अग्नि महा पुराण

58- भगवद्विग्रहको स्नान और शयन कराने की विधि

श्रीभगवान् हयग्रीव कहते हैं-

ब्रह्मन् ! आचार्य  ईशानकोणमें एक होमकुण्ड तैयार करे और उसमें वैष्णव-अग्निकी स्थापना करे। तदनन्तर गायत्री मन्त्रसे एक सौ आठ आहुतियाँ देकर सम्पात विधिसे कलशोंका प्रोक्षण करे। तदनन्तर मूर्तिपालक विद्वानों तथा शिल्पियोंसहित यजमान बाजे-गाजेके साथ कारुशाला (कारीगरकी कर्मशाला)- में जाय। वहाँ प्रतिमावर्ती इष्टदेवताके दाहिने हाथमें कौतुक-सूत्र (कङ्कण आदि) बाँधे । उसे बाँधते समय 'विष्णवे शिपिविष्टाय नमः । इस मन्त्रका पाठ करे उस समय आचार्यके हाथमें भी ऊनी सूत, सरसों और रेशमी वस्त्र कौतुक बाँध देना चाहिये। मण्डलमें सवस्त्र प्रतिमाकी स्थापना और पूजा करके उसकी स्तुति करते हुए कहे–'विश्वकर्माकी बनायी हुई देवेश्वर प्रतिमे! तुम्हें नमस्कार है। सम्पूर्ण जगत्को प्रभावित करनेवाली जगदम्ब ! तुम्हें मेरा बारंबार प्रणाम है। ईश्वरि ! मैं तुममें निरामय नारायणदेवका पूजन करता हूँ। तुम शिल्प सम्बन्धी दोषोंसे - रहित हो; अतः मेरे लिये सदा समृद्धिशालिनी बनी रहो' ॥ १-५३॥

इस तरह प्रार्थना करके प्रतिमाको स्नान मण्डपमें ले जाय। शिल्पीको यथेष्ट द्रव्य देकर संतुष्ट करे। गुरुको गोदान दे। 'चित्रं देवाना०' (चित्र देवानामुदगादनीकं चक्षुमित्रस्य वरुणस्याग्ने:। आप्रा द्यावापृथिवी अन्तरिक्षः सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च स्वाहा ॥ (यजु० ७१४२ तथा १३४६)) इत्यादि मन्त्रसे प्रतिमाका नेत्रोन्मीलन करे। 'अग्निर्ज्योति ०( अग्निज्योतिज्योतिरग्निः स्वाहा सूर्यो ज्योतिज्योतिः सूर्यः स्वाहा। अग्निर्वच ज्योतिर्वर्थः स्वाहा सूर्यो वर्षो ज्योतिर्वर्चः स्वाहा। ज्योतिः सूर्यः सूर्यो ज्योतिः स्वाहा ॥ (यजु० ३।९)) इत्यादि मन्त्रसे दृष्टिसंचार करे। फिर भद्रपीठपर प्रतिमाको स्थापित करे। तत्पश्चात् आचार्य श्वेत पुष्प, घी, सरसों, दूर्वादल तथा कुशाग्र इष्टदेवके सिरपर चढ़ावे ॥ ६-८ ॥

