अग्नि महा पुराण

74- शिवपूजाकी विधि

महादेवजी कहते हैं-

स्कन्द ! अब मैं शिव पूजाकी विधि बताऊँगा। आचमन ( एवं स्नान आदि) करके प्रणवका जप करते हुए सूर्यदेवको अर्घ्य दे। फिर पूजा-मण्डपके द्वारको 'फट्' इस मन्त्रद्वारा जलसे सींचकर आदिमें 'हां' बीजसहित नन्दी आदि द्वारपालोंका पूजन करे द्वारपर उदुम्बर वृक्षकी स्थापना या भावना करके उसके ऊपरी भागमें गणपति, सरस्वती और लक्ष्मीजीकी पूजा करे। उस वृक्षकी दाहिनी शाखापर या द्वारके दक्षिण भागमें नन्दी (नारदपुराण के अनुसार नन्दी, भृङ्गी, रिटि, स्कन्द, गणेश, उमा महेश्वर, नन्दी वृषभ तथा महाकाल-ये शैव द्वारपाल हैं।) और गङ्गाका पूजन करे तथा वाम शाखापर या द्वारके वाम भागमें महाकाल एवं यमुनाजीकी पूजा करनी चाहिये । तत्पश्चात् अपनी दिव्य दृष्टि डालकर दिव्य विघ्नोंका उत्सारण (निवारण) करे। उनके ऊपर या उनके उद्देश्यसे फूल फेंके और यह भावना करे कि 'आकाशचारी सारे विघ्न दूर हो गये।' साथ ही, दाहिने पैरकी एड़ीसे तीन बार भूमिपर आघात करे और इस क्रियाद्वारा भूतलवर्ती समस्त विघ्नोंके निवारणकी भावना करे। तत्पश्चात् यज्ञमण्डपकी देहलीको लाँघे। वाम शाखाका आश्रय लेकर भीतर प्रवेश करे। दाहिने पैरसे मण्डपके भीतर प्रविष्ट हो उदुम्बरवृक्षमें अस्त्रका न्यास करे तथा मण्डपके मध्य भागमें पीठकी आधारभूमिमें ॐ हां वास्त्वधिपतये ब्रह्मणे नमः । इस मन्त्रसे वास्तुदेवताकी पूजा करे ॥ १ – ५ ॥

निरीक्षण आदि शस्त्रोंद्वारा शुद्ध किये हुए गडुओंको हाथमें लेकर, भावनाद्वारा भगवान् शिवसे आज्ञा प्राप्त करके साधक मौन हो गङ्गा आदि नदीके तटपर जाय। वहाँ अपने शरीरको पवित्र करके गायत्री मन्त्रका जप करते हुए वस्त्रसे छाने हुए जलके द्वारा जलाशयमें उन गडुओंको भरे, अथवा हृदय बीज ( नमः ) का उच्चारण करके जल भरे। तत्पश्चात् पूजाके लिये गन्ध, अक्षत, पुष्प आदि सब द्रव्योंको अपने पास एकत्र करके भूतशुद्धि आदि कर्म करे। फिर उत्तराभिमुख हो आराध्यदेवके दाहिने भागमें शरीरके विभिन्न अङ्गोंमें मातृकान्यास करके, संहार- मुद्राद्वारा अर्घ्यके लिये जल लेकर मन्त्रोच्चारणपूर्वक मस्तकसे लगावे और उसे देवतापर अर्पित करनेके लिये अपने पास रख ले। इसके बाद भोग्य कर्मोंके उपभोगके लिये | पाणिकच्छपिका (कूर्ममुद्रा) का प्रदर्शन करके - द्वादश दलोंसे युक्त हृदयकमलमें अपने आत्माका चिन्तन करे ॥ ६ - १०॥

