अग्निदेव कहते हैं-
मुने! अब मैं दूसरी 'अपरा विद्या का वर्णन करता हूँ, जो भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाली है। धूलिसे निर्मित, वज्र चिह्नसे आवृत और चौकोर भूपुरमण्डलमें त्वरितादेवीकी पूजा करे। उस मण्डलके भीतर योगपीठपर कमलका निर्माण भी होना चाहिये । मण्डलके पूर्वादि दिशाओं तथा कोणोंमें कुल मिलाकर आठ वज्र अङ्कित होंगे। मण्डलके भीतर वीथी, द्वार, शोभा तथा उपशोभाकी भी रचना करे। उसके भीतर उपासक मनुष्य त्वरितादेवीका चिन्तन करे। उनके अठारह भुजाएँ| हैं। उनकी बायीं जङ्घा तो सिंहकी पीठपर प्रतिष्ठित है और दाहिनी जङ्घा उससे दुगुनी बड़ी आकृतिमें पीढ़े या खड़ाऊँपर अवलम्बित है। वे नागमय आभूषणोंसे विभूषित हैं। दायें भागके हाथों में क्रमशः वज्र, दण्ड, खङ्ग, चक्र, गदा, शूल, बाण, शक्ति तथा वरद मुद्रा धारण करती हैं और वामभागके हाथों में क्रमश: धनुष, पाश, शर, घण्टा, तर्जनी, शङ्ख, अङ्कुश, अभयमुद्रा तथा वज्र नामक आयुध लिये रहती हैं ॥ १-५ ॥
त्वरितादेवीके पूजनसे शत्रुका नाश होता है। त्वरिताका आराधक राज्यको भी अनायास ही जीत लेता है। वह दीर्घायु तथा राष्ट्रकी विभूति बन जाता है। दिव्य और अदिव्य (दैविक और लौकिक) सभी सिद्धियाँ उसके अधीन हो जाती हैं। (त्वरिताको 'तोतला त्वरिता' भी कहते हैं। इस नामकी व्युत्पत्ति इस प्रकार समझनी चाहिये –) 'तल' शब्दसे सातों पाताल, - काल, अग्नि और सम्पूर्ण भुवन गृहीत होते हैं। ॐ कारसे परमेश्वरसे लेकर जितना भी ब्रह्माण्ड है, उन सबका प्रतिपादन होता है। अपने मन्त्रके आदि अक्षर ॐकारसे देवी तलपर्यन्त 'तोय' का त्वरित भ्रामण (प्रक्षेपण) करती हैं, इसलिये वे 'तोतला त्वरिता' कही गयी हैं ॥ ६ ७ ॥
अब मैं त्वरिता मन्त्रको प्रस्तुत करनेका प्रकार (अर्थात् मन्त्रोद्धार) बता रहा हूँ। भूतलपर स्वरवर्ग लिखे। (स्वरवर्गमें सोलह अक्षर हैं अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ऋ, ऌ, ऌ, ए, ऐ, ओ औ अं अः । इसके बाद व्यञ्जन वर्णोंको भी वर्गक्रमसे लिखे -) कवर्गके लिये सांकेतिक नाम तालुवर्ग है। स्वरवर्ग पहला है और तालुवर्ग दूसरा। तीसरा जिह्वा तालुकवर्ग है। (इसमें चवर्गके अक्षर संयोजित हैं।) चतुर्थ वर्ग तालु-जिह्वाग्र कहा गया है। (इसमें टवर्गके अक्षर हैं।) पञ्चम जिह्वादन्तक वर्ग है। (इसमें तवर्गके अक्षर हैं।) षष्ठ वर्गका नाम है-ओष्ठपुट सम्पन्न (इसमें पवर्गके अक्षर हैं।) सातवाँ मिश्रवर्ग है। (इसमें अन्तःस्थ - य, र, ल, वका समावेश है।) आठवाँ वर्ग ऊष्मा या शवर्ग है। इन्हीं वर्गोंके अक्षरोंसे मन्त्रका उद्धार करे ॥ ८-१० ॥
