अग्नि महा पुराण

351- सुबन्त-सिद्ध रूप

स्कन्द कहते हैं -

कात्यायन ! अब मैं तुम्हारे सम्मुख विभक्ति-सिद्ध रूपोंका वर्णन करता हूँ। विभक्तियाँ दो हैं– 'सुप्' और 'तिङ्'। 'सुप्' विभक्तियाँ सात हैं। 'सु औ जस्'- यह प्रथमा विभक्ति है। 'अम् औट् शस्'– यह द्वितीया, टा भ्याम् भिस्'– यह तृतीया, 'डे भ्याम् भ्यस्' यह चतुर्थी, 'ङसि भ्याम् भ्यस्'– यह पञ्चमी, 'डस् ओस् आम्' – यह षष्ठी तथा 'ङि ओस् सुप्' – यह सप्तमी विभक्ति है। ये सातों विभक्तियाँ प्रातिपदिक संज्ञावाले शब्दोंसे परे प्रयुक्त होती हैं ॥ १-३॥

'प्रातिपदिक' दो प्रकारका होता है—'अजन्त और 'हलन्त'। इनमें से प्रत्येक पुल्लिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग और नपुंसकलिङ्गके भेदसे तीन-तीन प्रकारका है। उन पुल्लिङ्ग आदि शब्दोंके नायकोंका यहाँ दिग्दर्शन कराया जाता है। जो शब्द नहीं कहे गये हैं (किंतु जिनके रूप इन्हींके समान होते हैं) उन्हींके ये 'वृक्ष' आदि शब्द सामर्थ्यतः नायक हैं। 'वृक्ष' शब्द पेड़का वाचक है। यह अकारान्त पुल्लिङ्ग है। इसके सात विभक्तियोंमें तथा सम्बोधनमें एकवचन द्विवचन और बहुवचनके भेदसे कुल मिलाकर चौबीस रूप होते हैं। उन सबको यहाँ उद्धृत किया जाता है। १– वृक्षः, वृक्षौ, वृक्षाः । २ – वृक्षम्, वृक्षौ, वृक्षान् । ३ – वृक्षेण, वृक्षाभ्याम्, वृक्षैः । ४ – वृक्षाय, वृक्षाभ्याम् वृक्षेभ्यः । ५ – वृक्षात्, वृक्षाभ्याम्, वृक्षेभ्यः । ६ – वृक्षस्य, वृक्षयोः, वृक्षाणाम् । ७ – वृक्षे, वृक्षयोः, वृक्षेषु । सम्बोधने- हे वृक्ष, हे वृक्षौ, हे वृक्षाः। इसी प्रकार राम, देव, इन्द्र, वरुण, भव आदि शब्दोंके रूप जानने चाहिये। 'देव' आदि शब्दोंके तृतीयाके एकवचनमें 'देवेन' तथा षष्ठीके बहुवचन में 'देवानाम्' इत्यादि रूप होते हैं। वहाँ 'न' के स्थानमें 'ण' नहीं होता। रेफ और षकारके बाद जो 'न' हो, उसीके स्थानमें 'ण' होता है। अकारान्त शब्दोंमें जो सर्वनाम हैं, उनके रूपोंमें कुछ भिन्नता होती है। उस भिन्नताका परिचय देनेके लिये सर्वनामका 'प्रथम' या 'नायक' जो 'सर्व' शब्द है, उसके रूप यहाँ दिये जाते हैं; उसी तरह अन्य सर्वनामोंके भी रूप होंगे। यथा - १ - सर्वः सर्वो सर्वे । २- सर्वम् सर्वो सर्वान् । ३ - सर्वेण सर्वाभ्याम् सर्वैः । ४– सर्वस्मै सर्वाभ्याम् सर्वेभ्यः । ५ – सर्वस्मात् सर्वाभ्याम् सर्वेभ्यः । ६ - सर्वस्य सर्वयोः सर्वेषाम् । ७- सर्वस्मिन् सर्वयोः सर्वेषु सम्बोधनमें- हे सर्व हे सर्वो हे सर्वे (यहाँ यह ध्यान में रखना चाहिये कि यदि किसीका नाम 'सर्व' रख दिया जाय तो उस 'सर्व' का रूप वृक्षकी तरह ही होगा। 'सब' इस अर्थमें प्रयुक्त 'सर्व' शब्दका ही रूप ऊपर बताये अनुसार होगा। यही बात अन्य सर्वनामोंके विषय में भी समझनी चाहिये। संज्ञा एवं उपसर्जनीभूत 'सर्व' आदि शब्दोंकी सर्वनामोंमें गणना नहीं होती। 'अतिसर्व' आदि शब्दों में जो 'सर्व' शब्द है; वह उपसर्जन है।) यहाँ रेखाङ्कित रूपोंपर दृष्टिपात कीजिये साधारण अकारान्त शब्दोंकी अपेक्षा सर्वनाम शब्दोंके रूपों में भिन्नताके पाँच ही स्थल हैं। इसके बाद 'पूर्व' शब्द आता है। यह सर्वनाम होनेपर भी अन्य सर्वनामोंसे कुछ विलक्षण रूप रखता है। पूर्व, पर, अवर, दक्षिण, उत्तर, अपर, अधर ये व्यवस्था और असंज्ञामें सर्वनाम हैं। 'स्व' तथा 'अन्तर' शब्द भी अर्थ-विशेषमें ही सर्वनाम हैं। अतः उससे भिन्न अर्थमें वे असर्वनामवत् रूप धारण करते हैं। प्रथमाके बहुवचनमें तथा पञ्चमी सप्तमीके एकवचनमें पूर्वादि शब्दोंके रूप सर्वनामवत् होते हैं, किंतु विकल्पसे। अतः पक्षान्तरमें उनके असर्वनामवत् रूप भी होते ही हैं-जैसे पूर्वे पूर्वाः, परे पराः, इत्यादि। पूर्वस्मात् पूर्वात् । पूर्वस्मिन् पूर्वे इत्यादि । प्रथम, द्वितीय तथा तृतीय ये शब्द सर्वनाम नहीं हैं, तथापि 'प्रथम' शब्द प्रथमा बहुवचनमें प्रथमे प्रथमाः– यह रूप होता है। 'चरम' आदि शब्दोंके लिये भी यही बात है। 'द्वितीय' तथा 'तृतीय' शब्द चतुर्थी, पञ्चमी तथा सप्तमीके एकवचनमें विकल्पसे सर्वनामवत् रूप धारण करते हैं। यथा- द्वितीयस्मै द्वितीयाय । तृतीयस्मै तृतीयाय – इत्यादि शेष रूप वृक्षवत् होते हैं।

