भगवान् शिव कहते हैं-
स्कन्द ! अब मैं प्रासाद ( मन्दिर ) की स्थापनाका वर्णन करता हूँ। उसमें चैतन्यका सम्बन्ध दिखा रहा हूँ। जहाँ मन्दिरके गुंबजकी समाप्ति होती है, वहाँ पूर्ववेदीके मध्यभागमें आधारशक्तिका चिन्तन करके प्रणव मन्त्रसे कमलका न्यास करे। उसके ऊपर सुवर्ण आदि धातुओंमेंसे किसी एकका बना हुआ कलश स्थापित करे। उसमें पञ्चगव्य, मधु और दूध पड़ा हुआ हो। रत्न आदि पाँच वस्तुएँ डाली गयी हों। कलशपर गन्धका लेप हुआ हो। वह वस्त्रसे आवृत हो तथा उसे सुगन्धित पुष्पोंसे सुवासित किया गया हो। उस कलशके मुखमें आम आदि पाँच वृक्षोंके पल्लव डाले गये हों। हृदय मन्त्रसे हृदय कमलकी भावना करके उस कलशको वहाँ स्थापित करना चाहिये ॥ १ - ३३ ॥
तदनन्तर गुरु पूरक प्राणायामके द्वारा श्वासको भीतर लेकर, शरीरके द्वारा सकलीकरण क्रियाका सम्पादन करके, स्व सम्बन्धी मन्त्रसे कुम्भक प्राणायामद्वारा प्राणवायुको भीतर अवरुद्ध करे। फिर भगवान् शंकरकी आज्ञासे सर्वात्मासे अभिन्न आत्मा (जीवचैतन्य) को जगावे। तत्पश्चात्, रेचक प्राणायामद्वारा द्वादशान्त स्थानसे प्रज्वलित - अग्निकणके समान जीव चैतन्यको लेकर कलश भीतर स्थापित करे और उसमें आतिवाहिक शरीरका न्यास करके उसके गुणोंके बोधक काल आदिका एवं ईश्वरसहित पृथ्वी पर्यन्त - तत्त्व समुदायका भी उसमें निवेश करे ॥ ४-७॥
इसके बाद उक्त कलशमें दस नाड़ियों, दस प्राणों (पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय तथा मन, बुद्धि और अहंकार - इन) तेरह इन्द्रियों तथा उनके अधिपतियोंकी भी उस कलशमें स्थापना करके, प्रणव आदि नाम मन्त्रोंसे उनका पूजन करे अपने-अपने कार्यके कारकरूपसे जो मायापाशके नियामक हैं, उनका, प्रेरक विद्येश्वरोंका तथा सर्वव्यापी शिवका भी अपने-अपने मन्त्रद्वारा वहाँ न्यास और पूजन करे। समस्त अङ्गोंका भी न्यास करके अवरोधिनी मुद्राद्वारा उन सबका निरोध करे। अथवा सुवर्ण आदि धातुओं द्वारा निर्मित पुरुषकी आकृति, जो ठीक मानव शरीरके तुल्य हो, लेकर उसे पूर्ववत् पञ्चगव्य एवं कसैले जल आदिसे संस्कृत (शुद्ध) करे। फिर उसे शय्यापर आसीन करके उमापति रुद्रदेवका ध्यान करते हुए शिव मन्त्रसे उस | पुरुष शरीरमें व्यापक रूपसे उन्हींका न्यास करे ॥ ८-११३ ॥
उनके संनिधानके लिये होम, प्रोक्षण, स्पर्श एवं जप करे। संनिधापन तथा रोधक आदि सारा कार्य भागत्रय-विभागपूर्वक करे। इस प्रकार प्रकृति पर्यन्त न्यास सारा विधान पूर्ण करके उस पुरुषको पूर्वोक्त कलशमें स्थापित कर दे ॥ १२-१३ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'प्रासाद प्रतिष्ठाको विधिका वर्णन' नामक एक सौ एकवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०१ ॥
Summary of chapter 102 of the Agni Mahā Purana is as follows:
The elaborate worship of the Mahāliṅga is described with fuller ritual detail than the sāmānya procedure. Agni prescribes the installation of Mahāliṅga on a pīṭha adorned with aṣṭa-dala-padma and surrounded by the eight directional deities. Abhiṣeka with pañcāmṛta, dadhi-kṣīra, gandhodaka, and puṣpodaka forms the heart of the rite. The phala of Mahāliṅgārcanā includes removal of all sins and attainment of Śiva-sāyujya.