छठे स्वर ऊकारपर आरूढ़ ऊष्माका द्वितीय अक्षर हकार बिन्दु (अनुस्वार) से युक्त हो (हूं)। तालुवर्गका द्वितीय अक्षर 'खकार' ग्यारहवें स्वर 'एकार' से युक्त हो (खे) । जिह्वा-तालु-समायोगका केवल प्रथम अक्षर 'चकार' हो, उसके नीचे उसी वर्गका दूसरा अक्षर 'छकार' हो और वह ग्यारहवें स्वर 'एकार से संयुक्त (च्छे) हो। तालुवर्गका प्रथम अक्षर 'कू' हो, फिर उसके नीचे ऊष्माका द्वितीय अक्षर 'ष' को देखकर जोड़ दे और उसे सोलहवें स्वर - 'अः 'से संयुक्त करे (क्षः) । ऊष्माका तीसरा अक्षर 'स्' हो, उसके नीचे जिह्वादन्त-समायोगके प्रथम अक्षर 'तकार को जोड़े। उसके नीचे मिश्रवर्गका दूसरा अक्षर 'रकार' जोड़े और उसे चौथे स्वर 'ईकार से जोड़ दे - (स्त्री) । तदनन्तर तालुवर्गके आदि अक्षर 'कू' के नीचे ऊष्माका द्वितीय अक्षर 'ष' जोड़ दे और उसको ग्यारहवें स्वरसे मिला दे - (क्षे) । इसके बाद ऊष्माके अन्तिम अक्षर 'हकार' को अनुस्वारयुक्त करके पाँचवें स्वरपर आरूढ़ कर दे (हुं)। ओष्ठसम्पुटयोगसे दूसरा अक्षर 'फू' और जिह्वाग्र तालुयोगसे द्वितीय अक्षर 'ट्'को पञ्चम 'ण' के रूपमें परिणत करके जोड़ना चाहिये । स्वर तथा अर्द्ध-व्यञ्जन वर्णोंके साथ उद्धृत हुए - ये अक्षर 'तोतला त्वरिता' के मन्त्र हैं। इनके आदिमें ॐकार और अन्तमें 'नमः' जोड़नेपर जो मन्त्र बने, उसका तो जप करे, किंतु अग्निकार्य (हवन) में 'नमः 'को हटाकर 'स्वाहा' जोड़ देना - चाहिये। (तात्पर्य यह है कि 'ॐ हूं खे च्छे क्षः स्त्री क्षे हुं फट् नमः । - यह जपमन्त्र है और 'ॐ हूं खे च्छे क्षः स्त्री क्षे हुं फट् स्वाहा' | यह हवनोपयोगी मन्त्र है ) ॥ ११ - १८ ॥
इसका अङ्गन्यास इस प्रकार है- ॐ ह्रीं हूं हः हृदयाय नमः । हां हः शिरसे स्वाहा । ह्रीं ज्वल ज्वल शिखायै वषट् । हनु हनु (अथवा हुलु हुलु), कवचाय हुम् । ह्रीं श्रीं क्षूं नेत्रत्रयाय वौषट् । नवाँ (फ) और आधा अक्षर (ट्) रूप जो तोतला त्वरिता विद्या है, उसीको देवीका नेत्र कहा गया है। 'क्षौं हः खौ हूं फट् अस्त्राय फट् ।' ये गुह्य अङ्गमन्त्र हैं। इनका पहले न्यास करे ॥ १९-२० ॥
त्वरिताके अङ्गोंका वर्णन आगे चलकर करूँगा। इस समय त्वरिता विद्याके अङ्गका वर्णन मुझसे सुनो - प्रथम दो बीजाक्षर या मन्त्राक्षर हृदय हैं, तीसरा और चौथा- ये दो अक्षर स्थिर हैं, पाँचवाँ और छठा- ये अक्षर शिखाके मन्त्र
कहे गये हैं। सातवाँ और आठवाँ कवच मन्त्र हैं, नवाँ और आधा अक्षर तारक ( फट् ) है। यही नेत्र कहा गया है। (प्रयोग - ॐ हूं हृदयाय नमः । खे च्छे शिरसे स्वाहा। क्षः स्त्री शिखायै वषट् । क्षे हुम् कवचाय हुम् । फट् नेत्रत्रयाय वौषट् । )॥ २१-२२ ।।
'तोतले वज्रतुण्डे ख ख हूं' – इन दस अक्षरोंसे युक्त 'वज्रतुण्डिका' नामक 'इन्द्रदूतिका विद्या' है। 'खेचरि ज्वालिनि ज्वाले ख ख' इन दस अक्षरोंसे युक्त 'ज्वालिनी विद्या' है। 'वर्चे शरविभीषण (अथवा शवरि भीषणि) ख खे'– यह दशाक्षरा 'शबरी विद्या' है। 'छे छेदनि करालिनि ख ख'– यह दशाक्षरा 'कराली - विद्या' है। 'क्षः श्रव द्रव प्लवङ्गि ख खे' – यह दशाक्षर 'प्लवङ्गदूती विद्या' है। 'स्त्रीबलं कलिधुननि शासी'– यह दशाक्षरा 'श्वसनवेगिका विद्या' है। 'क्षे पक्षे कपिले हंस'- यह दशाक्षरा 'कपिलादूतिका विद्या' है। 'हूं तेजोवति रौद्रि मातङ्गि'– यह दशाक्षरा 'रौद्री' दूतिका है 'पुटे - पुटे ख ख खड्गे फट्'– यह दशाक्षरा 'ब्रह्मदूतिका विद्या' है। 'वैताली' में उक्त सभी मन्त्र दशाक्षर होते हैं। अन्य विस्तारकी बातें पुआलकी भाँति सारहीन हैं। उन्हें छोड़ देना चाहिये। न्यास आदिमें हृदयादि अङ्गोंका उपयोग है। नेत्रका सुधी पुरुष मध्यमें न्या करे ।। २३ - २८ ॥
