पुष्कर कहते हैं –
परशुराम ! अब मैं देवपूजा आदि कर्मका वर्णन करूँगा, जो उत्पातोंको शान्त करनेवाला है। मनुष्य स्नान करके 'आपो हि ष्ठा०' (यजु० ३६ । १४ - १६) आदि तीन मन्त्रोंसे भगवान् श्रीविष्णुको अर्घ्य समर्पित करे। फिर 'हिरण्यवर्णा०' (ऋक्०प० ११ ११ १-३) आदि तीन मन्त्रोंसे पाद्य समर्पित करे। 'शं नो आपः ० – इस मन्त्रसे आचमन एवं 'इदमाप:०' (यजु० ६ १७) मन्त्रसे अभिषेक अर्पण करे। 'रथे०, अक्षेषु० एवं चतस्त्रः - इन तीन मन्त्रोंसे भगवान्के श्रीअङ्गोंमें चन्दनका अनुलेपन करे। फिर 'युवा सुवासा:०' (ऋक्० ३।८।४) मन्त्र वस्त्र और 'पुष्पवती०' (अथर्व० ८।७।२७) इत्यादि मन्त्रसे पुष्प एवं 'धूरसि०' (यजु० १।८) आदि मन्त्रसे धूप समर्पित करे। 'तेजोऽसि शुक्रमसि०' (यजु० १ ३१ ) इस मन्त्रसे दीप - तथा 'दधिक्राव्णो०' (यजु० २३ । ३२) मन्त्रसे मधुपर्क निवेदन करे। नरश्रेष्ठ! तदनन्तर 'हिरण्यगर्भः०' आदि आठ ऋचाओंका पाठ करके अन्न एवं सुगन्धित पेय पदार्थका नैवेद्य समर्पित करे। इसके अतिरिक्त भगवान्को चामर, व्यजन, पादुका, छत्र, यान एवं आसन आदि जो कुछ भी समर्पित करना हो, वह सावित्र-मन्त्र अर्पण करे। फिर 'पुरुषसूक्त' का जप करे और उसी से आहुति दे। भगवद्विग्रहके अभाव में वेदिकापर स्थित जलपूर्ण कलशमें, अथवा नदीके तटपर, अथवा कमलके पुष्पमें भगवान् विष्णुका पूजन करनेसे उत्पातोंकी शान्ति होती है ॥ १-७॥
(काम्य बलिवैश्वदेव-प्रयोग) भूमिस्थ वेदीका मार्जन एवं प्रोक्षण करके उसके चारों ओर कुशको बिछावे। फिर उसपर अग्निको प्रदीप्त करके उसमें होम करे (यहाँ मूलमें संक्षेपसे अग्रिस्थापनकी विधि दी गयी है। इसे विशदरूपमें इस प्रकार समझे पहले भूमिस्थ वेदीपर कुशोंसे सम्मार्जन करके उन कुशोंको ईशान दिशामें फेंक दे; इसके बाद उस वेदोपर शुद्ध जल छिड़के। तदनन्तर खुवाके मूलभागसे उस वेदीपर तीन उत्तरोत्तर रेखाएँ अङ्कित करे। इन रेखाओंकी लंबाई प्रादेशमात्र हो। उल्लेखन-क्रमसे रेखाओंके ऊपरसे थोड़ी-थोड़ी मिट्टी अनामिका एवं अनुष्ठद्वारा उठाकर बायें हाथपर रखे और उन सबको एक साथ फेंक दे। तत्पश्चात् गोबर और जलसे उस वेदीको लीपे और उसके ऊपर कांस्यपात्र में अग्रि मँगाकर स्थापित करे। उस अग्निके ऊपर कुछ काष्ठकी समिधाएँ रखकर अग्निको प्रचलित करे। वैदीके चारों ओर कुश बिछा दे। फिर प्रज्वलित अग्निमें होम करे।) । महाभाग परशुराम! मन और इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए सब प्रकारकी रसोईमेंसे अग्राशन निकालकर गृहस्थ द्विज क्रमश: वासुदेव आदि लिये आहुतियाँ दे । मन्त्रवाक्य इस प्रकार हैं-
'प्रभवे अव्ययाय देवाय वासुदेवाय नमः स्वाहा । अग्नये नमः स्वाहा। सोमाय नमः स्वाहा। मित्राय नमः स्वाहा। वरुणाय नमः स्वाहा। इन्द्राय नमः स्वाहा । इन्द्राग्नीभ्यां नमः स्वाहा । विश्वेभ्यो देवेभ्यो नमः स्वाहा। प्रजापतये नमः स्वाहा। अनुमत्यै नमः स्वाहा धन्वन्तरये नमः स्वाहा । वास्तोष्पतये नमः स्वाहा। देव्यै (मनुस्मृतिके अनुसार यह आहुति 'द्यावा-पृथिवी के लिये दी जाती है। यथा - 'द्यावापृथिवीभ्यां नमः स्वाहा।') नमः स्वाहा। एवं अग्नये स्विष्टकृते नमः स्वाहा।' इन देवताओं को उनका चतुर्थ्यन्त नाम लेकर एक-एक ग्रास अन्नकी आहुति दे। तत्पश्चात् निम्नाङ्कित रीतिसे बलि समर्पित करे ॥ ८- १२ ॥
