अग्नि महा पुराण

78- पवित्राधिवासनकी विधि

भगवान् महेश्वर कहते हैं-

स्कन्द ! अब मैं पवित्रारोहणका वर्णन करूँगा, जो क्रिया, योग तथा पूजा आदिमें न्यूनताकी पूर्ति करनेवाला है। जो पवित्रारोहण कर्म नित्य किया जाता है, उसे 'नित्य' कहा गया है तथा दूसरा, जो विशेष निमित्तको लेकर किया जाता है, उसे 'नैमित्तिक ' कहते हैं। आषाढ़ मासकी आदि चतुर्दशीको तथा श्रावण और भाद्रपद मासोंकी शुक्ल कृष्ण उभय-पक्षीय चतुर्दशी एवं अष्टमी तिथियों में पवित्रारोहण या पवित्रारोपण कर्म करना चाहिये । अथवा आषाढ़ मासकी पूर्णिमासे लेकर कार्तिक । मासकी पूर्णिमातक प्रतिपदा आदि तिथियों को विभिन्न देवताओंके लिये पवित्रारोहण करना चाहिये। प्रतिपदाको अग्निके लिये, द्वितीयाको

ब्रह्माजीके लिये, तृतीयाको पार्वतीके लिये, चतुर्थीको गणेशके लिये, पञ्चमीको नागराज अनन्तके लिये, षष्ठीको स्कन्दके अर्थात् तुम्हारे लिये, सप्तमीको सूर्यके लिये, अष्टमीको शूलपाणि अर्थात् मेरे लिये, नवमीको दुर्गाके लिये, दशमीको यमराज के लिये, एकादशीको इन्द्रके लिये, द्वादशीको भगवान् गोविन्दके लिये, त्रयोदशीको कामदेवके लिये, चतुर्दशीको मुझ शिवके लिये तथा पूर्णिमाको अमृतभोजी देवताओंके लिये पवित्रारोपण कर्म करना चाहिये ॥ १३॥

सत्ययुग आदि तीन युगोंमें क्रमशः सोने, चाँदी और ताँबेके पवित्रक अर्पित किये जाते हैं, किंतु कलियुगमें कपासके सूत, रेशमी सूत अथवा कमल आदिके सूतका पवित्रक अर्पित करनेका विधान है। प्रणव, चन्द्रमा, अग्नि, ब्रह्मा, नागगण, स्कन्द, श्रीहरि, सर्वेश्वर तथा सम्पूर्ण

देवता – ये क्रमशः पवित्रकके नौ तन्तुओंके देवता हैं। उत्तम श्रेणीका पवित्रक एक सौ आठ सूत्रोंसे बनता है। मध्यम श्रेणीका चौवन तथा निम्न श्रेणीका सत्ताईस सूत्रोंसे निर्मित होता है। अथवा इक्यासी, पचास या अड़तीस सूत्रोंसे उसका निर्माण करना चाहिये। जो पवित्रक जितने नवसूत्रीसे बनाया जाय, उसमें बीचमें उतनी ही गाँठें लगनी चाहिये। पवित्रकोंका व्यास मान या विस्तार बारह अङ्गुल, आठ अङ्गुल अथवा चार अङ्गुलका होना चाहिये । यदि शिवलिङ्गके लिये पवित्रक बनाना हो तो उस लिङ्गके बराबर ही बनाना चाहिये ॥ ४–८॥

(इस प्रकार तीन तरहके पवित्रक बताये गये।) इसी तरह एक चौथे प्रकारका भी पवित्रक बनता है, जो सभी देवताओंके उपयोगमें आता है। वह उनकी पिण्डी या मूर्तिके बराबरका बनाया जाना चाहिये। इस तरह बने हुए पवित्रकको 'गङ्गावतारक' कहते हैं। इसे 'सद्योजात' मन्त्रके द्वारा भलीभाँति धोना चाहिये। इसमें 'वामदेव' मन्त्रसे ग्रन्थि लगावे । 'अघोर मन्त्रसे इसकी शुद्धि करे तथा 'तत्पुरुष' ('सद्योजात' आदि पाँच मूर्तियोंके मन्त्र पचहत्तरवें अध्यायकी टिप्पणीमें दिये गये हैं।) मन्त्रसे रक्तचन्दन एवं रोलीद्वारा इसको रँगे। अथवा कस्तूरी, गोरोचना, कपूर, हल्दी और गेरू आदिसे मिश्रित रंगके द्वारा पवित्रक मात्रको रँगना चाहिये। सामान्यतः पवित्रकमें दस गाँठें लगानी चाहिये अथवा तन्तुओं की संख्याके अनुसार उसमें गाँठें लगावे। एक गाँठसे दूसरी गाँठमें एक, दो या चार अङ्गलका अन्तर रखे। अन्तर उतना ही रखना चाहिये, जिससे उसकी शोभा बनी रहे। प्रकृति (क्रिया), पौरुषी, वीरा, अपराजिता, जया, विजया, अजिता, सदाशिवा, मनोन्मनी तथा सर्वतोमुखी- ये दस ग्रन्थियोंकी अधिष्ठात्री देवियाँ हैं। अथवा दससे अधिक भी सुन्दर गाँठें लगानी चाहिये। पवित्रकके चन्द्रमण्डल, अग्निमण्डल तथा सूर्य मण्डलसे युक्त होनेकी भावना करके, - उसे साक्षात् भगवान् शिवके तुल्य मानकर हृदयमें धारण करे मन-ही-मन उसके दिव्य | स्वरूपका चिन्तन करे। शिवरूपसे भावित अपने स्वरूपको, पुस्तकको तथा गुरुगणको एक-एक पवित्रक अर्पित करे ॥ ९- १४ ॥

