भगवान् शिव कहते हैं-
स्कन्द ! प्रातः काल नित्य-कर्मके अनन्तर द्वार-देवताओंका पूजन करके मण्डपमें प्रवेश करे। पूर्वोक्त विधिसे देहशुद्धि आदिका अनुष्ठान करे। दिक्पालोंका, शिव कलशका तथा वार्धानी (जलपात्र) का पूजन करके अष्टपुष्पिकाद्वारा शिवलिङ्गकी अर्चना करे और क्रमशः आहुति दे, अग्निदेवको तृप्त करे । तदनन्तर शिवकी आज्ञा ले 'अस्त्राय फट् ।' का उच्चारण करते हुए मन्दिरमें प्रवेश करे तथा 'अस्त्राय हुं फट् ।' बोलकर वहाँके विघ्नोंका अपसारण करे ॥ १-३॥
शिलाके ठीक मध्यभागमें शिवलिङ्गकी स्थापना न करे; क्योंकि वैसा करनेपर वेध-दोषी आशङ्का रहती है। इसलिये मध्यभागको त्यागकर, एक या आधा जौ किंचित् ईशान भागका आश्रय ले आधारशिलामें शिवलिङ्गकी स्थापना करे। मूल मन्त्रका उच्चारण करते हुए उस (अनन्त) नाम-धारिणी, सर्वाधारस्वरूपिणी, सर्वव्यापिनी शिलाको सृष्टियोगद्वारा अविचल भावसे स्थापित करे। अथवा निम्नाङ्कित मन्त्रसे शिवकी आसनस्वरूपा उस शिलाकी पूजा करे- 'ॐ नमो व्यापिनि भगवति स्थिरेऽचले ध्रुवे ह्रीं लं ह्रीं स्वाहा।' पूजनसे पहले यों कहे- 'आधारशक्ति स्वरूपिणि शिले! तुम्हें भगवान् शिवकी आज्ञासे यहाँ नित्य निरन्तर स्थिरतापूर्वक स्थित रहना - चाहिये।'– ऐसा कहकर पूजन करनेके पश्चात् अवरोधिनी मुद्रासे शिलाको अवरुद्ध (स्थिरतापूर्वक स्थापित) कर दे ॥ ४–८॥
हीरे आदि रत्न, उशीर (खश) आदि ओषधियाँ, लौह और सुवर्ण, कांस्य आदि धातु, हरिताल, आदि, धान आदिके पौधे तथा पूर्वकथित अन्य वस्तुएँ क्रमश: एकत्र करे और मन-ही-मन भावना करे कि 'ये सब वस्तुएँ कान्ति, आरोग्य, देह, वीर्य और शक्तिस्वरूप हैं। इस प्रकार एकाग्रचित्तसे भावना करके लोकपाल और शिवसम्बन्धी मन्त्रों द्वारा पूर्वादि कुण्डोंमें इन वस्तुओंमेंसे एक-एकको क्रमशः डाले। सोने अथवा ताँबेके बने हुए कछुए या वृषभको द्वारके सम्मुख रखकर नदीके किनारेकी या पर्वतके शिखरकी मिट्टीसे युक्त करे और उसे बीचके कुण्ड आदिमें डाल दे अथवा सुवर्णनिर्मित मेरुको मधूक, अक्षत और अञ्जनसे युक्त करके उसमें डाले अथवा सोने या चाँदीकी बनी हुई पृथ्वीको सम्पूर्ण बीजों और सुवर्णसे संयुक्त करके उसे मध्यम कुण्डमें डाले। अथवा सोने, चाँदी या सब प्रकारके लोहसे निर्मित सुवर्णमय केसरोंसे युक्त कमल या अनन्त ( शेषनाग) की मूर्तिको उसमें छोड़े ॥ ९–१५॥
शक्तिसे लेकर मूर्ति पर्यन्त अथवा शक्तिसे लेकर शक्ति पर्यन्त तत्त्वका देवाधिदेव महादेवके लिये आसन निर्मित करके उसमें खीर या गुग्गुलका लेप करे। तत्पश्चात् वस्त्रसे गर्तको आच्छादित करके कवच और अस्त्र-मन्त्रद्वारा उसकी रक्षा करे फिर दिक्पालोंको बलि देकर आचार्य आचमन करे। शिला और गर्तके सङ्ग दोषकी निवृत्तिके लिये शिवमन्त्रसे अथवा अस्त्र मन्त्रसे विधिपूर्वक सौ आहुतियाँ दे। साथ ही पूर्णाहुति भी करे । वास्तु देवताओंको एक-एक आहुति देकर तृप्त करनेके पश्चात् हृदय मन्त्रसे भगवान्को उठाकर मङ्गल वाद्य और मङ्गल पाठ आदिके साथ ले आवे ॥ १६ - १९ ॥