धर्मज्ञ! पहले अग्निदिशासे आरम्भ करके तक्षा, उपतक्षा, अश्वा, ऊर्णा, निरुन्धी, धूम्रिणीका, अस्वपन्ती तथा मेघपत्नी–इनको बलि अर्पित करे। भृगुनन्दन। ये ही समस्त बलिभागिनी देवियों के नाम हैं। क्रमशः आग्नेय आदि दिशाओं से आरम्भ करके इन्हें बलि दे। (बलि समर्पण के वाक्य इस प्रकार हैं-तक्षायै नमः आरोय्याम् उपतक्षायै नमः याम्ये, अश्वाभ्यो नमः नैत्रीत्ये ऊर्णाभ्यो नमः वारुण्याम, निरुन्ध्यै नमः वायव्ये, धूम्रिणीकायै नमः उदीच्याम्, अस्वपन्त्यै नमः ऐशान्याम्, मेघपल्यै नमः प्राच्याम् ) भार्गव तदनन्तर नन्दिनी आदि शक्तियोंको बलि अर्पित करे । यथा - नन्दिन्यै नमः, सुभगायै नमः (अथवा सौभाग्यायै नमः), सुमङ्गल्यै नमः, भद्रकाल्यै (मनुस्मृतिके अनुसार भद्रकालीको बलि वास्तुपुरुषके चरणकी दिशा- दक्षिण-पश्चिममें देनी चाहिये ।) नमः । इन चारोंके लिये पूर्वादि चारों दिशाओं में बलि देकर किसी खम्भे या खूँटेपर लक्ष्मी (लक्ष्मीको वास्तुपुरुषके शिरोभाग उत्तर-पूर्वमें बलि दी जाती है।) आदिके लिये बलि दे। यथा- श्रियै नमः, हिरण्यकेश्यै नमः तथा वनस्पतये नमः । द्वारपर दक्षिणभागमें 'धर्ममयाय नमः, वामभागमें 'अधर्ममयाय नमः', घरके भीतर 'ध्रुवाय नमः, घरके बाहर 'मृत्यवे नमः' तथा जलाशयमै 'वरुणाय नमः' इस मन्त्रसे बलि अर्पित करे। फिर घरके बाहर 'भूतेभ्यो नमः ' – इस मन्त्रसे भूतबलि दे। - घरके भीतर 'धनदाय नमः' कहकर कुबेरको बलि दे। इसके बाद मनुष्य घरसे पूर्वदिशामें 'इन्द्राय नमः, इन्द्रपुरुषेभ्यो नमः'– इस मन्त्रसे इन्द्र और इन्द्रके पार्षदपुरुषोंको बलि अर्पित करे। तत्पश्चात् दक्षिणमें 'यमाय नमः, यमपुरुषेभ्यो नमः – इस - मन्त्रसे, 'वरुणाय नमः, वरुणपुरुषेभ्यो नमः – इस मन्त्रसे पश्चिममें, - 'सोमाय नमः, सोमपुरुषेभ्यो नमः – इस मन्त्रसे उत्तरमें और 'ब्रह्मणे वास्तोष्पतये नमः, ब्रह्मपुरुषेभ्यो नमः – इस मन्त्रसे गृहके मध्यभागमें बलि दे। 'विश्वेभ्यो देवेभ्यो नमः – इस मन्त्रसे घरके आकाशमें ऊपरकी ओर बलि अर्पित करे। "स्थण्डिलाय नमः' इस मन्त्रसे पृथ्वीपर बलि दे। तत्पश्चात् 'दिवाचारिभ्यो भूतेभ्यो नमः – इस मन्त्रसे दिनमें बलि दे तथा 'रात्रिचारिभ्यो भूतेभ्यो नमः – इस मन्त्रसे रात्रिमें बलि अर्पित - करे। घरके बाहर जो बलि दी जाती है, उसे प्रतिदिन सायंकाल और प्रातःकाल देते रहना चाहिये। यदि दिनमें श्राद्ध सम्बन्धी पिण्डदान किया जाय तो उस दिन सायंकालमें बलि नहीं देनी चाहिये ॥ १३- २२ ।।
पितृ श्राद्धमें दक्षिणाग्र कुशोंपर पहले पिताको, फिर पितामहको और उसके बाद प्रपितामहको पिण्ड देना चाहिये। इसी प्रकार पहले माताको, फिर पितामहीको, फिर प्रपितामहीको पिण्ड अथवा जल दे। इस प्रकार 'पितृयाग' करना चाहिये ॥ २३ ॥
बने हुए पाकमेंसे बलिवैश्वदेव करनेके बाद पाँच बलियाँ दी जाती हैं। उनमें सर्वप्रथम 'गो 'बलि' है; किंतु यहाँ पहले 'काकबलि का विधान किया गया है