तदनन्तर शरीरमें शून्यका चिन्तन करते हुए पाँच भूतोंका क्रमश: शोधन करे। पैरोंके दोनों अँगूठोंको पहले बाहर और भीतरसे छिद्रमय (शून्यरूप) देखे। फिर कुण्डलिनी शक्तिको मूलाधारसे उठाकर हृदयकमलसे संयुक्त क इस प्रकार चिन्तन करे – 'हृदयरन्ध्र में स्थित अग्नितुल्य तेजस्वी 'हूं' बीजमें कुण्डलिनी शक्ति विराज रही है। उस समय चिन्तन करनेवाला साधक प्राणवायुका अवरोध (कुम्भक) करके उसका रेचक (निःसारण) करनेके पश्चात्, 'हुं फट्' के उच्चारणपूर्वक क्रमशः उत्तरोत्तर चक्रोंका भेदन करता हुआ उस कुण्डलिनीको हृदय, कण्ठ, तालु, भ्रूमध्य एवं ब्रह्मरन्ध्रमें ले जाकर स्थापित करे। इन ग्रन्थियोंका भेदन करके कुण्डलिनीके साथ हृदयकमलसे ब्रह्मरन्ध्रमें आये 'हूं' बीजस्वरूप जीवको वहीं मस्तकमें (मस्तकवर्ती ब्रह्मरन्ध्रमें या सहस्रारचक्रमें) स्थापित कर दे।

हृदयस्थित 'हूं' बीजसे सम्पुटित हुए उस जीवमें पूरक प्राणायामद्वारा चैतन्यभाव जाग्रत् किया गया है। शिखाके ऊपर 'हूं' का न्यास करके शुद्ध बिन्दुस्वरूप जीवका चिन्तन करे। फिर कुम्भक प्राणायाम करके उस एकमात्र चैतन्य गुणसे युक्त

जीवको शिवके साथ संयुक्त कर दे ॥ ११-१५॥

इस तरह शिवमें लीन होकर साधक सबीज रेचक प्राणायामद्वारा शरीरगत भूतोंका शोधन करे। अपने शरीरमें पैरसे लेकर बिन्दु पर्यन्त सभी तत्त्वों का विलोम क्रमसे चिन्तन करे। बिन्दुरूप जीवको बिन्द्वन्त लीन करके पृथ्वी और वायुका एक-दूसरेमें लय करे। साथ ही अग्नि एवं जलका भी परस्पर विलय करे। इस प्रकार दो दो विरोधी भूतोंका परस्पर शोधन (लय) करना चाहिये। आकाशका किसीसे विरोध नहीं है; इस भूत शुद्धिका विशेष विवरण सुनो - भूमण्डलका स्वरूप चतुष्कोण है। उसका रंग सुवर्णके समान पीला है। वह कठोर होनेके साथ ही वज्रके चिह्नसे तथा 'हां' ( अन्य तन्त्रों के अनुसार पृथ्वीका अपना बीज 'लं' है।

इस आत्मीय बीज (भूबीज) - से युक्त है। उसमें 'निवृत्ति' नामक कला है। (शरीरमें पैरसे लेकर घुटनेतक भूमण्डलकी स्थिति है।) इसी तरह पैरसे लेकर मस्तक पर्यन्त - क्रमशः पाँचों भूतोंका चिन्तन करना चाहिये। इस प्रकार पाँच गुणोंसे युक्त वायुभूत भूमण्डलका चिन्तन करे ॥ १६ - १९ ॥

जलका स्वरूप अर्धचन्द्राकार है। वह द्रवस्वरूप है, चन्द्रमण्डलमय है। उसकी कान्ति या वर्ण उज्ज्वल है। वह दो कमलोंसे चिह्नित है। 'ह्रीं' (जलका बीज 'वं' है। यही ग्रन्थान्तरोंसे सिद्ध है।) इस बीजसे युक्त है। 'प्रतिष्ठा' नामक कलाके स्वरूपको प्राप्त है। वह वामदेव तथा तत्पुरुष मन्त्रों से संयुक्त जलतत्त्व चार गुणोंसे युक्त है। उसे इस प्रकार (घुटनेसे नाभितक जलका) चिन्तन करते हुए उस जल तत्त्वका वह्निस्वरूपमें लीन करके शोधन करे। अग्निमण्डल त्रिकोणाकार है। उसका वर्ण लाल है। (नाभिसे हृदयतक उसकी स्थिति है।) वह स्वस्तिकके चिह्नसे युक्त है। उसमें 'हूं' (अग्निका मुख्य बीज रं है।) बीज अङ्कित है। वह विद्याकला स्वरूप है। उसका अघोर मन्त्र है तथा वह तीन गुणोंसे युक्त एवं जलभूत है - इस प्रकार चिन्तन करते हुए अग्नितत्त्वका शोधन करे। वायुमण्डल षट्कोणाकार है। (शरीरमें हृदयसे लेकर भौंहोंके मध्य भागतक उसकी स्थिति है।) वह छः बिन्दुओंसे चिह्नित है। उसका रंग काला है। वह 'हैं' ( वायुका बीज 'य' है।) बीज एवं सद्योजात मन्त्रसे युक्त और शान्तिकला-स्वरूप है। उसमें दो गुण हैं तथा वह पृथ्वीभूत है। इस प्रकार चिन्तन करते हुए वायुतत्त्वका शोधन करे ॥ २०- २४ ॥