अब आकारान्त शब्दका एक रूप उपस्थित करते हैं-खड्गपा:- खड्गं पातीति खड्गपाः अर्थात् 'खड्ग रक्षक'। इसका रूप यों समझना चाहिये – १ – खड्गपाः, खड्गपौ, खड्गपाः । २ - खड्गपाम्, खड्गपौ, खड्गपः ३–खड्गपा, खड्गपाभ्याम् खड्गपाभिः । ४ खड्गपे, खड्गपाभ्याम् खड्गपाभ्यः । ५– खड्गपः, खड्गपाभ्याम् खड्गपाभ्यः । ६ – खड्गपः, खड्गपोः, खड्गपाम् । ७- खड्गपि, खड्गपोः, खड्गपासु। सम्बो०- हे खड्गपाः, हे खड्गपी, हे खड्गपाः। इसी तरह विश्वपा (विश्वपालक), गोपा (गोरक्षक), कीलालपा (जल पीनेवाला), शङ्खध्मा (शङ्ख बजानेवाला) आदि शब्दोंके रूप होंगे। (अब ह्रस्व इकारान्त 'वह्नि' शब्दका रूप प्रस्तुत करते हैं-) १ – वह्निः, वह्नी, वह्नयः । २– वह्निम्, वह्नी, वह्नीन् । ३– वह्निना, वह्निभ्याम्, वह्निभिः । ४ वह्नये, वह्निभ्याम् वह्निभ्यः । - ५ – वह्नेः, वह्निभ्याम् वह्निभ्यः । ६ वह्नेः, - वह्नयोः, वह्नीनाम्। ७ वहाँ, वयोः, वहिषु । - [ सम्बो०- हे वह्ने, हे वह्नी, हे वह्नयः । 'वह्नि' का अर्थ है अग्नि। इसी तरह अनि, रवि, कवि, गिरि, पवि इत्यादि शब्दोंके रूप होंगे। इकारान्त शब्दोंमें 'सखि' और 'पति' शब्दोंके रूप कुछ भिन्नता रखते हैं। जैसे– १ – सखा, सखायौ, सखायः । २ सखायम् सखायौ, सखीन् । सखीन् । तृतीयाके एकवचनमें सख्या, चतुर्थी के एकवचनमें सख्ये, - पञ्चमी और षष्ठीके एकवचनमें सख्युः तथा सप्तमीके एकवचनमें सख्यौ रूप होते हैं। शेष सभी रूप 'वह्नि' शब्दके समान हैं। 'पति' शब्दके प्रथमा और द्वितीया विभक्तियों में वह्निवत् रूप होते हैं, शेष विभक्तियों में वह 'सखि' शब्दके समान रूप रखता है। 'अहर्पतिः' का अर्थ है सूर्य । यहाँ 'पति' शब्द समासमें आबद्ध है। समासमें उसका रूप वह्नितुल्य ही होता है। ।

( अब उकारान्त शब्दका रूप प्रस्तुत करते हैं।) पहले पुल्लिङ्ग 'पटु' शब्दके रूप दिये जाते हैं। पटुका अर्थ है- कुशल – निपुण । १ – पटुः, - पटू, पटवः । २– पटुम्, पटू, पटून् । ३ पटुना, पटुभ्याम्, पटुभिः । ४– पटवे, पटुभ्याम्, पटुभ्यः । ५–पटोः, पटुभ्याम्, पटुभ्यः । ६ - पटोः, पवोः, पटूनाम् । ७– पटौ, पट्वोः, पटुषु । सम्बो०- हे पटो, हे पटू, हे पटवः । इसी तरह भानु, शम्भु विष्णु आदि शब्दोंके रूप जानने चाहिये। दीर्घ ईकारान्त 'ग्रामणी' शब्द है। इसका अर्थ है— गाँवका मुखिया। इसका रूप इस प्रकार है – १ – ग्रामणीः, ग्रामण्यौ, ग्रामण्यः । - २ – ग्रामणीम्, ग्रामण्यौ, ग्रामण्यः । ३ ग्रामण्या, ग्रामणीभ्याम् ग्रामणीभिः । ४ ग्रामण्ये, ग्रामणीभ्याम् २ ग्रामणीभ्यः २ । ५– ग्रामण्यः २ । ६ – ग्रामण्योः २ । बहुवचन ग्रामण्याम् । ७ – ग्रामण्याम्, ग्रामणीषु । इसी तरह 'प्रधी' आदि शब्दोंके रूप जानने चाहिये। दीर्घ ऊकारान्त 'दृन्भू' शब्द है। इसका अर्थ है- राजा, वज्र, सूर्य, सर्प और चक्र । इसका रूप-दृन्भूः, दुन्थ्वौ, दुन्भ्वः इत्यादि । 'खलपूः '— खलिहान या भूमिको शुद्ध-स्वच्छ करनेवाला। इसके रूप खलपू:, खलप्वी, खलप्वः इत्यादि । 'मित्रभूः '— मित्रसे उत्पन्न । इसका रूप है- मित्रभूः, मित्रभुवी, मित्रभुवः इत्यादि । 'स्वभू' का अर्थ है―

स्वयम्भूः – स्वतः प्रकट होनेवाला। इसके रूप - स्वभूः, स्वभुवौ, स्वभुवः इत्यादि हैं ॥ ४–६॥

