अग्निदेव कहते हैं-
मुने! पहले 'हुं' रखे, फिर 'खे च च्छे'- ये तीन पद जोड़कर मन्त्रकी शोभा बढ़ावे। तत्पश्चात् 'क्षः स्त्रीं हूं क्षे' लिखकर अन्तमें 'फट्' जोड़ दे। (कुल मिलाकर) 'हुं खे च च्छे क्षः स्त्रीं हूं क्षे ह्रीं फट् ।' यह दशाक्षरा त्वरिता विद्या हुई। यह विद्या समस्त कार्योंको सिद्ध करनेवाली तथा विष, सर्पादिका मर्दन करनेवाली है। 'खे च च्छे'- यह त्र्यक्षर विद्या काल (अथवा काले साँप) के डँसे हुएको भी जीवन देनेवाली है ॥ १-२ ॥
'ॐ हूं खे क्षः '– इस चतुरक्षरी विद्याका प्रयोग विष एवं सर्पदंशकी पीड़ाको नष्ट करनेवाला है। (पाठान्तर 'विषशत्रुप्रमर्दनः' के अनुसार उक्त विद्याका प्रयोग विष एवं शत्रुकी बाधाको दूर करनेवाला है।) 'स्त्रीं हूं फट् ' – इस विद्याका प्रयोग पाप तथा रोग आदिपर विजय दिलाता है। 'खे च' – इस द्व्यक्षर मन्त्रका प्रयोग शत्रु एवं दुष्ट आदिकी बाधाको दूर करता है। 'हूं स्त्रीं ॐ'— इस मन्त्रका प्रयोग स्त्री आदिको वशमें करनेवाला है। 'खे स्त्रीं खे' – इस मन्त्रका प्रयोग कालसर्पद्वारा डँसे गये मनुष्यके जीवनकी रक्षा करता है तथा शत्रुओं पर विजय दिलाता है। 'क्षः स्त्रीं क्षः' इसका प्रयोग वशीकरण तथा विजयका साधक है ॥ ३-५ ॥
कुब्जिका-विद्या
'ऐं ह्रीं श्रीं हसखफ्रें हसौः ॐ नमो भगवति हसखफ्रें कुब्जिके हस्तूं हस्खूं अघोरे घोरे अघोरमुखि छां छीं किणि किणि विच्चे हसौः हसखफ्रें श्रीं ह्रीं ऐं' (यह मन्त्र अग्रिपुराणकी विभिन्न पोथियों में विभिन्न रूपसे छपा है। कोई भी शुद्ध नहीं है, अतः 'श्रीविद्यार्णव तन्त्र' (अष्टम श्वास) में जो इसका शुद्ध पाठ मिलता है, वही यहाँ रखा गया है। वहीं इसका विनियोग-वाक्य यों दिया गया है – 'अस्य श्रीकुब्जिकामन्त्र रुद्र ऋषिर्गायत्री छन्दः कुब्जिका देवता हसौ: बीजं हसखफ्रें शक्तिः हसूं कीलकम्, श्रीविद्याङ्गत्वेन विनियोगः ।' पूनावाले अग्निपुराणमें इस मन्त्रका पाठ यों है—'ऐं ह्रीं श्रीं स्प्रत्यै भगवति अम्बिके कुब्जिके स्पायें स्फं स्फम् ऊं ठं ठं रण नमो घोरमुखिच्छां छीं किणि किणि बिच्छू स्फों हों श्रीं ह्रीम् ऐं।' यही मन्त्र बहुल पाठान्तरके साथ चौखम्बावाले संस्करणमें भी है। दोनों जगहका पाठ अशुद्ध ही है। पिछले १४३, १४४ अध्यायोंमें भी कुब्जिकाका प्रसङ्ग द्रष्टव्य है।)
— यह श्रीमती कुब्जिकाविद्या सब कार्योंको सिद्ध करनेवाली मानी गयी है ॥ ६ ॥ अब उन मन्त्रों का वर्णन किया जायगा, जिनका उपदेश भगवान् शंकरने स्कन्दको दिया था ॥ ७ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'त्वरिता आदि नाना मन्त्रोंका तथा कुब्जिका विद्याका वर्णन' नामक तीन सौ सोलहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३१६ ॥
Summary of chapter 318 of the Agni Mahā Purana is as follows:
The twelve rāśis (zodiacal signs) are described with their ruling planets, bodily limbs, elemental nature (fire, earth, air, water), and qualities (movable/cara, fixed/sthira, dual/dvisvabhāva). Agni explains how the lagna (ascendant) is determined from the time of birth and how the positions of grahas in the twelve bhāvas (houses) shape the native's life in areas ranging from body, wealth, and siblings to death, gains, and liberation. The strength (bala) of planets — sthānabala, kālabala, ceṣṭābala, naisargikabala — is introduced as the basis for correct prediction.