आकाशका स्वरूप व्योमाकार, नाद-बिन्दुमय, गोलाकार, बिन्दु और शक्तिसे विभूषित तथा शुद्ध स्फटिक मणिके समान निर्मल है। (शरीर में भ्रूमध्यसे लेकर ब्रह्मरन्ध्रतक उसकी स्थिति है।) वह 'हौं फट्' (आकाशका बीज 'हं' है यही सर्वसम्मत है।) इस बीजसे युक्त है। शान्त्यतीतकलामय ( शान्त्यतीतकलाके भीतर इन्धिका, दीपिका, रेचिका और मोचिका-ये चार कलाएँ आती हैं।) है। एक गुणसे युक्त तथा परम विशुद्ध है। इस प्रकार चिन्तन करते हुए आकाश तत्त्वका शोधन करे। तदनन्तर अमृतवर्षी मूलमन्त्रसे सबको परिपुष्ट करे। तत्पश्चात् आधारशक्ति, कूर्म, अनन्त (पृथ्वी) की पूजा - करे। फिर पीठ (चौकी) के अग्निकोणवा पायेमें धर्मकी, नैर्ऋत्य कोणवाले पायेमें ज्ञानकी, वायव्यकोणमें वैराग्यकी और ऐशान्यकोणमें ऐश्वर्यकी पूजा करनी चाहिये। इसके बाद पीठकी पूर्वादि दिशाओं में क्रमश: अधर्म, अज्ञान, अवैराग्य और अनैश्वर्यकी पूजा करनी चाहिये। इसके बाद पीठके मध्यभागमें कमलकी पूजा करे। इस प्रकार मन-ही-मन इस पीठवर्ती कमलमय आसनका ध्यान करके उसपर देवमूर्ति सच्चिदानन्दघन भगवान् शिवका आवाहन करे। उस शिवमूर्ति में शिवस्वरूप आत्माको देखे और फिर आसन, पादुकाद्वय तथा नौ पीठशक्ति – इन बारहोंका ध्यान - करे। फिर शक्तिमन्त्रके अन्तमें 'वौषट्' लगाकर उसके उच्चारणपूर्वक पूर्वोक्त आत्ममूर्तिको दिव्य अमृतसे आप्लावित करके उसमें सकलीकरण करे। हृदयसे लेकर हस्त-पर्यन्त अङ्गोंमें तथा कनिष्ठिका आदि अँगुलियोंमें हृदय (नमः) मन्त्रोंका जो न्यास है, इसीको 'सकलीकरण' माना गया है ।। २५-३० ॥

तत्पश्चात् 'हुं फट्'– इस मन्त्रसे प्राकारकी भावनाद्वारा आत्मरक्षाकी व्यवस्था करके उसके बाहर, नीचे और ऊपर भी भावनात्मक शक्तिजालका विस्तार करे। इसके बाद महामुद्राका प्रदर्शन करे। तत्पश्चात् पूरक प्राणायामके द्वारा अपने हृदय कमलमें विराजमान शिवका ध्यान करके भावमय पुष्पोंद्वारा उनके पैरसे लेकर सिरतकके अङ्गोंमें पूजन करे। वे भावमय पुष्प आनन्दामृतमय मकरन्दसे परिपूर्ण होने चाहिये। फिर शिव मन्त्रों द्वारा नाभिकुण्डमें स्थित शिवस्वरूप अग्निको तृप्त करे। वही शिवानल ललाटमें बिन्दुरूपसे स्थित है; उसका विग्रह मङ्गलमय है – इस प्रकार चिन्तन करे ॥ ३१-३३ ॥

