शंकरजी कहते हैं -
पूर्वादि दिशाओं में प्रदक्षिणक्रमसे अकारादि स्वरोंको लिखे। उसमें शुक्लपक्षकी प्रतिपदा, पूर्णिमा, त्रयोदशी, चतुर्दशी, केवल शुक्लपक्षकी एक अष्टमी (कृष्णपक्षकी अष्टमी नहीं), सप्तमी, कृष्णपक्षमें प्रतिपदासे लेकर त्रयोदशीतक (अष्टमीको छोड़कर) द्वादश तिथियोंका न्यास करे। इस चैत्र चक्रमें पूर्वादि दिशाओं में स्पर्श-वर्णोंको लिखनेसे जय पराजयका तथा लाभका निर्णय होता है। विषम दिशा, विषम स्वर तथा विषम वर्णमें शुभ होता है और सम दिशा आदिमें अशुभ होता है ॥ १-३॥
चैत्रचक्रम्
इस चक्रमें शुक्लपक्षको १।७।८।१३।१४।१५ ये तिथियाँ ली गयी हैं। कृष्णपक्षमें अष्टमी छोड़कर १।२।३।४।५।६।७।९ ।१०। ११। १२ १३ ये तिथियाँ ली गयी हैं। ( अब युद्धमें जय पराजयका लक्षण बतलाते हैं-) युद्धारम्भके समय सेनापति पहले जिसका नाम लेकर बुलाता है, उस व्यक्तिके नामका आदि-अक्षर यदि 'दीर्घ' हो तो उसकी घोर संग्राममें भी विजय होती है। यदि नामका आदि वर्ण 'ह्रस्व' हो तो निश्चय ही मृत्यु होती है। जैसे - एक सैनिकका नाम 'आदित्य' और दूसरेका - नाम है – 'गुरु'। इन दोनोंमें प्रथमके नामके आदिमें 'आ' दीर्घ स्वर है और दूसरेके नामके आदिमें 'उ' ह्रस्व स्वर है; अतः यदि दीर्घ स्वरवाले व्यक्तिको बुलाया जायगा तो विजय और ह्रस्ववालेको बुलानेपर हार तथा मृत्यु होगी ॥ ४ – ७ ॥
(अब 'नरचक्र' के द्वारा घाताङ्गका निर्णय करते हैं-) नक्षत्र पिण्डके आधारपर नर चक्रका वर्णन करता हूँ। पहले एक मनुष्यका आकार बनावे। तत्पश्चात् उसमें नक्षत्रोंका न्यास करे। सूर्यके नक्षत्रसे नामके नक्षत्रतक गिनकर संख्या जान ले। पहले तीनको नरके सिरमें, एक मुखमें, दो नेत्रमें, चार हाथमें, दो कानमें, पाँच हृदयमें और छः पैरों में लिखे। फिर नाम नक्षत्रका स्पष्ट रूपसे चक्रके मध्यमें न्यास करे।इस तरह लिखनेपर नरके नेत्र, सिर, दाहिना कान, दाहिना हाथ, दोनों पैर, हृदय, ग्रीवा, बायाँ हाथ और गुह्याङ्गमेंसे जहाँ शनि, मङ्गल, सूर्य तथा राहुके नक्षत्र पड़ते हों, युद्धमें उसी अङ्गमें घात (चोट) होता है ॥ ८-१२ ॥
नर चक्र
(अब जयचक्रका निर्णय करते हैं-) पूर्वसे पश्चिमतक तेरह रेखाएँ बनाकर पुनः उत्तरसे दक्षिणतक छः तिरछी रेखाएँ खींचे। (इस तरह लिखनेपर जयचक्र बन जायगा।) उसमें अ से ह तक अक्षरोंको लिखे और १० । ९ । ७ । १२ । ४ । ११ । १५ । २४ । १८ । ४ । २७ । २४ – इन अङ्कोंका भी न्यास करे। अङ्कोंको ऊपर लिखकर अकारादि अक्षरोंको उसके नीचे लिखे। शत्रुके नामाक्षर स्वर तथा व्यञ्जन वर्णके सामने जो अङ्क हों, उन सबको जोड़कर पिण्ड बनाये। उसमें सातसे भाग देनेपर एक आदि शेषके अनुसार सूर्यादि ग्रहोंका भाग जाने। १ शेषमें सूर्य, २ में चन्द्र, ३ में भौम, ४ में बुध, ५ में गुरु, ६ में शुक्र, ७ में शनिका भाग होता है - यों समझना चाहिये। जब सूर्य, शनि और मङ्गलका भाग आये तो विजय होती है तथा शुभ ग्रहके भागमें संधि होती है ॥ १३ - १५॥
प्रथम जयचक्र―
१०
९
७
१२
४
११
१५
१४
१८
४
२७
२४
अ
आ
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ई
उ
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ष
