शंकरजी कहते हैं-
अब सूर्यादि ग्रहोंकी राशियोंमें पैदा हुए नवजात शिशुका जन्म-फल क्षेत्राधिपके अनुसार वर्णन करूँगा। सूर्यके गृहमें अर्थात् सिंह लग्नमें उत्पन्न बालक समकाय, कभी कृशाङ्ग, कभी स्थूलाङ्ग, गौरवर्ण, पित्त प्रकृति, लाल नेत्रोंवाला, गुणवान् तथा वीर होता है । चन्द्रके गृहमें अर्थात् कर्क लग्नका जातक भाग्यवान् तथा कोमल शरीरवाला होता है। मङ्गलके गृहमें अर्थात् मेष तथा वृश्चिक लग्नोंका जातक वातरोगी तथा अत्यन्त लोभी होता है। बुधके गृहमें अर्थात् मिथुन तथा कन्या लग्नोंका जातक बुद्धिमान् सुन्दर तथा मानी होता है। गुरुके गृहमें अर्थात् धनु तथा मीन लग्नोंका जातक सुन्दर और अत्यन्त क्रोधी होता है। शुक्रके गृहमें अर्थात् तुला तथा वृष लग्नोंका जातक त्यागी, भोगी एवं सुन्दर शरीरवाला होता है। शनिके गृहमें अर्थात् मकर तथा कुम्भ लग्नोंका जातक बुद्धिमान् सुन्दर तथा मानी होता है। सौम्य लग्नका जातक सौम्य स्वभावका तथा क्रूर लग्नका जातक क्रूर स्वभावका होता है ( यहाँपर मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु, कुम्भ ये राशियाँ तथा लग्न क्रूर हैं और वृष, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर, मीन ये - राशियाँ तथा लग्न सौम्य हैं। इसके लिये वराहमिहिरने 'लघुजातक' तथा 'बृहज्जातक' में लिखा है 'पुंस्त्री कुराकरौ चरस्थिरद्विस्वभावसंज्ञाच्श्र)॥ १-५॥
गौरि ! अब नाम राशिके अनुसार सूर्यादि ग्रहोंका दशा-फल कहता हूँ। सूर्यकी दशामें हाथी, घोड़ा, धन-धान्य, प्रबल राज्यलक्ष्मीकी प्राप्ति और धनागम होता है। चन्द्रमाकी दशामें दिव्य स्त्रीकी प्राप्ति होती है। मङ्गलकी दशा में भूमिलाभ और सुख होता है। बुधकी दशामें भूमिलाभके साथ धन-धान्यकी भी प्राप्ति होती है। गुरुकी दशामें घोड़ा, हाथी तथा धन मिलता है। शुक्रकी दशामें खाद्यान्न तथा गोदुग्धादिपानके साथ धनका लाभ होता है। शनिकी दशामें नाना प्रकारके रोग उत्पन्न होते हैं। राहुका दर्शन होनेपर अर्थात् ग्रहण लगनेपर निश्चित स्थानपर निवास, दिनमें ध्यान और व्यापारका काम करना चाहिये ॥६-८३॥
यदि वाम श्वास चलते समय नामका अक्षर विषम संख्याका हो तो वह समय मङ्गल, शनि तथा राहुका रहता है। उसमें युद्ध करनेसे विजय होती है। दक्षिण श्वास चलते समय यदि नामका अक्षर सम संख्याका हो तो वह समय सूर्यका रहता है। उसमें व्यापार कार्य निष्फल होता है, । किंतु उस समय पैदल संग्राम करनेसे विजय होती है और सवारीपर चढ़कर युद्ध करनेसे मृत्यु होती है ॥ ९-११ ॥
ॐ हूं, ॐ हूं, ॐ स्फें, अस्त्रं मोटय, ॐ चूर्णय, चूर्णय, ॐ सर्वशत्रुं मर्दय, मर्दय ॐ हूं, ॐ ह्रः फट् । - इस मन्त्रका सात बार न्यास करना चाहिये। फिर जिनके चार, दस तथा बीस भुजाएँ हैं, जो हाथोंमें त्रिशूल, खट्वाङ्ग, खड्ग और कटार धारण किये हुए हैं तथा जो अपनी सेनासे विमुख और शत्रु सेनाका भक्षण करनेवाले - हैं, उन भैरवजीका अपने हृदयमें ध्यान करके शत्रु सेनाके सम्मुख उक्त मन्त्रका एक सौ आठ बार जप करे। जपके पश्चात् डमरूका शब्द करनेसे शत्रु सेना शस्त्र त्यागकर भाग खड़ी होती है ॥ १२-१५॥