इसी प्रकार द्वारपाल, दिक्पाल और कलश आदिपर भी एक एक पवित्रक चढ़ाना चाहिये । शिवलिङ्गोंके लिये एक हाथसे लेकर नौ हाथतकका पवित्रक होता है। एक हाथवाले पवित्रक में अट्ठाईस गाँठें होती हैं। फिर क्रमशः दस-दस गाँठें बढ़ती जाती हैं। इस तरह नौ हाथ पवित्रकमें एक सौ आठ गाँठें होती हैं। ये ग्रन्थियाँ क्रमश: एक या दो-दो अङ्गलके अन्तरपर रहती हैं। इनका मान भी लिङ्गके विस्तारके अनुरूप हुआ करता है। जिस दिन पवित्रारोपण करना हो, उससे एक दिन पूर्व अर्थात् सप्तमी या त्रयोदशी तिथिको उपासक नित्यकर्म करके पवित्र हो सायंकालमें पुष्प और वस्त्र आदिसे याग मन्दिर (पूजा-मण्डप) को सजावे। नैमित्तिकी - संध्योपासना करके, विशेषरूपसे तर्पण कर्मका सम्पादन करनेके पश्चात् पूजाके लिये निश्चित किये हुए पवित्र भूभागमें सूर्यदेवका पूजन करे ॥ १५ - १८३ ॥

आचार्यको चाहिये कि वह आचमन एवं सकलीकरणकी क्रिया करके प्रणवके उच्चारणपूर्वक अर्घ्यपात्र हाथमें लिये अस्त्र-मन्त्र (फट्) बोलकर पूर्वादि दिशाओंके क्रमसे सम्पूर्ण द्वारोंका प्रोक्षण करके उनका पूजन करे। 'हां शान्तिकला - द्वाराय नमः । 'हां विद्याकलाद्वाराय नमः । हां निवृत्तिकलाद्वाराय नमः । 'हां प्रतिष्ठाकलाद्वाराय नमः ।' – इन मन्त्रों से पूर्वादि चारों द्वारोंका पूजन करना चाहिये। प्रत्येक द्वारकी दक्षिण और वाम शाखाओंपर दो-दो द्वारपालोंका पूजन करे। पूर्वमें 'नन्दिने नमः।' 'महाकालाय नमः।' – इन मन्त्रोंसे नन्दी और महाकालका, दक्षिणमें 'भृङ्गिणे नमः। 'गणाय नमः।' – इन मन्त्रोंसे भृङ्गी और गणका, पश्चिममें 'वृषभाय नमः।' 'स्कन्दाय नमः।' - इन मन्त्रोंसे नन्दिकेश्वर वृषभ तथा स्कन्दका तथा उत्तर द्वारमें 'देव्यै नमः । चण्डाय नमः।' – इन मन्त्रोंसे देवी तथा चण्ड नामक द्वारपालका क्रमशः पूजन करे ॥ १९ - २२ ॥