गुरु भगवान्के आगे-आगे चले और चार दिशाओं में स्थित चार मूर्तिपालोंके साथ यजमान स्वयं भगवान्की सवारीके पीछे-पीछे चले। मन्दिर आदिके चारों ओर घुमाकर शिवलिङ्गको भद्र-द्वारके सम्मुख नहलावे और अर्घ्य देकर उसे मन्दिरके भीतर ले जाय खुले द्वारसे अथवा द्वारके लिये निश्चित स्थानसे शिवलिङ्गको मन्दिर में ले जाय। इन सबके अभावमें द्वार बंद करनेवाली शिलासे शून्य-मार्गसे अथवा उस शिलाके ऊपर से होकर मन्दिरमें प्रवेशका विधान है। दरवाजेसे ही महेश्वरको मन्दिरमें ले जाय, परंतु उनका द्वारसे स्पर्श न होने दे। यदि देवालयका समारम्भ हो रहा हो तो किसी कोणसे भी शिवलिङ्गको मन्दिरके भीतर प्रविष्ट कराया जा सकता है। व्यक्त अथवा स्थूल शिवलिङ्गके मन्दिर प्रवेशके लिये सर्वत्र यही विधि जाननी चाहिये । घरमें प्रवेशका मार्ग द्वार ही है, इसका साधारण लोगोंको भी प्रत्यक्ष अनुभव है। यदि बिना द्वारके घरमें प्रवेश किया जाय तो गोत्रका नाश होता है- ऐसी मान्यता है ॥ २० - २४३ ॥
तदनन्तर पीठपर, द्वारके सामने शिवलिङ्गको स्थापित करके नाना प्रकारके वाद्यों तथा मङ्गलसूचक ध्वनियोंके साथ उसपर दूर्वा और अक्षत चढ़ावे तथा 'समुत्तिष्ठ नमः'– ऐसा कहकर महापाशुपत मन्त्रका पाठ करे। इसके बाद आचार्य गर्तमें रखे हुए घटको वहाँसे हटाकर मूर्तिपालकोंके साथ यन्त्रमें स्थापित करावे और उसमें कुङ्कुम आदिका लेप करके, शक्ति और शक्तिमान्की एकताका चिन्तन करते हुए लयान्त मूल मन्त्रका उच्चारण करके, उस आलम्बनलक्षित घटका स्पर्शपूर्वक पुनः गर्तमें ही स्थापना करा दे। ब्रह्मभागके एक अंश, दो अंश, आधा अंश अथवा आठवें अंशतक या सम्पूर्ण ब्रह्मभागका ही गर्तमें प्रवेश करावे। फिर नाभिपर्यन्त दीर्घाओं के साथ शीशेका आवरण देकर, एकाग्रचित्त हो, नीचेके गर्तको बालूसे पाट दे और कहे 'भगवन् ! आप सुस्थिर हो जाइये ॥ २५ – ३० ।। -
तदनन्तर लिङ्गके स्थिर हो जानेपर सकल (सावयव) रूपवाले परमेश्वरका ध्यान करके, शक्त्यन्त-मूल-मन्त्रका उच्चारण करते हुए, शिवलिङ्गके स्पर्शपूर्वक उसमें निष्कलीकरण-न्यास करे। जब शिवलिङ्गकी स्थापना हो रही हो, उस समय जिस-जिस दिशाका आश्रय ले, उस उस दिशाके दिक्पाल सम्बन्धी मन्त्रका उच्चारण करके पूर्णाहुति - पर्यन्त होम करे और दक्षिणा दे। यदि शिवलिङ्गसे शब्द प्रकट हो अथवा उसका मुख्यभाग हिले या फट-फूट जाय तो मूल मन्त्रसे या 'बहुरूप' मन्त्रद्वारा सौ आहुतियाँ दे । इसी प्रकार अन्य दोष प्राप्त होनेपर शिवशास्त्रोक्त शान्ति करे। उक्त विधिसे यदि शिवलिङ्गमें न्यासका विधान किया जाय तो कर्ता दोषका भागी नहीं होता। तदनन्तर लक्षणस्पर्शरूप पीठबन्ध करके गौरीमन्त्रसे उसका लय करे फिर पिण्डीमें सृष्टिन्यास करे ॥ ३१-३५ ॥