पुनः शत्रु सेनाकी पराजयका अन्य प्रयोग बतलाता हूँ। श्मशानके कोयलेको काक या उल्लूकी विष्ठामें मिलाकर उसीसे कपड़ेपर शत्रुकी प्रतिमा लिखे और उसके सिर, मुख, ललाट, हृदय, गुह्य, पैर, पृष्ठ, बाहु और मध्यमें शत्रुका नाम नौ बार लिखे। उस कपड़ेको मोड़कर संग्रामके समय अपने पास रखनेसे तथा पूर्वोक्त मन्त्र पढ़नेसे विजय होती है ॥ १६-१८३ ॥
अब विजय प्राप्त करनेके लिये त्रिमुखाक्षर 'तार्क्ष्यचक्र' को कहता हूँ। 'क्षिप ॐ स्वाहा तार्क्ष्यात्मा शत्रुरोगविषादिनुत्।' इस मन्त्रको 'तार्क्ष्य चक्र' कहते हैं। इसके अनुष्ठानसे दुष्टोंकी बाधा, भूत बाधा एवं ग्रह बाधा तथा अनेक - प्रकारके रोग निवृत्त हो जाते हैं। इस 'गरुड मन्त्र' से जैसा कार्य चाहे, सब सिद्ध हो जाता है । इस मन्त्रके साधकका दर्शन करनेसे स्थावर जंगम, लूता तथा कृत्रिम - ये सभी विष नष्ट हो जाते हैं ॥ १९–२१३ ॥
पुनः महातार्क्ष्यका यों ध्यान करना चाहिये जिनकी आकृति मनुष्यकी-सी है, जो दो पाँख और दो भुजा धारण करते हैं, जिनकी चोंच टेढ़ी है, जो सामर्थ्यशाली तथा हाथी और कछु पकड़ रखनेवाले हैं, जिनके पंजोंमें असंख्य सर्प उलझे हुए हैं, जो आकाशमार्गसे आ रहे हैं और रणभूमिमें शत्रुओंको खाते हुए नोच-नोचकर निगल रहे हैं, कुछ शत्रु जिनकी चोंचसे म हुए दीख रहे हैं, कुछ पंजोंके आघातसे चूर्ण हो गये हैं, किन्हींका पंखोंके प्रहारसे कचूमर निकल गया है और कुछ नष्ट होकर दसों दिशाओं में भाग गये हैं। इस तरह जो साधक ध्यान निष्ठ होगा, वह तीनों लोकोंमें अजेय होकर रहेगा अर्थात् उसपर कोई विजय नहीं प्राप्त कर सकता ॥ २२-२५ ॥
अब मन्त्र-साधनसे सिद्ध होनेवाली 'पिच्छिका
क्रिया' का वर्णन करता हूँ – ॐ हूं पक्षिन् क्षिप, ॐ हूं सः महाबलपराक्रम सर्वसैन्यं भक्षय भक्षय, ॐ मर्दय मर्दय, ॐ चूर्णय चूर्णय,ॐ विद्रावय विद्रावय, ॐ हूं खः, ॐ भैरवो ज्ञापयति स्वाहा । – इस 'पिच्छिका मन्त्र' को चन्द्रग्रहणमें जप करके सिद्ध कर लेनेवाला साधक संग्राममें सेनाके सम्मुख हाथी तथा सिंहको भी खदेड़ सकता है। मन्त्रके ध्यानसे उनके शब्दोंका मर्दन कर सकता है तथा सिंहारूढ़ होकर मृग तथा बकरेके समान शत्रुओं को मार सकता है ॥ २६ - २८३ ॥
दूर रहकर केवल मन्त्रोच्चारणसे शत्रुनाशका उपाय कह रहे हैं— कालरात्रि (आश्विन शुक्लाष्टमी) - में मातृकाओंको चरु प्रदान करे और श्मशानकी भस्म, मालती पुष्प, चामरी एवं कपासकी जड़ - द्वारा दूरसे शत्रुको सम्बोधित करे। सम्बोधित करनेका मन्त्र निम्नलिखित है―
ॐ, अहे हे महेन्द्र ! अहे महेन्द्रि भञ्ज हि । ॐ जहि मसानं हि खाहि खाहि, किलि किलि, ॐ हूं फट । - इस भङ्गविद्याका जप करके दूरसे ही शब्द करनेसे, अपराजिता और धतूरेका र मिलाकर तिलक करनेसे शत्रुका विनाश होता है ॥ २९ - ३२३ ॥
ॐ किलि किलि विकिलि इच्छाकिलि भूतहनि शङ्खिनि, उमे दण्डहस्ते रौद्रि माहेश्वरि, उल्कामुखि ज्वालामुखि शङ्कुकर्णे शुष्कजङ्घे अलम्बुषे हर हर, सर्वदुष्टान् खन खन, ॐ यन्मान्निरीक्षयेद् देवि ताँस्तान् मोहय, ॐ रुद्रस्य हृदये स्थिता रौद्रि सौम्येन भावेन आत्मरक्षां ततः कुरु स्वाहा । - इस सर्वकार्यार्थसाधक मन्त्रको भोजपत्रपर वृत्ताकार लिखकर बाहरमें मातृकाओंको लिखे। इस विद्याको पहले ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र तथा इन्द्रने हाथ आदिमें धारण किया था तथा इस विद्याद्वारा बृहस्पतिने देवासुर संग्राममें देवताओंकी - रक्षा की थी ॥ ३३- ३५ ॥
