अग्निदेव कहते हैं-
अब मैं तुम्हें 'एकाक्षराभिधान' तथा मातृकाओंके नाम एवं मन्त्र बतलाता हूँ । सुनो- 'अ' नाम है भगवान् विष्णुका। 'अ' निषेध अर्थमें भी आता है। 'आ' ब्रह्माजीका बोध कराता है। वाक्य-प्रयोगमें भी उसका उपयोग होता है। 'सीमा' अर्थमें 'आ' अव्ययपद है। क्रोध और पीड़ा अर्थमें भी उसका प्रयोग किया जाता है। 'इ' काम अर्थमें प्रयुक्त होता है। 'ई' रति और लक्ष्मीके अर्थमें आता है। 'उ' शिवका वाचक है। 'ऊ' रक्षक आदि अर्थोंमें प्रयुक्त होता है। 'ऋ' शब्दका बोधक है। 'ॠ' अदितिके अर्थमें प्रयुक्त होता है। 'लू', 'लु' – ये दोनों अक्षर दिति एवं कुमार कार्तिकेयके बोधक हैं। 'ए' का अर्थ है- देवी। 'ऐ' योगिनीका वाचक है। 'ओ' ब्रह्माजीका और 'औ' महादेवजीका बोध करानेवाला है। 'अं' का प्रयोग काम अर्थमें होता है। 'अः' प्रशस्त (श्रेष्ठ) का वाचक है। 'क' ब्रह्मा आदिके अर्थमें आता है। 'कु' कुत्सित (निन्दित) अर्थमें प्रयुक्त होता है। 'खं' – यह पद शून्य, इन्द्रिय और मुखका वाचक है। 'ग' अक्षर यदि पुल्लिङ्गमें हो तो गन्धर्व, गणेश तथा गायकका वाचक होता है। नपुंसकलिङ्ग 'ग' गीत अर्थमें प्रयुक्त होता है। 'घ' घण्टा तथा करधनीके अग्रभागके अर्थमें आता है। 'ताडन' अर्थमें भी 'घ' आता है। 'ङ' अक्षर विषय, स्पृहा तथा भैरवका वाचक है। 'च' दुर्जन तथा निर्मल अर्थमें प्रयुक्त होता है। छ' का अर्थ छेदन है। 'जि' विजेयके अर्थमें आता है। 'ज' पद गीतका वाचक है। 'झ' का अर्थ प्रशस्त, 'ञ' का बल तथा 'ट' का गायन है। 'ठ' का अर्थ चन्द्रमण्डल, शून्य, शिव तथा उद्बन्धन है। 'ड' अक्षर रुद्र, ध्वनि एवं त्रासके अर्थमें आता है। ढक्का और उसकी आवाजके अर्थमें 'ढ' का प्रयोग होता है। 'ण' निष्कर्ष एवं निश्चयके अर्थमें आता है। 'त' का अर्थ है तस्कर (चोर) और सूअरकी पूँछ। 'थ' भक्षण और 'द' छेदन, धारण तथा शोभनके अर्थमें आता है। 'ध' धाता ( धारण करनेवाले या ब्रह्माजी) तथा धूस्तूर (धतूरे) के अर्थमें प्रयुक्त - होता है। 'न' का अर्थ समूह और सुगत (बुद्ध) है। 'प' उपवनका और 'पू: ' झंझावातका बोधक है। 'फु' फूँकने तथा निष्फल होनेके अर्थमें आता है। 'बि' पक्षी तथा 'भ' ताराओंका बोधक है। 'मा' का अर्थ है- लक्ष्मी, मान और माता। 'य' योग, याता (यात्री अथवा दयादिन) तथा 'ईरिण' नामक वृक्षके अर्थमें आता है ॥ १- १० ॥
'र' का अर्थ है- अग्नि, बल और इन्द्र 'ल' का विधाता, 'व' का विश्लेषण (वियोग या बिलगाव) और वरुण तथा 'श' का अर्थ शयन एवं सुख है। 'ष' का अर्थ श्रेष्ठ, 'स' का परोक्ष, 'सा' का लक्ष्मी, 'स' का बाल, 'ह' का धारण तथा रुद्र और 'क्ष' का क्षेत्र, अक्षर, नृसिंह, हरि, क्षेत्र तथा पालक है। एकाक्षरमन्त्र देवतारूप होता है। वह भोग और मोक्ष देनेवाला है। 'क्षौं हयशिरसे नमः' यह सब विद्याओंको देनेवाला मन्त्र है। अकार आदि नौ अक्षर भी मन्त्र हैं; ' उन्हें उत्तम 'मातृका मन्त्र' कहते हैं। इन मन्त्रों को एक कमलके दलमें स्थापित करके इनकी पूजा करे। इनमें नौ दुर्गाओंकी भी पूजा की जाती है । भगवती, कात्यायनी, कौशिकी, चण्डिका, प्रचण्डा, सुरनायिका, उग्रा, पार्वती तथा दुर्गाका पूजन करना चाहिये। 