'सुश्रीः' का अर्थ है- सुन्दर शोभासे सम्पन्न । इसके रूप हैं- सुश्रीः, सुश्रियौ, सुश्रियः इत्यादि । 'सुधीः' का अर्थ है- उत्तम बुद्धिसे युक्त विद्वान् ।इसके रूप हैं- सुधी:, सुधियौ, सुधियः इत्यादि। (अब ऋकारान्त पुंल्लिङ्ग 'पितृ' तथा 'भ्रातृ' शब्दोंके रूप दिये जाते हैं- 'पिता' का अर्थ है-बाप और 'भ्राता' का अर्थ है- भाई। 'पितृ' शब्दके सब रूप इस प्रकार हैं- १ – पिता, पितरौ पितरः । २– पितरम् पितरौ पितॄन् । ३ – पित्रा, पितृभ्याम् पितृभ्यः । ४ – पित्रे, पितृभ्याम् पितृभ्यः । ५– पितुः, पितृभ्याम्, पितृभ्यः । ६ – पितुः, पित्रोः, पितॄणाम् । ७– पितरि, पित्रोः, पितृषु । सम्बो०- हे पितः, हे पितरौ, हे पितरः । इसी तरह 'भ्रातृ' और 'जामातृ' शब्दोंके भी रूप होते हैं। 'नृ' शब्द नरका वाचक है। इसके रूप ना, नरौ, नरः इत्यादि 'पितृ' शब्दवत् होते हैं। केवल षष्ठीके बहुवचनमें दो रूप होते हैं-नृणाम् नृणाम्। 'कर्तृ' शब्दका अर्थ है करनेवाला यह 'तृजन्त' शब्द है। इसके दो विभक्तियोंमें रूप इस प्रकार हैं-कर्ता, कर्तारौ, कर्तारः । कर्तारम् कर्तारौ, कर्तॄन् । शेष 'पितृ' शब्दकी भाँति । 'क्रोष्ट' शब्द सियारका वाचक है। क्रोष्टु विकल्पसे 'क्रोष्ट' शब्दके रूपमें प्रयुक्त होता है। उस दशामें इसका रूप 'कर्तृ' शब्दकी भाँति होता है। 'कोष्ट' के रूपमें ही यदि इसके रूप लिये जायँ तो 'पटु' शब्दक तरह लेने चाहिये। 'नतृ' शब्द नातीका वाचक है। इसके रूप 'कर्तृ' शब्दकी भाँति होते हैं। 'सुरै' शब्दका अर्थ उत्तम धनवान् है। शब्दका अर्थ है- धन। ये ऐकारान्त पुंल्लिङ्ग हैं। इन दोनोंके रूप एक से होते हैं – १ – सुराः, सुरायौ, सुरायः । - २ – सुरायम्, सुरायौ, सुरायः । ३- सुराया, सुराभ्याम् सुराभिः इत्यादि । 'रे'– राः, रायौ, रायः इत्यादि। हलादि विभक्तियों में 'रे' की जगह 'रा' हो जाता है। ओकारान्त 'गो' शब्दपर विचार कीजिये। 'गो' का अर्थ है- बैल। इसके रूप-गौः, गावौ, गावः । गाम्, गावौ, गाः इत्यादि हैं। औकारान्त पुल्लिङ्ग–'द्यौ' का अर्थ है- आकाश और 'ग्लौ' का अर्थ है- चन्द्रमा । इनके रूप द्यौः, द्यावौ द्यावः इत्यादि । ग्लौः, ग्लावौ, ग्लावः इत्यादि हैं। ये पुंल्लिङ्गमें 'स्वरान्त नायक' शब्द बताये गये ॥ ७ ॥

(अब हलन्त पुंल्लिङ्ग शब्दोंका परिचय कराया जाता है - ) सुवाक् (श्रेष्ठ वक्ता), सुत्वक् (सुन्दर त्वचावाला), पृषत् (जलबिन्दु), सम्राट् (चक्रवर्ती नरेश), जन्मभाक् (जन्म ग्रहण करनेवाला), सुराट् (श्रेष्ठ राजा), अयम् (यह), मरुत् (वायु), भवन् (होता हुआ), दीव्यन् (क्रीडा करता हुआ), भवान् (आप), मघवान् (इन्द्र), पिबन् (पीता हुआ), भगवान् (समग्र ऐश्वर्यसे सम्पन्न), अघवान् (पापयुक्त), अर्वा (अश्व), वह्निमान् (अग्नियुक्त), सर्ववित् (सर्वज्ञ), सुपृत् (भलीभाँति पालन करनेवाला), सुसीमा (उत्तम सीमावाला), कुण्डी (कुण्डधारी शिव), राजा, श्वा (कुत्ता), युवा (तरुण), मघवा (इन्द्र), पूषा (सूर्य), सुकर्मा (उत्तम कर्म करनेवाला), यज्वा (यज्ञकर्ता), सुवर्मा (उत्तम कवचधारी), सुधर्मा (उत्तम धर्मवाला), अर्यमा (सूर्य), वृत्रहा (इन्द्र), पन्थाः (मार्ग), सुककुप् (स्वच्छ दिशावाला समय), अष्ट (आठ), पञ्च (पाँच), प्रशान् (पूर्णतः शान्त), सुत्वा, 'प्राङ् प्राञ्चौ प्राञ्चः' तथा प्रत्यङ् इत्यादि। सुधौ (शोभन आकाशवाला काल), सुभ्राट् (विशेष शोभाशाली), सुपूः ( सुन्दर नगरीवाला देश), चन्द्रमा, सुवचाः, श्रेयान् विद्वान्, उशना (शुक्राचार्य), पेचिवान् (पूर्वकालमें जिसने पाचन किया हो), अनड्वान् गाड़ी खींचनेवाला बैल, गोधुक् (गायको दुहनेवाला), मित्रध्रुक् (मित्रद्रोही), मुक् (विवेकशून्य), तथा लिट् (चाटनेवाला), – ये सभी हलन्त पुल्लिङ्गके 'नायक' (आदर्श या प्रमुख शब्द) हैं ('सुवाक्' यह 'सुवाच्' शब्दका प्रथम विभक्तिमें एकवचनान्तरूप है। जिज्ञासुओंको सुविधा के लिये इन शब्दोंके कतिपय रूप यहाँ उदाहरण के तौरपर दिये जाते हैं- १. 'सुवाक्', सुवाग, सुवाचौ, सुवाचः '२. सुवाचम्, सुवाचौ, सुवाच: । ३. सुवाचा, सुवाग्भ्याम् सुवाग्भिः इत्यादि। सप्तमीके बहुवचनमें 'सुवाक्षु' यह रूप होता है। इसी तरह 'त्वच्' शब्दके त्वक्, त्वचौ, त्वचः इत्यादि, 'पृषत्' शब्दके- पृषत्, पृषती, पृषतः इत्यादि, 'सम्राज्' शब्दके-सम्राट् सम्राइ, सम्राजौ, सम्राजः इत्यादि, 'जन्मभाज्' शब्दके–'जन्मभाक्, जन्मभाग, जन्मभाजौ, जन्मभाजः, इत्यादि तथा 'सुराज्' शब्दके- सुराद, सुराड़, सुराजौ, सुराजः इत्यादि रूप होते हैं। 'अयम्' यह 'इदम्' शब्दका प्रथमविभक्तीय एकवचनान्त रूप है। व्यवहारमें इसके रूपोंकी अधिक आवश्यकता रहती है। इसलिये इसके पूरे रूप यहाँ दिये जाते हैं)॥ ८–११ ॥