इस प्रकार द्वारपाल आदिकी 'नित्य' पूजा करके पश्चिम द्वारसे होकर याग मन्दिरमें प्रवेश करे। फिर वास्तुदेवताका पूजन करके भूतशुद्धि करे। तत्पश्चात् विशेषार्घ्य हाथमें लेकर अपनेमें शिवस्वरूपकी भावना करते हुए पूजा सामग्रीका प्रोक्षण आदि करके यज्ञभूमिका संस्कार करे। फिर कुश, दूर्वा और फूल आदि हाथमें लेकर 'नमः' आदिके उच्चारणपूर्वक उसे अभिमन्त्रित करे। इस प्रकार शिवहस्तका विधान करके उसे अपने सिरपर रखे और यह भावना करे कि 'मैं सबका आदि कारण सर्वज्ञ शिव हूँ तथा यज्ञमें मेरी ही प्रधानता है। इस प्रकार आचार्य भगवान् शिवका अत्यन्त ध्यान करे और ज्ञानरूपी खड्ग हाथमें लिये नैर्ऋत्य दिशामें जाकर उत्तराभिमुख हो अर्घ्यका जल छोड़े तथा यज्ञ मण्डपमें चारों ओर पञ्चगव्य छिड़के। चतुष्पथान्त संस्कार और उत्तम संस्कारयुक्त वीक्षण आदिके द्वारा वहाँ सब ओर गौर सर्षप आदि बिखेरने योग्य वस्तुओंको बिखेरकर कुशनिर्मित कूर्चके द्वारा उनका उपसंहार करे। फिर उनके द्वारा ईशानकोणमें वर्धनी एवं कलशकी स्थापनाके लिये आसनकी कल्पना करे ।। २३-२८ ॥

तत्पश्चात् नैर्ऋत्यकोणमें वास्तुदेवताका तथा द्वारपर लक्ष्मीका पूजन करे फिर पश्चिमाभिमुख कलशको सप्तधान्यके ऊपर स्थापित करके प्रणवके उच्चारणपूर्वक यह भावना करे कि 'यह शिवस्वरूप कलश नन्दिकेश्वर वृषभके ऊपर आरूढ़ है। साथ ही वर्धनी सिंहके ऊपर स्थित है, ऐसी भावना करे। कलशपर साङ्ग भगवान् शिवकी और वर्धनीमें अस्त्रकी पूजा करे। इसके बाद पूर्वादि दिशाओंमें इन्द्र आदि दिक्पालोंका तथा मण्डपके मध्यभागमें ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव आदिका पूजन करे। तत्पश्चात् कलशके पृष्ठभागका अनुसरण करनेवाली वर्धनीको भलीभाँति हाथमें लेकर मन्त्रज्ञ गुरु भगवान् शिवकी आज्ञा सुनावे । फिर पूर्वसे लेकर प्रदक्षिणक्रमसे चलते हुए ईशानकोणतक जलकी अविच्छिन्न धारा गिरावे और मूलमन्त्रका उच्चारण करे। शस्त्ररूपिणी वर्धनीको यज्ञमण्डपकी रक्षाके लिये उसके चारों ओर घुमावे। पहले कलशको आरोपित करके उसके वामभागमें शस्त्रके लिये वर्धनीको स्थापित करे ॥ २९-३३ ॥

उत्तम एवं सुस्थिर आसनवाले कलशपर भगवान् शंकरका तथा प्रणवपर स्थित हुई वर्धनीमें उनके आयुधका पूजन करे । तदनन्तर उन दोनोंका लिङ्गमुद्राके द्वारा परस्पर संयोग कराकर भगलिङ्ग संयोगका सम्पादन करे कलशपर ज्ञानरूपी खड्ग अर्पित करके मूल मन्त्रका जप करे। उस जपके दशांश होमसे वर्धनीमें रक्षा घोषित करे । फिर वायव्यकोणमें गणेशजीकी पूजा करके पञ्चामृत आदिसे भगवान् शिवको स्नान करावे और पूर्ववत् पूजन करके कुण्डमें शिवस्वरूप अग्निकी पूजा करे। इसके बाद विधिपूर्वक चरु तैयार करके उसे सम्पाताहुतिकी विधिसे शोधित करे।

तदनन्तर भगवान् शिव, अग्नि और आत्माके भेदसे तीन अधिकारियोंके लिये चम्मचसे उस चरुके तीन भाग करे तथा अग्निकुण्डमें शिव एवं अग्निका भाग देकर शेष भाग आत्माके लिये सुरक्षित रखे ॥ ३४-३८ ॥

