भगवान् महेश्वर कहते हैं-
स्कन्द ! अब मैं नित्य-नैमित्तिक आदि स्नान, संध्या और प्रतिष्ठासहित पूजाका वर्णन करूँगा। किसी तालाब या पोखरेसे अस्त्रमन्त्र (फट्) के उच्चारणपूर्वक आठ अङ्गुल गहरी मिट्टी खोदकर निकाले। उसे सम्पूर्णरूपसे ले आकर उसी मन्त्रद्वारा उसका पूजन करे। इसके बाद शिरोमन्त्र (स्वाहा) से उस मृत्तिकाको जलाशयके तटपर रखकर अस्त्रमन्त्रसे उसका शोधन करे। फिर शिखामन्त्र ( वषट्) के उच्चारणपूर्वक उसमेंसे तृण आदिको निकालकर, कवच-मन्त्र (हुम्) से उस मृत्तिकाके तीन भाग करे। प्रथम भागकी जलमिश्रित मिट्टीको नाभिसे लेकर पैरतकके अङ्गोंमें लगावे। तत्पश्चात् उसे धोकर, अस्त्र-मन्त्रद्वारा अभिमन्त्रित हुई दूसरे भागकी दीप्तिमती मृत्तिकाद्वारा शेष सम्पूर्ण शरीरको अनुलिप्त करके, दोनों हाथोंसे कान-नाक आदि इन्द्रियोंके छिद्रोंको बंद कर, साँस रोक मन-ही मन कालाग्निके समान तेजोमय अस्त्रका चिन्तन करते हुए पानीमें डुबकी लगाकर स्नान करे। यह मल (शारीरिक मैल) को दूर करनेवाला स्नान कहलाता है। इसे इस प्रकार करके जलके भीतरसे निकल आवे और संध्या करके विधि स्नान करे ॥ १-५३ ॥
ह्दय-मन्त्र (मध्यमा अँगुलीको सीधी रखकर तर्जनीको बिचले पोरुतक उसके साथ सटाकर कुछ सिकोड़ ले यही अङ्कुश मुद्रा है।)के उच्चारणपूर्वक हृदय मन्त्र (नमः) के अङ्कुशमुद्राद्वारा सरस्वती आदि तीर्थोमेंसे किसी एक तीर्थका भावनाद्वारा आकर्षण करके, फिर संहारमुद्राद्वारा (अधोमुख वामहस्तपर ऊर्ध्वमुख दाहिना हाथ रखकर अंगुलियोंको परस्पर ग्रथित करके घुमावे- यह संहार- मुद्रा है (मन्त्रमहार्णव)) उसे अपने समीपवर्ती जलाशय स्थापित करे। तदनन्तर शेष (तीसरे भागकी) मिट्टी लेकर नाभितक जलके भीतर प्रवेश करे और उत्तराभिमुख हो, बायीं हथेलीपर उसके तीन भाग करे। दक्षिणभागकी मिट्टीको अङ्गन्यास सम्बन्धी मन्त्रों द्वारा (अर्थात् ॐ हृदयाय नमः, शिरसे स्वाहा, शिखायै वषट्, कवचाय हुम्, नेत्रत्रयाय वौषट् तथा अस्त्राय फट् - इन छः मन्त्रों द्वारा) एक बार अभिमन्त्रित करे। पूर्वभागकी मिट्टीको 'अस्त्राय फट् ' – इस मन्त्रका सात बार जप करके अभिमन्त्रित करे तथा उत्तरभागकी मिट्टीका 'ॐ नमः शिवाय' इस मन्त्रका दस - बार जप करके अभिमन्त्रण करे। इस तरह पूर्वोक्त मृत्तिकाके तीन भागोंका क्रमशः अभिमन्त्रण करना चाहिये। तत्पश्चात् पहले उन मृत्तिकाओंमेंसे थोड़ा-थोड़ा-सा भाग लेकर सम्पूर्ण दिशाओंमें छोड़े। छोड़ते समय 'अस्त्राय हुं फट् ।' का जप करता रहे। इसके बाद 'ॐ नमः शिवाय। इस शिव - मन्त्रका तथा ॐ सोमाय स्वाहा।' इस सोम 4 मन्त्रका जप करके जलमें अपनी भुजाओंको घुमाकर उसे शिवतीर्थस्वरूप बना दे तथा पूर्वोक्त अङ्गन्यास सम्बन्धी मन्त्रोंका जप करते हुए उसे मस्तकसे लेकर पैरतकके सारे अङ्गों में लगावे ॥ ६-९॥