लिङ्गके पार्श्वभागमें जो संधि (छिद्र) हो, उसको बालू एवं वज्रलेपसे भर दे। तत्पश्चात् गुरु मूर्तिपालकोंके साथ शान्तिकलशके आधे जलसे शिवलिङ्गको नहलाकर, अन्य कलशों तथा पञ्चामृत आदिसे भी अभिषिक्त करे। फिर चन्दन आदिका लेप लगा, जगदीश्वर शिवकी पूजा करके, उमा-महेश्वर-मन्त्रोंद्वारा लिङ्गमुद्रासे उन दोनोंका स्पर्श करे। इसके बाद छहों अध्वाओंके न्यासपूर्वक त्रितत्त्वन्यास करके, मूर्तिन्यास, दिक्पालन्यास, अङ्गन्यास एवं ब्रह्मन्यासपूर्वक ज्ञानाशक्तिका लिङ्गमें तथा क्रियाशक्तिका पीठ में न्यास करनेके पश्चात् स्नान करावे ॥ ३६ – ३९ ॥
गन्धका लेपन करके धूप दे और व्यापकरूपसे शिवका न्यास करे। हृदय मन्त्रद्वारा पुष्पमाला, धूप, दीप, नैवेद्य और फल निवेदन करे । यथाशक्ति इन वस्तुओंको निवेदित करने के पश्चात् महादेवजीको आचमन करावे। फिर विशेषार्घ्य देकर मन्त्र जपे और भगवान्के वरदायक हाथमें उस जपको अर्पित करनेके पश्चात् इस प्रकार कहे- 'हे नाथ! जबतक चन्द्रमा, सूर्य और तारोंकी स्थिति रहे, तबतक मूर्तीशों तथा मूर्तिपालकोंके साथ आप स्वेच्छापूर्वक ही इस मन्दिरमें सदा स्थित रहें। ऐसा कहकर प्रणाम करनेके पश्चात् बाहर जाय और हृदय या प्रणव मन्त्रसे वृषभ (नन्दिकेश्वर) की स्थापना करके, - फिर पूर्ववत् बलि निवेदन करे। तत्पश्चात् न्यूनता आदि दोषके निराकरणके लिये मृत्युञ्जय मन्त्रसे सौ बार समिधाओंकी आहुति दे एवं शान्तिके लिये खीरसे होम करे ॥ ४०-४४॥
इसके बाद यों प्रार्थना करे- 'महाविभो ! ज्ञान अथवा अज्ञानपूर्वक कर्ममें जो त्रुटि रह गयी है, उसे आप पूर्ण करें। यों कहकर यथाशक्ति सुवर्ण, पशु एवं भूमि आदि सम्पत्ति तथा गीत वाद्य आदि उत्सव, सर्वकारणभूत अम्बिकानाथ शिवको भक्तिपूर्वक समर्पित करे। तदनन्तर चार दिनोंतक लगातार दान एवं महान् उत्सव करे। मन्त्रज्ञ आचार्यको चाहिये कि उत्सवके इन चार दिनोंमेंसे तीन दिनोंतक तीनों समय मूर्तिपालकोंके साथ होम करे और चौथे दिन पूर्णाहुति देकर, बहुरूप सम्बन्धी मन्त्रसे चरु निवेदित करे। सभी कुण्डोंमें सम्पाताहुतिसे शोधित चरु अर्पित करना चाहिये। उक्त चार दिनोंतक निर्माल्य न हटावे। चौथे दिनके बाद निर्माल्य हटाकर, स्नान करानेके पश्चात् पूजन करे। सामान्य लिङ्गों में साधारण मन्त्रोंद्वारा पूजा करनी चाहिये । लिङ्ग-चैतन्यको छोड़कर स्थाणु विसर्जन करे। आसाधारण लिङ्गों में 'क्षमस्व' इत्यादि कहकर विसर्जन करे ।। ४५-५० ।।