पैरसे लेकर मस्तकतक तथा मस्तकसे लेकर पैरोंतक चरण, जानु, ऊरु, गुह्य, नाभि, हृदय तथा कण्ठदेशसे मुखमण्डलपर्यन्त ऊपर-नीचे आदिबीजसे निर्गत सोमरूप 'अकार', जो अमृतकी धारा एवं सुवाससे परिपूर्ण है, ब्रह्मरन्ध्रसे मुझमें प्रवेश कर रहा है, ऐसा साधक चिन्तन करे । मन्त्रोपासक मूर्धा, मुख, कण्ठ, हृदय, नाभि, गुह्य, ऊरु, जानु और पैरोंमें तथा तर्जनी आदिमें आदिबीजका बारंबार न्यास करे। ऊपर अमृतमय सोम है, नीचे बीजाक्षररूप शरीर कमल है। इस गूढ़ रहस्यको जो जानता है, उसकी मृत्यु नहीं होती है। इस मन्त्रके जपसे रोग-व्याधिका अभाव हो जाता है। न्यास और ध्यानपूर्वक त्वरितादेवीका पूजन और उनके मन्त्रका एक सौ आठ बार जप करे ('श्रीविद्यार्णवतन्त्र' में त्वरिता नित्याका प्रयोग संक्षेपसे इस प्रकार उपलब्ध होता है - अन्यत्र कथित आसनादि योगपीठन्यासान्त कर्म करके त्वरिता विद्याद्वारा तीन प्राणायाम करके निम्नाङ्कित रूपसे विनियोग करे- 'अस्य त्वरितामन्त्रस्य सौरिऋषिविराट्छन्दः त्वरिता नित्या देवता स्त्री कवचम् । ॐ बीजं हुं शक्तिः क्षे कीलकम् ममाभीष्टसिद्धये जपे विनियोगः । इसका न्यासवाक्य इस प्रकार है- 'सौरये ऋषये नमः शिरसि विराट्छन्दसे नमः मुखे त्वरितानित्यादेवतायै नमः हृदि ॐ बीजाय नमः गुह्ये हुं शक्तये नमः पादयोः क्षे कीलकाय नमः नाभौ ।' अग्निपुराणमें दशाक्षरा 'तोतला त्वरिता का मन्त्र है। परंतु 'श्रीविद्यार्णव में द्वादशाक्षरा त्वरिता विद्या बतायी गयी है। यथा- 'ॐ ह्रीं हुं खे च छे क्षः स्त्री हुं क्षे ह्रीं फट्।' आदिके तीन और अन्तके दो अक्षर छोड़कर जो शेष सात अक्षर बचते हैं, उन्हींसे दो-दो अक्षर जोड़ते हुए न्यास करे। यथा- 'ॐ खे च हृदयाय नमः च छे शिरसे स्वाहा छे क्षः शिखायै वषट् क्षः स्त्री कवचाय हुम् । स्त्री हूं नेत्रत्रयाय वौषट् । हूं क्षे अस्त्राय फट्।' इसी तरह करन्यास भी करे। तत्पश्चात् - 'शिरसि हीं ॐ ह्रीं नमः। - ह्रीं च ह्रीं नमः । नाभी- ह्रीं छे ह्रीं नमः । मूलाधारे ह्रीं क्षः ह्रीं नमः । ऊरुद्वये ललाटे- ह्रीं हुं ह्रीं नमः । कण्ठे-हीं खे ह्रीं नमः हृदि ह्रीं स्त्री ह्रीं नमः । जानुद्वये-हीं हूं ह्रीं नमः । जङ्घाद्वये- ह्रीं क्षे ह्रीं नमः । पादद्वये-हीं फट् हाँ नमः।' इस प्रकार 'हाँ' बीजसे सम्पुटित अक्षरोंका न्यास करके समस्त विद्या (द्वादशाक्षरविद्या) द्वारा व्यापकन्यास करे। तदनन्तर ध्यानादि मानसपूजनान्त कर्म करके स्वर्णादि पट्टपर कुङ्कुम आदिद्वारा पश्चिमादि द्वारोंसे युक्त दो चतुरस्र रेखा बनाकर, उसके भीतर दो वृत्त बनाकर उसमें अष्टदलकमल अङ्कित करे। फिर पूर्ववत् आत्मपूजान्त कर्म करके भुवनेश्वरीपीठकी अर्चनाके बाद मूलविद्यासे मूर्तिनिर्माण कर आवाहनादि पुष्पोपचार अर्पित करे। कर्णिकामें पडङ्ग, गुरुपचित्रयकी पूजाके बाद बाहरकी वृत्तत्रयान्तरालगत दो वीथियों में देवीके अग्रवर्ती दलके अग्रभागमें फटकारीका, बाह्यवीथी–देवीके अग्रभागमें ही किंकराका, द्वारपार्श्वमें जया विजयाका, आठ दलों में क्रमश: हुंकारी, खेचरी, चण्डा, छेदिनी, क्षेपिणी, स्त्रीकारी, हूंकारी एवं क्षेमकारीकी पूजा करे फिर पूर्ववत् लोकपालादिकोंकी पूजा करके पूजा समाप्त करे।) ॥ २९ - ३३ ॥