अब स्त्रीलिङ्गमें नायकस्वरूप शब्दोंको उपस्थित किया जा रहा है— जाया (स्त्री), जरा (वृद्धावस्था), - बाला (नूतन अवस्थाकी स्त्री), एडका (भेड़), वृद्धा (बूढ़ी), क्षत्रिया (क्षत्रिय जातिकी स्त्री), बहुराजा (जहाँ बहुतसे राजा निवास करते हों, वह नगरी), बहुदा (अधिक देनेवाली), मा (लक्ष्मी), अथवा बहुदामा (अधिक दाम- रज्जु या दीप्तिवाली), बालिका (लड़की), माया (भगवान्की शक्ति या प्रकृति), कौमुदगन्धा (कुमुदकी-सी सुगन्धवाली), सर्वा (सब), पूर्वा ( पूर्व दिशा या पहली), अन्या (दूसरी), द्वितीया (दूसरी) तृतीया (तीसरी), बुद्धिः (मति), स्त्री (औरत), श्री (लक्ष्मी), नदी, सुधी (उत्तम बुद्धिवाली), भवन्ती (होती हुई), दीव्यन्ती ( क्रीड़ा करती हुई), भाती, भान्ती (शोभमाना), यान्ती (जाती हुई), शृण्वती (सुनती हुई), तुदती, तुदन्ती (व्यथित करती हुई), कर्त्री ( करनेवाली), कुर्वती ( करती हुई), मही (पृथ्वी), रुन्धती (अवरोध करती हुई), क्रीडन्ती (खेलती हुई), दान्ती (दाँतकी बनी हुई वस्तु), पालयन्ती (पालती हुई), सुवाणी (उत्तम वाणी), गौरी (पार्वती), पुत्रवती (पुत्रवाली), नौः (नाव), वधूः (स्त्री), देवता, भूः (पृथ्वी), तिस्त्रः (तीन), द्वे (दो), कति, वर्षाभूः (वर्षाकालमें उत्पन्न होनेवाली मेढकी), स्वसा (बहिन), माता (माँ), अवरा (लघु), गौः (गाय), द्यौः (स्वर्ग), वाक् (वाणी), त्वक् (चमड़ा), प्राची (पूर्व दिशा), अवाची (दक्षिण दिशा), तिरश्ची (टेढ़ी या मादा पशु-पक्षी), उदीची (उत्तर दिशा), शरद् (ऋतुविशेष), विद्युत् (बिजली), सरित् (नदी), योषित् (स्त्री), अग्निवित् (अग्निको जाननेवाली), सस्यदा (अन्न देनेवाली) अथवा सम्पद् (सम्पत्ति), दृषत् (शिला), या (जो), एषा (यह), सा (वह), वेदवित् (वेदज्ञा), संविद् (ज्ञानशक्ति), बह्री (बहुत), राज्ञी (रानी), त्वया, मया (युष्मद् अस्मद् शब्दोंके तीनों लिङ्गों में समान रूप होते हैं, ये तृतीयाके एक वचनके रूप हैं)। सीमा (अवधि), पञ्च आदि (संख्यावाचक नान्त शब्द), राका (पूर्णिमा), धूः (बोझ), पूः (नगरी), दिशा (दिक्), गिरा (गी:), चतस्त्रः (चार), विदुषी (पण्डिता), का (कौन), इयम् (यह), दिक् (दिशा), दृक् (नेत्र), तादृक् (तादृशी) तथा 'असौ'– ये स्त्रीलिङ्गके नायक शब्द हैं (स्त्रीलिङ्गमें नामतः निर्दिष्ट 'नायक' शब्दोंके रूपोंका दिग्दर्शन मात्र कराया जा रहा है। 'जाया' शब्दका पूरा रूप इस प्रकार है- १. जाया जाये जाया। २. जायाम् जाये जायाः ३. जायया जायाभ्याम् जायाभिः । ४. जायायै जायाभ्याम् जायाभ्यः । ५. जायायाः जायाभ्याम् जायाभ्यः । ६. जायायाः जाययोः जायानाम्। ७. जायायाम् जाययोः जायासु सम्बोधनमें- हे जाये हे जाये हे जायाः। 'जरा' शब्दका, स्वादि विभक्तियाँ परे हों तो 'जरस्' आदेश होता है। यह आदेश वैकल्पिक है। अतः 'जरा' का एक रूप तो 'जाया' की तरह ही होगा औ, जस्, अम्, शस्, टा, डे आदि विभक्तियों में क्रमश: जरसी, जरसः जरसम्, जरस, जरमा, जरसे इत्यादि वैकल्पिक रूप भी होंगे। बाला, एडका, वृद्धा आदिसे लेकर कौमुदगन्धातक के सभी शब्दोंका रूप जायावत् होगा। 'सर्वा' शब्दका रूप-सर्वा सर्वे सर्वाः । सर्वाम् सर्वे सर्वाः सर्वया सर्वाभ्याम् सर्वाभिः । हिन्दू-विभक्तियों में सर्वस्यै, सर्वस्याः, सर्वस्याः, सर्वस्याम् रूप होंगे। 'आम्' विभक्तिमें सर्वासाम्। शेष सब जगह जायावत् रूप चलेंगे। 'पूर्वा' और 'अन्या' शब्दोंके रूप 'सर्वा' की तरह होंगे। द्वितीया-तृतीया शब्द डिदू-विभक्तियों में विकल्पसे सर्वनामवत् रूप धारण करते हैं। जैसे 'डे' विभक्ति में 'द्वितीयायै', 'द्वितीयस्यै'। इसी प्रकार अन्य पञ्चमी आदिके एकवचनमें भी 'बुद्धि' शब्दके रूप- 'बुद्धिः, बुद्धी, बुद्धयः बुद्धिम् बुद्धी, बुद्धीः । बुद्ध्या, बुद्धिभ्याम् बुद्धिभिः। बुद्ध्यै इत्यादि। 'ङि'विभक्तिमें बुद्ध्याम् बुद्धौ इसी तरह 'मति' शब्दके भी रूप हैं। 'स्त्री' शब्दकी 'ई'को अजादि विभक्तियोंमें 'इय' आदेश होता है। यथा स्त्रियाँ, स्त्रियः इत्यादि। अम्-शस्में विकल्प है स्त्रियम्, स्त्रीम्। स्त्रियः स्त्रीः । 'सु' विभक्ति में 'स्त्री' रूप होता है। 'सु' का लोप हो जाता है। 'श्री' शब्दका रूप- श्री श्रियी श्रियः इत्यादि। 'नदी' शब्दका रूप नदी नद्यौ नद्यः । नदीम्, नद्यौ, नदीः नद्या नदीभ्याम् नदीभिः । नौ नदीभ्यां नदीभ्यः नद्याः, नदीभ्याम्, नदीभ्यः । नद्याः नद्योः नदीनाम् । नद्याम्, नद्योः नदीषु। हे नदि हे नद्यौ हे नद्यः। 'सुधी 'का रूप सुधीः सुधियाँ सुधियः इत्यादि। 'भवन्ती का रूप नदीवत्। यहाँसे लेकर 'पुत्रवती' शब्दतकके रूप नदीवत् ही होंगे। 'नौ' शब्दका रूप-नौः नावौ नावः इत्यादि । वधू-वधूः वध्वौ वध्वः इत्यादि। 'देवता' का रूप जायावत्। 'भू' - भूः भुवौ भुवः इत्यादि। तिसृ- १. तिस्रः । २. तिलः । ३. तिसृभिः । ४ ५. तिसृभ्यः । ६. तिसृणाम् ७. तिसृषु । इसी प्रकार 'चतसृ के रूप जानने चाहिये। 'द्वि' शब्दके स्त्रीलिङ्गमें-द्वे, द्वे, द्वाभ्याम् ३, द्वयोः २ रूप होते हैं। 'कति'–कति, कति, कतिभिः इत्यादि। 'वर्षाभू' वर्षाभूः, वर्षाभ्वौ वर्षाभ्वः इत्यादि। स्वसा स्वसारी स्वसार इत्यादि माता मातरौ मातरः । मातरम्, मातृः इत्यादि। 'अवरा' का रूप पूर्वावत्। 'गो'-गौः गावौ गावः गाम् गावौ गाः गवा गोभ्याम् गोभिः । इत्यादि द्यौः द्यावौ द्यावः इत्यादि। वाक् वागू, वाचौ वाचः इत्यादि। त्वक् – 'वाक् 'के समान। 'प्राची' से लेकर 'उदीची' तकके रूप - नदीवत् । शरत् शरत् शरद् शरदौ - शरदः इत्यादि । विद्युत् - विद्युत् विद्युद् विद्युतौ विद्युतः इत्यादि। सरित्सरित् सरिद् सरितौ सरितः इत्यादि। 'अग्निवित्' शरत्के समान 'सस्यदा' जायावत्। 'सम्पत्' शरत्के समान। 'दृषत्' शरत्के समान या ये याः, याम् ये याः। यया याभ्याम् इत्यादि यस्याः यासाम् यस्याम् इत्यादि । एषा एते एताः इत्यादि। सा ते ताः इत्यादि। 'वेदविद्' शरत्के समान। 'संवित्' भी शरत्के समान। 'बह्वी', 'राज्ञी'— नदीके समान। त्वम् युवाम् यूयम्। त्वां युवाम् युष्मान् । त्वया युवाभ्याम् युष्माभिः । तुभ्यम् युवाभ्याम् युष्मभ्यम्। त्वत् युवाभ्याम् युष्मत् । तव युवयोः युष्माकम् त्वयि युवयोः युष्मासु। इसी तरह 'अस्मद्' शब्दके अहं आवाम् वयम्। माम् आवाम् अस्मान्। मया आवाभ्याम् अस्माभिः। मह्यम्, मत्, मम, अस्माकम् मयि इत्यादि रूप हैं। 'सीमा' टाबन्त हो तो सीमा सीमे सीमाः। नान्त हो तो सीमा सीमानौ सीमानः इत्यादि। 'पञ्चन्' शब्द-पञ्च पञ्च पञ्चभिः इत्यादि। 'राका' जायावत्। धूः धुरौ धुरः इत्यादि। पूः पुरौ पुरः इत्यादि। 'दिशा' जायावत्। 'दिश्' शब्दके-दिक्-दिग् दिशौ दिशः । इत्यादि रूप हैं। गो: गिरौ गिरः इत्यादि । 'विदुषी'– नदीवत्। 'किम्' शब्दके - का के काः इत्यादि रूप हैं। 'इदम्' इयम् इमे इमाः इत्यादि। 'दृक्' शब्द 'दिक्' के समान तादृग, तादृक्, तादृशौ तादृशः इत्यादि। - 'अदस्' असौ अमू अमृः । अमूम् अमू अमूः । अमुया इत्यादि।)। अब नपुंसकलिङ्गके नायक शब्द बताये जा रहे हैं ॥ १२ – १९ ॥

