १५-१६ ॥
कूर्म-अनन्त आदिके रूपमें कल्पित पीठपर कमल एवं गरुड़के आसनपर विराजमान त्रैलोक्यमोहन भगवान् विष्णु सर्वाङ्गसुन्दर हैं और वयके अनुरूप लावण्य तथा यौवनको प्राप्त हैं। उनके अरुणनयन मदसे घूर्णित हो रहे हैं। वे परम उदार तथा स्मरसे विह्वल हैं। दिव्य माला, वस्त्र और अनुलेप उनकी शोभा बढ़ाते हैं। मुखपर मन्दहास्यकी छटा छिटक रही है। उनके परिवार और परिकर अनेक हैं। वे लोकपर अनुग्रह करनेवाले, सौम्य तथा सहस्रों सूर्योके समान तेजस्वी हैं। उन्होंने हाथोंमें पाँच बाण धारण कर रखे हैं। उनकी समस्त इन्द्रियाँ पूर्णकाम हैं। उनके आठ भुजाएँ हैं। देवाङ्गनाएँ उन्हें घेरकर खड़ी हैं। उनकी दृष्टि लक्ष्मीदेवीके मुखपर गड़ी है। ऐसे भगवान्का भजन करे। उनके आठ हाथोंमें क्रमश: चक्र, शङ्ख, धनुष, खड्ग, गदा, मुसल, अङ्कुश और पाश शोभा पाते हैं। आवाहन आदिके द्वारा उनकी अर्चना करके अन्त में उनका विसर्जन करना चाहिये ॥ १७ - २१ ॥
यह भी चिन्तन करे कि भगवान् अपने ऊरु तथा जंघापर श्रीलक्ष्मीजीको बैठाये हुए हैं और वे दोनों हाथों से पतिका आलिङ्गन करके स्थित हैं। उनके बायें हाथमें कमल है। वे शरीरसे हृष्ट पुष्ट हैं तथा श्रीवत्स और कौस्तुभसे सुशोभित हैं। भगवान्के गलेमें वनमाला है और शरीरपर पीताम्बर शोभा पाता है। इस प्रकार चक्र आदि आयुधों सम्पन्न श्रीहरिका पूजन करे ॥ २२-२३ ॥
'ॐ सुदर्शन महाचक्रराज दह दह सर्वदुष्टभयं कुरु कुरु छिन्द छिन्द विदारय विदारय परमन्त्रान् ग्रस ग्रस भक्षय भक्षय भूतानि त्रासय त्रासय हुं फट् स्वाहा' – इस मन्त्रसे चक्र सुदर्शनकी पूजा करे ।
ॐ महाजलचराय हुं फट् स्वाहा । पाञ्चजन्याय नमः ।'– इस मन्त्रसे शङ्खकी पूजा करे। 'महाखड़ तीक्ष्ण छिन्द छिन्द हुं फट् स्वाहा खङ्गाय नमः । - इससे खङ्गकी पूजा करे।' 'शाय' सशराय नमः । इससे धनुष और बाणकी पूजा करे। 'ॐ भूतग्रामाय विद्महे । चतुर्विधाय धीमहि तन्नो ब्रह्म प्रचोदयात्। - यह भूतग्राम गायत्री है। 'संवर्तक मुशल पोथय पोथय हुं फट् स्वाहा।' इस मन्त्रसे मुशलकी पूजा करे। 'पाश बन्ध बन्धाकर्षयाकर्षय हुं फट्' इस मन्त्रसे पाशका (पाशका सर्वसम्मत मन्त्ररूप 'शारदातिलक' में इस प्रकार वर्णित हुआ है- 'महापाश बन्ध बन्ध आकर्षयाकर्षय हुं फट् स्वाहा, पाशाय नमः।') पूजन करे। 'अङ्कुश'(अङ्कुश-मन्त्र भी अपने पूर्णरूपमें इस प्रकार उपलब्ध होता है - 'महाङ्कुश कट्ट कट्ट हुं फट् स्वाहा, अनुशाय नमः।') कट्ट हुं फट्' – इससे अङ्कुशकी पूजा करे ।
भगवान्की भुजाओंमें स्थित अस्त्रोंका तत्तत् अस्त्र सम्बन्धी इन्हीं मन्त्रोंसे क्रमशः पूजन - करे ॥ २४- २७ ॥