स्वर्ण, रजत एवं ताम्रपात्रों में से किसी एक पात्रको अर्घ्यके लिये लेकर उसे अस्त्रबीज (फट्) के उच्चारणपूर्वक जलसे धोये। फिर - बिन्दुरूप शिवसे प्रकट होनेवाले अमृतकी भावनासे युक्त जल एवं अक्षत आदिके द्वारा हृदय मन्त्र (नमः) के उच्चारणपूर्वक उसे भर दे। फिर हृदय, सिर, शिखा, कवच, नेत्र और अस्त्र - इन छ: - अङ्गोंद्वारा (अथवा इनके बीज मन्त्रों द्वारा) उस - अर्घ्यपात्रका पूजन करके उसे देवता सम्बन्धी - मूलमन्त्रसे अभिमन्त्रित करे। फिर अस्त्र-मन्त्र (फट्) से उसकी रक्षा करके कवच-बीज (हुम्) - के द्वारा उसे अवगुण्ठित कर दे। इस प्रकार अष्टाङ्ग अर्घ्यकी रचना करके, धेनुमुद्राके द्वारा उसका अमृतीकरण करके उस जलको सब ओर सींचे। अपने मस्तकपर भी उस जलकी बूँदोंसे अभिषेक करे। वहाँ रखी हुई पूजा सामग्रीका भी अस्त्र - बीजके उच्चारणपूर्वक उक्त जलसे प्रोक्षण करे। तदनन्तर हृदयबीजसे अभिमन्त्रित करके 'हुम्' बीजसे पिण्डों ( अथवा मत्स्यमुद्रा) द्वारा उसे आवेष्टित या आच्छादित करे ॥ ३४-३७ ।।

इसके बाद अमृता (धेनुमुद्रा) के लिये धेनुमुद्राका प्रदर्शन करके अपने आसनपर पुष्प अर्पित करे (अथवा देवताके निज आसनपर पुष्प चढ़ावे) । तत्पश्चात् पूजक अपने मस्तकमें तिलक लगाकर मूलमन्त्रके द्वारा आराध्यदेवको पुष्प अर्पित करे। स्नान, देवपूजन, होम, भोजन, यज्ञानुष्ठान, योग, साधन तथा आवश्यक जपके समय धीरबुद्धि साधकको सदा मौन रहना चाहिये। प्रणवका नाद - पर्यन्त उच्चारण करके मन्त्रका शोधन करे। फिर उत्तम संस्कारयुक्त देव-पूजा आरम्भ करे । मूलगायत्री (अथवा रुद्र गायत्री) -से -अर्घ्य -पूजन  करके रखे और वह सामान्य अर्घ्य देवताको अर्पित करे ॥ ३८-४० ।।

ब्रह्मपञ्चक (पञ्चगव्य और कुशोदकसे बना हुआ ब्रह्मकूर्च (ब्रह्मकुचंकी विधि इस प्रकार है- पलाश या कमलके पत्तेमें अथवा ताँबे या सुवर्णके पात्र में पञ्चगव्य संग्रह करना चाहिये। गायत्री मन्त्रसे गोमूत्रका 'गन्धद्वारा०' (श्रीसूक्त) इस मन्त्रसे गोबरका, 'आप्यायस्व०' (शु० यजु० १२ ११२) इस मन्त्रसे दूधका 'दधिक्राष्णो०' (शु० यजु० २३ ३२) इस मन्त्रसे दहीका, 'तेजोऽसि शुक्रं०' (शु० यजु० २२ । १) मन्त्रसे धीका और 'देवस्य त्वा०' (शु० यजु० ६।३०) इस मन्त्रसे कुशोदकका संग्रह करे चतुर्दशीको उपवास करके अमावस्याको उपर्युक्त वस्तुओं का संग्रह करे गोमूत्र एक पल होना चाहिये, गोबर आधे अँगूठेके बराबर हो, दूधका म सात पल और दहीका तीन पल है। घी और कुशोदक एक-एक पल बताये गये हैं। इस प्रकार सबको एकत्र करके परस्पर मिला दे। तत्पश्चात् सात-सात पत्तोंके तीन कुश लेकर जिनके अग्रभाग कटे न हों, उनसे उस पञ्चगव्यकी अग्निमें आहुति दे आहुतिसे बचे हुए पञ्चगव्यको प्रणवसे आलोडन और प्रणवसे ही मन्थन करके, प्रणवसे ही हाथमें ले तथा फिर प्रणवका ही उच्चारण करके उसे पी जाय इस प्रकार तैयार किये हुए पञ्चगव्यको 'ब्रह्मकूर्च' कहते हैं। स्त्री-शूद्रोंको ब्राह्मणके द्वारा पञ्चगव्य बनवाकर प्रणव उच्चारणके बिना ही पीना चाहिये। सर्वसाधारणके लिये ब्रह्मकूर्च पानका मन्त्र यह है