अब मैं 'प्रणीता' आदि मुद्राओंका वर्णन करूँगा । 'प्रणीता' मुद्राएँ पाँच प्रकारकी मानी गयी हैं– 'प्रणीता', 'सबीजा प्रणीता', 'भेदनी', 'कराली' और 'वज्रतुण्डा'। दोनों हाथोंको परस्पर ग्रथित करके बीचमें अँगूठोंको डाल दे और तर्जनीको ऊपर लगाये रखे, इसका नाम 'प्रणीता' है। इसे हृदयदेशमें लगाये। इसी मुद्रामें कनिष्ठिका अँगुलीको ऊपरकी ओर उठाकर मध्यमें रखे तो वह द्विजोंद्वारा 'सबीजा' के नामसे मानी जाती है । यदि तर्जनीके बीचमें अनामिकाको परस्पर संलग्न करके अङ्गुष्ठके अग्रभागको मध्यभागमें रखे तो वह 'भेदनी' मुद्रा कही गयी है। उस मुद्राको नाभिदेशमें निबद्ध करके अङ्गुष्ठका जल छिड़के। उसीको मन्त्रसाधकके हृदयमें योजित करनेपर 'कराली' नामक महामुद्रा होती है। फिर पूर्ववत् ब्रह्मलग्ना ज्येष्ठाको ऊपर उठाये तो वह 'वज्रतुण्डा मुद्रा' होती है। उसको वज्रदेशमें आबद्ध करे। दोनों हाथों से मणिबन्ध (कलाई) को बाँधे और तीन-तीन अँगुलियोंको फैलाये रखे, इसे 'वज्रमुद्रा' कहते हैं। दण्ड, खड्ग, चक्र और गदा आदि मुद्राएँ उनकी आकृतिके अनुसार बतायी गयी हैं। अङ्गुष्ठसे तीन अँगुलियोंको आक्रान्त करे, वे तीनों ऊर्ध्वमुख हों तो 'त्रिशूलमुद्रा' होती है। एकमात्र मध्यमा अँगुली ऊपरकी ओर उठी रहे तो 'शक्तिमुद्रा सम्पादित होती है। बाण, वरद, धनुष, पाश, भार, घण्टा, शङ्ख, अङ्कुश, अभय और पद्म – ये (प्रणीतासे लेकर पद्मतक कुल) अट्ठाईस मुद्राएँ कही गयी हैं। ग्रहणी, मोक्षणी, ज्वालिनी, अमृता और अभया-ये पाँच 'प्रणीता' नामवाली मुद्राएँ हैं। इनका पूजन और होममें उपयोग करना चाहिये ॥ ३४-३७ ॥
इस प्रकार आदि आग्रेय महापुराणमें त्वरितामन्त्र तथा मुद्रा आदिका वर्णन' नामक तीन सौ दसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३१० ॥
Summary of chapter 311 of the Agni Mahā Purana is as follows:
The science of horses (aśvaśāstra) is narrated by Agni to Vasiṣṭha, covering the mythic origin of the horse from the sacrificial fire, the classification of horses by breed, gait, and limb proportion, and the marks (lakṣaṇa) indicating auspiciousness or inauspiciousness in a horse. The four gaits — walk (dhīra), trot (pramita), canter (āvalita), and gallop (dhāvana) — are described along with their appropriate uses in battle and ceremonial contexts. The chapter includes prognostic signs by which a horse's lifespan, temperament, and military suitability may be assessed, and concludes with the horse-diseases and their treatments derived from Śālihotra's tradition.