तदनन्तर अङ्गन्यास सम्बन्धी चार मन्त्रोंका - पाठ करते हुए दाहिनेसे आरम्भ करके बायें तकके हृदय, सिर, शिखा और दोनों भुजाओंका स्पर्श करे तथा नाक, कान आदि सारे छिद्रोंको बंद करके सम्मुखीकरण मुद्राद्वारा भगवान् शिव, - विष्णु अथवा गङ्गाजीका स्मरण करते हुए जलमें गोता लगावे। 'ॐ हृदयाय नमः । 'शिरसे स्वाहा।' 'शिखायै वषट् ।' 'कवचाय हुम् ।' 'नेत्रत्रयाय वौषट् ।' तथा 'अस्त्राय फट् ।' इन षडङ्ग सम्बन्धी मन्त्रों का उच्चारण करके, जलमें स्थित हो, बायें और दायें हाथ दोनोंको मिलाकर, कुम्भमुद्राद्वारा अभिषेक करे। फिर रक्षाके लिये
पूर्वादि दिशाओं में जल छोड़े। सुगन्ध और आँवला आदि राजोचित उपचारसे स्नान करे। स्नानके पश्चात् जलसे बाहर निकलकर संहारिणी मुद्राद्वारा उस तीर्थका उपसंहार करे। इसके बाद विधि-विधानसे शुद्ध, संहितामन्त्रसे अभिमन्त्रित तथा निवृत्ति आदिके द्वारा शोधित भस्मसे स्नान करे ॥ १०-१४३ ॥
'ॐ अस्त्राय हुं फट् ।'– इस मन्त्रका उच्चारण करके, सिरसे पैरतक भस्मद्वारा मलस्नान करके फिर विधिपूर्वक शुद्ध स्नान करे। ईशान, तत्पुरुष, अघोर, गुह्यक या वामदेव तथा सद्योजात सम्बन्धी मन्त्रों द्वारा क्रमशः मस्तक, मुख, हृदय, गुह्याङ्ग तथा शरीरके अन्य अवयवोंमें उद्वर्तन (अनुलेप) लगाना चाहिये। तीनों संध्याओंके समय, निशीथकालमें, वर्षाके पहले और पीछे, सोकर, खाकर, पानी पीकर तथा अन्य आवश्यक कार्य करके आग्नेय स्नान करना चाहिये। स्त्री, नपुंसक, शूद्र, बिल्ली, शव और चूहेका स्पर्श हो जानेपर भी आग्नेय स्नानका विधान है। चुल्लूभर पवित्र जल पी ले, यही 'आग्नेय-स्नान' है। सूर्यकी किरणोंके दिखायी देते समय यदि आकाशसे जलकी वर्षा हो रही हो तो पूर्वाभिमुख हो, दोनों भुजाएँ ऊपर उठाकर, ईशान मन्त्रका उच्चारण करते हुए, सात पग चलकर उस वर्षाके जलसे स्नान करे। यह 'माहेन्द्र स्नान' कहलाता - है। गौओंके समूहके मध्यभागमें स्थित हो उनकी खुरोंसे खुदकर ऊपरको उड़ी हुई धूलसे इष्टदेव सम्बन्धी मूलमन्त्रका जप करते हुए अथवा कवच मन्त्र (हुम्) का जप करते हुए जो स्नान किया जाता है, उसे 'पावनस्नान' कहते हैं ॥ १५ - २०ई ।।
सद्योजात आदि मन्त्रोंके उच्चारणपूर्वक जो जलसे अभिषेक किया जाता है, उसे 'मन्त्रस्नान' कहते हैं। इसी प्रकार वरुणदेवता और अग्निदेवता सम्बन्धी मन्त्रोंसे भी यह स्नान कर्म सम्पन्न किया जाता है। मन-ही-मन मूल मन्त्रका उच्चारण करके प्राणायामपूर्वक मानसिक स्नान करना चाहिये। इसका सर्वत्र विधान है। विष्णुदेवता आदिसे सम्बन्ध रखनेवाले कार्योंमें उन-उन देवताओंके मन्त्रों से ही स्नान करावे ॥ २१ - २३ ॥