आवाहन, अभिव्यक्ति, विसर्ग, शक्तिरूपता और प्रतिष्ठा- ये पाँच बातें मुख्य हैं। कहीं-कहीं प्रतिष्ठाके अन्तमें स्थिरता आदि गुणोंकी सिद्धि के लिये सात आहुतियाँ देनेका विधान है। भगवान् शिव स्थिर, अप्रमेय, अनादि, बोधस्वरूप, नित्य, सर्वव्यापी, अविनाशी एवं आत्मतृप्त हैं। महेश्वरकी संनिधि या उपस्थितिके लिये ये गुण कहे गये हैं। आहुतियोंका क्रम इस प्रकार है- 'ॐ नमः शिवाय स्थिरो भव नमः स्वाहा।'– इत्यादि । इस प्रकार इस कार्यका सम्पादन करके शिव कलशकी भाँति दो कलश और तैयार करे । उनमें से एक कलशके जलसे भगवान् शिवको स्नान कराकर, दूसरा यजमानके स्नानके लिये रखे। (कहीं-कहीं 'कर्मस्थानाय धारयेत् ।' ऐसा पाठ है। इसके अनुसार दूसरे कलशका जल कर्मानुष्ठानके लिये स्थापित करे, यह अर्थ समझना चाहिये ।) इसके बाद बलि देकर आचमन करनेके पश्चात् शिवकी आज्ञासे बाहर जाय ॥ ५१-५५ ॥
याग मण्डपके बाहर मन्दिरके ईशानकोणमें चण्डका स्थापन-पूजन करे। फिर मण्डपमें धामके गर्भके बराबर उत्तम पीठपर आसनकी कल्पना करके, पूर्ववत् न्यास, होम, आदिका अनुष्ठान करे। फिर ध्यानपूर्वक 'सद्योजात' आदिकी स्थापना करके, वहाँ ब्रह्माङ्गोंद्वारा विधिवत् पूजन करे। ब्रह्माङ्गोंका वर्णन पहले किया जा चुका है। अब जिस प्रकार मन्त्रद्वारा पूजन किया जाता है, उसे सुनो — ॐ वं सद्योजाताय हूं फट् नमः । ॐ - विं वामदेवाय हूं फट् नमः । ॐ वुं अघोराय हूं फट् नमः ।' इस प्रकार 'ॐ वें तत्पुरुषाय हूं फट् नमः'। तथा 'ॐ वों ईशानाय हूं फट् नमः । - ये मन्त्र हैं ( इन मन्त्रोंके विषयमें पाठभेद मिलता है। सोमशम्भुकी 'कर्मकाण्ड क्रमावली में ये मन्त्र इस प्रकार दिये गये हैं—'ॐ चैं सद्योजाताय हूं फट् नमः । ॐ चैं तत्पुरुषाय हूं फट् नमः । 'ॐ चों प्रशमनाय हूं फट् नमः ।') ॥५६ - ५९ ॥
इस प्रकार जप निवेदन करके, तर्पण करने के पश्चात् स्तुतिपूर्वक विज्ञापना देकर चण्डेशसे प्रार्थना करे – 'हे चण्डेश! जबतक श्रीमहादेवजी - यहाँ विराजमान हैं, तबतक तुम भी इसके समीप विद्यमान रहो। मैंने अज्ञानवश जो कुछ भी न्यूनाधिक कर्म किया है, वह सब तुम्हारे कृपाप्रसादसे पूर्ण हो जाय तुम स्वयं उसे पूर्ण करो।' जहाँ बाणलिङ्ग (नर्मदेश्वर) हो, जहाँ चल लोहमय (सुवर्णमय) लिङ्ग हो, जहाँ सिद्धलिङ्ग (ज्योतिर्लिङ्गादि) तथा स्वयम्भूलिङ्ग हों, वहाँ और सब प्रकारकी प्रतिमाओंपर चढ़े हुए निर्माल्यमें चण्डेशका अधिकार नहीं होता है। अद्वैतभावनायुक्त यजमानपर तथा स्थण्डिलेश विधिमें भी चण्डेशका अधिकार नहीं है ( बाणलिङ्गे चले लोहे सिद्धलिङ्गे स्वयम्भुवि । प्रतिमासु च सर्वासु न चण्डोऽधिकृतो भवेत्। अद्वैतभावनायुक्ते स्थण्डिलेशविधावपि ॥ (अग्नि० ९७ ६२-६३))। चण्डका पूजन करके स्रापक (अभिषेक करनेवाला गुरु) स्वयं ही पत्नी और पुत्रसहित यजमानको पूर्व स्थापित कलशके जलसे स्नान करावे। - यजमान भी स्रापक गुरुका महेश्वरकी भाँति पूजन करके, धनकी कंजूसी छोड़कर, उन्हें भूमि और सुवर्ण आदिकी दक्षिणा दे ॥ ६० - ६४३ ॥