इसके बाद 'मधु(मधु वाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः माध्वीनः सन्त्वोषधीः ॥ मधु नक्तमुतोषसी मधुमत्पार्थिवरजः मधु चौरस्तु नः पिता ॥ मधुमान्नो वनस्पतिर्मधुमऽ अस्तु सूर्यः ॥ माध्वीर्गावो भवन्तु नः ॥ (यजु० १३ २७, २८, २९)वाता०' इत्यादि मन्त्रसे गुरु प्रतिमाके नेत्रों में अञ्जन करे। उस समय 'हिरण्यगर्भः ०((यजु० १३१४) यह मन्त्र अध्याय ५६ की टिप्पणी में दिया जा चुका है।) इत्यादि तथा 'इमं मे वरुण०' (यजु० २१ । १) इत्यादि मन्त्रोंका कीर्तन करे। | तत्पश्चात् पुनः 'घृतवती०' (घृतवती भुवनानामभित्रियोर्वी पृथ्वी मधुदुधे सुपेशसा। द्यावा पृथिवी वरुणस्य धर्मणा विष्कमिते अजरे भूरिरेतसा ॥ (यजु० ३४४५)) ऋचाका पाठ करते हुए घृतका अभ्यङ्ग लगावे। इसके बाद मसूरके बेसनसे उबटनका काम लेकर 'अतो देवाः ०(अतो देवा अवन्तु नो यतो विष्णुर्विचक्रमे पृथिव्याः सप्तधामभिः ॥ (ऋ० म० १. सू०२२ १६ )) इत्यादि मन्त्रका कीर्तन करे। फिर 'सप्त (सप्त ते अग्ने समिधः सप्त जिलाः सप्त ऋषयः सप्त धाम प्रियाणि सप्त होत्रा सप्तधा त्वा यजन्ति सप्त योनीरापूणस्वा घृतेन स्वाहा (यजु० १७७९)) ते अग्ने०' इत्यादि मन्त्र बोलकर गुरु गर्म जलसे प्रतिमाका प्रक्षालन करे। तदनन्तर 'द्रुपदादिव० (द्रुपदादिव मुमुचानः स्विन्नः स्नातो मलादिव पूतं पवित्रेणेवाज्यमापः शुन्धन्तु मैनसः ॥ (यजु० २० २० )) इत्यादि मन्त्रसे अनुलेपन और 'आपो (आपो हि ष्ठा मयोभुवस्ता न ऊर्जे दधातन महे रणाय चक्षसे ॥ यो वः शिवतमो रसस्तस्य भाजयतेह नः उशतीरिव मातरः ॥ तस्मा अरं गमाम वो यस्य क्षयाय जिन्वथ आपो जनयथा च नः ॥ (यजु० ११ ५० ५१५२)) हि ष्ठा०' इत्यादिसे अभिषेक करे। अभिषेकके पश्चात् नदी एवं तीर्थके जलसे स्नान कराकर 'पावमानी' ऋचा (शु० यजु० ३९-४३) का पाठ करते हुए रत्न स्पर्शसे युक्त जलद्वारा स्नान करावे। 'समुद्रं (समुद्रं गच्छ स्वाहान्तरिक्षं गच्छ स्वाहा देवर सवितारं गच्छ स्वाहा मित्रावरुणौ गच्छ स्वाहाहोरात्रे गच्छ स्वाहा छन्दारसि गच्छ स्वाहा द्यावापृथिवी गच्छ स्वाहा यज्ञं गच्छ स्वाहा सोमं गच्छ स्वाहा दिव्यं नमो गच्छ स्वाहाग्निं वैश्वानरं गच्छ स्वाहा। मनो मे हार्दि यच्छ दिवं ते धूमो गच्छतु स्वज्योतिः पृथिवीं भस्मनापूर्ण स्वाहा । (यजु० ६।२१)) गच्छ स्वाहा०' इत्यादि मन्त्र पढ़कर तीर्थकी मृत्तिका और कलशके जलसे स्नान करावे 'शं नो (शं नो देवीरभीष्टय आपो भवन्तु पीतये शं योरभि स्रवन्तु नः (अथर्ववेद १९६१))। देवी:०' इत्यादि तथा गायत्री मन्त्रसे गरम जलके द्वारा इष्टदेवकी प्रतिमाको नहलावे ॥ ९-१३ ॥

'हिरण्यगर्भः०' इत्यादि मन्त्रसे पाँच प्रकारकी मृत्तिकाओंद्वारा परमेश्वरको स्नान करावे। इसके बाद 'इमं मे गङ्गे यमुने०' इत्यादि मन्त्र बालुकामिश्रित जलके द्वारा तथा 'तद्' विष्णोः ०' इत्यादि मन्त्रसे बाँबीकी मिट्टी मिले हुए जलसे पूर्ण घटके द्वारा भगवान्‌को स्नान करावे। 'या ओषधी:०'इत्यादि मन्त्रसे ओषधिमिश्रित जलके द्वारा, 'यज्ञा'यज्ञा०' इत्यादि मन्त्रसे आँवले आदि कसैले पदार्थोंसे मिश्रित जलके द्वारा, 'पयः' पृथिव्याम्०' इत्यादि मन्त्र पञ्चगव्यों द्वारा तथा 'याः फलिनी:०' इत्यादि मन्त्रसे फलमिश्रित जलके द्वारा भगवान्को नहलावे । 'विश्वतश्चक्षुः०' इत्यादि मन्त्रसे उत्तरवर्ती कलशद्वारा, 'सोमं' राजानम्०' इस मन्त्रसे पूर्ववर्ती कलशद्वारा, 'विष्णो' रराटमसि०' इत्यादि मन्त्रसे दक्षिणवर्ती कलशद्वारा तथा 'हसः शुचिषद्' इत्यादि मन्त्रसे पश्चिमवर्ती कलशद्वारा भगवान्को उद्वर्तन स्नान करावे ॥ १४–१७ ।।