काकबलि
इन्द्रवारुणवायव्या याम्या वा नैर्ऋताश्च ये ॥
ते काकाः प्रतिगृह्णन्तु इमं पिण्डं मयोद्धृतम् ।
(उत्तरार्धके स्थानमें यह पाठान्तर उपलब्ध होता है - वायसाः प्रतिगृह्णन्तु भूमौ पिण्डं मयोज्झितम् ।)
'जो इन्द्र, वरुण, वायु, यम एवं निर्ऋति देवताकी दिशामें रहते हैं, वे काक मेरेद्वारा प्रदत्त यह पिण्ड ग्रहण करें। इस मन्त्रसे काकबलि देकर निम्नाङ्कित मन्त्रसे कुत्तोंके लिये अनका ग्रास दे ॥ २४-२५ ॥
कुक्कुर-बलि
विवस्वतः कुले जातौ द्वौ श्यामशबलौ (कहीं-कहीं द्वौ श्वानौ श्यामशबलौ वैवस्वतकुलोद्भवी ताभ्यामन्नं प्रदास्यामि स्यातामेतावहिंसकौ ॥ - ऐसा पाठ मिलता है।) शुनौ ।
ताभ्यां पिण्डं प्रदास्यामि रक्षतां पथि मां सदा ॥
'श्याम और शबल (काले और चितकबरे) रंगवाले दो श्वान विवस्वान्के कुलमें उत्पन्न हुए हैं। मैं उन दोनोंके लिये पिण्ड प्रदान करता हूँ। वे लोक-परलोकके मार्गमें सदा मेरी रक्षा करें' ॥ २६ ॥
गो-ग्रास
सौरभेय्यः सर्वहिताः पवित्राःपापनाशनाः (पाठान्तर–'पुण्यराशयः ।') ।
प्रतिगृह्णन्तु मे ग्रासं गावस्त्रैलोक्यमातरः ॥
"त्रैलोक्यजननी, सुरभिपुत्री गौएँ सबका हित करनेवाली, पवित्र एवं पापोंका विनाश करनेवाली हैं। वे मेरे द्वारा दिये हुए ग्रासको ग्रहण करें।' इस मन्त्रसे गो-ग्रास देकर स्वस्त्ययन करे। फिर याचकोंको भिक्षा दिलावे। तदनन्तर दीन प्राणियों एवं अतिथियोंका अन्नसे सत्कार करके गृहस्थ स्वयं भोजन करे ॥ २७-२८ ॥
(अनाहिताग्नि पुरुष निम्नलिखित मन्त्रोंसे जलमें अन्नकी आहुतियाँ दे-)
ॐ भूः स्वाहा । ॐ भुवः स्वाहा । ॐ स्वः स्वाहा । ॐ भूर्भुवः स्वः स्वाहा । ॐ देवकृतस्यैन सोऽवयजनमसि स्वाहा । ॐ पितृकृतस्यैनसोऽवय - जनमसि स्वाहा । ॐ आत्मकृतस्यैनसोऽवयजनमसि स्वाहा । ॐ मनुष्यकृतस्यैनसोऽवयजनमसि स्वाहा । ॐ एनस एनसोऽवयजनमसि स्वाहा। यच्चाहमेनो विद्वांश्चकार यच्चाविद्वांस्तस्य सर्वस्यैनसोऽवयजनमसि स्वाहा । अग्नये स्विष्टकृते स्वाहा । ॐ प्रजापतये स्वाहा ।
यह मैंने तुमसे विष्णुपूजन एवं बलिवैश्वदेवका वर्णन किया ॥ २९ ।।
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'देवपूजा और वैश्वदेव-बलिका वर्णन' नामका दो सौ चौंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २६४ ।।
Summary of chapter 266 of the Agni Mahā Purana is as follows:
The science of temple architecture (Prāsāda-lakṣaṇa) is presented. Agni describes the three main styles of Hindu temple architecture: Nāgara (northern), Drāviḍa (southern), and Vesara (mixed). The proportional measurements of the vimāna (tower), the garbhagṛha (sanctum), the maṇḍapa (hall), and the ardha-maṇḍapa (antechamber) are given according to the Vāstu-śāstra principles. The chapter stresses that a temple built according to these divine proportions becomes a living cosmic diagram that radiates the deity's energy throughout the surrounding region.