तत्पश्चात् मूर्तिपालकों तथा जपकर्ता ब्राह्मणोंका, ज्योतिषीका और शिल्पीका भी भलीभाँति विधिवत् पूजन करके दीनों और अनाथों आदिको भोजन करावे। इसके बाद यजमान गुरुसे इस प्रकार प्रार्थना करे- 'हे भगवन् ! यहाँ सम्मुख करनेके लिये मैंने आपको जो कष्ट दिया है, वह सब आप क्षमा करें; क्योंकि नाथ! आप करुणाके सागर हैं, अतः मेरा सारा अपराध भूल जायँ।' इस प्रकार प्रार्थना करनेवाले यजमानको सद्गुरु अपने हाथसे कुश, पुष्प और अक्षतपुञ्जके साथ प्रतिष्ठाजनित पुण्यकी सत्ता समर्पित करे, जिसका स्वरूप चमकते हुए तारोंके समान दीप्तिमान् है ॥ ६५-६८ ॥तदनन्तर, पाशुपत मन्त्रका जप करके, परमेश्वरको प्रणाम करनेके अनन्तर, भूतगणोंको बलि अर्पित करे और इस प्रकार उन सबको समीप लाकर यों निवेदन करे- 'आपलोगोंको तबतक यहाँ स्थित रहना चाहिये, जबतक महादेवजी यहाँ विराजमान हैं।' वस्त्र आदिसे युक्त याग मण्डपको गुरु अपने अधिकारमें ले ले तथा समस्त उपकरणोंसे युक्त स्नापन-मण्डपको शिल्पी ग्रहण करे। अन्य देवता आदिकी आगमोक्त मन्त्रों द्वारा स्थापना करनी चाहिये। सूर्यके वर्णभेदके अनुसार उन देवता आदिके वर्णभेद समझने चाहिये। वे अपने तैजस तत्त्वमें व्याप्त हैं- ऐसी भावना करनी चाहिये। साध्य आदि देवता, सरिताएँ, ओषधियाँ, क्षेत्रपाल और किंनर आदि- ये सब पृथ्वीतत्त्वके आश्रित हैं। कहीं-कहीं सरस्वती, लक्ष्मी और नदियोंका स्थान जलमें बताया गया है ॥ ६९-७३ ।।
भुवनाधिपतियों का स्थान वही है, जहाँ उनकी स्थिति है। अहंकार, बुद्धि और प्रकृति- ये तीन तत्त्व ब्रह्माके स्थान हैं। तन्मात्रासे लेकर प्रधान पर्यन्त तीन तत्त्व श्रीहरिके स्थान हैं। नाट्येश, गण, मातृका, यक्षराज, कार्तिकेय तथा गणेशका अण्डजादि शुद्ध विद्यान्त तत्त्व है। मायांश देशसे लेकर शक्ति- पर्यन्त तत्त्व शिवा, शिव तथा उग्रतेजवाले सूर्यदेवका स्थान है। व्यक्त प्रतिमाओं के लिये ईश्वर पर्यन्त पद बताया गया है। स्थापनाकी सामग्रीमें जो कूर्म आदिका वर्णन किया गया है तथा जो रत्न आदि पाँच वस्तुएँ कही गयी हैं, उन सबको देवपीठके गर्तमें डाल दे, परंतु पाँच ब्रह्मशिलाओंको उसमें न डाले ॥ ७४-७७९ ॥
मन्दिरके गर्भका छः भागों में विभाजन करके छठे भागको त्याग दे और पाँचवें भागमें देवताकी स्थापना करे। अथवा मन्दिरके गर्भका आठ भाग करके सातवें भागमें प्रतिमाओंकी स्थापना करे तो वह सुखावह होता है। लेप अथवा चित्रमय विग्रहकी स्थापनामें पञ्चभूतोंकी धारणाओंद्वारा विशुद्धि होती है। वहाँ स्नान आदि कार्य जलसे नहीं, मानसिक किये जाते हैं। वैसे विग्रहोंको शिला एवं रत्न आदिके भवनमें रखना चाहिये। उनमें नेत्रोन्मीलन तथा आसन आदिकी कल्पना अभीष्ट है। इनकी पूजा जलरहित पुष्पोंसे करनी चाहिये, जिससे चित्र दूषित न हो ॥ ७८- ८१ ॥
