अग्नि महा पुराण

314- त्वरिताके पूजन तथा प्रयोगका विज्ञान

निग्रहयन्त्र

अग्निदेव कहते हैं-

मुने! 'ॐ ह्रीं ह्रूं खे च च्छे क्षः स्त्री हूं क्षे ह्रीं फट् त्वरितायै नमः । - इस मन्त्रसे न्यासपूर्वक त्वरितादेवीकी पूजा करे । उनके द्विभुज या अष्टभुज रूपका ध्यान करे । आधारशक्ति तथा अष्टदल कमलका पूजन करे । सिंहासन और उसके ऊपर विराजित त्वरितादेवीकी तथा उनके चारों ओर हृदयादि अङ्गोंकी पूजा करे ('सारसंग्रह' तथा ' श्रीविद्यार्णवतन्त्र' आदिमें जो मन्त्रोद्धार किया गया है, उससे उपर्युक्त द्वादशाक्षर बीज ही त्वरिता विद्याके नामसे प्रसिद्ध होते हैं। अग्रिपुराणकी आजकलकी छपी प्रतियोंमें मन्त्रका शुद्ध रूप नहीं रह गया है, अतः तन्त्रान्तरसे मिलाकर ही शुद्ध रूपका यहाँ ग्रहण किया गया है। न्यासकी विधि पहले बता चुके हैं, अतः यहाँ संकेतमात्र किया गया है। तन्त्रोंमें देवीके द्विभुज, अष्टभुज तथा अष्टादशभुज रूप भी वर्णित हुए हैं। यहाँ मूलमें द्विभुज तथा अष्टभुज रूपकी ओर संकेत है। आधारशक्ति आदिका पूजन भी पूर्ववत् समझना चाहिये। सिंहासनका मन्त्र इस प्रकार है- 'क्षं हुं हुं वज्रदेह मुरु मुरु क्षिं गुल गुल गर्ज गर्ज हं हुं क्षां पञ्चाननाय नमः।' एक एक अक्षरका उद्धार करके यह मन्त्रस्वरूप निश्चित हुआ है, अतः इसीको शुद्ध मानकर अन्यत्रके विकृत पाठको भी शुद्ध किया जा सकता है। यहाँ कही हुई अधिकांश बातें पिछले तीन सौ नवें अध्यायमें आ गयी हैं।') । पूर्वादि दिशाओं में हृदयादि अङ्गोंकी पूजा करके मण्डलमें प्रणीता तथा गायत्रीकी पूजा करे। (देवीके अग्रभागके केसरसे लेकर प्रदक्षिणक्रमसे छः केसरोंमें छः अङ्गोंका पूजन करके अवशिष्ट दोमें प्रणीता तथा गायत्रीका पूजन करना चाहिये। ) इसके बाद आठ दलोंमें हुंकारी, खेचरी, चण्डा, छेदिनी, क्षेपिणी, स्त्री, हूंकारी तथा क्षेमंकरीकी पूजा करे। फिर मध्यभागमें देवीके सामने फट्कारीकी अर्चना करे। देवीके सम्मुखवर्ती द्वारके दक्षिण तथा वामपार्श्वमें जया एवं विजयाकी पूजा करके द्वाराग्रभागमें 'किंकराय रक्ष रक्ष त्वरिताज्ञया स्थिरो भव हुं फट् किंकराय नमः।' इस मन्त्रसे किंकरका पूजन करना चाहिये ॥ १४ ॥

त्वरिता मन्त्रसे तिलोंद्वारा होम करने से सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुओंकी प्राप्ति होती है। नामोच्चारणपूर्वक देवीके आभूषणस्वरूप आठ नागोंकी पूजा करनी चाहिये। यथा - अनन्ताय नमः स्वाहा । कुलिकाय नमः स्वधा । वासुकिराजाय स्वाहा । शङ्खपालाय वौषट् । तक्षकाय वषट् । महापद्माय नमः । कर्कोटनागाय स्वाहा । पद्माय नमः फट् ('नारायणीय तन्त्र' में ब्राह्मण-नागोंको कुण्डलोंके स्थानमें चिन्तनीय बताया है, क्षत्रिय-नाग दोनों भुजाओंमें केयूरका काम करते हैं, - वैश्य- नाग कटिबन्ध (करधनी) की आवश्यकता पूर्ण करते हैं तथा शूद्र-नाग दोनों पैरोंमें नूपुर बनकर शोभा बढ़ाते हैं। इनका ध्यान इस प्रकार करना चाहिये – 'अनन्त और कुलिक ब्राह्मण-नाग हैं। इनका वर्ण अग्रिके समान तेजस्वी है। ये दोनों नाग सहस्र-सहस्र फणोंसे - समलंकृत हैं। वासुकि और शङ्खपाल क्षत्रिय हैं। इनकी अङ्गकान्ति पीली है। ये दोनों सात-सात सौ फण धारण करते हैं। तक्षक और महापद्म वैश्य-नाग हैं। इनका रंग नीला है। इन दोनोंने पाँच-पाँच सौ फण धारण कर रखे हैं। पद्म तथा कर्कोटक शूद्र-नाग हैं। इनकी अङ्गकान्ति श्वेत है तथा ये तीन-तीन सौ फण धारण करते हैं। त्वरितादेवीके वामहस्तमें वरदमुद्रा और दाहिने हाथमें अभयमुद्रा शोभा पाती है।')॥ ५-६३ ॥

