श्रीभगवान् हयग्रीव कहते हैं-
ब्रह्मन् ! सात अश्वोंसे जुते हुए एक पहियेवाले रथपर विराजमान सूर्यदेवकी प्रतिमाको स्थापित करना चाहिये। भगवान् सूर्य अपने दोनों हाथोंमें दो कमल धारण करते हैं। उनके दाहिने भागमें दावात और कलम लिये दण्डी खड़े हैं।('राज्ञी' और 'निष्प्रभा'—ये चँवर डुलानेवाली स्त्रियों के नाम हैं। अथवा इन नामों द्वारा सूर्यदेवको दोनों पत्तियोंकी और संकेत किया गया है। 'राज्ञी' शब्दसे उनकी रानी 'संज्ञा' गृहीत होती हैं और निष्प्रभा' शब्दसे 'छाया'। ये दोनों देवियाँ चैवर डुलाकर पतिकी सेवा कर रही हैं।) और वाम भागमें पिङ्गल हाथमें दण्ड लिये द्वारपर विद्यमान हैं। ये दोनों सूर्यदेवके पार्षद हैं। भगवान् सूर्यदेवके उभय पार्श्वमें बालव्यजन (चँवर) लिये 'राज्ञी' तथा 'निष्प्रभा' खड़ी हैं। अथवा घोड़ेपर चढ़े हुए एकमात्र सूर्यकी ही प्रतिमा बनानी चाहिये। समस्त दिक्पाल हाथोंमें वरद मुद्रा, दो-दो कमल तथा शस्त्र लिये क्रमशः पूर्वादि दिशाओं में स्थित दिखाये जाने चाहिये ॥ १-३ ॥
बारह दलोंका एक कमल-चक्र बनावे। उसमें सूर्य, अर्यमा (सूर्य आदि द्वादश आदित्योंके नाम नीचे गिनाये गये हैं और अर्यमा आदि द्वादश आदित्योंके नाम १९वें अध्यायके दूसरे और तीसरे श्लोकोंमें देखने चाहिये। वे नाम वैवस्वत मन्वन्तरके आदित्योंके हैं। चाक्षुष मन्वन्तरमें वे ही 'तुषित' नामसे विख्यात थे। अन्य पुराणोंमें भी आदित्योंकी नामावली तथा उनके मासक्रममें यहाँको अपेक्षा कुछ अन्तर मिलता है। इसकी संगति कल्पभेदके अनुसार माननी चाहिये।) आदि नामवाले बारह आदित्योंका क्रमशः बारह दलोंमें स्थापन करे । यह स्थापना वरुण-दिशा एवं वायव्यकोणसे आरम्भ करके नैर्ऋत्यकोणके अन्ततकके दलों में होनी चाहिये। उक्त आदित्यगण चार-चार हाथवाले हों और उन हाथों में मुद्गर, शूल, चक्र एवं कमल धारण किये हों। अग्निकोणसे लेकर नैर्ऋत्यतक, नैर्ऋत्यसे वायव्यतक, वायव्यसे ईशानतक और वहाँसे अग्निकोणतकके दलोंमें उक्त आदित्योंकी स्थिति जाननी चाहिये ॥ ४ ॥
बारह आदित्योंके नाम इस प्रकार हैं- वरुण, सूर्य, सहस्रांशु, धाता, तपन, सविता, गभस्तिक, रवि, पर्जन्य, त्वष्टा, मित्र और विष्णु। ये मेष आदि बारह राशियों में स्थित होकर जगत्को ताप एवं प्रकाश देते हैं। ये वरुण आदि आदित्य क्रमश: मार्गशीर्ष मास (या वृश्चिक राशि) से लेकर कार्तिक मास (या तुलाराशि) तकके मासों ( एवं राशियों) में स्थित होकर अपना - कार्य सम्पन्न करते हैं। इनकी अङ्गकान्ति क्रमशः काली, लाल, कुछ-कुछ लाल, पीली, पाण्डुवर्ण, श्वेत, कपिलवर्ण, पीतवर्ण, तोतेके समान हरी, धवलवर्ण, धूम्रवर्ण और नीली है। इनकी शक्तियाँ द्वादशदल कमलके केसरोंके अग्रभागमें स्थित होती हैं। उनके नाम इस प्रकार हैं- इडा, सुषुम्ना, विश्वार्चि, इन्दु, प्रमर्दिनी (प्रवर्द्धिनी), प्रहर्षिणी,महाकाली, कपिला, प्रबोधिनी, नीलाम्बरा, वनान्तस्था (घनान्तस्था) और अमृताख्या। वरुण आदिकी जो अङ्गकान्ति है, वही इन शक्तियोंकी भी है। केसरोंके अग्रभागों में इनकी स्थापना करे। सूर्यदेवका तेज प्रचण्ड और मुख विशाल है। उनके दो भुजाएँ हैं। वे अपने हाथों में कमल और खड्ग धारण करते हैं ॥ ५- १०॥
