भगवान् शंकर कहते हैं-
स्कन्द ! अभिषेक हो जानेपर दीक्षित पुरुष शिव, विष्णु तथा सूर्य आदि देवताओंका पूजन करे। जो शङ्ख, भेरी आदि वाद्योंकी ध्वनिके साथ देवताओंको पञ्चगव्य से स्नान कराता है, वह अपने कुलका उद्धार करके स्वयं भी देवलोकको जाता है। अग्निनन्दन ! कोटि सहस्र वर्षोंमें जो पाप उपार्जित किया गया है, वह सब देवताओंको घीका अभ्यङ्ग लगानेसे भस्म हो जाता है। एक आढ़क घी आदिसे देवताओंको नहलाकर मनुष्य देवता हो जाता है ॥ १-३॥
चन्दनका अनुलेप लगाकर गन्ध आदिसे देवपूजन करे तो उसका भी वही फल है। थोड़ेसे आयासके द्वारा स्तुति पढ़कर यदि सदा देवताओंकी स्तुति की जाय तो वे भूत और भविष्यका ज्ञान, मन्त्रज्ञान, भोग तथा मोक्ष प्रदान करनेवाले होते हैं ॥ ४३ ॥
यदि कोई मन्त्रके शुभाशुभ फलके विषयमें प्रश्न करे तो प्रश्नकर्ताके संक्षिप्त प्रश्नवाक्यके अक्षरोंकी संख्या गिन ले। उस संख्यामें दोसे भाग दे। एक बचे तो शुभ और शून्य या दो बचे तो अशुभ फल जाने तीनसे भाग देनेपर मूल धातुरूप जीवका परिचय मिलता है, अर्थात् एक शेष रहे तो वातजीव, दो शेष रहे तो पित्तजीव और तीन शेष रहे तो कफजीव जाने। चारसे भाग देनेपर ब्राह्मणादि वर्ण-बुद्धि होती है। तात्पर्य यह कि एक बाकी बचे तो उस मन्त्रमें ब्राह्मण-बुद्धि, दो बचनेपर क्षत्रिय बुद्धि, तीन बचनेपर वैश्य बुद्धि और चार शेष रहनेपर शूद्र बुद्धि करे। पाँचसे भाग देनेपर शेषके अनुसार भूततत्त्व आदिका बोध होता है, अर्थात् एक आदि शेष रहनेपर पृथिवी आदि तत्त्वका परिचय मिलता है। इसी प्रकार जय-पराजय आदिका ज्ञान प्राप्त करे ॥ ५-६ ॥
यदि मन्त्र पदके अन्तमें एक त्रिक (तीन - बीजाक्षर) हों, अधिक बीजाक्षर हों अथवा दो प, म एवं क हो तो इनमें से प्रथम वर्ग अशुभ, बीचवाला मध्यम तथा अन्तिम वर्ग शुभ है। यदि अन्तमें संख्या समूह हो तो वह जीवनकालके दस वर्षका सूचक है। यदि दसकी संख्या हो तो दस वर्षके पश्चात् उस मन्त्रके साधकपर यमराजका निश्चय ही आक्रमण हो सकता है ॥ ७३ ॥
सूर्य, गणपति, शिव, दुर्गा, लक्ष्मी तथा श्रीविष्णु भगवान् के मन्त्रोंके अक्षरों द्वारा जपमें तत्पर कठिनी (अङ्गुष्ठ अँगुली) से स्पर्श किये गये कमलपत्रमें गोमूत्राकार रेखापर एक त्रिकसे आरम्भ कर बारह त्रिक-पर्यन्त लिखे। अर्थात् उक्त मन्त्रोंके तीन-तीन अक्षरोंका समुदाय एकसे लेकर बारह स्थानोंतक पृथक्-पृथक् लिखे। इसी प्रकार चौंसठ कोष्ठोंका एक मण्डल बनाकर उसमें मरुत् (यं), व्योम (हं) और मरुत् ( यं ) - इन तीन बीजोंका त्रिक पहले कोष्ठसे लेकर आठवें कोष्ठतक लिखे। इन सब स्थानोंपर पासा फेंकनेसे अथवा स्पर्श करनेपर शुभाशुभका परिज्ञान होता है। विषम संख्यावाले स्थानों पर पासा पड़े या स्पर्श हो तो शुभ और सम संख्यापर पड़े तो अशुभ फल होता है ॥ ८- १०॥
