शंकरजी कहते हैं-
देवि ! अब मैं प्राणियों के शुभाशुभ फलकी जानकारीके लिये नाक्षत्रिक पिण्डका वर्णन करूँगा (जिस राजा या मनुष्यके लिये शुभाशुभ फलका ज्ञान करना हो, उसकी प्रतिकृतिरूपसे एक मनुष्यका आकार बनाकर) सूर्य जिस नक्षत्रमें हों, उससे तीन नक्षत्र उसके मस्तकमें, एक मुखमें, दो नेत्रोंमें, चार हाथ और पैरमें, पाँच हृदयमें और पाँच जानुमें लिखकर आयु वृद्धिका विचार करना चाहिये। सिरवाले नक्षत्रों में संग्राम (कार्य) करनेसे राज्यकी प्राप्ति होती है। मुखवाले नक्षत्र में सुख, नेत्रवाले नक्षत्रों में सुन्दर सौभाग्य, हृदयवाले नक्षत्रोंमें द्रव्यसंग्रह, हाथवाले नक्षत्रों में चोरी और पैरवाले नक्षत्रों में मार्गमें ही मृत्यु - इस तरह क्रमशः फल होते है।
(अब 'कुम्भ चक्र' कह रहे हैं - ) आठ कुम्भको पूर्वादि आठ दिशाओं में स्थापित करना चाहिये। प्रत्येक कुम्भमें तीन-तीन नक्षत्रोंकी स्थापना करनेपर आठ कुम्भों में चौबीस नक्षत्रोंका निवेश हो जानेपर चार नक्षत्र शेष रह जायँगे। इन्हें ही 'सूर्यकुम्भ' कहते हैं। यह सूर्यकुम्भ अशुभ होता है। शेष पूर्वादि दिशाओंवाले कुम्भ सम्बन्धी नक्षत्र शुभ होते हैं। (इसका उपयोग नाम-नक्षत्रसे दैनिक नक्षत्रतक गिनकर उसी संख्यासे करना चाहिये । ) ॥ ४ ॥
अब मैं संग्राममें जय-पराजयका विवेक प्रदान करनेवाले सर्पाकार राहुचक्रका वर्णन करता हूँ।
प्रथम अट्ठाईस बिन्दुओंको लिखे, उसमें तीन-तीनका विभाग कर दे, इस तरह आठ विभाग कर देनेपर चौबीस नक्षत्रोंका निवेश हो जायगा। चार शेष रह जायँगे। उसपर रेखा करे । इस तरह करनेपर 'सर्पाकार चक्र' बन जायगा। जिस नक्षत्र में राहु रहे, उसको सर्पके फणमें लिखे। उसके बाद उसी नक्षत्रसे प्रारम्भ करके क्रमशः सत्ताईस नक्षत्रोंका निवेश करे ॥ ५-७ ॥
( सर्पाकार राहुचक्रका फल – ) मुखवाले - सात नक्षत्रों में संग्राम करनेसे मरण होता है, स्कन्धवाले सात नक्षत्रों में युद्ध करनेसे पराजय होती है, पेटवाले सात नक्षत्रोंमें युद्ध करनेसे सम्मान तथा विजयकी प्राप्ति होती है, कटिवाले नक्षत्रों में संग्राम करनेसे शत्रुओंका हरण होता है, पुच्छवाले नक्षत्रों में संग्राम करनेसे कीर्ति होती है और राहुसे दृष्ट नक्षत्र में संग्राम करनेसे मृत्यु होती है। इसके बाद फिर सूर्यसे राहुतक ग्रहों के बलका वर्णन करूँगा ॥ ८-१० ॥
( अर्धयामेशका वर्णन करते हैं-) जैसे चार प्रहरका एक दिन होता है तो एक दिनमें आठ अर्धप्रहर होंगे। यदि दिनमान बत्तीस दण्डका हो तो एक अर्ध प्रहरका मान चार दण्डका होगा। दिनमान प्रमाणमें आठसे भाग देनेपर जो लब्धि - होगी, वही एक अर्धप्रहरका मान होता है। रवि आदि सात वारों में प्रत्येक अर्धप्रहरका कौन ग्रह स्वामी होगा - इसपर विचार करते हुए केवल रविवार के दिन प्रत्येक अर्धप्रहरके स्वामियोंको बता रहे हैं। जैसे रविवारमें एकसे लेकर आठ अर्धप्रहरोंके स्वामी क्रमशः सूर्य, शुक्र, बुध, सोम, शनि, गुरु, मङ्गल और राहु ग्रह होते हैं। (इनमें जिस विभागका स्वामी शनि होता है, वह समय शुभ कार्योंमें त्याज्य है और उसे ही 'वारवेला' कहते हैं।)