'ॐ चण्डिकायै विद्महे भगवत्यै धीमहि तन्नो दुर्गा प्रचोदयात्'– यह दुर्गा मन्त्र है। षडङ्ग आदिके क्रमसे पूजन करना उचित है। अजिता, अपराजिता, जया, विजया, कात्यायनी, भद्रकाली, मङ्गला, सिद्धि, रेवती, सिद्ध आदि वटुक तथा एकपाद, भीमरूप, हेतुक, कापालिकका पूजन करे। मध्यभागमें नौ दिक्पालोंकी पूजा करनी चाहिये। मन्त्रार्थकी सिद्धिके लिये 'ह्रीं दुर्गे रक्षिणि स्वाहा' – इस मन्त्रका जप करे। गौरीकी पूजा करे; धर्म आदिका, स्कन्द आदिका तथा शक्तियोंका यजन करे प्रज्ञा ज्ञानक्रिया, वाचा, वागीशी, ज्वालिनी, वामा, ज्येष्ठा, रौद्रा, गौरी, ही तथा पुरस्सरा देवीका 'ह्रीं सः महागौरि रुद्रदयिते स्वाहा' – इस मन्त्रसे - महागौरीका तथा ज्ञानशक्ति, क्रियाशक्ति, सुभगा, ललिता, कामिनी, काममाला और इन्द्रादि शक्तियोंका पूजन भी एकाक्षर मन्त्रोंसे होता है। गणेश पूजनके लिये 'ॐ गं स्वाहा' 'यह मूलमन्त्र है। अथवा - 'गं गणपतये नमः ।' से भी उनकी - पूजा होती है। रक्त, शुक्ल, दन्त, नेत्र, परशु और मोदक- यह 'षडङ्ग' कहा गया है। 'गन्धोल्काय नमः ।' से क्रमशः गन्ध आदि निवेदन करे। गज, महागणपति तथा महोल्क भी पूजनके योग्य हैं। पद्मद्रष्ट्राय, मेघोल्काय, धूमोल्काय, वक्रतुण्डाय, विघ्नेश्वराय, विकटोत्कटाय, गजेन्द्रगमनाय, भुजगेन्द्रहाराय, शशाङ्कधराय, गणाधिपतये स्वाहा।' इन मन्त्रोंके आदिमें 'क' आदि एकाक्षर बीज मन्त्र लगाये और अन्तमें 'नमः' 'कूष्माण्डाय, एकदन्ताय, त्रिपुरान्तकाय, श्यामदन्तविकटहरहासाय, लम्बनासाननाय, एवं 'स्वाहा' शब्दका प्रयोग करे। फिर इन्हीं मन्त्रों द्वारा तिलोंसे होम आदि करके मन्त्रार्थभूत देवताका पूजन करे। अथवा द्विरेफ, द्विर्मुख एवं द्वयक्ष आदि पृथक्-पृथक् मन्त्र हो सकते हैं। अब कुमार कार्तिकेयजीने कात्यायनको जिसका उपदेश किया था, वह व्याकरण बतलाऊँगा ॥ ११- २८ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'एकाक्षराभिधान' नामक तीन सौ अड़तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३४८ ॥
Summary of chapter 350 of the Agni Mahā Purana is as follows:
The rules governing the junction of sounds (sandhi) are presented with worked examples. Svara-sandhi (vowel junction) is treated first: identical vowels coalesce into the corresponding long vowel (a + a = ā), dissimilar vowels combine according to the rules of guṇa and vṛddhi, and semi-vowel substitution (yaṇādeśa) and glide formation rules are illustrated with ślokas. Vyañjana-sandhi (consonant junction) covers the assimilation of stop consonants, the insertion of the nasal, and the treatment of the anusvāra and visarga. Visarga-sandhi rules — the change of visarga before voiced consonants to the corresponding sibilant or to the vowel o — are worked through with Purāṇic compound words as examples.