अग्नि महा पुराण

39- विष्णु आदि देवताओंकी स्थापनाके लिये भूपरिग्रहका विधान

भगवान् हयग्रीव कहते हैं-

ब्रह्मन् ! अब मैं विष्णु आदि देवताओंकी प्रतिष्ठाके विषयमें कहूँगा, ध्यान देकर सुनिये इस विषयमें मेरे द्वारा वर्णित पञ्चरात्रों एवं सप्तरात्रोंका ऋषियोंने मानवलोक में प्रचार किया है। वे संख्यामें पच्चीस हैं। ( उनके नाम इस प्रकार हैं-) आदिहयशीर्षतन्त्र, त्रैलोक्यमोहनतन्त्र, वैभवतन्त्र, पुष्करतन्त्र, प्रह्लादतन्त्र, गार्ग्यतन्त्र, गालवतन्त्र, नारदीयतन्त्र, श्रीप्रनतन्त्र, शाण्डिल्यतन्त्र, ईश्वरतन्त्र, सत्यतन्त्र, शौनकतन्त्र, वसिष्ठोक्त ज्ञानसागरतन्त्र, स्वायम्भुवतन्त्र, कापिलतन्त्र, तार्क्ष्य (गारुड) तन्त्र, नारायणीयतन्त्र, आत्रेयतन्त्र, नारसिंहतन्त्र, आनन्दतन्त्र, आरुणतन्त्र, बौधायनतन्त्र, अष्टाङ्गतन्त्र और विश्वतन्त्र ॥ १-५॥

इन तन्त्रों के अनुसार मध्यदेश आदिमें उत्पन्न द्विज देवविग्रहोंकी प्रतिष्ठा करे कच्छदेश, कावेरीतटवर्ती देश, कोंकण, कामरूप, कलिङ्ग, काञ्ची तथा काश्मीर देशमें उत्पन्न ब्राह्मण देवप्रतिष्ठा आदि न करे। आकाश, वायु, तेज, जल एवं पृथ्वी ये पञ्चमहाभूत पञ्चरात्र हैं। जो चेतनाशून्य एवं अज्ञानान्धकारसे आच्छन्न हैं, वे पञ्चरात्रसे रहित हैं। जो मनुष्य यह धारणा करता है कि 'मैं पापमुक्त परब्रह्म विष्णु हूँ'– वह देशिक होता है। वह समस्त बाह्य लक्षणों (वेष आदि) से हीन होनेपर भी तन्त्रवेत्ता आचार्य माना गया है ॥ ६-८३ ॥

देवताओंकी नगराभिमुख स्थापना करनी चाहिये । नगरकी ओर उनका पृष्ठभाग नहीं होना चाहिये। कुरुक्षेत्र, गया आदि तीर्थस्थानों में अथवा नदीके समीप देवालयका निर्माण कराना चाहिये। ब्रह्माका मन्दिर नगरके मध्यमें तथा इन्द्रका पूर्व दिशामें उत्तम माना गया है। अग्निदेव तथा मातृकाओंका आग्रेयकोणमें, भूतगण और यमराजका दक्षिणमें, चण्डिका, पितृगण एवं दैत्यादिका मन्दिर नैर्ऋत्य कोणमें बनवाना चाहिये। वरुणका पश्चिममें, वायुदेव और नागका वायव्यकोणमें, यक्ष या कुबेरका उत्तर दिशामें, चण्डीश महेशका ईशानकोणमें और विष्णुका मन्दिर सभी ओर बनवाना श्रेष्ठ है। ज्ञानवान् मनुष्यको पूर्ववर्ती देव मन्दिरको संकुचित करके अल्प, समान या विशाल मन्दिर नहीं बनवाना चाहिये ॥ ९–१३३ ॥

(किसी देव मन्दिरके समीप मन्दिर बनवानेपर) दोनों मन्दिरोंकी ऊँचाईके बराबर दुगुनी सीमा छोड़कर नवीन देव प्रासादका निर्माण करावे। विद्वान् व्यक्ति दोनों मन्दिरोंको पीडित न करे । भूमिका शोधन करनेके बाद भूमि परिग्रह करे । तदनन्तर प्राकारकी सीमातक माष, हरिद्राचूर्ण, खील, दधि और सक्तुसे भूतबलि प्रदान करे। फिर अष्टाक्षरमन्त्र पढ़कर आठों दिशाओं में सक्नु बिखेरते हुए कहे – 'इस भूमिखण्डपर जो राक्षस एवं पिशाच आदि निवास करते हों, वे सब यहाँसे चले जायँ। मैं यहाँपर श्रीहरिके लिये मन्दिरका निर्माण करूँगा (राक्षसाक्ष पिशाचाच येऽस्मिस्तिष्ठन्ति भूतले सर्वे ते व्यपगच्छन्तु स्थानं कुर्यामहं हरेः॥)। फिर भूमिको हलसे | जुतवाकर गोचारण करावे आठ परमाणुका 'रथरेणु' माना गया है। आठ रथरेणुका 'त्रसरेणु' माना जाता है। आठ त्रसरेणुका 'बालाग्र' तथा आठ बालाग्रकी 'लिक्षा' कही जाती है। आठ लिक्षाकी 'यूका,' आठ यूकाका 'यवमध्यम', आठ यवका 'अङ्गुल, ,' चौबीस अङ्गलका 'कर' और अट्ठाईस अङ्गुलका 'पद्महस्त' होता है ( श्रीविद्यार्णवतन्त्र में यह मान इस प्रकार दिया गया है वातायनपथं प्राप्य ये भान्ति रविरश्मयः । तेषु सूक्ष्मा परमाणोरष्टगुणस्त्रसरेणुरुदाहृतः तदष्टकं विसर्पन्ते रेणवस्त्रसरेणवः ॥ । वेष्टी केशायास्तेऽष्टी लिक्षा यूकास्तदष्टकम् ॥ वस्तेऽष्टावलिः समुदाहृता सा तूतमाङ्गुलि सतयवा सैव तु मध्यमा ॥ षयवा साधमा प्रोक्ता मानाङ्गुलमितीरितम्॥ (१२।१-४))॥ १४ – २१ ॥

इस प्रकार आदि आग्रेय महापुराणमें विष्णु आदि देवताओंकी स्थापना के लिये 'भूपरिग्रहका वर्णन' नामक उन्तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३९ ॥