अग्नि महा पुराण

206- अगस्त्यके उद्देश्यसे अर्घ्यदान एवं उनके पूजनका कथन

अग्निदेव कहते हैं-

वसिष्ठ! महर्षि अगस्त्य साक्षात् भगवान् विष्णुके स्वरूप हैं। उनका पूजन करके मनुष्य श्रीहरिको प्राप्त कर लेता है। जब सूर्य कन्या राशिको प्राप्त न हुए हों (किंतु उसके निकट हों) तब ३ दिनतक उपवास रखकर अगस्त्यका पूजन करके उन्हें अर्घ्यदान दे। पहले दिन जब चार घंटा दिन बाकी रहे, तब व्रत आरम्भ करके प्रदोषकालमें अगस्त्य मुनिकी काश-पुष्पमयी मूर्तिको कलशपर स्थापित करे और उस कलशस्थित मूर्तिका पूजन करे। अर्घ्य देनेवालेको रात्रिमें जागरण भी करना चाहिये ॥ १-२३ ॥ (अगस्त्यके आवाहनका मन्त्र यह है -)

अगस्त्य मुनिशार्दूल तेजोराशे महामते ॥

इमां मम कृतां पूजां गृह्णीष्व प्रियया सह।

मुनिश्रेष्ठ अगस्त्य ! आप तेजःपुञ्जमय और महाबुद्धिमान् हैं। अपनी प्रियतमा पत्नी लोपामुद्राके साथ मेरे द्वारा की गयी इस पूजाको ग्रहण कीजिये ॥ ३३ ॥

इस प्रकार अगस्त्यका आवाहन करे और उन्हें गन्ध, पुष्प, फल, जल आदिसे अर्घ्यदान दे। तदनन्तर मुनिश्रेष्ठ अगस्त्यकी ओर मुख करके चन्दनादि उपचारों द्वारा उनका पूजन करे। दूसरे दिन प्रातःकाल कलशस्थित अगस्त्यकी मूर्तिको किसी जलाशयके समीप ले जाकर निम्नलिखित मन्त्रसे उन्हें अर्घ्य समर्पित करे ॥ ४ ॥

काशपुष्पप्रतीकाश अग्निमारुतसम्भव ॥

मित्रावरुणयोः पुत्र कुम्भयोने नमोऽस्तु ते ।

आतापिर्भक्षितो येन वातापिश्च महासुरः ।।

समुद्रः शोषितो येन सोऽगस्त्यः सम्मुखोऽस्तु मे ।

अगस्ति प्रार्थयिष्यामि कर्मणा मनसा गिरा।

अर्चयिष्याम्यहं मैत्रं परलोकाभिकाङ्क्षया ।

काशपुष्पके समान उज्वल, अग्नि और वायुसे प्रादुर्भूत, मित्रावरुणके पुत्र, कुम्भसे प्रकट होनेवाले अगस्त्य ! आपको नमस्कार है। जिन्होंने राक्षसराज आतापी और वातापीका भक्षण कर लिया था तथा समुद्रको सुखा डाला था, वे अगस्त्य मेरे सम्मुख प्रकट हों। मैं मन, कर्म और वचनसे अगस्त्यकी प्रार्थना करता हूँ। मैं उत्तम लोकोंकी आकाङ्क्षासे अगस्त्यका पूजन करता हूँ॥५-७॥

चन्दन-दान- मन्त्र

द्वीपान्तरसमुत्पन्नं देवानां परमं प्रियम् ॥

राजानं सर्ववृक्षाणां चन्दनं प्रतिगृह्यताम् ।

जम्बूद्वीपके बाहर उत्पन्न, देवताओंके परमप्रिय, समस्त वृक्षोंके राजा चन्दनको ग्रहण कीजिये ॥८॥

पुष्पमाला अर्पण धर्मार्थकाममोक्षाणां भाजनी पापनाशनी ॥

सौभाग्यारोग्यलक्ष्मीदा पुष्पमाला प्रगृह्यताम् । महर्षि अगस्त्य ! यह पुष्पमाला धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थोंको देनेवाली एवं पापोंका नाश करनेवाली है। सौभाग्य, आरोग्य और लक्ष्मीकी प्राप्ति करानेवाली इस पुष्पमालाको आप ग्रहण कीजिये ॥ ९ ॥

धूपदान-मन्त्र

धूपोऽयं गृह्यतां देव! भक्तिं मे ह्यचलां कुरु ॥

ईप्सितं मे वरं देहि परमां च शुभां गतिम् ।

भगवन् ! अब यह धूप ग्रहण कीजिये और आपमें मेरी भक्तिको अविचल कीजिये। मुझे इस लोकमें मनोवाञ्छित वस्तुएँ और परलोकमें शुभगति प्रदान कीजिये ॥ १० ॥