यत्त्वगस्थिगतं पापं देहे तिष्ठति देहिनाम् ब्रह्मकूच दहेत्सव प्रदीप्ताग्निरिवन्धनम् ॥ (वृद्धशातातप० १२) अर्थात् 'देहधारियों के शरीरमें चमड़े और हड्डीतकमें जो पाप विद्यमान है, वह सब ब्रह्मकूर्य इस प्रकार जला दे, जैसे प्रचलित आग इन्धनको जला डालती है।')) तैयार करके पूजित शिवलिङ्गसे पुष्प निर्माल्य ले ईशानकोणकी ओर चण्डाय नमः'। कहकर चण्डको समर्पित करे। तत्पश्चात् उक्त ब्रह्मपञ्चकसे पिण्डिका (पिण्डी या अर्धा ) और शिवलिङ्गको नहलाकर 'फट्' का उच्चारण करके उन्हें जलसे नहलाये। फिर 'नमो नमः' के उच्चारणपूर्वक पूर्वोक्त अर्घ्यपात्रके जलसे उस लिङ्गका अभिषेक करे। यह लिङ्ग-शोधनका प्रकार बताया गया है ॥ ४१-४२ ॥

आत्मा ( शरीर और मन), द्रव्य (पूजनसामग्री), मन्त्र तथा लिङ्गकी शुद्धि हो जानेपर सब देवताओंका पूजन करे। वायव्यकोणमें 'ॐ हां गणपतये नमः ।'(प्रचलित 'गं' आदि स्ववीजके स्थानपर 'हां' बीज सोमशम्भुकी कर्मकाण्डक्रमावली' में भी मिलता है।) कहकर गणेशजीकी पूजा करे और ईशानकोणमें ॐ हां गुरुभ्यो नमः ।' कहकर गुरु, परम गुरु, परात्पर गुरु तथा परमेष्ठी गुरु गुरुपंक्तिकी पूजा करे ॥ ४३ ॥

तत्पश्चात् कूर्मरूपी शिलापर स्थित अङ्कुर सदृश आधारशक्तिका तथा ब्रह्मशिलापर आरूढ़

 शिवके आसनभूत अनन्तदेवका 'ॐ हां अनन्तासनाय नमः । मन्त्रद्वारा पूजन करे। शिवके सिंहासनके रूपमें जो मञ्च या चौकी है, उसके चार पाये हैं, जो विचित्र सिंहकी - सी आकृतिसे सुशोभित होते हैं। वे सिंह मण्डलाकारमें स्थित रहकर अपने आगेवालेके पृष्ठभागको ही देखते हैं तथा सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग - इन चार युगोंके प्रतीक हैं। तत्पश्चात् भगवान् शिवकी आसन पादुकाकी पूजा करे। तदनन्तर धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्यकी पूजा करे। वे अग्नि आदि चारों कोणोंमें स्थित हैं। उनके वर्ण क्रमशः कपूर, । कुङ्कुम, सुवर्ण और काजलके समान हैं। इनका चारों पायोंपर क्रमशः पूजन करे। इसके बाद (ॐ हां अधश्छदनाय नमोऽधः, ॐ हां ऊर्ध्वच्छदनाय नम ऊर्ध्वं ॐ हां पद्मासनाय नमः । - ऐसा कहकर) आसनपर विराजमान अष्टदल कमलके नीचे-ऊपरके दलोंकी, सम्पूर्ण कमलकी तथा ॐ हां कर्णिकायै नमः ।' के द्वारा कर्णिकाके मध्यभागकी पूजा करे। उस कमलके पूर्व आदि आठ दलोंमें तथा मध्यभागमें नौ पीठ-शक्तियोंकी पूजा करनी चाहिये। वे शक्तियाँ चँवर लेकर खड़ी हैं। उनके हाथ वरद एवं अभयकी मुद्राओंसे सुशोभित हैं ॥ ४४ - ४७ ।।