( सर्वप्रथम स्वरान्त नपुंसकलिङ्ग शब्दोंके प्रारम्भिक सिद्ध रूप दिये जाते हैं - ) ' कुण्डम्' यह अकारान्त नपुंसकलिङ्ग'कुण्ड' शब्दका प्रथमान्त एकवचनरूप है। इसके प्रथम दो विभक्तियोंमें क्रमशः एकवचन द्विवचन और बहुवचनके रूप इस प्रकार जानने चाहिये-कुण्डम्, कुण्डे, कुण्डानि ।तृतीया आदि शेष विभक्तियोंके रूप पुल्लिङ्गवत् जानने चाहिये। यथा-कुण्डेन, कुण्डाभ्याम्, कुण्डै: इत्यादि । सम्बोधनमें- हे कुण्ड, हे कुण्डे, हे कुण्डानि। 'कुण्डम्' का अर्थ है- पानीसे भरा हुआ गहरा गड्ढा यह नदी और तालाब आदिमें होता है। मिट्टीके बड़े और गहरे पात्रविशेषको भी 'कुण्ड' कहते हैं। इसीको ध्यानमें रखकर कुण्डभर दूध देनेवाली गायको 'कुण्डोघ्नी' कहते हैं। 'सर्वम्'– यह 'सर्व' शब्दका एकवचनान्त रूप है, इसका अर्थ है सम्पूर्ण या सब। इसके प्रथमा और द्वितीया विभक्तियोंमें नपुंसकलिङ्ग सम्बन्धी रूप इस प्रकार होते हैं- सर्वम् सर्वे सर्वाणि । शेष पुल्लिङ्गवत्। 'सोमपम्'– सोम पान करनेवाला कुल (ब्राह्मणकुल या देवकुल) । इसके भी प्रथम दो विभक्तियों में सोमपम् सोमपे सोमपानि इत्यादि रूप होंगे। शेष पुल्लिङ्ग रामवत्। 'दधि' और 'वारि' शब्द क्रमशः दही और जलके वाचक हैं। ये नित्य नपुंसकलिङ्ग हैं। अतः इनके सम्पूर्ण रूप यहाँ उद्धृत किये जाते हैं। प्र०, द्वि० विभक्तियों में दधि दधिनी - दधीनि। तृ० - दध्ना, दधिभ्याम् दधिभिः । च० - दध्ने दधिभ्याम् दधिभ्यः । पं० - दनः दधिभ्याम् दधिभ्यः । ष० दध्नः, दनोः, दध्नाम् । स०-दनि-दधनि, दध्नोः, दधिषु। 'वारि' शब्दके सातों विभक्तियोंके रूप इस प्रकार जानने चाहिये - १,२ वारि वारिणी वारीणि । ३ वारिणा वारिभ्याम् वारिभिः । ४ – वारिणे वारिभ्याम् वारिभ्यः । ५ – वारिणः वारिभ्याम् वारिभ्यः । ६ वारिणः वारिणोः - वारीणाम् । ७ – वारिणि, वारिणोः, वारिषु । 'खलपु' का अर्थ है-खलिहानको स्वच्छ करनेवाला साधन, 'खुरपा' आदि। इसके रूप विशेष्यके अनुसार स्त्रीलिङ्ग और पुल्लिङ्गमें भी होते हैं । यहाँ नपुंसकलिङ्गमें इसके रूप उद्धृत किये जाते हैं। १, २ - खलपु खलपुनी खलपूनि । ३ – खलप्वा, खलपुना खलपूभ्याम् खलपूभिः । ४- खलप्वे खलपुने खलपूभ्याम् खलपूभ्यः इत्यादि । 'मधु' शब्द शहद और मदिराका वाचक है। इसके रूप इस प्रकार जानने चाहिये - १, २ - मधु मधुनी मधूनि । ३- मधुना मधुभ्याम् मधुभिः । ४- मधुने मधुभ्याम् मधुभ्यः । ५ मधुनः मधुभ्याम् मधुभ्यः । ६- मधुनः मधुनोः मधूनाम् । ७ मधुनि मधुनोः मधुषु । सं० हे मधो, हे मधु हे मधुनी हे मधूनि! 'त्रपु' शब्द राँगाका वाचक है। इसके प्रथम दो विभक्तियोंके रूप इस प्रकार हैं-त्रपु त्रपुणी, त्रपूणि। शेष मधुवत् । 'कर्तृ' ( करनेवाला), 'भर्तृ' (भरण-पोषण करनेवाला), 'अतिभर्तृ' (भर्ताको भी अतिक्रमण करनेवाला कुल) - इन तीनों शब्दोंके प्रथमा और द्वितीया विभक्तियोंमें रूप क्रमश: इस प्रकार हैं कर्तृ कर्तॄणी कर्तॄणि भर्तृ भर्तॄणी भर्तॄणि । अतिभर्तृ अतिभर्तॄणी अतिभर्तॄणि तृतीया आदि विभक्तियोंमें जो अजादि प्रत्यय हैं, उनमें दो-दो रूप होंगे। यथा-कर्त्री, कर्तॄणा। भर्त्रा, भर्तॄणा । अतिभत्र, अतिभर्तॄणा इत्यादि । 'पयस्' शब्द जलका वाचक है। इसके रूप इस प्रकार हैं १, २ – पयः पयसी पयांसि। तृतीया आदिमें पयसा पयोभ्याम् पयोभिः इत्यादि । 'पुरस्' शब्द सकरान्त अव्यय है। इसका अर्थ है- पहले या आगे | अव्यय शब्दोंका कोई रूप नहीं चलता; क्योंकि 'अव्यय 'का यह लक्षण है— ॥ २० ॥

