अग्नि महा पुराण

77- घरकी कपिला गाय, चूल्हा, चक्की, ओखली मूसल, झाडू और खंभे आदिका पूजन एवं प्राणाग्निहोत्रकी विधि

भगवान् महेश्वर कहते हैं-

स्कन्द ! अब कपिलापूजनके विषयमें कहूँगा। निम्नाङ्कित मन्त्रोंसे गोमाताका पूजन करे – 'ॐ कपिले नन्दे नमः । ॐ कपिले भद्रिके नमः । ॐ कपिले सुशीले नमः । ॐ कपिले सुरभिप्रभे नमः । ॐ कपिले सुमनसे नमः । ॐ कपिले भुक्तिमुक्तिप्रदे नमः।(इन मन्त्रोंका भावार्थ इस प्रकार है- आनन्ददायिनी, कल्याणकारिणी, उत्तम स्वभाववाली, सुरभिकी-सी मनोहर कान्तिवाली, शुद्ध हृदयवाली तथा भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाली कपिले! तुम्हें बार-बार नमस्कार है।)

इस प्रकार गोमातासे प्रार्थना करे- 'देवताओंको अमृत प्रदान करनेवाली, वरदायिनी, जगन्माता सौरभेयि ! यह ग्रास ग्रहण करो और मुझे मनोवाञ्छित वस्तु दो। कपिले! ब्रह्मर्षि वसिष्ठ तथा बुद्धिमान् विश्वामित्रने भी तुम्हारी वन्दना की है। मैंने जो दुष्कर्म किया हो, मेरा वह सारा पाप तुम हर लो। गौएँ सदा मेरे आगे रहें, गौएँ मेरे पीछे भी रहें, गौएँ मेरे हृदयमें निवास करें और मैं सदा गौओंके बीच निवास करूँ। गोमातः ! मेरे दिये हुए इस ग्रासको ग्रहण करो।'

गोमाताके पास इस प्रकार बारंबार प्रार्थना करनेवाला पुरुष निर्मल (पापरहित) एवं शिव स्वरूप हो जाता है। विद्या पढ़नेवाले मनुष्यको चाहिये कि प्रतिदिन अपने विद्या-ग्रन्थोंका पूजन करके गुरुके चरणोंमें प्रणाम करे। गृहस्थ पुरुष नित्य मध्याह्नकालमें स्नान करके अष्टपुष्पिका (आठ फूलोंवाली) पूजाकी विधिसे भगवान् शिवका पूजन करे। योगपीठ, उसपर स्थापित शिवकी मूर्ति तथा भगवान् शिवके जानु, पैर, हाथ, उर, सिर, वाक्, दृष्टि और बुद्धि – इन - आठ अङ्गोंकी पूजा ही अष्टपुष्पिका पूजा' कहलाती है (आठ अङ्ग ही आठ फूल हैं) । मध्याह्नकालमें सुन्दर रीतिसे लिपे-पुते हुए रसोईघरमें पका पकाया भोजन ले आवे। फिर 'त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् । उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात् ॥' वौषट् ॥ (शु० यजु० ३।६०) इस प्रकार अन्तमें 'वौषट्' पदसे युक्त मृत्युञ्जय मन्त्रका सात बार जप करके कुशयुक्त शङ्खमें रखे हुए जलकी बूँदोंसे उस अन्नको सींचे। तत्पश्चात् सारी रसोईसे अग्राशन निकालकर भगवान् शिवको निवेदन करे ॥ १- ९ ॥