उनके नाम इस प्रकार हैं-वामा ज्येष्ठा, रौद्री, काली, कलविकारिणी', बलविकारिणी, बलप्रमथिनी, सर्वभूतदमनी तथा मनोन्मनी – इन - सबका क्रमशः पूजन करना चाहिये। वामा आदि आठ शक्तियोंका कमलके पूर्व आदि आठ दलोंमें तथा नवीं मनोन्मनीका कमलके केसर भागमें क्रमश: पूजन किया जाता है। यथा- 'ॐ हां वामायै नमः ।' इत्यादि । तदनन्तर पृथ्वी आदि अष्ट मूर्तियों एवं विशुद्ध विद्यादेहका चिन्तन एवं पूजन करे। (यथा- पूर्वमें ॐ सूर्यमूर्तये नमः ।' अग्निकोणमें 'ॐ चन्द्रमूर्तये नमः ।' दक्षिणमें 'ॐ पृथ्वीमूर्तये नमः ।' नैर्ऋत्यकोणमें 'ॐ जलमूर्तये नमः ।' पश्चिममें 'ॐ वह्निमूर्तये नमः ।' वायव्यकोणमें 'ॐ वायुमूर्तये नमः ।' उत्तरमें 'ॐ आकाशमूर्तये नमः ।' और ईशानकोणमें ॐ यजमानमूर्तये नमः।') तत्पश्चात् शुद्ध विद्याकी और तत्त्वव्यापक आसनकी पूजा करनी चाहिये। उस सिंहासनपर कर्पूर-गौर, सर्वव्यापी एवं पाँच मुखोंसे सुशोभित भगवान् महादेवको प्रतिष्ठित करे। उनके दस भुजाएँ हैं। वे अपने मस्तकपर अर्धचन्द्र धारण करते हैं। उनके दाहिने हाथों में शक्ति, ॠष्टि, शूल, खट्वाङ्ग और वरद मुद्रा हैं तथा अपने बायें हाथों में वे डमरू, बिजौरा नीबू, सर्प, अक्षसूत्र और नील कमल धारण करते हैं ॥ ४८-५१ ॥

आसनके मध्यमें विराजमान भगवान् शिवकी -

वह दिव्य मूर्ति बत्तीस लक्षणोंसे सम्पन्न है, ऐसा चिन्तन करके स्वयं प्रकाश शिवका स्मरण करते - हुए 'ॐ हां हां हां शिवमूर्तये नमः ।' कहकर उसे नमस्कार करे। ब्रह्मा आदि कारणोंके त्यागपूर्वक मन्त्रको शिवमें प्रतिष्ठित करे। फिर यह चिन्तन करे कि ललाटके मध्यभागमें विराजमान तथा तारापति चन्द्रमाके समान प्रकाशमान बिन्दुरूप परमशिव हृदयादि छः अङ्गोंसे संयुक्त हो पुष्पाञ्जलिमें उतर आये हैं। ऐसा ध्यान करके उन्हें प्रत्यक्ष पूजनीय मूर्तिमें स्थापित कर दे। इसके बाद 'ॐ हां हौं शिवाय नमः। - यह मन्त्र बोलकर मन ही-मन आवाहनी- मुद्राद्वारा मूर्तिमें भगवान् शिवका आवाहन करे। फिर स्थापनी मुद्राद्वारा वहाँ उनकी स्थापना और संनिधापिनी मुद्राद्वारा भगवान् शिवको समीपमें विराजमान करके संनिरोधनी मुद्राद्वारा उन्हें उस मूर्तिमें अवरुद्ध करे। तत्पश्चात् 'निष्ठुरायै कालकल्यायै ( कालकान्त्यै अथवा कालकान्तायै) फट् ।' का उच्चारण करके खड्ग मुद्रासे भय दिखाते हुए विघ्नोंको मार भगावे। इसके बाद लिङ्ग-मुद्राका' प्रदर्शन करके  नमस्कार करे ॥ ५२-५६ ॥

