शंकरजी कहते हैं-
'विष्कुम्भ योग' की तीन घड़ियाँ, 'शूल योग 'की पाँच 'गण्ड' तथा 'अतिगण्ड योग की छः 'व्याघात' तथा 'वज्र योग' की नौ घड़ियोंको सभी शुभ कार्योंमें त्याग देना चाहिये। 'परिघ', 'व्यतीपात' और 'वैधृति' योगोंमें पूरा दिन त्याज्य बतलाया गया है। इन योगोंमें यात्रा युद्धादि कार्य नहीं करने चाहिये ॥ १-२॥
देवि! अब मैं मेषादि राशि तथा ग्रहोंके द्वारा शुभाशुभका निर्णय बताता हूँ - जन्म राशिके चन्द्रमा तथा शुक्र वर्जित होनेपर ही शुभदायक होते हैं । जन्म राशि तथा लग्नसे दूसरे स्थानमें सूर्य, शनि, राहु अथवा मङ्गल हो तो प्राप्त द्रव्यका नाश और अप्राप्तका अलाभ होता है तथा युद्धमें पराजय होती है। चन्द्रमा, बुध, गुरु, शुक्र- ये दूसरे स्थानमें शुभप्रद होते हैं। सूर्य, शनि, मङ्गल, शुक्र, बुध, चन्द्रमा, राहु- ये तीसरे घरमें हों तो शुभ फल देते हैं। बुध, शुक्र चौथे भावमें हों तो शुभ तथा शेष ग्रह भयदायक होते हैं। बृहस्पति, शुक्र, बुध, चन्द्रमा- ये पञ्चम भावमें हों तो अभीष्ट लाभकी प्राप्ति कराते हैं। देवि ! अपनी राशिसे छठे भावमें सूर्य, चन्द्र, शनि, मङ्गल, बुध- ये ग्रह शुभ फल देते हैं; किंतु छठे भावका शुक्र तथा गुरु शुभ नहीं होता। सप्तम भावके सूर्य, शनि, मङ्गल, राहु हानिकारक होते हैं तथा बुध, गुरु, शुक्र सुखदायक होते हैं। अष्टम भावके बुध और शुक्र - शुभ तथा शेष ह हानिकारक होते हैं। नवम भावके बुध, शुक्र शुभ तथा शेष ग्रह अशुभ होते हैं। दशम भावके शुक्र, सूर्य लाभकर होते हैं तथा शनि, मङ्गल, राहु, चन्द्रमा बुध शुभकारक होते हैं। ग्यारहवें भावमें प्रत्येक ग्रह शुभ फल देता है, परंतु दसवें बृहस्पति त्याज्य हैं। द्वादश भावमें बुध-शुक्र शुभ तथा शेष ग्रह अशुभ होते हैं। एक दिन-रातमें द्वादश राशियाँ भोग करती हैं। अब मैं उनका वर्णन कर रहा हूँ ॥ ३ – १२ ॥
(राशियोंका भोगकाल एवं चरादि संज्ञा तथा प्रयोजन कह रहे हैं-) मीन, मेष, मिथुन- इनमें प्रत्येकके चार दण्ड; वृष, कर्क, सिंह, कन्या - इनमें प्रत्येकके छः दण्ड; तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुम्भ – इनमें प्रत्येकके पाँच दण्ड भोगकाल हैं। सूर्य जिस राशिमें रहते हैं, उसीका उदय होता है और उसी राशिसे अन्य राशियोंका भोगकाल प्रारम्भ होता है। मेषादि राशियोंकी क्रमशः 'चर', 'स्थिर' और 'द्विस्वभाव' संज्ञा होती है। जैसे मेष, कर्क, तुला, मकर - इन राशियोंकी 'चर' संज्ञा है। इनमें शुभ तथा अशुभ स्थायी कार्य करने चाहिये। वृष, सिंह, वृश्चिक, कुम्भ- इन राशियों की 'स्थिर' संज्ञा है। इनमें स्थायी कार्य करना चाहिये। इन लग्नोंमें बाहर गये हुए व्यक्तिसे शीघ्र समागम नहीं होता तथा रोगीको शीघ्र रोगसे मुक्ति नहीं प्राप्त होती मिथुन, कन्या, धनु, मीन - इन राशियोंकी 'द्विस्वभाव' संज्ञा है। ये द्विस्वभावसंज्ञक राशियाँ प्रत्येक कार्यमें शुभ फल देनेवाली हैं। इनमें यात्रा, व्यापार, संग्राम विवाह एवं राजदर्शन होनेपर वृद्धि, जय तथा लाभ होते हैं और युद्ध में विजय होती है। अश्विनी नक्षत्रकी बीस ताराएँ हैं और घोड़ेके समान उसका आकार है। यदि इसमें वर्षा हो तो एक राततक घनघोर वर्षा होती है। यदि भरणीमें वर्षा आरम्भ हो तो पंद्रह दिनतक लगातार वर्षा होती रहती है ॥ १३-१९ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें विभिन्न बलोंका वर्णन' नामक एक सौ सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२७ ॥
Summary of chapter 129 of the Agni Mahā Purana is as follows:
The section dealing with arghya—the respectful water offering—is presented as a distinct procedural unit. Agni describes the composition of arghya-dravya: water mixed with tila, akṣata, dūrvā, kuśa, puṣpa, gandha, and sometimes dadhi or kṣīra depending on the deity and occasion. The specific arghya-mantras for Sūrya, Candra, Viṣṇu, and Śiva are given. The ritual importance of offering arghya at the correct moment of dawn, midday, or dusk (saṃdhyā) is underscored, and negligence in arghya-offering at the three saṃdhyās is listed among the impurities accumulating daily.