'ॐ पक्षिराजाय हुं फट् ' – इस मन्त्रसे - पक्षिराज गरुडकी पूजा करे। कर्णिकामें पहले अङ्ग-देवताओंका विधिवत् पूजन करे। फिर पूर्व आदि दलोंमें लक्ष्मी आदि शक्तियों तथा चामरधारी तार्क्ष्य आदिकी अर्चना करे। शक्तियोंकी पूजाका प्रयोग अन्तमें करना चाहिये। पहले देवेश्वर इन्द्र आदि दण्डीसहित पूजनीय हैं लक्ष्मी और सरस्वती पीतवर्णकी हैं। रति, प्रीति और जया ये शक्तियाँ श्वेतवर्णा हैं। कीर्ति तथा कान्ति श्वेतवर्णा हैं। तुष्टि तथा पुष्टि- ये दोनों श्यामवर्णा हैं। इनमें स्मरभाव (प्रेममिलनकी उत्कण्ठा) उदित रहती है। लोकेश (ब्रह्माजी तथा दिक्पाल) - पर्यन्त देवताओंकी पूजा करके अभीष्ट अर्थकी सिद्धिके लिये भगवान् विष्णुकी पूजा करनी चाहिये। निम्नाङ्कित मन्त्रका ध्यान और जप करे। उसके द्वारा होम और अभिषेक करे। (मन्त्र यों है-) ॐ श्रीं क्लीं ह्रीं हुं त्रैलोक्यमोहनाय हूं विष्णवे नमः । – इस मन्त्रद्वारा पूर्ववत् पूजन
आदि करनेसे साधक सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। जल तथा सम्मोहनी वृक्षके पुष्पद्वारा उक्त मन्त्रसे नित्य तर्पण करे। ब्रह्मा, इन्द्र श्रीदेवी, दण्डी, बीजमन्त्र तथा त्रैलोक्यमोहन विष्णुका पूजन करके उक्त मन्त्रका तीन लाख जप करनेके पश्चात् कमलपुष्प, बिल्वपत्र तथा घीसे एक लाख होम करे। उक्त हवन सामग्रीमें चावल, फल, सुगन्धित चन्दन आदि द्रव्य और दूर्वा भी मिला ले। इन सबके द्वारा हवनकर्म सम्पादित करके मनुष्य दीर्घ आयुकी उपलब्धि करता है। उस जप, अभिषेक तथा होमादि क्रियासे संतुष्ट होकर भगवान् विष्णु उपासकको अभीष्ट फल प्रदान करते हैं । २८-३६ ॥
'ॐ नमो भगवते वराहाय भूर्भुवः स्वः पतये भूपतित्वं मे देहि दापय स्वाहा।' यह वराह - भगवान्का मन्त्र है। इसका पञ्चाङ्गन्यास इस प्रकार है- 'ॐ नमो हृदयाय नमः । भगवते शिरसे स्वाहा । वराहाय शिखायै वषट् । भूर्भुवः स्वः पतये कवचाय हुम् । भूपतित्वं मे देहि | दापय स्वाहा अस्त्राय फट् ।' इस प्रकार पञ्चाङ्ग न्यासपूर्वक वराह मन्त्रका प्रतिदिन दस हजार बार जप करनेसे मनुष्य दीर्घ आयु तथा राज्य प्राप्त कर सकता है ।। ३७-३८ ।।
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'त्रैलोक्यमोहनमन्त्रका वर्णन' नामक तीन सौ सातवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३०७ ॥
Summary of chapter 308 of the Agni Mahā Purana is as follows:
The science of toxicology (agadatantra) is presented, covering the sources and classification of poisons — sthāvara (plant-based), jaṅgama (animal-based), and kṛtrima (artificial). The signs and stages of poisoning and the proper emergency treatments — emesis, antidotes (agada), local applications, and fumigation — are described. Specific antidotes for snake-bite, scorpion-sting, spider-bite, and poisoned food are enumerated. The chapter also covers the neutralization of compound or successive poisoning, as well as the formulation of protective preparations (rakṣā) to be worn or consumed prophylactically.