सदृशं त्रिषु लिङ्गेषु सर्वासु च विभक्तिषु ।

वचनेषु च सर्वेषु यन्न व्येति तदव्ययम् ॥

प्राक् (पूर्व), प्रत्यक् (अंदर या पश्चिम), तिर्यक् (तिरछी दिशाकी ओर चलनेवाले पशु-पक्षी आदि), उदक् (उत्तर) – इन शब्दोंके प्रथम दो विभक्तियोंमें रूप इस प्रकार जानने चाहिये। प्राक् प्राची प्राञ्चि। प्रत्यक् प्रतीची प्रत्यञ्चि। तिर्यक् तिरश्ची तिर्यञ्चि। उदक् उदीची उदञ्चि इत्यादि। ये गत्यर्थक 'अञ्च के रूप हैं, पूजा-अर्थमें प्रयुक्त 'अञ्च् 'के प्राङ् प्राञ्ची प्राञ्चि। प्रत्यङ् प्रत्यची प्रत्यञ्चि। उदइ उदी उदञ्चि। तिर्थङ तिर्यची तिर्यचि इत्यादि रूप होते हैं। 'जगत्' शब्द संसारका वाचक है। इसके रूप हैं- जगत् जगती जगन्ति इत्यादि । 'जाग्रत्' शब्दका अर्थ है-सजग रहनेवाला। इसके रूप हैं- जाग्रत् जाग्रती जाग्रन्ति, जाग्रति इत्यादि । 'शकृत्' शब्द मल या विष्ठाका वाचक है। इसके रूप शकृत, शकृती, शकृन्ति, शकानि इत्यादि । तृतीया आदिमें शक्ना, शकृता इत्यादि। जिस कुलमें बहुत अच्छी सम्पत्ति है, उसको 'सुसम्पत्' कहते हैं। सुसम्पत् के प्रथम दो विभक्तियों में इस प्रकार रूप होते हैं सुसम्पत्, सुसम्पद, सुसम्पदी, सुसम्पन्ति, इत्यादि । सुन्दर दण्डियोंसे युक्त मन्दिर या आयतनको 'सुदण्डि' कहते हैं। 'सुदण्डिन्' शब्दके रूप इस प्रकार जानने चाहिये सुदण्डि सुदण्डिनी सुदण्डीनि। शेष रूप पुल्लिङ्गवत् होते हैं। 'इह' शब्द अव्यय है। 'अहन्' शब्द दिनका वाचक है। इसके प्रथम दो विभक्तियोंमें रूप इस प्रकार जानने चाहिये- अहः अहनी, अह्नी, अहानि। 'किम्' प्रश्नवाचक सर्वनाम है। इसके रूप तीनों लिङ्गों में होते हैं। नपुंसकलिङ्गमें प्रथमा और द्वितीया विभक्तियोंमें 'किम् के कानि- ये रूप होते हैं। शेष रूप पुल्लिङ्ग 'सर्व' शब्दके समान हैं। 'इदम्' का अर्थ है यह इसके नपुंसकलिङ्गमें— इदम् इमे इमानि - ये रूप होते हैं। तृतीया आदि विभक्तियोंमें पुल्लिङ्गवत् रूप जानने चाहिये ॥ २१ ॥