विशेष – रविवारके अर्धयामेशोंको देखनेसे यह अनुमान होता है कि रविवारके अतिरिक्त जिस दिनका अर्धमेश जानना हो तो प्रथम अर्धयामेश तो दिनपति ही होगा और बादके अर्धयामोंके स्वामी छः संख्यावाले ग्रह होंगे। इसी आधारपर रविवारसे लेकर शनिवारतकके अर्धयामोंके स्वामी नीचे चक्रमें दिये जा रहे हैं ।
(प्रत्येक दिनकी अर्धयामेश संख्या आठ है तथा दिनपति रविसे लेकर शनितक सात ही हैं। अतः आठवें अर्धयामको ग्रन्थान्तरों में 'निरीश' माना गया है। जैसे रविवारादिशन्यन्तं गुलिकादिर्निरूप्यते। अष्टमांशो निरीशः स्याच्छन्वंशो गुलिकः स्मृतः ॥ किंतु यहाँ अग्निपुराणमें प्रतिदिन राहुको अष्टमांशका स्वामी मान रहे हैं - यह विशेष बात है।)
शनि, सूर्य तथा राहुको यत्नसे पीठ पीछे करके जो संग्राम करता है, वह सैन्यसमुदायपर विजय प्राप्त करता है तथा जूआ, मार्ग और युद्धमें सफल होता है ॥ ११ १२ ॥
(नक्षत्रों की स्थिरादि संज्ञा तथा उसका प्रयोजन कहते हैं- ) रोहिणी, तीनों उत्तराएँ, मृगशिरा - इन पाँच नक्षत्रोंकी 'स्थिर' संज्ञा है। अश्विनी, रेवती, स्वाती, धनिष्ठा, शतभिषा – इन पाँचों नक्षत्रोंकी 'क्षिप्र' संज्ञा है। इनमें यात्रार्थीको यात्रा करनी चाहिये। अनुराधा, हस्त, मूल, मृगशिरा, पुष्य, पुनर्वसु – इनमें प्रत्येक कार्य हो सकता है। - ज्येष्ठा, चित्रा, विशाखा, तीनों पूर्वाएँ, कृत्तिका, भरणी, मघा, आर्द्रा, आश्लेषा- इनकी 'दारुण' संज्ञा है। स्थिर कार्यों में स्थिर संज्ञावाले नक्षत्रों को लेना चाहिये। यात्रामें 'क्षिप्र' संज्ञक नक्षत्र उत्तम माने गये हैं। 'मृदु' संज्ञक नक्षत्रों में सौभाग्यका काम तथा 'उग्र' संज्ञक नक्षत्रों में उग्र काम करना चाहिये। 'दारुण' संज्ञक नक्षत्र दारुण (भयानक) कामके लिये उपयुक्त होते हैं ॥ १३ - १६३ ॥
(अब अधोमुख, तिर्यङ्मुख आदि नक्षत्रोंका नाम तथा प्रयोजन कहता हूँ) कृत्तिका, भरणी, आश्लेषा, विशाखा, मघा, मूल, तीनों पूर्वाएँ- ये अधोमुख नक्षत्र हैं। इनमें अधोमुख कर्म करना चाहिये। उदाहरणार्थ कूप, तड़ाग, विद्याकर्म, चिकित्सा, स्थापन, नौका निर्माण, कूपोंका विधान, गड्ढा खोदना आदि कार्य इन्हीं अधोमुख नक्षत्रों में करना चाहिये। रेवती, अश्विनी, चित्रा, हस्त, स्वाती, पुनर्वसु, अनुराधा, मृगशिरा, ज्येष्ठा- ये नौ नक्षत्र तिर्यङ्मुख हैं। इनमें राज्याभिषेक, हाथी तथा घोड़ेको पट्टा बाँधना, बाग लगाना, गृह तथा प्रासादका निर्माण, प्राकार बनाना, क्षेत्र, तोरण, ध्वजा, पताका लगाना - इन सभी कार्योंको करना चाहिये। रविवारको द्वादशी, सोमवारको एकादशी, मङ्गलवारको दशमी, बुधवारको तृतीया, बृहस्पतिवारको षष्ठी, शुक्रवारको द्वितीया, शनिवारको सप्तमी हो तो 'दग्धयोग' होता है ॥ १७-२३ ॥
