भगवान् महेश्वर कहते हैं-
स्कन्द ! अब मैं दमनकारोपणकी विधिका वर्णन करूँगा। इसमें भी सब कार्य पूर्ववत् करने चाहिये। प्राचीन कालमें भगवान् शंकरके कोपसे भैरवकी उत्पत्ति हुई। भैरवने देवताओंका दमन आरम्भ किया। यह देख त्रिपुरारि शिवने रुष्ट होकर भैरवको शाप दिया- 'तुम वृक्ष हो जाओ।' फिर भैरवके क्षमा माँगनेपर प्रसन्न हो भगवान् शिव बोले- 'जो मनुष्य तुम्हारे पत्रों द्वारा पूजन करेंगे, अथवा तुम्हारी पूजा करेंगे, उनका मनोवाञ्छित फल पूरा होगा। उनकी इच्छा किसी तरह अपूर्ण नहीं रहेगी।' सप्तमी या त्रयोदशी तिथिको मन्त्रवेत्ता पुरुष संहिता मन्त्रों से दमनक-वृक्षकी पूजा करके - उसे भगवान् शंकरके वाक्यका स्मरण दिलाते हुए जगावे - ॥ १-३३ ॥
हरप्रसादसम्भूत त्वमत्र संनिधीभव ।
शिवकार्य समुद्दिश्य नेतव्योऽसि शिवाज्ञया ॥
'दमनक! तुम भगवान् शंकरके कृपाप्रसादसे प्रकट हुए हो। तुम यहाँ संनिहित हो जाओ। भगवान् शिवकी आज्ञासे उन्हींके कार्यके उद्देश्य से मुझे तुम्हें अपने साथ ले जाना है।' घरपर भी उस वृक्षको आमन्त्रित करे और सायंकालमें अधिवासन-कर्म सम्पन्न करे। विधिपूर्वक सूर्य, शंकर और अग्निदेवकी पूजा करके, इष्टदेवता पश्चिम भागमें मिट्टीके साथ संयुक्त करके उस वृक्षकी जड़को स्थापित करे। वामदेव मन्त्र अथवा शिरोमन्त्रसे उस वृक्षकी नाल तथा आँवलेका फल उत्तर दिशामें रखे। उसके टूटे हुए पत्रको दक्षिणमें तथा पुष्प और धावनको पूर्वमें स्थापित करे ॥ ४–७ ॥
ईशानकोणमें एक दोनेमें उसके फल और मूलको रखकर भगवान् शिवका पूजन करे। उस वृक्षकी जड़, नाल, पत्र, फूल और फल – इन पाँचों अङ्गोंको अञ्जलिमें लेकर आमन्त्रित करते हुए सिरपर रखे और इस प्रकार कहे–'देवेश्वर! मैं आज आपको निमन्त्रित करता हूँ। कल प्रातःकाल मुझे तपस्याका लाभ लेना है— की हुई उपासनाको सफल बनाना है। वह सब कार्य आपकी आज्ञासे पूर्ण हो ।' तत्पश्चात् पात्रमें रखे हुए शेष पवित्रकको मूल मन्त्रसे ढककर प्रातःकाल स्नान करनेके पश्चात् जगदीश्वर शिवका गन्ध पुष्प आदिसे पूजन करे ॥ ८-१० ॥
तदनन्तर नित्य-नैमित्तिक कर्म करके दमनकसे पूजन करे। शेष दमनकको अञ्जलिमें लेकर 'ॐ हां आत्मतत्त्वाधिपतये शिवाय स्वाहा।',
'ॐ हां विद्यातत्त्वाधिपतये शिवाय स्वाहा।', 'ॐ हां शिवतत्त्वाधिपतये शिवाय स्वाहा।', ॐ हां सर्वतत्त्वाधिपतये शिवाय स्वाहा।' – इन चार मन्त्रों द्वारा दमनक चढ़ाकर शिवका पूजन करना चाहिये। तदनन्तर दमनककी चौथी अञ्जलि लेकर 'ॐ हौं महेश्वराय मखं पूरय पूरय शूलपाणये नमः । - इस मन्त्रके उच्चारणपूर्वक भगवान् शिवको अर्पित करे ॥ ११-१३॥
इस प्रकार शिव और अग्निकी पूजा करके गुरुकी विशेषरूपसे अर्चना करते हुए प्रार्थना करे – 'भगवन् ! मैंने दमनकद्वारा पूजनकर्ममें जो न्यूनता या अधिकता कर दी है, वह सब आपकी कृपासे परिपूर्ण हो जाय।' इस रीतिसे दमनकारोपण-कर्मका सम्पादन करके मनुष्य चैत्रमासजनित सम्पूर्ण फलको पाता है और अन्तमें स्वर्ग लोकको जाता है ॥ १४-१५ ॥ -
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'दमनकारोपणकी विधिका वर्णन' नामक अस्सीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८० ॥
Summary of chapter 81 of the Agni Mahā Purana is as follows:
The eighty-first chapter marks a major transition in the Purāṇa's content, introducing the sacred subject of Śaiva dīkṣā — the initiation that grants entry into Śiva's community of properly consecrated worshippers. The three categories of souls who approach dīkṣā — vijñānakala (pure souls bound only by āṇava mala), pralayākala (souls bound by āṇava and kārma mala-s), and sakala (souls bound by all three mala-s) — are distinguished, and the appropriate type of dīkṣā for each is described. The four types of dīkṣā — nirādhārā, sādhārā, sabīja, and nirbīja — are enumerated. The chapter then describes how the guru, having identified himself with Śiva, constructs the initiation maṇḍala and performs the crucial nāḍī-saṃdhāna — the connecting of the guru's own subtle channels with those of the śiṣya, creating the ritual space for the transmission of Śiva's grace.