भगवान् महेश्वर कहते हैं-
कार्तिकेय ! अब मैं राज्यादिकी अभिवृद्धिके लिये नगर-वास्तुका वर्णन करता हूँ। नगर-निर्माणके लिये एक योजन या आधी योजन भूमि ग्रहण करे। वास्तु नगरका पूजन करके उसको प्राकारसे संयुक्त करे। ईशादि तीस पदोंमें सूर्यके सम्मुख पूर्वद्वार, गन्धर्वके समीप दक्षिणद्वार, वरुणके निकट पश्चिमद्वार और सोमके समीप उत्तरद्वार बनाना चाहिये। नगरमें चौड़े-चौड़े बाजार बनाने चाहिये। नगरद्वार छः हाथ चौड़ा बनाना चाहिये, जिससे हाथी आदि सुखपूर्वक आ-जा सकें। नगर छिन्नकर्ण, भग्न तथा अर्धचन्द्राकार नहीं होना चाहिये। वज्र सूचीमुख नगर भी हितकर नहीं है। एक, दो या तीन द्वारोंसे युक्त धनुषाकार वज्रनागाभ नगरका निर्माण शान्तिप्रद है ॥ १-५॥
नगरके आग्नेयकोणमें स्वर्णकारोंको बसावे, दक्षिण दिशामें नृत्योपजीविनी वाराङ्गनाओंके भवन हों। नैर्ऋत्यकोणमें नट, कुम्भकार तथा केवट आदिके आवास स्थान होने चाहिये। पश्चिममें रथकार, आयुधकार और खड्ग निर्माताओंका - निवास हो । नगरके वायव्यकोणमें मद्य विक्रेता, कर्मकार तथा भृत्योंका निवेश करे। उत्तर दिशामें ब्राह्मण, यति, सिद्ध और पुण्यात्मा पुरुषोंको बसावे। ईशानकोणमें फलादिका विक्रय करनेवाले एवं वणिग्-जन निवास करें। पूर्व दिशामें सेनाध्यक्ष रहें। आग्नेयकोणमें विविध सैन्य, दक्षिणमें स्त्रियोंको ललित कलाकी शिक्षा देनेवाले आचार्यों तथा नैर्ऋत्यकोणमें धनुर्धर सैनिकोंको रखे। पश्चिममें महामात्य, कोषपाल एवं कारीगरोंको, उत्तर में दण्डाधिकारी, नायक तथा द्विजोंको पूर्वमें क्षत्रियोंको दक्षिणमें वैश्योंको, पश्चिममें शूद्रोंको, विभिन्न दिशाओं में वैद्योंको और अश्वों तथा सेनाको चारों ओर रखे ॥ ६ - १२॥
राजा पूर्वमें गुप्तचरों, दक्षिणमें श्मशान, पश्चिममें गोधन और उत्तरमें कृषकोंका निवेश करे। म्लेच्छोंको दिक्कोणोंमें स्थान दे अथवा ग्रामों में स्थापित करे। पूर्वद्वारपर लक्ष्मी एवं कुबेरकी स्थापना करे। जो उन दोनोंका दर्शन करते है, उन्हें लक्ष्मी (सम्पत्ति) की प्राप्ति होती है। - पश्चिममें निर्मित देवमन्दिर पूर्वाभिमुख, पूर्व दिशामें स्थित पश्चिमाभिमुख तथा दक्षिण दिशाके मन्दिर उत्तराभिमुख होने चाहिये। नगरकी रक्षा लिये इन्द्र और विष्णु आदि देवताओंके मन्दिर बनवावे। देवशून्य नगर, ग्राम, दुर्ग तथा गृह आदिका पिशाच उपभोग करते हैं और वह रोगसमूहसे परिभूत हो जाता है। उपर्युक्त विधिसे निर्मित नगर आदि सदा जयप्रद और भोग-मोक्ष प्रदान करनेवाले होते हैं ॥ १३ - १७ ॥
वास्तु भूमिकी पूर्व दिशामें शृङ्गार कक्ष, - अग्निकोणमें पाकगृह (रसोईघर), दक्षिणमें शयनगृह, नैर्ऋत्यकोणमें शस्त्रागार, पश्चिममें भोजनगृह, वायव्यकोणमें धान्य संग्रह, उत्तर दिशामें धनागार - तथा ईशानकोणमें देवगृह बनवाना चाहिये। नगर में एकशाल, द्विशाल, त्रिशाल या चतुःशाल गृहका निर्माण होना चाहिये। चतुःशाल गृहके शाला और अलिन्द (प्राङ्गण) के भेदसे दो सौ भेद होते हैं। उनमें भी चतुःशाल गृहके पचपन, त्रिशाल- गृहके चार तथा द्विशालके पाँच भेद होते
हैं ॥ १८-२१ ।।
एकशाल- गृहके चार भेद हैं। अब मैं अलिन्दयुक्त गृहके विषयमें बतलाता हूँ, सुनिये। गृह वास्तु - तथा नगर वास्तुमें अट्ठाईस अलिन्द होते हैं। चार तथा सात अलिन्दोंसे पचपन, छः अलिन्दों से बीस तथा आठ अलिन्दोंसे भी बीस भेद होते हैं। इस प्रकार नगर आदिमें आठ अलिन्दोंसे युक्त वास्तु भी होता है ॥ २२ - २४ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'नगर आदिके वास्तुका वर्णन' नामक एक सौ छठा अध्याय पूरा हुआ ॥ १०६ ॥
Summary of chapter 107 of the Agni Mahā Purana is as follows:
The complete procedure of fire sacrifice is described from the selection of the kuṇḍa through the final āhuti. Agni specifies different kuṇḍa-shapes for different purposes: square for śānti, circular for puṣṭi, triangular for abhicāra, and crescent-shaped for vaśya. The samidhs, dravyas, and āhuti-counts appropriate to each class of homa are enumerated. The text emphasizes that purity of the hotṛ, correct pronunciation of svāhā, and maintaining the four-part agni-kārya guarantee the full fruition of the sacrifice.