कार्तिकेय ! अब मैं विभिन्न मन्त्रों द्वारा संध्या विधिका सम्यग् वर्णन करूँगा। भलीभाँति देख भालकर ब्रह्मतीर्थसे तीन बार जलका मन्त्रपाठपूर्वक आचमन करे। आचमन कालमें आत्मतत्त्व, विद्यातत्त्व और शिवतत्त्व-इन शब्दोंके अन्तमें 'नमः' सहित 'स्वाहा' शब्द जोड़कर मन्त्रपाठ करना चाहिये। यथा ॐ आत्मतत्त्वाय नमः स्वाहा।' 'ॐ विद्यातत्त्वाय नमः स्वाहा।' 'ॐ शिवतत्त्वाय नमः स्वाहा।' इन मन्त्रोंसे आचमन करनेके पश्चात् मुख, नासिका, नेत्र और कानोंका स्पर्श करे फिर प्राणायामद्वारा सकलीकरणकी क्रिया सम्पन्न करके स्थिरतापूर्वक बैठ जाय। इसके बाद मन्त्र-साधक पुरुष मन-ही-मन तीन बार शिवसंहिताकी आवृत्ति करे और आचमन एवं अङ्गन्यास करके प्रातःकाल ब्राह्मी संध्याका इस प्रकार ध्यान करे - ॥ २४ – २६ ॥
संध्यादेवी प्रातः काल ब्रह्मशक्तिके रूपमें उपस्थित हैं। हंसपर आरूढ हो कमलके आसनपर विराजमान हैं। उनकी अङ्गकान्ति लाल है। वे चार मुख और चार भुजाएँ धारण करती हैं। उनके दाहिने हाथों में कमल और स्फटिकाक्षकी माला तथा बायें हाथोंमें दण्ड एवं कमण्डलु शोभा पाते हैं।(हंसपद्मासनां रक्तं चतुर्वंक्त्रा चतुर्भुजाम् । अब्जाक्षमालिनीं दक्षे वामे दण्डकमण्डलुम्॥ (अग्नि० ७२।२७))
मध्याह्नकालमें वैष्णवी शक्तिके रूपमें संध्याका ध्यान करे। वे गरुडकी पीठपर बिछे हुए कमलके आसनपर विराजमान हैं। उनकी अङ्गकान्ति श्वेत है। वे अपने बायें हाथोंमें शङ्ख और चक्र धारण करती हैं तथा दायें हाथोंमें गदा एवं अभयकी मुद्रासे सुशोभित हैं।(ताक्ष्र्यपद्मासनां ध्यायेन्मध्याहे वैष्णवी सिताम्। शङ्खचक्रधरां वामे दक्षिणे सगदाभयाम्॥ (अग्नि० ७२।२८))
सायंकालमें संध्यादेवीका रुद्रशक्तिके रूपमें ध्यान करे। वे वृषभकी पीठपर बिछे हुए कमलके आसनपर बैठी हैं। उनके तीन नेत्र हैं। वे मस्तकपर अर्धचन्द्रके मुकुटसे विभूषित हैं। दाहिने हाथों में त्रिशूल और रुद्राक्ष धारण करती हैं और बायें हाथोंमें अभय एवं शक्तिसे सुशोभित हैं (रौद्रो ध्यायेद् वृषाब्जस्थां त्रिनेत्रां शशिभूषिताम् । त्रिशूलाक्षधरों दक्षे वामे साभयशक्तिकाम् ॥ (अग्नि० ७२।२९)। ये संध्याएँ कर्मोंकी साक्षिणी हैं। अपने-आपको उनकी प्रभासे अनुगत समझे। इन तीनके अतिरिक्त एक चौथी संध्या है, जो केवल ज्ञानीके लिये है। उसका आधी रातके आरम्भमें बोधात्मक साक्षात्कार होता है ॥ २७-३०।।
ये तीन संध्याएँ क्रमशः हृदय, बिन्दु और ब्रह्मरन्ध्रमें स्थित हैं। चौथी संध्याका कोई रूप नहीं है। वह परमशिवमें विराजमान है; क्योंकि वह शिव सबसे परे हैं, इसलिये इसे 'परमा संध्या' कहते हैं। तर्जनी अँगुलीके मूलभागमें पितरोंका, कनिष्ठाके मूलभागमें प्रजापतिका, अङ्गुष्ठके मूलभागमें ब्रह्माका और हाथके अग्रभागमें देवताओंका तीर्थ है। दाहिने हाथकी हथेली में अग्निका, बायीं हथेलीमें सोमका तथा अँगुलियोंके सभी पर्वों एवं संधियोंमें ऋषियोंका तीर्थ है। संध्याके ध्यानके पश्चात् शिव सम्बन्धी मन्त्रोंद्वारा तीर्थ (जलाशय) को शिवस्वरूप बनाकर 'आपो - हि ष्ठा०' इत्यादि संहिता मन्त्रों द्वारा उसके जलसे - मार्जन करे। बायें हाथपर तीर्थके जलको गिराकर उसे रोके रहे और दाहिने हाथ से मन्त्रपाठपूर्वक क्रमश: सिरका सेचन करना 'मार्जन' कहलाता है ॥ ३१-३५ ॥