तत्पुरुष मन्त्रके साथ 'हुं' जोड़कर उसके उच्चारणपूर्वक पूर्व दिशामें इष्टदेवके लिये दन्तधावन अर्पित करे। अघोर-मन्त्रके अन्तमें 'वषट्' जोड़कर उसके उच्चारणपूर्वक उत्तर दिशामें आँवला अर्पित करे। वामदेव मन्त्रके अन्तमें 'स्वाहा' जोड़कर उसका उच्चारण करते हुए जल निवेदन करे । 'ईशान मन्त्रसे' (ॐ ईशानः सर्वविद्यानामीश्वरः सर्वभूतानां ब्रह्माधिपतिर्ब्रह्मणो ब्रह्माशिवो मेऽस्तु सदाशिवोम्।)  ईशानकोणमें सुगन्धित जल समर्पित - करे। पञ्चगव्य और पलाश आदिके दोने सब में दिशाओंमें रखे। ईशानकोणमें पुष्प, अग्निकोणमें गोरोचन, नैर्ऋत्यकोणमें अगुरु तथा वायव्यकोणमें चतुःसम ( एक गन्धद्रव्य, जिसमें दो भाग कस्तूरी, चार भाग चन्दन, तीन भाग कुडकुम और तीन भाग कपूर रहता है।) समर्पित करे। तुरंतके पैदा हुए कुशोंके साथ समस्त होमद्रव्य भी अर्पित करे। दण्ड, अक्षसूत्र, कौपीन तथा भिक्षापात्र भी देवविग्रहको अर्पित करे। काजल, कुङ्कुम, सुगन्धित तेल, केशोंको शुद्ध करनेवाली कंघी, पान, दर्पण तथा गोरोचन भी उत्तर दिशामें अर्पित करे। तत्पश्चात् आसन, खड़ाऊँ, पात्र, योगपट्ट और छत्र ये वस्तुएँ भगवान् शंकरकी प्रसन्नताके लिये ईशानकोणमें ईशान मन्त्रसे ही निवेदन करे ॥ ३९-४४६ ॥

पूर्व दिशामें घीसहित चरु तथा गन्ध आदि भगवान् तत्पुरुषको अर्पित करे। तदनन्तर अर्घ्यजलसे प्रक्षालित तथा संहिता मन्त्रसे शोधित पवित्रकों को लेकर अग्निके निकट पहुँचावे कृष्ण मृगचर्म आदिसे उन्हें ढककर रखे। उनके भीतर समस्त कर्मोंके साक्षी और संरक्षक संवत्सरस्वरूप अविनाशी भगवान् शिवका चिन्तन करे। फिर 'स्वा' और 'हा' का प्रयोग करते हुए मन्त्र-संहिताके पाठपूर्वक इक्कीस बार उन पवित्रकोंका शोधन करे। तत्पश्चात् गृह आदिको सूत्रोंसे वेष्टित करे। सूर्यदेवको गन्ध, पुष्प आदि चढ़ावे। फिर पूजित हुए सूर्यदेवको आचमनपूर्वक अर्घ्य दे। न्यास करके नन्दी आदि द्वारपालों को और वास्तुदेवताको भी गन्धादि समर्पित करे । तदनन्तर यज्ञ-मण्डपके भीतर प्रवेश करके शिव कलशपर उसके चारों ओर इन्द्रादि लोकपालों और उनके शस्त्रोंकी अपने-अपने नाम मन्त्रोंसे - पूजा करे ॥ ४५-५० ॥

इसके बाद वर्धनीमें विघ्नराज, गुरु और आत्माका पूजन करे। इन सबका पूजन करनेके अनन्तर सर्वौषधिसे लिप्त, धूपसे धूपित तथा पुष्प दूर्वा आदिसे पूजित पवित्रकको दोनों अञ्जलियोंके बीचमें रख ले और भगवान् शिवको सम्बोधित करते हुए कहे- 'सबके कारण तथा जड और चेतनके स्वामी परमेश्वर! पूजनकी समस्त विधियों में होनेवाली त्रुटिकी पूर्तिके लिये मैं आपको आमन्त्रित करता हूँ। आपसे अभीष्ट मनोरथकी प्राप्ति करानेवाली सिद्धि चाहता हूँ । आप अपनी आराधना करनेवाले इस उपासकके लिये उस सिद्धिका अनुमोदन कीजिये। शम्भो ! आपको सदा और सब प्रकारसे मेरा नमस्कार है। आप मुझपर प्रसन्न होइये देवेश्वर! आप देवी पार्वती तथा गणेश्वरोंके साथ आमन्त्रित हैं। मन्त्रेश्वरों, लोकपालों तथा सेवकोंसहित आप पधारें। परमेश्वर! मैं आपको सादर निमन्त्रित करता हूँ। आपकी आज्ञासे कल प्रातःकाल पवित्रारोपण तथा तत्सम्बन्धी नियमका पालन करूँगा' ॥ ५१-५५३ ॥ इस प्रकार महादेवजीको आमन्त्रित करके रेचक प्राणायामके द्वारा अमृतीकरणकी क्रिया सम्पादित करते हुए शिवान्त मूल मन्त्रका उच्चारण एवं जप करके उसे भगवान् शिवको समर्पित करे जप, स्तुति एवं प्रणाम करके भगवान् शंकरसे अपनी त्रुटियोंके लिये क्षमा प्रार्थना करे । तत्पश्चात् चरुके तृतीय अंशका होम करे। उसे शिवस्वरूप अग्निको, दिग्वासियोंको, दिशाओंके अधिपतियोंको, भूतगणोंको, मातृगणोंको, एकादश रुद्रोंको तथा क्षेत्रपाल आदिको उनके नाममन्त्र साथ 'नमः स्वाहा' बोलकर आहुतिके रूपमें अर्पित करे। इसके बाद इन सबका चतुर्थ्यन्त नाम बोलकर 'अयं बलिः' कहते हुए बलि समर्पित करे। पूर्वादि दिशाओं में दिग्गजों आदि साथ दिक्पालोंको, क्षेत्रपालको तथा अग्निको भी बलि समर्पित करनी चाहिये। बलिके पश्चात् आचमन करके विधिच्छिद्रपूरक (विधिके पालन या सम्पादनमें जो त्रुटि रह गयी हो, उसकी पूर्ति करनेवाला।) होम करे । फिर पूर्णाहुति और व्याहृति- होम करके अग्निदेवको अवरुद्ध करे ॥ ५६-६०॥