निग्रहयन्त्र

दस खड़ी रेखाएँ खींचकर उनपर दस पड़ी रेखाएँ खींचे तो इक्यासी पद (कोष्ठ) बन जाते हैं। इन पदोंद्वारा 'निग्रहचक्र' का निर्माण करे। यह चक्र वस्त्रपर, वेदीपर, वृक्षके तनेपर, शिलापट्टपर तथा यष्टिकाओंपर भी लिखा जा सकता है। इसके मध्यवर्ती कोष्ठमें साध्य (शत्रु आदि) का नाम लिखे (उस नामको दो 'रं' बीजोंद्वारा आवेष्टित कर दे। अर्थात् दो "रं" बीजों के बीचमें 'साध्य नाम' लिखना चाहिये ।) उसके पार्श्वभागकी पूर्वादि दिशाओंकी चार पट्टिकाओंमें 'धूं धूं छूं हूं'– इन चार बीजोंको लिखे। फिर ईशान आदि कोणोंमें भीतरकी ओर 'कालरात्रि मन्त्र' (काली-अनुष्टुभ सर्वतोभद्र) - लिखे तथा बाहरकी ओर 'यमराज मन्त्र' (यम आनुष्टुभ ) का उल्लेख करे। (यदि साध्य-व्यक्ति पुरुष है, तब तो यही क्रम ठीक है। यदि वह स्त्री हो तो उसपर निग्रहके लिये भीतरकी ओर 'यम आनुष्टुभ' मन्त्र लिखा जाय और बाहरकी - ओर 'काली-अनुष्टुभ' मन्त्रका उल्लेख किया जाय – यह ' श्रीविद्यार्णवतन्त्र में विशेष बात कही गयी है) ॥ ७–९ ॥

काली आनुष्टुभ मन्त्र

का ली मार र मा ली का लीनमोक्षक्षमोनली । मामोदेततदेमोमा रक्षतत्वत्वतक्षर ॥ १० ॥

यम -आनुष्टुभ-मन्त्र

यमावाटटवामाय माटमोटटमोटमा ।

वामोभूरिरिभूमोवा टटरीत्वत्वरीटट ॥ ११ ॥

यम-मन्त्रके बाह्यभागमें चारों ओर 'रं' लिखे, फिर 'रं' के नीचे 'यं' लिखे। इससे 'मारणात्मक निग्रहयन्त्र' सम्पादित होता है। नीमकी गोंद, मज्जा, रक्त तथा विषसे(नमक, ऊसरकी मिट्टी स्रोतका जल, गृहधूम (घरकी कालिख), चित्रक, चिताका कोयला और नीमकी गोंद-इनसे युक्त जो स्याही है, उसे 'विष' कहा गया है।) मिश्रित स्याहीमें थोड़ा चिताका कोयला कूट-पीसकर मिला दे और उसे पिङ्गलवर्णकी दावातमें रखे। फिर कौएके पंखकी कलमसे उक्त 'निग्रह यन्त्र को लिखकर उसे श्मशानभूमिमें या चौराहेपर किसी गड्ढे में नीचेकी ओर गाड़ दे, अथवा बाँबीकी मिट्टीमें उसे डाल दे, अथवा बहेड़ेके वृक्षकी डाली नीचे भूमिमें गाड़ दे। ऐसा करनेसे सभी शत्रुओंका नाश हो जाता है ॥ १२ – १४ ॥