इसके बाद अघमर्षण करे। दाहिने हाथ के दोनेमें रखे हुए बोधरूप शिवमय जलको नासिकाके समीप ले जाकर बायीं- इडा नाड़ीद्वारा साँसको खींचकर रोके और भीतरसे काले रंगके पाप पुरुषको दाहिनी - पिङ्गला नाडीद्वारा बाहर निकालकर उस जलमें स्थापित करे। फिर उस पापयुक्त जलको हथेलीद्वारा वज्रमयी शिलाकी भावना करके उसपर दे मारे। इससे अघमर्षणकर्म सम्पन्न होता है। तदनन्तर कुश, पुष्प, अक्षत और जलसे युक्त अर्ध्याञ्जलि लेकर उसे 'ॐ नमः शिवाय स्वाहा।' इस मन्त्रसे भगवान् शिवको समर्पित करे और यथाशक्ति गायत्रीमन्त्रका जप करे ॥ ३६-३८ ।।
अब मैं तर्पणकी विधिका वर्णन करूँगा। देवताओंके लिये देवतीर्थसे उनके नाममन्त्रके उच्चारणपूर्वक तर्पण करे। 'ॐ हूं शिवाय स्वाहा।' ऐसा कहकर शिवका तर्पण करे। इसी प्रकार अन्य देवताओंको भी उनके स्वाहायुक्त नाम लेकर जलसे तृप्त करना चाहिये। 'ॐ ह हृदयाय नमः । ॐ ह्रीं शिरसे स्वाहा । ॐ हूं शिखायै वषट् । ॐ हैं कवचाय हुम् । ॐ हौं नेत्रत्रयाय वौषट् । ॐ हः अस्त्राय फट् ।' – इन वाक्योंको क्रमशः पढ़कर हृदय, सिर, शिखा, कवच, नेत्र एवं अस्त्र विषयक न्यास करना चाहिये। आठ देवगणोंको उनके नामके अन्तमें 'नमः' पद जोड़कर तर्पणार्थ जल अर्पित करना चाहिये। यथा - 'ॐ हां आदित्येभ्यो नमः । ॐ हां वसुभ्यो नमः । ॐ हां रुद्रेभ्यो नमः । ॐ हां विश्वेभ्यो देवेभ्यो नमः । ॐ हां मरुद्भ्यो नमः । ॐ हां भृगुभ्यो नमः । ॐ हां अङ्गिरोभ्यो नमः ।' तत्पश्चात् जनेऊको कण्ठमें मालाकी भाँति धारण करके ऋषियोंका तर्पण करे ॥ ३९ - ४१ ॥
ॐ हां अत्रये नमः । ॐ हां वसिष्ठाय नमः । ॐ हां पुलस्तये नमः । ॐ हां क्रतवे नमः । ॐ हां भरद्वाजाय नमः । ॐ हां विश्वामित्राय नमः । ॐ हां प्रचेतसे नमः । ॐ हां मरीचये नमः । - इन मन्त्रोंको पढ़ते हुए अत्रि आदि ऋषियोंको (ऋषितीर्थसे) एक-एक अञ्जलि जल दे। तत्पश्चात् | सनकादि मुनियोंको (दो-दो अञ्जलि) जल देते हुए निम्नाङ्कित मन्त्रवाक्य पढ़े – 'ॐ हां सनकाय - वषट् । ॐ हां सनन्दनाय वषट् । ॐ हां सनातनाय वषट् । ॐ हां सनत्कुमाराय वषट् । ॐ हां कपिलाय वषट् । ॐ हां पञ्चशिखाय वषट् । ॐ हां ऋभवे वषट्।' – इन मन्त्रोंद्वारा जुड़े हाथों की | कनिष्ठिकाओंके मूलभागसे जलाञ्जलि देनी चाहिये ॥ ४२-४४ ॥
