भगवान् हयग्रीव कहते हैं-
ब्रह्मन्! पूर्वकालमें सम्पूर्ण भूत-प्राणियोंके लिये भयंकर एक महाभूत था। देवताओंने उसे भूमिमें निहित कर दिया। उसीको 'वास्तुपुरुष' माना गया है। चतुःषष्टि पदोंसे युक्त क्षेत्रमें अर्धकोणमें स्थित ईश (या शिखी) को घृत एवं अक्षतोंसे तृप्त करे। फिर एक पदमें स्थित पर्जन्यको कमल तथा जलसे, दो पदोंमें स्थित जयन्तको पताकासे, दो कोष्ठों में स्थित महेन्द्रको भी उसीसे, द्विपदस्थ रविको सभी लाल रंगकी वस्तुओंसे संतुष्ट करे। दो पदोंमें स्थित सत्यको वितान (चँदोवों) से एवं एकपदस्थ भृशको घृतसे, अग्निकोणवर्ती अर्धपदमें स्थित व्योम (आकाश) को शाकुननामक औषध गूदेसे, उसी कोणके दूसरे अर्धपदमें स्थित अग्निदेवको स्रुक्से, एकपदस्थ पूषाको लाजा (खील) से, द्विपदस्थ वितथको स्वर्णसे, एकपदस्थ गृहक्षतको माखनसे, एक पदमें स्थित यमराजको उड़दमिश्रित भातसे, द्विपदस्थ गन्धर्वको गन्धसे, एकपदस्थ भृङ्गको शाकुनजिह्वा नामक औषधिसे, अर्धपदमें स्थित मृगको नीले वस्त्रसे, अर्धकोष्ठके निम्नभागमें विद्यमान पितृगणको कृशर (खिचड़ी) से, एकपदस्थ दौवारिकको दन्तकाष्ठसे एवं दो पदोंमें स्थित सुग्रीवको यव निर्मित पदार्थ (हलुवा आदि) से परितृप्त करे ॥ १-७३ ॥
द्विपदस्थ पुष्पदन्तको कुश-समूहोंसे, दो पदोंमें स्थित वरुणको पद्मसे, द्विपदस्थ असुरको सुरासे, एक पदमें स्थित शेषको घृतमिश्रित जलसे, अर्धपदस्थित पाप (या पापयक्ष्मा) को यवान्नसे, अर्धपदस्थ रोगको माँड़से, एकपदस्थित नाग (सर्प) - को नागपुष्पसे, द्विपदगत मुख्यको भक्ष्य पदार्थोंसे, एकपदस्थ भल्लाटको मूँग भातसे, एकपद-संस्थित सोमको मधुयुक्त खीरसे, दो पदोंमें अधिष्ठित ऋषिको शालूकसे, एक पदमें विद्यमान अदितिको लोपिकासे एवं अर्धपदस्थ दितिको पूरियों द्वारा संतुष्ट करे। फिर ईशानस्थित ईशके निम्न भागमें अर्धपदस्थित 'आप' को दुग्धसे एवं उसके नीचे अर्धपदमें अधिष्ठित आप-वत्सको दहीसे संतुष्ट करे। साथ ही पूर्ववर्ती कोष्ठ चतुष्टयमें मरीचिको लड्डू देकर तृप्त करे। ब्रह्माके ऊर्ध्वभागके कोणस्थित कोष्ठ में अर्धपदस्थ सावित्रको रक्तपुष्प निवेदन करे। उसके निम्नवर्ती अर्ध कोष्ठकमें स्थित सविताको कुशोदक प्रदान करे। चार पदोंमें स्थित विवस्वान्को रक्तचन्दन, नैर्ऋत्यकोणवर्ती अर्धकोष्ठमें स्थित सुराधिप इन्द्रको हरिद्रामिश्रित जलका अर्घ्य दे। उसीके अर्धभागमें कोणवर्ती कोष्ठकमें स्थित इन्द्रजय (अथवा जय) को घृतका अर्घ्य दे। चतुष्पदमें मित्रको गुड़युक्त पायस दे। वायव्यकोणके आधे कोष्ठकमें प्रतिष्ठित रुद्रको पकायी हुई उड़द (या उसका बड़ा) एवं उसके अधोवर्ती अर्धकोष्ठमें स्थित यक्ष (या रुद्रदास) - को आर्द्रफल (अंगूर, सेव आदि) समर्पित करे । चतुष्पदवर्ती महीधर (या पृथ्वीधर) को उड़दमिश्रित अन्न एवं माष (उड़द) की बलि दे। मध्यवर्ती कोष्ठ चतुष्टयमें भगवान् ब्रह्माके निमित्त तिल तण्डुल स्थापित करे। चरकीको उड़द और घृतसे, स्कन्दको खिचड़ी तथा पुष्पमालासे, विदारीको लाल कमलसे, कन्दर्पको एक पलके तोलवाले भातसे, पूतनाको पलपित्तसे, जम्भकको उड़द एवं पुष्पमालासे, पापा या पापराक्षसीको पित्त, पुष्पमाला एवं अस्थियोंसे तथा पिलिपित्सको भाँति-भाँतिकी मालाके द्वारा संतुष्ट करे। तदनन्तर ईशान आदि दिक्पालोंको लाल उड़दकी बलि दे। इन सबके अभावमें अक्षतोंसे सबकी पूजा करनी चाहिये ( वर्तमान समयमें अक्षतसे ही सबका पूजन करना चाहिये। इससे शास्त्रीय आज्ञाका भी परिपालन होता है तथा हिंसा आदि दोषकी भी प्राप्ति नहीं होती है।)। राक्षस, मातृका, गण, पिशाच, पितर एवं क्षेत्रपालको भी इच्छानुसार (दही अक्षत या दही-उड़दकी) बलि प्रदान करनी चाहिये ॥ ८-२१॥