इसके बाद 'नमः' बोलकर अवगुण्ठन करे आवाहनका अर्थ है सादर सम्मुखीकरण इष्टदेवको अपने सामने उपस्थित करना। देवताको अर्चा विग्रहमें बिठाना ही उसकी स्थापना है। 'प्रभो! मैं आपका हूँ'– ऐसा कहकर भगवान्से निकटतम सम्बन्ध स्थापित करना ही 'संनिधान' या 'संनिधापन' कहलाता है। जबतक पूजन - सम्बन्धी कर्मकाण्ड चालू रहे, तबतक भगवान्की समीपताको अक्षुण्ण रखना ही 'निरोध' है और अभक्तोंके समक्ष जो शिवतत्त्वका अप्रकाशन या संगोपन किया जाता है, उसीका नाम 'अवगुण्ठन' है। तदनन्तर सकलीकरण करके 'हृदयाय नमः', 'शिरसे स्वाहा', 'शिखायै वषट्', 'कवचाय हुम्', 'नेत्राभ्यां वौषट्', 'अस्त्राय फट्' – इन छः मन्त्रों द्वारा हृदयादि अङ्गोंकी अङ्गीके साथ एकता स्थापित करे – यही 'अमृतीकरण' है। चैतन्यशक्ति भगवान् शंकरका हृदय है, आठ प्रकारका ऐश्वर्य उनका सिर है, वशित्व उनकी शिखा है तथा अभेद्य तेज भगवान् महेश्वरका कवच है। उनका दुःसह प्रताप ही समस्त विघ्नोंका निवारण करनेवाला अस्त्र है। हृदय आदिको पूर्वमें रखकर क्रमशः 'नमः', 'स्वधा', 'स्वाहा' और 'वौषट्' का क्रमशः उच्चारण करके पाद्य आदि निवेदन करे ॥ ५७-६१ ॥

पाद्यको आराध्यदेवके युगल चरणारविन्दोंमें, आचमनको मुखारविन्दमें तथा अर्घ्य, दूर्वा, पुष्प और अक्षतको इष्टदेवके मस्तकपर चढ़ाना चाहिये । इस प्रकार दस संस्कारोंसे परमेश्वर शिवका संस्कार करके गन्ध पुष्प आदि पञ्च उपचारोंसे - विधिपूर्वक उनकी पूजा करे। पहले जलसे देवविग्रहका अभ्युक्षण (अभिषेक) करके राई लोन आदिसे उबटन और मार्जन करना चाहिये । तत्पश्चात् अर्घ्यजलकी बूँदों और पुष्प आदिसे अभिषेक करके गड्डुओंमें रखे हुए जलके द्वारा धीरे-धीरे भगवान्‌को नहलावे। दूध, दही, घी, मधु और शक्कर आदिको क्रमशः ईशान, तत्पुरुष, अघोर, वामदेव और सद्योजात- इन पाँच  मन्त्रों द्वारा अभिमन्त्रित करके उनके द्वारा बारी-बारीसे स्नान करावे। उनको परस्पर मिलाकर पञ्चामृत बना ले और उससे भगवान्‌को नहलावे। इससे भोग और मोक्षकी प्राप्ति होती है। पूर्वोक्त दूध दही आदिमें जल और धूप मिलाकर उन सबके द्वारा इष्ट देवता सम्बन्धी मूल मन्त्रके उच्चारणपूर्वक भगवान् शिवको स्नान करावे ॥ ६२-६६ ॥

तदनन्तर जौके आटेसे चिकनाई मिटाकर इच्छानुसार शीतल जलसे स्नान करावे अपनी शक्तिके अनुसार चन्दन, केसर आदिसे युक्त जलद्वारा स्नान कराकर शुद्ध वस्त्रसे इष्टदेवके श्रीविग्रहको अच्छी तरह पोंछे। उसके बाद अर्घ्य निवेदन करे। देवताके ऊपर हाथ न घुमावे। शिवलिङ्गके मस्तकभागको कभी पुष्पसे शून्य न रखे। तत्पश्चात् अन्यान्य उपचार समर्पित करे । (स्नानके पश्चात् देवविग्रहको वस्त्र और यज्ञोपवीत धारण कराकर) चन्दन-रोली आदिका अनुलेप करे। फिर शिव सम्बन्धी मन्त्र बोलकर पुष्प अर्पण करते हुए पूजन करे। धूपके पात्रका अस्त्र मन्त्र ( फट् ) से प्रोक्षण करके शिव मन्त्रसे धूपद्वारा पूजन करे। फिर अस्त्र मन्त्रद्वारा पूजित घण्टा बजाते हुए गुग्गुलका धूप जलावे । फिर 'शिवाय नमः ।' बोलकर अमृतके समान सुस्वादु जलसे भगवान्‌को आचमन करावे। इसके बाद आरती उतारकर पुनः पूर्ववत् आचमन करावे। फिर प्रणाम करके देवताकी आज्ञा ले भोगाङ्गोंकी पूजा करे ॥ ६७ – ७१ ॥