इसके बाद आधे अन्नको चुल्लिका होमका - कार्य सम्पन्न करनेके लिये रखे। विधिपूर्वक चूल्हेकी शुद्धि करके उसकी आगमें पूरक प्राणायामपूर्वक एक आहुति दे। फिर नाभिगत अग्नि- जठरानलके उद्देश्यसे एक आहुति देकर रेचक प्राणायामपूर्वक भीतरसे निकलती हुई  वायुके साथ अग्निबीज (रं) को लेकर क्रमशः 'क' आदि अक्षरोंके उच्चारणस्थान कण्ठ आदिके मार्गसे बाहर करके 'तुम शिवस्वरूप अग्नि हो' ऐसा चिन्तन करते हुए उसे चूल्हेकी आगमें भावनाद्वारा समाविष्ट कर दे। इसके बाद चूल्हेकी पूर्वादि दिशाओंमें ॐ हां अग्नये नमः । ॐ हां सोमाय नमः । ॐ हां सूर्याय नमः । ॐ हां बृहस्पतये नमः । ॐ हां प्रजापतये नमः । ॐ हां सर्वेभ्यो देवेभ्यो नमः । ॐ हां सर्वविश्वेभ्यो नमः । ॐ हां अग्नये स्विष्टकृते नमः । - इन आठ मन्त्रोंद्वारा अग्नि आदि आठ देवताओंकी पूजा करे । फिर इन मन्त्रों के अन्तमें 'स्वाहा' पद जोड़कर एक-एक आहुति दे और अपराधोंके लिये क्षमा माँगकर उन सबका विसर्जन कर दे ॥ १० - १४ ॥

चूल्हेके दाहिने बगलमें 'धर्माय नमः ।' इस मन्त्रसे धर्मकी तथा बायें बगलमें 'अधर्माय नमः । इस मन्त्रसे अधर्मकी पूजा करे। फिर काँजी आदि रखनेके जो पात्र हों, उनमें तथा जलके आश्रयभूत घट आदिमें 'रसपरिवर्तमानाय वरुणाय नमः । इस मन्त्रसे वरुणकी पूजा करे । रसोईघरके द्वारपर 'विघ्नराजाय नमः ।' से विघ्नराजकी तथा 'सुभगायै नमः ।' से चक्कीमें सुभगाकी पूजा करे ॥ १५-१६ ॥ ओखलीमें 'ॐ रौद्रिके गिरिके नमः ।' इस मन्त्रसे रौद्रिका तथा गिरिकाकी पूजा करनी चाहिये। मूसलमें 'बलप्रियायायुधाय नमः ।' इस मन्त्रसे बलभद्रजीके आयुधका पूजन करे। झाडूमें भी उक्त दो देवियों (रौद्रिका और गिरिका) - की, शय्यामें कामदेवकी तथा मझले खम्भेमें स्कन्दकी पूजा करे। बेटा स्कन्द ! तत्पश्चात् व्रतका पालन करनेवाला साधक एवं पुरोहित वास्तु देवताको बलि देकर सोनेके थालमें अथवा पुरइनके पत्ते आदिमें मौनभावसे भोजन करे। भोजनपात्रके रूपमें उपयोग करनेके लिये बरगद, पीपल, मदार, रेंड, साखू और भिलावेके पत्तोंको त्याग देना चाहिये - इन्हें काममें नहीं लाना चाहिये। पहले आचमन करके, 'प्रणवयुक्त प्राण' आदि शब्दोंके अन्तमें 'स्वाहा' बोलकर अन्नकी पाँच आहुतियाँ देकर जठरानलको उद्दीप्त करने के पश्चात् भोजन करना चाहिये। इसका क्रम यों है - नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त और धनंजय - ये पाँच उपवायु हैं। 'एतेभ्यो नागादिभ्य उपवायुभ्यः

स्वाहा।' इस मन्त्रसे आचमन करके, भात आदि भोजन निवेदन करके, अन्तमें फिर आचमन करे और कहे – 'ॐ अमृतोपस्तरणमसि स्वाहा।' इसके बाद पाँच प्राणोंको एक-एक ग्रासकी आहुतियाँ अपने मुखमें दे - (१) ॐ प्राणाय स्वाहा । (२) ॐ अपानाय स्वाहा । (३) ॐ व्यानाय स्वाहा । (४) ॐ समानाय स्वाहा । (५) ॐ उदानाय स्वाहा (अग्निपुराणके मूलमें व्यान-वायुकी आहुति अन्तमें बतायी गयी है; परंतु गृह्यसूत्रों में इसका तीसरा स्थान है इसलिये वही क्रम अर्थमें रखा गया है।) तत्पश्चात् पूर्ण भोजन करके पुनः चूल्लूभर पानीसे आचमन करे और कहे- 'ॐ अमृतापिधानमसि स्वाहा।' यह आचमन शरीरके भीतर पहुँचे हुए अन्नको आच्छादित करने या पचानेके लिये है ॥ १७–२४॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'कपिला-पूजन आदिकी विधिका वर्णन' नामक सतहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७७ ॥