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ह
उदाहरण- जैसे किसीका नाम देवदत्त है, इस नामके अक्षरों तथा ए स्वरके अनुसार अङ्क क्रमसे १८+४+२४+१८+ १५-७९ (उन्यासी) योग हुआ। इसमें सातका भाग दिया = ११ लब्धि तथा २ शेष हुआ। शेषके अनुसार सूर्यसे गिननेपर चन्द्रका भाग हुआ, अतः संधि होगी। इससे यह निश्चय हुआ कि 'देवदत्त' नामका व्यक्ति संग्राममें कभी पराजित नहीं हो सकता। इसी तरह और नामके अक्षर तथा मात्राके अनुसार जय-पराजयका ज्ञान करना चाहिये।
( अब द्वितीय जयचक्रका निर्णय करते हैं-) पूर्वसे पश्चिमतक बारह रेखाएँ लिखे और छः रेखाएँ याम्योत्तर करके लिखी जायँ। इस तरह यह 'जयचक्र' बन जायगा। उसके सर्वप्रथम ऊपरवाले कोष्ठमें १४ । २७ । २ । १२ । १५ । ६ । ४ । ३ । १७ । ८ । ८–इन अङ्कोंको लिखे और कोष्ठों में 'अकार' आदि स्वरोंसे लेकर 'ह' तकके अक्षरोंका क्रमशः न्यास करे। तत्पश्चात् नामके अक्षरोंद्वारा बने हुए पिण्डमें आठसे भाग दे तो एक आदि शेषके अनुसार वायस, मण्डल, रासभ, वृषभ, कुञ्जर, सिंह, खर, धूम्र – ये आठ शेषों के नाम होते हैं। इसमें वायससे प्रबल मण्डल और मण्डलसे प्रबल रासभ–यों उत्तरोत्तर बली जानना चाहिये। संग्राममें यायी तथा स्थायीके नामाक्षरके अनुसार मण्डल बनाकर एक-दूसरेसे बली तथा दुर्बलका ज्ञान करना चाहिये ॥ १६-२०॥
द्वितिया जयचक्र―
१४
२७
२
१२
१५
६
४
३
१७
८
८
अ
आ
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ध
न
प
फ
ब
भ
म
य
र
ल
व
श
ष
स
ह
उदाहरण जैसे यायी रामचन्द्र तथा स्थायी रावण- इन दोनों में कौन बली है - यह जानना है। अतः रामचन्द्रके अक्षर तथा स्वरके अनुसार र् १५, आ= २७, म्-२, अ-१४, च्-३, अ-१४, न्-१७, द्-४, इ १५, अ-१४ – इनका योग १२५ हुआ। इसमें ८ का भाग दिया तो शेष ५ रहा। तथा रावणके अक्षर और स्वरके अनुसार र् १५, आ-२७, व्-४, अ-१४, न्-१७, अ= १४ – इनका योग हुआ ९१ । इसमें ८ से भाग - देनेपर ३ शेष हुआ। ३ शेषसे ५ बली है, अतः रामचन्द्र रावणके संग्राममें रामचन्द्र ही बली हो - रहे हैं ।
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'घातचक्रोंका वर्णन' नामक एक सौ इकतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३१ ॥
Summary of chapter 133 of the Agni Mahā Purana is as follows:
Various forms of bali (ritual offering of cooked food, flesh, or symbolic substitutes) appropriate to different deities and occasions are described. Agni distinguishes sāttvika-bali (fruit, cooked grain, flowers), rājasika-bali (meat and wine in specified tantric contexts), and the purely symbolic bali using clay or flour figures. The proper vessels, directions, and mantras for bali-dāna to the bhūtas, yakṣas, and kṣetrapālas who guard the four quarters are enumerated. The chapter emphasizes that a householder's daily bali-karma, when properly performed, maintains harmony with the unseen presences inhabiting the domestic and village environment.