चन्द्रमा कुण्डिका तथा जपमाला धारण करते हैं। मङ्गलके हाथों में शक्ति और अक्षमाला शोभित होती हैं। बुधके हाथों में धनुष और अक्षमाला शोभा पाते हैं। बृहस्पति कुण्डिका और अक्षमालाधारी हैं। शुक्रका भी ऐसा ही स्वरूप है। अर्थात् उनके हाथोंमें भी कुण्डिका और अक्षमाला शोभित होती हैं। शनि किङ्किणी सूत्र धारण करते हैं। - राहु अर्द्धचन्द्रधारी हैं तथा केतुके हाथोंमें खड्ग और दीपक शोभा पाते हैं। अनन्त, तक्षक, कर्कोटक, पद्म, महापद्म, शङ्ख और कुलिक आदि सभी मुख्य नागगण सूत्रधारी होते हैं। फन ही इनके मुख हैं। ये सब के सब महान् प्रभापुञ्जसे उद्भासित होते हैं। इन्द्र वज्रधारी हैं। ये हाथीपर आरूढ होते हैं। अग्निका वाहन बकरा है। अग्निदेव शक्ति धारण करते हैं। यम दण्डधारी हैं। और भैंसेपर आरूढ होते हैं। निरृति खड्गधारी हैं और मनुष्य उनका वाहन है। वरुण मकरपर आरूढ हैं और पाश धारण करते हैं। वायुदेव वज्रधारी हैं और मृग उनका वाहन है। कुबेर भेड़पर चढ़ते और गदा धारण करते हैं। ईशान जटाधारी हैं और वृषभ उनका वाहन है ॥ ११-१५ ॥
समस्त लोकपाल द्विभुज हैं। विश्वकर्मा अक्षसूत्र धारण करते हैं। हनुमान्जीके हाथमें वज्र है। उन्होंने अपने दोनों पैरोंसे एक असुरको दबा रखा है। किंनर मूर्तियाँ हाथमें वीणा लिये हों - और विद्याधर माला धारण किये आकाशमें स्थित दिखाये जायँ। पिशाचोंके शरीर दुर्बल कङ्कालमात्र हों। वेतालोंके मुख विकराल हों। क्षेत्रपाल शूलधारी बनाये जायँ। प्रेतोंके पेट लंबे और शरीर कृश हों ॥ १६ - १८ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'सूर्यादि ग्रहों तथा दिक्पालादि देवताओंकी प्रतिमाओंके लक्षणोंका वर्णन' नामक इक्यावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५१ ॥
Summary of chapter 52 of the Agni Mahā Purana is as follows:
The fifty-second chapter describes the pañcāmṛta abhiṣeka — the ritual bathing of the deity's image with five sacred substances: milk, yogurt, ghee, honey, and sugar. The Purāṇa specifies the proper sequence of application (milk first, then yogurt, then ghee, then honey, then sugar, with pure water between each), the specific mantras accompanying each substance, and the way in which these five represent the five elements, the five prāṇa-s, or the five senses depending on the theological framing. The additional substances often added to the sequence — coconut water, sugarcane juice, rose water, turmeric water, and saffron water — are described. The chapter affirms that the deity's image, when bathed with these substances, truly partakes of them as cosmic nourishment, and the offerings return to the devotees as blessed prasāda carrying divine grace.