(अब त्रिपुष्कर योग बतलाते हैं-) द्वितीया, द्वादशी, सप्तमी- तीन तिथियाँ तथा रवि, मङ्गल, शनि- तीन वार- ये छः 'त्रिपुष्कर' हैं तथा विशाखा, कृत्तिका, दोनों उत्तराएँ, पुनर्वसु, पूर्वाभाद्रपदा- ये छः नक्षत्र भी 'त्रिपुष्कर' हैं। अर्थात् रवि, शनि, मङ्गलवारों में द्वितीया, सप्तमी, द्वादशीमेंसे कोई तिथि हो तथा उपर्युक्त नक्षत्रों में से कोई नक्षत्र हो तो 'त्रिपुष्कर योग' होता है। त्रिपुष्कर योगमें लाभ हानि, विजय, वृद्धि, पुत्रजन्म, वस्तुओं का नष्ट एवं विनष्ट होना- ये सब त्रिगुणित हो जाते हैं ॥ २४- २६ ॥
( अब नक्षत्रों की स्वक्ष, मध्याक्ष, मन्दाक्ष और अन्धाक्ष संज्ञा तथा प्रयोजन कहते हैं-) अश्विनी, भरणी, आश्लेषा, पुष्य, स्वाती, विशाखा, श्रवण, पुनर्वसु – ये दृढ़ नेत्रवाले नक्षत्र हैं और दसों - दिशाओंको देखते हैं। (इनकी संज्ञा 'स्वक्ष' है।) इनमें गयी हुई वस्तु तथा यात्रामें गया हुआ व्यक्ति विशेष पुण्यके उदय होनेपर ही लौटते हैं। दोनों आषाढ़ नक्षत्र, रेवती, चित्रा, पुनर्वसु- ये पाँच नक्षत्र 'केकर' हैं, अर्थात् 'मध्याक्ष' हैं। इनमें गयी हुई वस्तु विलम्बसे मिलती है। कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिरा, पूर्वाफाल्गुनी, मघा, मूल, ज्येष्ठा, अनुराधा, धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वाभाद्रपदा - ये नक्षत्र 'चिपिटाक्ष' अर्थात् 'मन्दाक्ष' हैं। इनमें गयी हुई वस्तु तथा मार्ग चलनेवाला व्यक्ति कुछ ही विलम्बमें लौट आता है। हस्त, उत्तराभाद्रपदा, आर्द्रा, पूर्वाषाढा- ये नक्षत्र 'अन्धाक्ष' हैं। इनमें गयी हुई वस्तु शीघ्र मिल जाती है, कोई संग्राम नहीं करना पड़ता ॥ २७ - ३२ ॥
अब नक्षत्रों में स्थित 'गण्डान्त' का निरूपण करता हूँ-रेवतीके अन्तके चार दण्ड और अश्विनी आदिके चार दण्ड 'गण्डान्त' होते हैं। इन दोनों नक्षत्रोंका एक प्रहर शुभ कार्योंमें प्रयत्नपूर्वक त्याग देना चाहिये। आश्लेषाके अन्तका तथा मघाके आदिके चार दण्ड 'द्वितीय गण्डान्त' कहे गये हैं। भैरवि ! अब 'तृतीय गण्डान्त को सुनो- ज्येष्ठा तथा मूलके बीचका एक प्रहर बहुत ही भयानक होता है। यदि व्यक्ति अपना जीवन चाहता हो तो उसे इस कालमें कोई शुभ कार्य नहीं करना चाहिये। इस समयमें यदि बालक पैदा हो तो उसके माता-पिता जीवित नहीं रहते ॥ ३३-३६ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'नक्षत्रों के निर्णयका प्रतिपादन' नामक एक सौ छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२६ ॥
Summary of chapter 128 of the Agni Mahā Purana is as follows:
A brief summary of the Mahābhārata is presented to place it within the Purāṇic context. Agni describes the Kuru-Pāṇḍava rivalry, the game of dice, the exile, the Kurukṣetra war, and the final ascent of the Pāṇḍavas to svarga. Special emphasis falls on the Bhagavadgītā as the essence of the epic and on Kṛṣṇa's role as sarathī (charioteer) and jagad-guru. The eighteen Parvas are enumerated by name. The chapter closes with the statement that the Mahābhārata is an itihāsa whose hearing removes sins and grants dharma, artha, kāma, and mokṣa.