अग्निदेव कहते हैं-
मुने! अब संक्षेपसे समस्त देवताओंके लिये पवित्रारोपणकी विधि सुनो। पहले जो चिह्न कहे गये हैं, उन्हीं लक्षणों से युक्त पवित्रक देवताको अर्पित किया जाता है। उसके दो भेद होते हैं 'स्वरस' और 'अनलग'। पहले निम्नाङ्कित रूपसे इष्टदेवताको निमन्त्रण देना चाहिये – 'जगत्के कारणभूत ब्रह्मदेव ! आप परिवार सहित यहाँ पधारें। मैं आपको निमन्त्रित करता हूँ। कल प्रातः काल आपकी सेवामें पवित्रक अर्पित करूँगा।' फिर दूसरे दिन पूजनके पश्चात् निम्नाङ्कित प्रार्थना करके पवित्रक भेंट करे 'संसारकी सृष्टि करनेवाले आप विधाताको नमस्कार है। यह पवित्रक ग्रहण कीजिये। इसे अपनेको पवित्र करनेके लिये आपकी सेवामें प्रस्तुत किया गया है। यह वर्षभरकी पूजाका फल देनेवाला है। ''शिवदेव ! वेदवेत्ताओंके पालक प्रभो! आपको नमस्कार है। यह पवित्रक स्वीकार कीजिये। इसके द्वारा आपके लिये मणि, मूँगे और मन्दार कुसुम आदिसे प्रतिदिन एक वर्षतक की जानेवाली पूजा सम्पादित हो।' 'पवित्रक! मेरी इस वार्षिक पूजाका विधिवत् सम्पादन करके मुझसे विदा लेकर अब तुम स्वर्गलोकको पधारो।' 'सूर्यदेव! आपको नमस्कार है; यह पवित्रक लीजिये। इसे पवित्रीकरणके उद्देश्यसे आपकी सेवामें अर्पित किया गया है। यह एक वर्षकी पूजाका फल देनेवाला है।' 'गणेशजी! आपको नमस्कार है; यह पवित्रक स्वीकार कीजिये। इसे पवित्रीकरणके उद्देश्यसे दिया गया है। यह वर्षभरकी पूजाका फल देनेवाला है। "शक्ति देवि! आपको नमस्कार है; यह पवित्रक लीजिये। इसे पवित्रीकरणके उद्देश्यसे आपकी सेवामें भेंट किया गया है। यह वर्षभरकी पूजाका फल देनेवाला है ॥" १-९३ ॥
'पवित्रकका यह उत्तम सूत नारायणमय और अनिरुद्धमय है। धन-धान्य, आयु तथा आरोग्यको देनेवाला है, इसे मैं आपकी सेवामें दे रहा हूँ। यह श्रेष्ठ सूत प्रद्युम्नमय और संकर्षणमय है, विद्या, संतति तथा सौभाग्यको देनेवाला है। इसे मैं आपकी सेवामें अर्पित करता हूँ। यह वासुदेवमय सूत्र धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्षको देनेवाला है। संसारसागरसे पार लगानेका यह उत्तम साधन है, इसे आपके चरणोंमें चढ़ा रहा हूँ। यह विश्वरूपमय सूत्र सब कुछ देनेवाला और समस्त पापोंका नाश करनेवाला है; भूतकाल पूर्वजों और भविष्यकी भावी संतानोंका उद्धार करनेवाला है, इसे आपकी सेवामें प्रस्तुत करता हूँ। कनिष्ठ, मध्यम, उत्तम एवं परमोत्तम – इन चार प्रकारके पवित्रकोंका मन्त्रोच्चारणपूर्वक क्रमशः दान करता हूँ ॥ १०- १४॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'संक्षेपतः सर्वदेवसाधारण पवित्रारोपण' नामक सैतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३७॥
Summary of chapter 38 of the Agni Mahā Purana is as follows:
The thirty-eighth chapter describes how dharma itself changes in form — though not in essence — across the four yugas: Kṛta (Satya), Tretā, Dvāpara, and Kali. In the Kṛtayuga, dharma stands on all four legs (truth, purity, austerity, and compassion) and human beings spontaneously follow the highest dharma through meditation alone. In Tretā, sacrifice becomes the primary vehicle; in Dvāpara, temple worship and recitation of the Purāṇa-s. In the Kaliyuga — the current age — all that is required for liberation is the recitation of Bhagavān's names, for other forms of sādhana are beyond the capacity of most humans. The chapter affirms that Bhagavān adapts his grace to the circumstances of each age, ensuring that the path to liberation is never closed. The shortness of human life in the Kaliyuga and the disproportionate merit of nāma-kīrtana in this age are celebrated.