अनुग्रह-चक्र

शुक्लपक्षमें भोजपत्रपर, भूमिपर तथा दीवारपर लाक्षाके रङ्गसे, कुङ्कुमसे अथवा खड़िया मिट्टी के चन्दनसे 'अनुग्रह-चक्र' (श्रीविद्यार्णवतन्त्र' में इस 'अनुग्रह यन्त्र' के लेखनके विषय में इस प्रकार कहा गया है कुङ्कुमैर्लाक्षया वापि लिखितं स्वर्णपट्टके धवले वसने वापि लेखिन्या स्वर्णजातया ॥ सम्पूज्य जपसंसिद्धं स्थापयेद् यत्र तत्र वै। भवेलक्ष्मीरतिस्फीता नीरोगाश्च प्रजास्तथा ॥ गजाश्वपशवस्त्वन्ये प्राणिनः सुखिनो भृशम् भूतप्रेतपिशाचादिपीडासु विभृयादिदम् ॥ अलक्ष्मीशान्तये वश्यसिद्धये सर्वसम्पदे ।

अर्थात् 'रोली अथवा लाक्षा (महावर) के रङ्गसे सोनेके पत्रपर या श्वेत वस्त्रपर सोनेकी ही लेखनीसे इस अनुग्रह यन्त्रको लिखे। लिखकर इसकी पूजा करके त्वरिता-मन्त्र जपद्वारा इसे सिद्ध कर ले जपसिद्ध यन्त्रको जहाँ रखा जायगा, वहाँ अत्यन्त वृद्धिशीला लक्ष्मीका वास होगा। वहाँकी समस्त प्रजाएँ नीरोग होंगी। हाथी, घोड़े तथा अन्य पशु-प्राणी अत्यन्त सुखी होंगे। भूत, प्रेत तथा पिशाच आदिकी बाधा प्राप्त होनेपर इस यन्त्रको धारण करना चाहिये। दरिद्रताकी शान्ति, वशीकरणकी सिद्धि तथा सम्पूर्ण सम्पदाओंकी प्राप्ति के लिये भी इस यन्त्रको धारण करना आवश्यक है।')लिखे (यह 'अनुग्रह चक्र' पूर्वोक्त निग्रह-चक्रकी भाँति इक्यासी पदोंका होना चाहिये।) मध्यकोष्ठमें साध्य व्यक्तिका नाम लिखे। उस नामको 'ठं ठं' के मध्यमें रखे । पूर्वादि वीथीमें 'जूं सः वषट्' का उल्लेख करे । ईशान आदि कोणसे आरम्भ करके वीथीको छोड़ते हुए अग्निकोणपर्यन्त लक्ष्मीका आनुष्टुभ मन्त्र (जो सर्वतोभद्रबन्धमें निबद्ध है) लिखे। यह ऊपरकी चार पङ्क्तियों में पूरा हो जायगा। तत्पश्चात् नीचेकी चार पतियों में सबसे नीचेके नैर्ऋत्यकोणस्थ कोष्ठसे आरम्भ करके दाहिनेसे बायें पार्श्वकी ओर लिखे। निचली पङ्क्तिके बाद ऊपरी पङ्क्तिमें भी बायेंसे दाहिने लिखे। इस तरह चार पङ्क्तियों में वही 'लक्ष्मी-मन्त्र' पूरा लिख दे | वह मन्त्र इस प्रकार है -

'श्री सा मा या या मा सा श्री, सानो या ज्ञे ज्ञे या नो सा मा या ली ला ला ली या मा, या ज्ञे ला ली ली ला ज्ञे या ॥ '

चक्रके बहिर्भागमें चारों ओर त्वरिता मन्त्र लिखे। प्रत्येक दिशामें एक बार इस प्रकार चार बार वह मन्त्र लिखा जायगा। फिर उस चौकोर चक्रको इस प्रकार गोल रेखासे घेर दे, जिससे वह कलशके भीतर हो जाय। उक्त कलशके नीचे एक कमल बनाकर उसीपर उस कमलको स्थापित किया हुआ दिखाये (ऊपरकी ओर कलशके मुखकी-सी आकृति बना दे। दो वृत्ताकार रेखाओंसे कलशकी आकृति स्पष्ट करनी चाहिये। कलशके मुखपर दो आड़ी रेखाएँ खींचकर उन रेखाओंके बीचमें 'नववव'- इस प्रकारकी माला सी बनाकर उस मालासे घटको परिपूरित दिखाये।इस प्रकार इस चक्रका मनोरथपूर्तिके लिये तन्त्र शास्त्रोक्त रीतिसे प्रयोग करे ) ॥ १५ - १८॥

