शालिहोत्र कहते हैं-
सुश्रुत ! अब मैं घोड़ोंके रोगोंका मर्दन करनेवाली 'अश्वशान्ति' का वर्णन करूँगा; जो नित्य, नैमित्तिक और काम्यके भेदसे तीन प्रकारकी मानी गयी है; इसे सुनो। किसी शुभ दिनको श्रीधर (विष्णु), श्री (लक्ष्मी) तथा उच्चैःश्रवाके पुत्र हयराजकी पूजा करके सविता देवता सम्बन्धी मन्त्रों द्वारा घीका हवन करे। तदनन्तर ब्राह्मणोंको दक्षिणा दे। इससे अश्वोंकी वृद्धि होती है। (शुभ दिनसे आरम्भ करके इस कर्मको प्रतिदिन चालू रखा जाय तो यह 'नित्य अश्व शान्ति' है) ॥ १-२६ ॥
(अश्व-समृद्धिकी कामनासे) आश्विनके शुक्ल पक्षकी पूर्णिमाको नगरके बाह्यदेशमें शान्ति-कर्म करे। उसमें विशेषतः अश्विनीकुमारों तथा वरुण- देवताका पूजन करे। तत्पश्चात् श्रीदेवीको वेदीपर पद्मासनके ऊपर अङ्कित करके उन्हें चारों ओरसे वृक्षकी शाखाओंद्वारा आवृत कर दे। उनकी सभी दिशाओं में समस्त रसोंसे परिपूर्ण कलशोंको वस्त्रसहित स्थापित करे। इसके बाद श्रीदेवीका पूजन करके उनकी प्रसन्नताके लिये जौ और घीका हवन करे। फिर अश्विनीकुमारों और अश्वोंकी अर्चना करे तथा ब्राह्मणोंको दक्षिणा दे। (यह काम्य शान्ति हुई) अब नैमित्तिक शान्तिका वर्णन सुनो ॥॥३-५ई ॥
मकर आदिकी संक्रान्तियोंमें अश्वोंका पूजन करे। साथ ही कमलपुष्पोंद्वारा विष्णु, लक्ष्मी, ब्रह्मा, शंकर, चन्द्रमा, सूर्य, अश्विनीकुमार, रेवन्त तथा उच्चैःश्रवाकी अर्चना करे। इसके सिवा कमलके दस दलोंपर दस दिक्पालोंकी भी पूजा करे। प्रत्येक अर्चनीय देवताके निमित्त वेदीपर जलपूर्ण कलश स्थापित करे और उन कलशोंमें अधिष्ठित देवोंकी पूजा करे। इन देवताओंके उत्तरभागमें इन सबके निमित्त तिल, अक्षत, घी और पीली सरसोंकी आहुतियाँ दे। एक-एक देवताके निमित्त सौ-सौ आहुतियाँ देनी चाहिये। अश्वसम्बन्धी रोगोंके निवारणके लिये उपवासपूर्वक यह शान्तिकर्म करना उचित है ॥ ६-८॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'अश्व शान्तिका कथन' नामक दो सौ नब्बेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २९० ॥
Summary of chapter 291 of the Agni Mahā Purana is as follows:
Pacification rituals for elephants are prescribed. The pañcamī-pūjā honors Viṣṇu-Lakṣmī, Airāvaṇa, Brahmā, Śaṅkara, Indra, Kubera, Yama, Candra, Sūrya, Varuṇa, Vāyu, Agni, Pṛthvī, Śeṣa, and the eight deva-yoni elephants (Virūpākṣa, Mahāpadma, Bhadra, Sumanas, Kumuda, Airāvaṇa, Padma, Puṣpadanta, Vāmana, Añjana). The aṣṭa-dikpāla pūjā is performed with pūrṇa-kumbhas. A specific mantra is whispered into the elephant's ear: "Śrī-gaja, the rāja has consecrated you." The diṇḍima (drum) is then presented to the gajādhyakṣa (superintendent of elephants) as the ritual's conclusion.