भगवान् शिव कहते हैं-
स्कन्द ! ईशान आदि कोणोंमें वास्तुमण्डलके बाहर पूर्ववत् चरकी आदिका पूजन करे। प्रत्येक देवताके लिये क्रमशः तीन-तीन आहुतियाँ दे। भूतबलि देकर नियत लग्नमें शिलान्यासका उपक्रम करे। खातके मध्यभागमें आधार शक्तिका न्यास करे। वहाँ अनन्त (शेषनाग) के मन्त्रसे अभिमन्त्रित उत्तम कलश स्थापित करे। 'लं पृथिव्यै नमः ।' इस मूल मन्त्रसे इस कलशपर पृथिवीस्वरूपा शिलाका न्यास करे। उसके पूर्वादि दिग्भागोंमें क्रमशः सुभद्र आदि आठ कलशोंकी स्थापना करे। पहले उनके लिये गड्ढे खोदकर उनमें आधार शक्तिका न्यास करनेके पश्चात् उक्त कलशोंको इन्द्रादि लोकपालोंके मन्त्रों द्वारा स्थापित करना चाहिये। तदनन्तर उन कलशोंपर क्रमश: नन्दा आदि शिलाओंको रखे ॥ १-४॥
तत्त्वमूर्तियोंके अधिदेवता सम्बन्धी शस्त्रों से - युक्त वे शिलाएँ होनी चाहिये। जैसे दीवारमें मूर्ति तथा अस्त्र आदि अङ्कित होते हैं, उसी प्रकार उन शिलाओं में शर्व आदि मूर्ति, देवताओंके अस्त्र शस्त्र अङ्कित रहें। उक्त शिलाओंपर कोण और दिशाओंके विभागपूर्वक धर्म आदि आठ देवताओंकी स्थापना करे। सुभद्र आदि चार कलशोंपर नन्दा आदि चार शिलाएँ अग्नि आदि चार कोणोंमें स्थापित करनी चाहिये। फिर जय आदि चार कलशोंपर अजिता आदि चार शिलाओंकी पूर्व आदि चार दिशाओंमें स्थापना करे। उन सबके ऊपर ब्रह्माजी तथा व्यापक महेश्वरका न्यास करके मन्दिरके मध्यवर्ती 'आकाश' नामक अध्वाका चिन्तन करे। इन सबको बलि अर्पित करके विघ्नदोषके निवारणार्थ अस्त्र-मन्त्रका जप करे। जहाँ पाँच ही शिलाएँ स्थापित करनेकी विधि है, उसके पक्षमें भी कुछ निवेदन किया जाता है ॥ ५-८॥
मध्यभागमें सुभद्र-कलशके ऊपर पूर्णा नामक शिलाकी स्थापना करे और अग्नि आदि कोणों में क्रमशः पद्म आदि कलशोंपर नन्दा आदि शिलाएँ स्थापित करे। मध्यशिलाके अभावमें चार शिलाएँ भी मातृभावसे सम्मानित करके स्थापित की जा सकती हैं। उक्त पाँचों शिलाओंकी प्रार्थना इस प्रकार करे―
'ॐ सर्वसंदोहस्वरूपे महाविद्ये पूर्णे! तुम अङ्गिरा ऋषिकी पुत्री हो। इस प्रतिष्ठाकर्ममें सब कुछ सम्यक् रूपसे ही पूर्ण करो। नन्दे! तुम समस्त पुरुषोंको आनन्दित करनेवाली हो। मैं यहाँ तुम्हारी स्थापना करता हूँ। तुम इस प्रासादमें सम्पूर्णतः तृप्त होकर तबतक सुस्थिरभावसे स्थित रहो, जबतक कि आकाशमें चन्द्रमा, सूर्य और तारे प्रकाशित होते रहें। वसिष्ठनन्दिनि नन्दे ! तुम देहधारियोंको आयु, सम्पूर्ण मनोरथ तथा लक्ष्मी प्रदान करो। तुम्हें प्रासादमें सदा स्थित रहकर यत्नपूर्वक इसकी रक्षा करनी चाहिये । ॐ कश्यपनन्दिनि भद्रे! तुम सदा समस्त लोकोंका कल्याण करो । देवि! तुम सदा ही हमें आयु,
मनोरथ और लक्ष्मी प्रदान करती रहो। ॐ देवि जये! तुम सदा सर्वदा हमारे लिये लक्ष्मी तथा आयु प्रदान करनेवाली होओ। भृगुपुत्रि देवि जये! तुम स्थापित होकर सदा यहीं रहो और इस मन्दिरके अधिष्ठाता मुझ यजमानको नित्य निरन्तर विजय तथा ऐश्वर्य प्रदान करनेवाली बनो । ॐ रिक्ते! तुम अतिरिक्त दोषका नाश करनेवाली तथा सिद्धि और मोक्ष प्रदान करनेवाली हो । शुभे! सम्पूर्ण देश - कालमें तुम्हारा निवास है। ईशरूपिणि ! तुम सदा इस प्रासादमें स्थित रहो ॥ ९ - १६॥
तत्पश्चात् आकाशस्वरूप मन्दिरका ध्यान करके उसमें तीन तत्त्वोंका न्यास करे फिर विधिवत् प्रायश्चित्त- होम करके यज्ञका विसर्जन करे ॥ १७ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'शिलान्यासकी विधिका वर्णन' नामक चौरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९४ ॥
Summary of chapter 95 of the Agni Mahā Purana is as follows:
The ninety-fifth chapter provides a comprehensive list of the timing rules and materials required for a major deity installation ceremony. The auspicious months for pratiṣṭhā — the five months from Māgha through Jyeṣṭha, excluding Caitra — are specified, with the requirement that Jupiter and Venus both be in favorable positions. The rules for selecting the auspicious nakṣatra, tithi, vāra, and lagna — with extensive lists of favorable and unfavorable combinations for each planet — are given in detail. The chapter then catalogs the materials required for a complete installation: the twelve types of sacred earth from mountain peaks, river banks, termite mounds, and elephant paths; the five types of tree bark; the five seasonal fruits; the eight types of grain; the eight types of metal; the eight classes of gems; the medicinal herbs (Vijayā, Lakṣmaṇā, Atibhalā, Pāṭhā, Śatāvarī, and others); and the full set of ritual implements, pots, vessels, and fabrics.