तदनन्तर 'ॐ अग्नये स्वाहा।''ॐ सोमाय स्वाहा।' 'ॐ अग्नीषोमाभ्यां स्वाहा।' 'ॐ अग्नये स्विष्टकृते स्वाहा।' इन चार मन्त्रों से चार आहुतियाँ देकर भावी कार्यकी योजना करे। अग्निकुण्डमें पूजित हुए आराध्यदेव भगवान् शिवको पूजामण्डलमें पूजित कलशस्थ शिवमें नाड़ीसंधानरूप विधिसे संयोजित करे। फिर बाँस आदिके पात्रमें 'फट्' और 'नमः' के उच्चारणपूर्वक अस्त्रन्यास और हृदयन्यास करके उसमें सब पवित्रकोंको रख दे। इसके बाद 'शान्तिकलात्मने नमः ।' 'विद्याकलात्मने नमः ।' 'निवृत्तिकलात्मने नमः ।' 'प्रतिष्ठाकलात्मने नमः ।' 'शान्त्यतीतकलात्मने नमः । - इन कला मन्त्रों द्वारा उन्हें अभिमन्त्रित करे फिर प्रणवमन्त्र अथवा मूल मन्त्रसे षडङ्गन्यास - करके 'नमः', 'हुं', एवं 'फट्' का उच्चारण करके, उनमें क्रमश: हृदय, कवच एवं अस्त्रकी योजना करे ॥ ६१-६४॥

यह सब करके उन पवित्रकोंको सूत्रोंसे आवेष्टित करे। फिर 'नमः', 'स्वाहा', 'वषद्', 'हुं', 'वौषट्', तथा 'फट्' इन अङ्ग-सम्बन्धी मन्त्रों द्वारा उन सबका पूजन करके उनकी रक्षाके लिये भक्तिभावसे नम्र हो, उन्हें जगदीश्वर शिवको समर्पित करे। इसके बाद पुष्प, धूप आदिसे पूजित सिद्धान्त ग्रन्थपर पवित्रक अर्पित करके गुरुके चरणोंके समीप जाकर उन्हें भक्तिपूर्वक पवित्रक दे। फिर वहाँसे बाहर आकर आचमन करे और गोबरसे लिपे-पुते मण्डलत्रयमें क्रमशः पञ्चगव्य, चरु एवं दन्तधावनका पूजन करे ॥ ६५-६७॥

तदनन्तर भलीभाँति आचमन करके मन्त्र आवृत एवं सुरक्षित साधक रात्रिमें संगीतकी व्यवस्था करके जागरण करे। आधी रातके बाद भोग सामग्रीकी इच्छा रखनेवाला पुरुष मन-ही-मन भगवान् शंकरका स्मरण करता हुआ कुशकी चटाईपर सोये मोक्षकी इच्छा रखनेवाला पुरुष भी इसी प्रकार जागरण करके उपवासपूर्वक एकाग्रचित्त हो केवल भस्मकी शय्यापर सोवे ॥ ६८-६९ ॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'पवित्राधिवासनकी विधिका वर्णन' नामक अठहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७८ ॥