नारदजी कहते हैं –
महर्षियो! अब मैं आचार्यक अभिषेकका वर्णन करूँगा, जिसे पुत्र अथवा पुत्रोपम श्रद्धालु शिष्य सम्पादित कर सकता है। इस अभिषेकसे साधक सिद्धिका भागी होता है और रोगी रोगसे मुक्त' जाता है। राजाको राज्य और स्त्रीको पुत्रकी प्राप्ति होती है। इससे अन्तःकरणके मलका नाश होता है। मिट्टी के बहुत से घड़ोंमें उत्तम रत्न रखकर एक स्थानपर स्थापित करे। पहले एक घड़ा बीचमें रखे; फिर उसके चारों ओर घट स्थापित करे। इस तरह एक सहस्र या एक सौ आवृत्तिमें उन सबकी स्थापना करे। फिर मण्डपके भीतर कमलाकार तत्पश्चात् ज्ञानेन्द्रियोंका, तन्मात्राओंका, मन, बुद्धि एवं अहंकारका तथा लिङ्गात्माका शोधन करके सबके अन्तमें पुनः प्रकृतिकी शुद्धि करे। शुद्ध हुआ प्राकृत पुरुष ईश्वरीय धाममें प्रतिष्ठित है। उसने सम्पूर्ण भोगोंका अनुभव कर लिया है और अब वह मुक्तिपदमें स्थित है। इस प्रकार ध्यान करे और पूर्णाहुति दे। यह अधिकार प्रदान करनेवाली दीक्षा है। पूर्वोक्त मन्त्रके अङ्गद्वारा आराधना करके, तत्त्वसमूहको समभाव (प्रकृत्यवस्था) में पहुँचाकर, क्रमश: इसी रीतिसे शोधन करके, अन्तमें साधक अपनेको सम्पूर्ण सिद्धियोंसे युक्त परमात्मरूपसे स्थित अनुभव करते हुए पूर्णाहुति दे यह साधकविषयक दीक्षा कही गयी है। यदि यज्ञोपयोगी द्रव्यका सम्पादन ( संग्रह ) न हो सके, अथवा अपनेमें असमर्थता हो तो समस्त उपकरणोंसहित श्रेष्ठ गुरु पूर्ववत् इष्टदेवका पूजन करके, तत्काल उन्हें अधिवासित करके, द्वादशी तिथिमें शिष्यको दीक्षा दे दे जो गुरुभक्त, विनयशील एवं समस्त शारीरिक सद्गुणोंसे सम्पन्न हो, ऐसा शिष्य यदि अधिक धनवान् न हो तो वेदीपर इष्टदेवका पूजनमात्र करके दीक्षा ग्रहण करे। आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक, सम्पूर्ण अध्वाका सृष्टिक्रमसे शिष्यके शरीरमें चिन्तन करके, गुरु पहले बारी-बारीसे आठ आहुतियोंद्वारा एक एककी तृप्ति करनेके पश्चात्, सृष्टिमान् हो, वासुदेव आदि विग्रहोंका उनके निज-निज मन्त्रोंद्वारा पूजन मण्डलमें पूर्व और ईशानकोणके मध्यभागमें पीठ या सिंहासनपर भगवान् विष्णुको स्थापित करके पुत्र एवं साधक आदिका सकलीकरण करे। तदनन्तर शिष्य या पुत्र भगवत्पूजनपूर्वक गुरुकी अर्चना करके उन कलशोंके जलसे उनका अभिषेक करे। उस समय गीत वाद्यका उत्सव होता रहे। फिर योगपीठ आदि गुरुको अर्पित कर दे और प्रार्थना करे- 'गुरुदेव! आप हम सब मनुष्योंको कृपापूर्वक अनुगृहीत करें।' गुरु भी उनको समय-दीक्षाके अनुकूल आचारका उपदेश दे इससे गुरु और साधक भी सम्पूर्ण मनोरथोंके भागी होते हैं ॥ १-५ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें ‘आचार्य अभिषेकको विधिका वर्णन' नामक अट्ठाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २८ ॥
Summary of chapter 29 of the Agni Mahā Purana is as follows:
The twenty-ninth chapter details the ritual of tarpaṇa — the offering of water mixed with sesame seeds and kuśa grass — to the pitṛ-s, one's ancestral spirits. The Purāṇa identifies three classes of pitṛ-s (divine, semi-divine, and human) and prescribes specific mantras for each. The proper time (midday), direction (facing south), and posture (water poured through the finger-spaces) are specified. The sacred months of Āśvina (Pitṛ Pakṣa — the fortnight of ancestors) receives special attention, with rules for Mahālaya śrāddha enumerated. The chapter also describes what becomes of the ancestral souls when tarpaṇa is properly performed — they receive sustenance in their respective realms and shower blessings of long life, prosperity, and progeny upon their descendants.