अग्निकोणमें चन्द्रमाके समान उज्ज्वल हृदयका, ईशानकोणमें सुवर्णके समान कान्तिवाले सिरका, नैर्ऋत्यकोणमें लाल रंगकी शिखाका तथा वायव्यकोणमें काले रंगके कवचका पूजन करे। फिर अग्निवर्ण नेत्र और कृष्ण पिङ्गल अस्त्रका पूजन करके चतुर्मुख ब्रह्मा और चतुर्भुज विष्णु आदि देवताओंको कमलके दलोंमें स्थित मानकर इन सबकी पूजा करे। पूर्व आदि दिशाओं में दाढ़ोंके समान विकराल, वज्रतुल्य अस्त्रका भी पूजन करे ॥ ७२-७३ ॥

मूल स्थानमें 'ॐ हां हूं शिवाय नमः ।' बोलकर पूजन करे। 'ॐ हां हृदयाय नमः, हीं शिरसे स्वाहा।' बोलकर हृदय और सिरकी पूजा करे। 'हूं शिखायै वषट्' बोलकर शिखाकी, 'हैं कवचाय हुम् ।' कहकर कवचकी तथा 'हः अस्त्राय फट् ।' बोलकर अस्त्रकी पूजा करे। इसके बाद परिवारसहित भगवान् शिवको क्रमशः पाद्य, आचमन, अर्घ्य, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, आचमनीय, करोद्वर्तन, ताम्बूल, मुखवास (इलायची आदि) तथा दर्पण अर्पण करे। तदनन्तर देवाधिदेवके मस्तकपर दूर्वा, अक्षत और पवित्रक चढ़ाकर हृदय (नमः) से अभिमन्त्रित मूलमन्त्रका एक सौ आठ बार जप करे। तत्पश्चात् कवचसे

आवेष्टित एवं अस्त्रके द्वारा सुरक्षित अक्षत-कुश, | पुष्प तथा उद्भव नामक मुद्रासे भगवान् शिव | इस प्रकार प्रार्थना करे - ॥ ७४ – ७७ ३ ॥

'प्रभो! गुह्यसे भी अति गुह्य वस्तुकी आप रक्षा करनेवाले हैं। आप मेरे किये हुए इस जपको ग्रहण करें, जिससे आपके रहते हुए आपकी कृपासे मुझे सिद्धि प्राप्त हो " ॥ ७८ ॥

भोगकी इच्छा रखनेवाला उपासक उपर्युक्त श्लोक पढ़कर, मूल मन्त्रके उच्चारणपूर्वक दाहिने हाथसे अर्घ्य जल ले भगवान्‌के वरकी मुद्रासे युक्त हाथमें अर्घ्य निवेदन करे। फिर इस प्रकार प्रार्थना करे- 'देव! शंकर! हम कल्याणस्वरूप आपके चरणोंकी शरणमें आये हैं। अतः सदा हम जो कुछ भी शुभाशुभ कर्म करते आ रहे हैं, उन सबको आप नष्ट कर दीजिये -निकाल फेंकिये। हूं क्षः। शिव ही दाता हैं, शिव ही भोक्ता हैं, शिव ही यह सम्पूर्ण जगत् हैं, शिवकी सर्वत्र जय हो। जो शिव हैं, वही मैं हूँ ॥ ७९ - ८१३ ॥

इन दो श्लोकोंको पढ़कर अपना किया हुआ जप आराध्यदेवको समर्पित कर दे। तत्पश्चात् जपे हुए शिव मन्त्रका दशांश भी जपे (यह हवनकी पूर्तिके लिये आवश्यक है।) फिर अर्घ्य देकर भगवान्की स्तुति करे। अन्तमें अष्टमूर्तिधारी आराध्यदेव शिवकी परिक्रमा करके उन्हें साष्टाङ्ग प्रणाम करे। नमस्कार और शिव ध्यान करके चित्रमें अथवा अग्नि आदिमें भगवान् शिवके उद्देश्यसे यजन पूजन करना चाहिये ॥ ८२-८४ ॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'शिव-पूजाकी विधिका वर्णन' नामक चौहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७४ ॥