'ष्' शब्द संख्या छः का वाचक और बहुवचनान्त है। इसके तीनों लिङ्गों में समान रूप होते हैं। १,२ षट् । ३ षड्भिः । ४-५ षड्भ्यः । ६ षण्णाम् । ७ – षट्सु । 'सर्पिष्' शब्द घीका वाचक है। इसके रूप इस प्रकार जानने चाहिये सर्पिः सर्पिषी सर्पषि सर्पिषा सर्पिम् सर्पिभिः इत्यादि । 'श्रेयस्' शब्द कल्याणका वाचक है। उसके रूप – श्रेयः श्रेयसी श्रेयांसि इत्यादि हैं। तृतीया आदिमें 'पयस्' शब्दके समान इसके रूप जानने चाहिये। संख्या चारका वाचक 'चतुर्' शब्द नित्य बहुवचनान्त है। नपुंसकलिङ्गमें इसके रूप इस प्रकार हैं- १,२ – चत्वारि । ३ – चतुर्भिः । ४, ५ चतुर्भ्यः। ६- चतुर्णाम् । ७- चतुर्षु । 'अदस्' शब्द 'यह', 'वह' का वाचक सर्वनाम है। नपुंसकमें प्रथम दो विभक्तियों में इसके रूप – 'अदः अमू अमूनि' होते हैं। शेष रूप पुँल्लिङ्गवत् जानने चाहिये। इनसे भिन्न जो दूसरे दूसरे शब्द हैं, उनके रूप भी इन पूर्वकथित शब्दोंके ही समान हैं। इन शब्दोंकी 'प्रातिपदिक' संज्ञा कही गयी है। प्रातिपदिकसे परे प्रथमा (जो लिङ्गरहित (अव्यय) और नियत लिङ्गवाले शब्द हैं, वे 'प्रातिपदिकार्थमात्र' के उदाहरण हैं। यथा- उच्चैः, नीचः कृष्णः, श्रीः, ज्ञानम् इत्यादि। जो अनियत लिङ्गवाले शब्द हैं वे 'लिङ्गमात्राधिक्य 'के उदाहरण हैं। यथा-तटः, तटी, तटम् इत्यादि। 'वचन' कहते हैं- संख्याको। उसके उदाहरण एकः द्वौ बहवः इत्यादि हैं।) आदि विभक्तियाँ होती हैं। जो धातु, प्रत्यय और प्रत्ययान्तसे रहित अर्थवान् शब्द है। उसीको 'प्रातिपदिक' कहते हैं। प्रातिपदिकसे प्रातिपदिकार्थ, लिङ्गमात्राधिक्य और वचनमात्रका बोध करानेके लिये प्रथमा विभक्ति होती है ॥ २२ २३ ॥

सम्बोधनमें तथा उक्त कर्म और कर्तामें भी प्रथमा विभक्तिका प्रयोग होता है। जो किया जाता है, उसकी 'कर्म' संज्ञा है। कर्ममें द्वितीया विभक्ति होती है। जिसकी सहायतासे कर्म किया जाता है, उसको 'करण' कहते हैं तथा जो कार्य करता है, उसे 'कर्ता' कहते हैं। तिङ् कृत् तद्धित प्रत्ययों और समाससे अनुक्त कर्तामें और करणमें भी तृतीया विभक्ति होती है। किसी भी कारकके रहते हुए कर्तामें भी तृतीया होती है। यथा-व्रजं नेतव्या गावः कृष्णेन।' [ यहाँ 'कृत्यानां कर्तरि वा। - इस सूत्र ( २।३ । ७१) के अभिप्रायका उपजीव्यभाव लक्षित होता है।] सम्प्रदानमें चतुर्थी विभक्ति होती है। जिसको कुछ देनेकी इच्छा हो, उसे 'सम्प्रदान' कहा गया है। जिससे कोई पृथक् होता हो, जिससे कुछ लेता या ग्रहण करता हो तथा जिससे भयकी प्राप्ति होती हो, उसकी 'अपादान' संज्ञा होती है। अपादानमें पञ्चमी' विभक्ति होती है। जहाँ स्व स्वामिभाव या जन्य-जनकभाव आदि सम्बन्धका बोध होता हो, वहाँ षष्ठी विभक्तिका प्रयोग होता है। जो आधार हो, उसकी अधिकरण' संज्ञा होती है। 'अधिकरण में सप्तमी विभक्तिका प्रयोग होता है। जहाँ एकार्थ विवक्षित हो, वहाँ एकवचन और जहाँ द्वित्व विवक्षित हो, वहाँ द्विवचनका प्रयोग करना चाहिये। बहुत्वकी विवक्षा होनेपर बहुवचनका प्रयोग होता है। अब शब्दोंके सिद्ध रूप बताता हूँ-वृक्षः, सूर्यः, अम्बुवाहः, अर्कः, हे रखे! हे द्विजातयः ! ॥ २४- २९ ॥

विप्रौ (विप्र + प्र० द्वि०), गजान् (गज+द्वि० बहु०), महेन्द्रेण (महेन्द्र तृ० एक०), यमाभ्याम् (यम तृ० द्वि), अनिलैः (अनिल + तृ० बहु०), कृतम् (कृत नपुंसकलिङ्ग प्रथमा एकवचन), रामाय (राम च० एक०), मुनिवर्याभ्याम् (मुनिवर्य+च० द्वि०), केभ्यः (किम् + च० बहु०), धर्मात् (धर्म + पं० एक०), हरौ (हरि+सप्त० एक०), रतिः (रति + प्र० एक०), शराभ्याम् (शर+पञ्च० द्वि०), पुस्तकेभ्यः (पुस्तक + पञ्च० बहु०), अर्थस्य (अर्थ+ षष्ठी एक०), ईश्वरयोः (ईश्वर+षष्ठी द्वि०), गतिः (गति+प्र० एक०), बालानाम् (बाल षष्ठी बहु०), सज्जने (सज्जन + सप्त० एक०), प्रीतिः (प्रीति प्र० एक०), हंसयो: (हंस+सप्त० द्वि०), कमलेषु (कमल + सप्त० बहु०), बालकोंकी सज्जनमें प्रीति होती है और हंसके जोड़ेकी कमलोंमें- यह इकतीसवें श्लोकके उत्तरार्धका वाक्यार्थ है ॥ ३०-३१ ॥