(अब रक्षायन्त्रका वर्णन करते हैं -) रक्षारूपिणी नारसिंही, शक्तिरूपा भैरवी तथा त्रैलोक्यमोहिनी गौरीने भी देवासुर संग्राम में देवताओंकी रक्षा की थी। अष्टदल-कमलकी कर्णिका तथा दलोंमें गौरीके बीज (ह्रीं) मन्त्र सम्पुटित अपना नाम लिख दे। पूर्व दिशामें रहनेवाले प्रथमादि दलोंमें पूजाके अनुसार गौरीजीकी अङ्ग-देवताओंका न्यास करे। इस तरह लिखनेपर शुभे! 'रक्षायन्त्र' बन जायगा ॥ ३६-३७ ॥
अब इन्हीं संस्कारोंके बीच 'मृत्युंजय-मन्त्र 'को कहता हूँ, जो सब कलाओंसे परिवेष्टित है, अर्थात् उस मन्त्रसे प्रत्येक कार्यका साधन हो सकता है, तथा जो सकारसे प्रबोधित होता है। मन्त्रका स्वरूप कहते हैं―
ॐ कार पहले लिखकर फिर बिन्दुके साथ जकार लिखे, पुनः धकारके पेटमें वकारको लिखे, उसे चन्द्रबिन्दुसे अङ्कित करे। अर्थात् ॐ जं ध्वम्' – यह मन्त्र सभी दुष्टोंका विनाश - करनेवाला है ॥ ३८-३९३ ॥
दूसरे 'रक्षायन्त्र' का उद्धार कहते हैं गोरोचन कुङ्कुमसे अथवा मलयागिरि चन्दन कर्पूरसे भोजपत्रपर लिखे हुए चतुर्दल कमलकी कर्णिकामें अपना नाम लिखकर चारों दलों में ॐकार लिखे। आग्नेय आदि कोणोंमें हूंकार लिखे। उसके ऊपर षोडश दलोंका कमल बनाये। उसके दलोंमें अकारादि षोडश स्वरोंको । लिखे। फिर उसके ऊपर चौंतीस दलोंका कमल बनाये। उसके दलोंमें 'क' से लेकर 'क्ष' तक अक्षरोंको लिखे। उस यन्त्रको श्वेत सूत्रसे वेष्टित
करके रेशमी वस्त्रसे आच्छादित कर, कलशपर स्थापन करके उसका पूजन करे। इस यन्त्रको धारण करनेसे सभी रोग शान्त होते हैं एवं शत्रुओं का विनाश होता है ॥ ४० - ४३ ३ ॥
रक्षायन्त्रका स्वरूप―
अब 'भेलखी विद्या' को कह रहा हूँ, जो वियोगमें होनेवाली मृत्युसे बचाती है। उसका मन्त्रस्वरूप निम्नलिखित है
'ॐ वातले वितले विडालमुखि इन्द्रपुत्रि उद्भवो वायुदेवेन खीलि आजी हाजा मयि वाह इहादिदुःखनित्यकण्ठोच्चैर्मुहूर्त्तान्वया अह मां यस्महमुपाडि ॐ भेलखि ॐ स्वाहा।'
नवरात्रके अवसरपर इस मन्त्रको सिद्ध करके संग्राम के समय सात बार मन्त्रजप करनेपर शत्रुका मुखस्तम्भन होता है ॥ ४४–४६ ॥
'ॐ चण्डि, ॐ हूं फट् स्वाहा।' इस मन्त्रको संग्रामके अवसरपर सात बार जपनेसे खड्ग युद्धमें विजय होती है ॥ ४७-४८ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'नाना प्रकारके बलोंका विचार' नामक एक सौ तैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३३ ॥
Summary of chapter 135 of the Agni Mahā Purana is as follows:
Procedures for securing victory in battle are described, addressed originally to kings and their purohitas. Agni prescribes a pre-battle Viṣṇu-pūjā with specific martial mantras, homa with red flowers and guggulu, and the installation of a victory-kalaśa on the chariot's front pole. The warrior is to carry a rakṣā-bandha prepared with mantras that invoke Nārasiṃha and Sudarśana. The chapter includes astrological guidance on auspicious nakṣatras and tithis for commencing a military campaign and on reading battle omens.