'ॐ हां सर्वेभ्यो भूतेभ्यो वषट्' – इस मन्त्रसे - वषट्स्वरूप भूतगणोंका तर्पण करे। तत्पश्चात् यज्ञोपवीतको दाहिने कंधेपर करके दुहरे मुड़े हुए कुशके मूल और अग्रभागसे तिलसहित जलकी तीन-तीन अञ्जलियाँ दिव्य पितरोंके लिये अर्पित करे। 'ॐ हां कव्यवाहनाय स्वधा । ॐ हां अनलाय स्वधा । ॐ हां सोमाय स्वधा । ॐ हां यमाय स्वधा । ॐ हां अर्यम्णे स्वधा । ॐ हां अग्निध्वात्तेभ्यः स्वधा । ॐ हां बर्हिषद्भ्यः स्वधा । ॐ हां आज्यपेभ्यः स्वधा । ॐ हां सोमपेभ्यः स्वधा'- इत्यादि मन्त्रोंका उच्चारण कर विशिष्ट देवताओंकी भाँति दिव्य पितरोंको जलाञ्जलिसे तृप्त करना चाहिये ॥ ४५-४६३ ||
'ॐ हां ईशानाय पित्रे स्वधा' कहकर पिताको, ॐ हां पितामहाय स्वधा' कहकर पितामहको तथा ॐ हां शान्तप्रपितामहाय स्वधा' कहकर प्रपितामहको भी तृप्त करे । इसी प्रकार समस्त प्रेत पितरोंका तर्पण करे। यथ—'ॐ हां पितृभ्यः स्वधा । ॐ हां पितामहेभ्यः स्वधा । ॐ हां प्रपितामहेभ्यः स्वधा । ॐ हां वृद्धप्रपितामहेभ्यः स्वधा । ॐ हां मातृभ्यः स्वधा । ॐ हां मातामहेभ्यः स्वधा । ॐ हां प्रमातामहेभ्यः स्वधा । ॐ हां वृद्धप्रमातामहेभ्यः स्वधा । ॐ हां सर्वेभ्यः पितृभ्यः स्वधा । ॐ हां सर्वेभ्यः ज्ञातिभ्यः स्वधा । ॐ हां सर्वाचार्येभ्यः स्वधा । ॐ हां दिग्भ्यः स्वधा । ॐ हां दिक्पतिभ्यः स्वधा । ॐ हां सिद्धेभ्यः स्वधा । ॐ हां मातृभ्यः स्वधा । ॐ हां ग्रहेभ्यः स्वधा । ॐ हां रक्षोभ्यः स्वधा । - | इन वाक्योंको पढ़ते हुए क्रमशः पितरों, पितामहों, वृद्धप्रपितामहों, माताओं, मातामहों, प्रमातामहों, वृद्धप्रमातामहों, सभी पितरों, सभी ज्ञातिजनों, सभी आचार्यों, सभी दिशाओं, दिक्पतियों, सिद्धों, मातृकाओं, ग्रहों और राक्षसोंको जलाञ्जलि दे ॥ ४७– ५१ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'स्नान आदिकी विधिका वर्णन' नामक बहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७२ ॥
Summary of chapter 73 of the Agni Mahā Purana is as follows:
This chapter provides the detailed ritual of Sūrya pūjā — the daily worship of Bhagavān Sūrya at sunrise, noon, and sunset. The kara-nyāsa (hand gestures consecrated to Sūrya's aspects) and aṅga-nyāsa (body consecration) mantras specific to Sūrya's twelve monthly forms (Vivasvat, Aryaman, Pūṣan, Tvaṣṭṛ, Savitṛ, Bhaga, Dhātṛ, Vidhātṛ, Varuṇa, Mitra, Indra, and Vivasvat again) are given. The eight Sūrya-śaktis — Dīptā, Sūkṣmā, Jayā, Bhadrā, Vibhūti, Vimalā, Amoghā, and Vidyutā — who preside over the eight daily intervals are identified. The nine-planet worship with Sūrya at the center is prescribed, with each planet's dhyāna-mantra, color, mount, and offering substance specified. The arghya offering — with water, red flowers, and sandal paste offered toward the rising sun — is described as the daily renewal of the world's connection with its cosmic light-source.