वास्तु- होम एवं बलि प्रदानसे इनकी तृप्ति किये बिना प्रासाद आदिका निर्माण नहीं करना चाहिये। ब्रह्माके स्थानमें श्रीहरि श्रीलक्ष्मीजी तथा गणदेवताकी पूजा करें। फिर भूमि, वास्तुपुरुष एवं वर्धनीयुक्त कलशका पूजन करे। कलशके मध्यमें ब्रह्मा तथा दिक्पालोंका यजन करे। फिर स्वस्तिवाचन एवं प्रणाम करके पूर्णाहुति दे। ब्रह्मन् ! तदनन्तर गृहपति हाथमें छिद्रयुक्त जलपात्र लेकर विधिपूर्वक दक्षिणावर्त मण्डल बनाते हुए सूत्रमार्गसे जलधाराको घुमावे। फिर पूर्ववत् उसी मार्गसे सात बीजोंका वपन करे। उसी मार्गसे खात (गड्ढे) का आरम्भ करे। तदनन्तर मध्यमें हाथभर चौड़ा एवं चार अङ्गुल नीचा गर्त खोद ले। उसको लीप पोतकर पूजन प्रारम्भ करे। सर्वप्रथम चार भुजाधारी श्रीविष्णु भगवान्का ध्यान करके उन्हें कलशसे अर्घ्य प्रदान करे। फिर छिद्रयुक्त जलपात्र (झारी) से गर्तको भरकर उसमें श्वेत पुष्प डाले। उस श्रेष्ठ दक्षिणावर्त गर्तको बीज एवं मृत्तिकासे भर दे। इस प्रकार अर्घ्यदानका कार्य निष्पन्न करके आचार्यको गो वस्त्रादिका दान करे। ज्यौतिषी और स्थपति (राजमिस्त्री) का यथोचित सत्कार करके विष्णुभक्त और सूर्यका पूजन करे। फिर भूमिको यत्नपूर्वक जलपर्यन्त खुदवावे मनुष्यके बराबरकी गहराई से नीचे यदि शल्य (हड्डी आदि) हो तो वह गृह लिये दोषकारक नहीं होता है। अस्थि (शल्य) होनेपर घरकी दीवार टूट जाती है और गृहपतिको सुख नहीं प्राप्त होता है। खुदाईके समय जिस जीव-जन्तुका नाम सुनायी दे जाय, वह शल्य उसी जीवके शरीरसे उद्भूत जानना चाहिये ॥ २२-३१ ॥
इस प्रकार आदि आग्रेय महापुराणमें 'वास्तु-देवताओंके अर्घ्य दान-विधान आदिका वर्णन ' नामक चालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४० ॥
Summary of chapter 41 of the Agni Mahā Purana is as follows:
The forty-first chapter opens the long Āgama-based section of the Purāṇa with the ritual procedure for installing a Śivaliṅga. The types of liṅga (svayambhū — self-manifested, bāṇa, and human-made from stone, metal, crystal, or clay) are distinguished, with their relative sanctity explained. The selection of stone, its auspicious qualities (color, texture, absence of cracks), the preparation of the installation site, the digging of the foundation pit, and the placement of the brahma-śilā (foundation stone) at the base are described. The mantras for consecrating the pīṭha (base/pedestal), the liṅga itself, and for performing prāṇa-pratiṣṭhā — the infusion of divine presence — are given. The chapter concludes with the merit of installing a Śivaliṅga, which the Purāṇa declares to be the greatest act a human being can perform for the benefit of all beings across fourteen worlds.