पुष्कर कहते हैं-
मृतकका दाह संस्कार - हुआ हो या नहीं, यदि श्रीहरिका स्मरण किया जाय तो उससे उसको स्वर्ग और मोक्ष दोनोंकी प्राप्ति हो सकती है। ('संस्कृतस्यासंस्कृतस्य स्वर्गो मोक्षो हरिस्मृतेः।' (अग्नि० १५९।१) 'मरनेवाला मनुष्य मरनेके समय यदि भगवन्नामका उच्चारण या भगवत्स्मरण कर ले, तब तो उसे भगवत्प्राप्ति अवश्य होती है; परंतु यदि उसके उद्देश्यसे भगवत्स्मरण किया जाय तो उससे भी उसको स्वर्ग और मोक्ष सुलभ हो सकते हैं।'))मृतककी हड्डियोंको गङ्गाजीके जलमें डालनेसे उस प्रेत (मृत व्यक्ति) का अभ्युदय होता है। मनुष्यकी हड्डी जबतक गङ्गाजीके जलमें स्थित रहती है, तबतक उसका स्वर्गलोकमें निवास होता है।('गङ्गातोये नरस्यास्थि यावत्तावद् दिवि स्थितिः ।'(अग्नि० १५९।२))आत्मत्यागी तथा पतित मनुष्योंके लिये यद्यपि पिण्डोदक क्रियाका विधान नहीं है तथापि गङ्गाजीके जलमें उनकी हड्डियोंका डालना भी उनके लिये हितकारक ही है। उनके उद्देश्यसे दिया हुआ अन्न और जल आकाशमें लीन हो जाता है। पतित प्रेतके प्रति । महान् अनुग्रह करके उसके लिये 'नारायण बलि' करनी चाहिये। इससे वह उस अनुग्रहका फल भोगता है। कमलके सदृश नेत्रवाले भगवान् नारायण अविनाशी हैं, अतः उन्हें जो कुछ अर्पण किया जाता है, उसका नाश नहीं होता। भगवान् जनार्दन जीवका पतनसे त्राण (उद्धार) करते हैं, इसलिये वे ही दानके सर्वोत्तम पात्र हैं ॥ १-५॥
निश्चय ही नीचे गिरनेवाले जीवोंको भी भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले एकमात्र श्रीहरि ही हैं। 'सम्पूर्ण जगत्के लोग एक न एक दिन मरनेवाले हैं'- यह विचारकर सदा अपने सच्चे सहायक धर्मका अनुष्ठान करना चाहिये। पतिव्रता पत्नीको छोड़कर दूसरा कोई बन्धु बान्धव मरकर भी मरे हुए मनुष्यके साथ नहीं जा सकता; क्योंकि यमलोकका मार्ग सबके लिये अलग अलग है। जीव कहीं भी क्यों न जाय, एकमात्र धर्म ही उसके साथ जाता है। जो काम कल करना है, उसे आज ही कर ले; जिसे दोपहर बाद करना है, उसे पहले ही पहरमें कर ले; क्योंकि मृत्यु इस बातकी प्रतीक्षा नहीं करती कि इसका कार्य पूरा हो गया है या नहीं? मनुष्य खेत बारी, बाजार हाट तथा घर-द्वारमें फँसा - होता है, उसका मन अन्यत्र लगा होता है; इसी दशामें जैसे असावधान भेड़को सहसा भेड़िया आकर उठा ले जाय, वैसे ही मृत्यु उसे लेकर चल देती है। कालके लिये न तो कोई प्रिय है, न न द्वेषका पात्र (पततां भुक्तिमुक्त्यादिप्रद एको हरिधु॑वम् । दृष्ट्वा लोकान् त्रियमाणान् सहायं धर्ममाचरेत् ॥ मृतोऽपि बान्धवः शक्तो नानुगन्तुं नरं मृतम् । जायावर्ज हि सर्वस्य याम्यः पन्था विभिद्यते ॥ धर्म एको व्रजत्येनं यत्रवचनगामिनम्। श्वः कार्यमद्य कुर्वीत पूर्वाहे चाऽऽपराह्निकम् ॥ न हि प्रतीक्षते मृत्युः कृतं वाऽस्य न वा कृतम् । क्षेत्रापणगृहासक्तमन्यत्रगतमानसम्॥ वृकीवोरणमासाद्य मृत्युरादाय गच्छति । न कालस्य प्रियः कश्चिद् द्वेष्यश्चास्य न विद्यते ॥ (अग्नि० १५९।६-१०))॥६- १०॥
आयुष्य तथा प्रारब्धकर्म क्षीण होनेपर वह हठात् जीवको हर ले जाता है। जिसका काल नहीं आया है, वह सैकड़ों बाणोंसे घायल होनेपर भी नहीं मरता तथा जिसका काल आ पहुँचा है, वह कुशके अग्रभागसे ही छू जाय तो भी जीवित
नहीं रहता। जो मृत्युसे ग्रस्त है, उसे औषध और मन्त्र आदि नहीं बचा सकते। जैसे बछड़ा गौओंके झुंडमें भी अपनी माँके पास पहुँच जाता है, उसी | प्रकार पूर्वजन्मका किया हुआ कर्म जन्मान्तरमें भी कर्ताको अवश्य ही प्राप्त होता है। इस जगत्का आदि और अन्त अव्यक्त है, केवल मध्यकी अवस्था ही व्यक्त होती है। जैसे जीवके इस शरीरमें कुमार तथा यौवन आदि अवस्थाएँ क्रमशः आती रहती हैं, उसी प्रकार मृत्युके पश्चात् उसे दूसरे शरीरकी भी प्राप्ति होती है। जैसे मनुष्य (पुराने वस्त्रको त्यागकर) दूसरे नूतन वस्त्रको धारण करता है, उसी प्रकार जीव एक शरीरको छोड़कर दूसरेको ग्रहण करता है। देहधारी जीवात्मा सदा अवध्य है, वह कभी मरता नहीं; अतः मृत्युके लिये शोक त्याग देना चाहिये ॥ ११- १४॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'असंस्कृत आदिकी शुद्धिका वर्णन' नामक एक सौ उनसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५९ ॥
Summary of chapter 161 of the Agni Mahā Purana is as follows:
The way of life of the saṃnyāsin (yati) who has renounced all worldly ties is described. Agni explains the four types of saṃnyāsins—kuṭīcaka, bahūdaka, haṃsa, and paramahaṃsa—in ascending order of renunciation. The paramahaṃsa carries only a daṇḍa and kamaṇḍalu, moves constantly without attachment to any place, accepts food from any varṇa without distinction, and meditates continuously on the advaita-tattva. The saṃnyāsin's death (mahāsamādhi or deliberate departure) is described as the final liberation from the body; his relatives perform no śrāddha since he has transcended sapiṇḍa-relationships.