कमलपर स्थापित पद्मचक्र लिखकर उसे धारण किया जाय तो वह मृत्युको जीतनेवाला तथा स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाला है। वह शान्तिके साधनोंमें भी परम शान्तिप्रद है। सौभाग्य आदि देनेवाला है (इस चक्रकी विधि 'श्रीविद्यार्णव तन्त्र' में इस प्रकार दी गयी है-दस दलवाला पद्म बनाकर उसकी कर्णिकामें माया-बीजके उदरमें साध्य नाम लिखकर उसके दलोंमें मूल त्वरिता विद्याके प्रणवादि दस वर्णोंको लिखे। माया बीजके अक्षर छोड़ दे। उस - कमलचक्रके बाह्यभागमें षट्कोण तथा उसके भी बाह्यभागमें चौकोर मण्डल बनावे ।) ॥ १९ ॥

बारह खड़ी रेखाओंपर बारह पड़ी रेखाएँ। खींचकर बराबर-बराबर एक सौ इक्कीस कोष्ठ बनावे। उसके मध्यकोष्ठमें साध्यका नाम लिखे। फिर ईशानकोणवाले कोष्ठसे आरम्भ करके प्रदक्षिणक्रमसे बारह बार त्वरिता विद्याके अक्षर लिखे। मायाबीज (ह्रीं) को छोड़कर ही मन्त्र लिखना चाहिये। रेखाओंके अग्रभागोंपर बारंबार त्रिशूल अङ्कित करे। इस यन्त्रको जपद्वारा सिद्ध कर ले (इस यन्त्रका उल्लेख 'शारदातिलक' के दशम पटलमें उपलब्ध होता है।)। मध्यकोष्ठमें साध्य नामके पहले 'ॐ' तथा अन्तमें 'हूं फट्' जोड़ दे। त्वरिता विद्याके - वर्णोंको क्रमसे ही लिखना चाहिये। अन्तमें नीचेकी ओर 'वषट्' जोड़ देना चाहिये। यह 'प्रत्यङ्गिरा विद्या' कहलाती है, जो सम्पूर्ण मनोरथ एवं प्रयोजनको सिद्ध करनेवाली है ॥ २०-२१ ॥

इक्यासी कोष्ठवाले चक्रमें आदिसे ही वर्णक्रमके अनुसार सम्पूर्ण चक्रों में त्वरिता-विद्याके अक्षर लिखे। छः बार मन्त्र लिखनेके बाद अन्तके शेष कोष्ठों में साध्यका नाम तथा उसके अन्तमें 'वषट् ' लिखे। यह दूसरी 'प्रत्यङ्गिरा-विद्या' है, जो समस्त कार्य आदिकी सिद्धि करनेवाली है। चौंसठ कोष्ठवाले चक्रोंमें भी 'निग्रह-चक्र' और 'अनुग्रह-चक्र' लिखे। वह 'अमृती विद्या' है। उसके मध्यकोष्ठमें 'क्रीं सा हूं' और साध्य नाम लिखे। (पाठान्तरके अनुसार उस चक्रके मध्यभागमें साध्यका नाम तथा नामके उभय पार्श्वमें 'ह्रीं' लिखे।) उसके बाह्यभागमें द्वादशदल कमल बनाकर उसके दलोंमें त्वरिता विद्याको विलोमक्रमसे लिखे। अर्थात् पहले 'फट्' लिखे, फिर पूर्व-पूर्वके अक्षर। फिर उसे ह्रींकारयुक्त तीन वृत्ताकार पङ्क्तियोंसे वेष्टित करे। कुम्भाकार यन्त्रके भीतर लिखित इस विद्याको धारण किया जाय तो यह समस्त शत्रुओं का नाश करनेवाली और सब कुछ देनेवाली होती है। यदि रोगीके कानमें इसका जप किया जाय तो सर्पादि विष भी शान्त हो जाते हैं। यदि इसके अक्षरोंसे अङ्कित (अथवा इस यन्त्रसे अङ्कित) डंडों द्वारा इसके शरीरपर ठोंका जाय तो उससे भी विषका शमन हो जाता है ॥ २२ - २५ ॥

इस प्रकार आदि आग्रेय महापुराणमें 'त्वरिता मन्त्रके प्रयोगोंका वर्णन' नामक तीन सौ चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३१४ ॥