'यं हं यं' – इन तीन बीजोंके आठ त्रिक हैं। - वे ध्वज आदि आठ आयोंके प्रतीक हैं। इन आयोंमें जो सम हैं, वे अशुभ हैं। विषम आय शुभप्रद कहे गये हैं ॥ ११ ॥
'क' आदि अक्षरोंको सोलह स्वरोंसे तथा सोलह स्वरोंको 'क' आदिसे युक्त करके उन सबके साथ 'आं ईं' यह पल्लव लगा दे। पल्लवयुक्त इन सस्वर कादि अक्षरोंको आदिमें रखकर उनके साथ त्रिपुराके नाम मन्त्रको पृथक् पृथक् सम्बद्ध करे। उनके आदिमें 'ॐ ह्रीं' जोड़े और अन्तमें 'नमः' पद लगा दे। इस प्रकार पूजनकर्मके उपयोगमें आनेवाले इन मन्त्रोंका प्रस्तार बीस हजार एक सौ साठकी संख्यातक पहुँच जाता है ॥ १२-१३॥
'आं ह्रीं' – इन बीजोंसे युक्त सरस्वती, चण्डी, गौरी तथा दुर्गाके मन्त्र हैं। श्रीदेवीके मन्त्र 'आं श्रीं' इन बीजोंसे युक्त हैं। सूर्यके मन्त्र 'आं क्षौं' इन बीजोंसे, शिवके मन्त्र 'आं हौं' इन बीजोंसे, गणेशके मन्त्र 'आं गं' इन बीजोंसे तथा श्रीहरिके मन्त्र 'आं अं' इन बीजोंसे युक्त हैं। कादि व्यञ्जन अक्षरों तथा अकारादि सोलह स्वरोंको मिलाकर इक्यावन होते हैं। इस प्रकार सस्वर कादि अक्षरोंको आदिमें और सस्वर 'क्ष' से लेकर 'क' तकके अक्षरोंको अन्तमें रखनेसे सम्पूर्ण मन्त्र बनते हैं ॥ १४–१६ ॥
१४४० सम्पूर्ण मण्डल होनेसे सूर्य, शिव, देवी दुर्गा तथा विष्णुमेंसे प्रत्येकके तीन सौ साठ मण्डल होते हैं। अभिषिक्त गुरु इन सब मन्त्रों तथा देवताओंका जप ध्यान करे तथा शिष्य एवं पुत्रको दीक्षा भी दे ॥ १७ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'नाना-मन्त्र आदिका कथन' नामक इक्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९१ ॥
Summary of chapter 92 of the Agni Mahā Purana is as follows:
The ninety-second chapter presents the ritual procedures for laying the foundation of a sacred building — both the vāstu-pratiṣṭhā (site consecration) and the śilā-nyāsa (placement of foundation stones). Five types of pratiṣṭhā for different classes of structure are distinguished: pratiṣṭhā (standard), sthāpana (establishing), sthira-sthāpana (firmly establishing), utāpana (raising), and āsthāpana (stabilizing). The bhūmi-parīkṣā (soil test) — determining the suitability of the site by the color and smell of soil at different depths, with different soil qualities being appropriate for residences of different varṇa-s — is described. The identification of underground obstructions (śalya) through a letter-code system is explained. Nine or five foundation stones (brahma-śilā) with tattva-mūrti-deva nyāsa inscribed upon them, and the homa sequences for brahma-śuddhi (consecration of the Brahma-point of the site), are specified.