अब चल लिङ्गोंके लिये स्थापनाकी विधि बतायी जाती है। गर्भस्थानके पाँच अथवा तीन भाग करके एक भागको छोड़ दे और तीसरे या दूसरे भागमें चल लिङ्गकी स्थापना करे। इसी प्रकार उनके पीठोंके लिये भी करना चाहिये। लिङ्गों में तत्त्वभेदसे पूजनकी प्रक्रियामें भेद होता है। स्फटिक आदिके लिङ्गों में इष्टमन्त्रसे (अथवा सृष्टि मन्त्रसे) विधिवत् संस्कार होना चाहिये। इसके सिवा वहाँ ब्रह्मशिला एवं रत्नप्रभूतिका निवेदन अपेक्षित नहीं है ॥ ८२-८४ ॥
पिण्डिकाकी योजना भी मनसे ही कर लेनी चाहिये। स्वयम्भूलिङ्ग और बाणलिङ्ग आदिमें संस्कारका नियम नहीं है।(पाठान्तरके अनुसार वहाँ पीठके ही संस्कारका नियम है, लिङ्गका नहीं।)उन लिङ्गोंको संहिता मन्त्रोंसे स्नान कराना चाहिये। वैदिक विधिसे ही उनके लिये न्यास और होम करना चाहिये। नदी, समुद्र तथा रोह– इनके स्थापन करानेका विधान पूर्ववत् है ।। ८५-८६ ।।
इहलोकमें जो मृत्तिका आदिके अथवा आटे आदिके शिवलिङ्गका पूजन किया जाता है, वह तात्कालिक होता है। अर्थात् पूजन-कालमें ही लिङ्ग निर्माण करके वीक्षणादि विधानसे उनकी शुद्धि करे। तत्पश्चात् विधिवत् पूजन करना चाहिये। पूजनके पश्चात् मन्त्रोंको लेकर अपने आपमें स्थापित करे और उस लिङ्गको जलमें डाल दे। एक वर्षतक ऐसा करनेसे वह लिङ्ग - और उसका पूजन मनोवाञ्छित फल देनेवाला होता है। विष्णु आदि देवताओंकी स्थापनाके मन्त्र अलग हैं। उन्हींके द्वारा उनकी स्थापना करनी चाहिये । ॥ ८७-८९ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'शिव-प्रतिष्ठाकी विधिका वर्णन' नामक सत्तानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९७ ॥
Summary of chapter 98 of the Agni Mahā Purana is as follows:
The ninety-eighth chapter provides the installation procedure for the image of Devī Gaurī — the bright, auspicious consort of Śiva. The procedure follows the general template established for Śivaliṅga installation but with the specific mantras, dhyāna, and nyāsa appropriate to the Goddess. The ātma-tattva, vidyā-tattva, and śiva-tattva are established in the image with their respective mantras, and the parāśakti — the supreme power of the Goddess — is invoked into the form. The pīṭha is identified as the seat of kriyāśakti and the vigraha (image) as the dwelling of jñānaśakti, with the sarvavyāpinī (all-pervading) śakti invoked through the āvāhana-mantra. The complete Gaurī pūjā mantra sequence — from "Oṃ Ādhāraśaktaye namaḥ" through the pīṭha-śaktis, the nāla, the eight petals, the Gaurī mūlamantra ("Oṃ Hrīṃ Sauḥ Mahāgauri rudradayite svāhā"), and the aṅga-mantras — is given in full, establishing a complete, usable pūjā protocol.