'मूर्द्धानं दिवो०' इत्यादि मन्त्रसे आँवले मिले हुए जलके द्वारा, 'मा नस्तोके०' इत्यादि मन्त्रसे जटामांसीमिश्रित जलके द्वारा, 'गन्धद्वाराम्०' इत्यादि मन्त्रसे गन्धमिश्रित जलके द्वारा तथा 'इदमाप: ०' इत्यादि मन्त्रसे इक्यासी पदोंवाले | वास्तुमण्डलमें रखे गये कलशोंद्वारा भगवान्‌को नहलावे। इस प्रकार स्नानके पश्चात् भगवान्‌को सम्बोधित करके कहे- 'भगवन्! समस्त लोकोंपर | अनुग्रह करनेवाले सर्वव्यापी वासुदेव! आइये, | आइये, इस यज्ञभागको ग्रहण कीजिये। आपको नमस्कार है। इस प्रकार देवेश्वरका आवाहन करके उनके हाथमें बँधा हुआ मङ्गलसूत्र खोल दे। उसे खोलते समय 'मुञ्चामि त्वा०' इस  मन्त्रका पाठ करे। इसी मन्त्रसे आचार्यका भी कौतुकसूत्र खोल दे। तदनन्तर 'हिरण्मयेन०' इत्यादि मन्त्रसे पाद्य और 'अतो देवाः०' (ऋक्० १ । १३ ।६) इत्यादि मन्त्रसे अर्घ्य दे। फिर 'मधु वाता:०' इत्यादि मन्त्रसे मधुपर्क देकर* 'मयि गृह्णामि०' इत्यादि मन्त्रसे आचमन करावे। तत्पश्चात् विद्वान् पुरुष 'अक्षन्नमीमदन्त०' इत्यादि मन्त्र पढ़कर भगवान्‌के श्रीअङ्गोंपर दूर्वा एवं अक्षत बिखेरे ॥ १८- २२ ॥

'काण्डात्०' इत्यादि मन्त्रसे निर्मञ्छन करे । 'गन्धवती०' इत्यादिसे गन्ध अर्पित करे। 'उन्नयामि०' इस मन्त्रसे फूल-माला और 'इदं विष्णुः०' इत्यादि मन्त्रसे पवित्रक अर्पित करे । 'बृहस्पते' इत्यादि मन्त्रसे एक जोड़ा वस्त्र चढ़ावे। 'वेदाहमेतम्' इत्यादिसे उत्तरीय अर्पित करे । 'महाव्रतेन०' इस मन्त्रसे फूल और औषध इन सबको चढ़ावे। तदनन्तर 'धूरसि०' इस मन्त्रसे धूप दे । 'विभ्रा०' सूक्तसे अञ्जन अर्पित करे। 'युञ्जन्ति०' इत्यादि मन्त्रसे तिलक लगावे तथा 'दीर्घात्वाय०' (अथर्व० २।४।१ ) इस मन्त्रसे फूलमाला चढ़ावे 'इन्द्र क्षत्रमभि०' (अथर्व० ७ ४ । २) इत्यादि मन्त्रसे छत्र, 'विरा०' मन्त्रसे दर्पण, 'विकर्ण०' मन्त्रसे चँवर तथा 'रथन्तर०' साम मन्त्रसे आभूषण निवेदित करे ॥ २३ - २६ ॥

वायुदेवता सम्बन्धी मन्त्रों द्वारा व्यजन, 'मुञ्चामि त्वा०' (ऋक् १० । १६१ १) इस मन्त्रसे फूल तथा वेदादि (प्रणव) युक्त पुरुषसूक्तके मन्त्रों द्वारा श्रीहरिकी स्तुति करे। ये सारी वस्तुएँ पिण्डिका आदिपर तथा शिव आदि देवताओंपर इसी प्रकार चढ़ावे । भगवान्को उठाते समय 'सौपर्ण'

सूक्तका पाठ करे। 'प्रभो! उठिये' ऐसा कहकर भगवान्को उठावे और मण्डपमें शय्यापर जाय। उस समय 'शकुनि' सूक्तका पाठ करे। ब्रह्मरथ एवं पालकी आदिके द्वारा भगवान्‌को शय्यापर ले जाना चाहिये। 'अतो देवाः' (ऋक्० १ २२ । १६) इस सूक्तसे तथा श्रीश्च ते लक्ष्मीश्च०' 4 (यजु० ३१ । २२) से प्रतिमा एवं पिण्डिकाको शय्यापर पधरावे। तदनन्तर भगवान् विष्णुके लिये निष्कली-करणकी क्रिया सम्पादित करे ।। २७-३० ॥

सिंह, वृषभ, हाथी, व्यजन, कलश, वैजयन्ती (पताका), भेरी तथा दीपक- ये आठ मङ्गलसूचक वस्तुएँ हैं। इन सब वस्तुओंको अश्वसूक्तका पाठ करते हुए भगवान्को दिखावे । 'त्रिपात्०' इत्यादि मन्त्रसे भगवान् के चरण प्रान्तमें उखा (पात्र विशेष), उसका ढक्कन, अम्बिका (कड़ाही), दर्विका (करछुल), पात्र, ओखली, मूसल, सिल, झाडू, भोजन-पात्र तथा घरके अन्य सामान रखें। उनके सिरकी ओर वस्त्र और रत्नसे युक्त एक कलश स्थापित करे, जो खाँड और खाद्य पदार्थसे भरा हुआ हो। उस घटकी 'निद्रा' संज्ञा होती है। इस प्रकार भगवान्के शयनकी विधि बतायी गयी है ॥ ३१-३४॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'स्नपनकी विधि आदिका वर्णन' नामक अट्ठावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५८ ॥