वस्त्र, धान्य, फल, सुवर्णसे युक्त अर्घ्य दान- मन्त्र

सुरासुरैर्मुनिश्रेष्ठ सर्वकामफलप्रद ॥

वस्त्रव्रीहिफलैर्हेम्ना दत्तस्त्वयों ह्ययं मया ।

देवताओं तथा असुरोंसे भी समादृत मुनिश्रेष्ठ अगस्त्य ! आप सम्पूर्ण अभीष्ट फल प्रदान करनेवा हैं। मैं आपको वस्त्र, धान्य, फल और सुवर्णसे युक्त यह अर्घ्य प्रदान करता हूँ ॥ ११ ॥

फलार्घ्यदान-मन्त्र

अगस्त्यं बोधयिष्यामि यन्मया मनसोद्धृतम् ।

फलैरर्घ्यं प्रदास्यामि गृहाणार्घ्यं महामुने ॥

महामुने! मैंने मनमें जो अभिलाषा कर रखी थी, तदनुसार मैं अगस्त्यजीको जगाऊँगा। आपको फलार्घ्य अर्पित करता हूँ, इसे ग्रहण कीजिये ॥ १२ ॥

(केवल द्विजोंके लिये उच्चारणीय अर्घ्यदानका वैदिक मन्त्र )

अगस्त्य एवं खनमानो धरित्रीं प्रजामपत्यं बलमीहमानः ।

उभौ कर्णावृषिरुग्रतेजाः पुपोष सत्या देवेष्वाशिषो जगाम ॥

महर्षि अगस्त्य इस प्रकार प्रजा संतति तथा बल एवं पुष्टिके लिये सचेष्ट हो कुदाल या खनित्रसे धरतीको खोदते रहे। उन उग्रतेजस्वी ऋषिने दोनों कर्णौ (सम्पूर्ण इन्द्रियोंकी शक्ति) - का पोषण किया। देवताओंके प्रति उनकी सारी आशी प्रार्थना सत्य हुई ॥ १३ ॥

( तदनन्तर निम्नलिखित मन्त्रसे लोपामुद्राको अर्घ्यदान दे )

राजपुत्रि नमस्तुभ्यं मुनिपत्नि महाव्रते।

अर्घ्यं गृह्णीष्व देवेशि लोपामुद्रे यशस्विनि ॥

महान् व्रतका पालन करनेवाली राजपुत्री अगस्त्यपत्नी देवेश्वरी लोपामुद्रे! आपको नमस्कार है। यशस्विनि ! इस अर्घ्यको ग्रहण कीजिये ॥ १४ ॥ अगस्त्यके लिये पञ्चरत्न, सुवर्ण और रजतसे युक्त एवं सप्तधान्यसे पूर्ण पात्र तथा दधि- चन्दन से समन्वित अर्घ्य प्रदान करे। स्त्रियों और शूद्रोंको 'काशपुष्पप्रतीकाश' आदि पौराणिक मन्त्रसे अर्घ्य देना चाहिये ॥ १५ ॥

विसर्जन-मन्त्र

अगस्त्य मुनिशार्दूल तेजोराशे च सर्वदा ॥

इमां मम कृतां पूजां गृहीत्वा व्रज शान्तये।

मुनिश्रेष्ठ अगस्त्य ! आप तेजःपुञ्जसे प्रकाशित

और सब कुछ देनेवाले हैं। मेरे द्वारा की गयी इस पूजाको ग्रहणकर शान्तिपूर्वक पधारिये ॥ १६ ॥ इस प्रकार अगस्त्यका विसर्जन करके उनके उद्देश्यसे किसी एक धान्य, फल और रसका त्याग करे। तदनन्तर ब्राह्मणोंको घृतमिश्रित खीर और लड्डू आदि पदार्थोंका भोजन करावे और उन्हें गौ, वस्त्र, सुवर्ण एवं दक्षिणा दे। इसके बाद उस कुम्भका मुख घृतमिश्रित खीरयुक्त पात्रसे ढककर, उसमें सुवर्ण रखकर वह कलश ब्राह्मणको दान दे। इस प्रकार सात वर्षोंतक अगस्त्यको अर्घ्य देकर सभी लोग सब कुछ प्राप्त कर सकते हैं। इससे स्त्री सौभाग्य और पुत्रोंको, कन्या पतिको और राजा पृथ्वीको प्राप्त करता है ॥ १७ - २० ॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'अगस्त्यके लिये अर्घ्यदानका वर्णन' नामक दो सौ छठा अध्याय पूरा हुआ ॥ २०६ ॥