इसी प्रकार 'काम', 'महेश' आदि शब्द 'वृक्ष' शब्दके समान जानने चाहिये। 'सर्वे', 'विश्वे' – इन दोनोंका अर्थ है-सब ये प्रथमा - विभक्तिके बहुवचनान्तरूप हैं। सर्वस्मै, सर्वस्मात् - ये 'सर्व' शब्दके क्रमश: चतुर्थी और पञ्चमी विभक्ति एकवचनान्त रूप हैं। कतरो मतः दोर्मेसें कौन अभिमत है ? यहाँ 'कतर' शब्दका प्रथमामें एकवचनान्त सिद्ध रूप दिया गया है। 'कतर' शब्द सर्वनाम है और 'सर्व' शब्दकी भाँति उसका रूप चलता है। सर्वेषाम् (सर्व+षष्ठी० बहु०), स्वं च ('स्व' शब्द भी सर्वनाम है। अतः इसका रूप भी सर्ववत् समझना चाहिये। ) विश्वस्मिन् (विश्व + सप्त० एक० ) - इन शब्दोंके शेष रूप 'सर्व' शब्दके समान हैं। इसी प्रकार उभय, कतर, कतम और अन्यतर आदि शब्दोंके रूप होते हैं। पूर्वे, पूर्वाः- ये 'पूर्व' शब्दके प्रथमान्त बहुवचन रूप हैं। प्रथमान्त बहुवचनमें पूर्वादि शब्दोंको विकल्पसे सर्वनाम माना जाता है। सर्वनाम पक्षमें 'पूर्वे' और सर्वनामाभव पक्षमें 'पूर्वाः' रूपकी सिद्धि होती है। पूर्वस्मै (पूर्व च० एक०), 'पूर्वस्मात् सुसमागतः '— + पूर्वसे आया। यहाँ 'पूर्व' शब्दका पञ्चमी विभक्तिमें एकवचनान्त रूप प्रयुक्त हुआ है। 'पूर्वे बुद्धिश्च पूर्वस्मिन्'– पूर्वमें बुद्धि। यहाँ 'पूर्व' शब्दका सप्तमीके एक वचनमें रूपद्वय प्रयुक्त हुआ है। 'पूर्व' आदि नौ शब्दोंसे पञ्चमी और सप्तमी एकवचनमें 'ङसि और ङि' के स्थानों में 'स्मात् ' और 'स्मिन्' आदेश विकल्पसे होते हैं। उनके होनेपर पूर्वस्मात् और पूर्वस्मिन् रूप बनते हैं और न होनेपर 'राम' शब्दकी भाँति 'पूर्वात्' और 'पूर्वे' रूप होते हैं। शेष रूप सर्ववत् जानने चाहिये। इसी प्रकार पर, अवर, दक्षिण, उत्तर, अन्तर, अपर, अधर और नेम शब्दोंके भी रूप जानने चाहिये। प्रथमे, प्रथमाः ये 'प्रथम' - शब्दके बहुवचनान्त रूप हैं। इनके शेष रूप 'अर्क' शब्दके समान जानने चाहिये। इसी तरह 'चरम' शब्द, 'तयप् प्रत्ययान्त शब्द तथा 'अल्प', 'अर्ध' और 'नेम' आदि शब्दोंके भी रूप होते हैं। यहाँ अन्तर इतना ही है कि 'चरम' और 'कतिपय' आदि शब्दोंके शेष रूप 'प्रथम' शब्दके समान होंगे और 'नेम' आदि शब्दोंके शेष रूप सर्ववत् होंगे। जिसके अन्तमें 'तीय' लगा है, उन 'द्वितीय' और 'तृतीय' शब्दोंके चतुर्थी, पञ्चमी और सप्तमी विभक्तियोंमें एकवचनान्त रूप विकल्पसे सर्ववत् होते हैं। जैसे- (चतुर्थी) द्वितीयस्मै, द्वितीयाय (पञ्चमी) द्वितीयस्मात् द्वितीयात् । (सप्तमी) द्वितीयस्मिन् द्वितीये ।

इसी प्रकार 'तृतीय' शब्दके भी रूप होंगे। इन दोनों शब्दोंके शेष रूप 'अर्क' शब्दके समान होते हैं ॥ ३२-३६ ||

अब 'सोमपा' शब्दके सिद्ध रूप क्रमशः दिये जाते हैं-

१ सोमपाः, सोमपौ, सोमपाः । २- सोमपाम्, सोमपौ, सोमपः । ३- सोमपा, सोमपाभ्याम् सोमपाभिः । ४ – सोमपे, सोमपाभ्याम्, सोमपाभ्यः । ५ सोमपः, सोमपाभ्याम्, सोमपाभ्यः । ६ – सोमपः, सोमपोः, सोमपाम् । ७ सोमपि, सोमपोः, सोमपासु। (यहाँ ज्ञेयाँ, व्रज, ह्रद और कुलम् - ये पद पादपूर्तिमात्र के लिये दिये गये हैं। यहाँ प्रकृतमें इनका कोई उपयोग नहीं है।) 'सोमपा' शब्दके समान ही 'कीलालपा' आदि शब्दोंके रूप होंगे। अब कवि, अग्नि, अरि हरि, सात्यकि, रवि, वह्नि-इन शब्दोंके कतिपय सिद्ध रूप उद्धृत किये जाते हैं। कविः (कवि+ प्र० एक०), अग्निः (अग्नि+प्र० एक०), अरयः (अरि + प्र० बहु०), हे कवे! (कवि सम्बोधन 1+ एक०), कविम् (कवि+द्वि० एक०), अग्नी (अग्नि द्वि० द्वि०), हरीन् ( हरि द्वि० बहु०), सात्यकिना (सात्यकि+तृ० एक०), रविभ्याम् (रवि + तृ० द्वि०), रविभिः (रवि०+तृ० बहु०), 'देहि वह्नये यः समागतः - जो आया है उसे वह्नि (अग्नि) को समर्पित कर दो।' वह्नये (वह्नि+च० - एक०), अग्नेः (अग्नि षष्ठी एक०), अग्न्योः + (अग्नि+ षष्ठी द्वि०), अग्नीनाम् (अग्नि+ षष्ठी बहु०), कवौ ( कवि सप्त० एक०), कव्योः (कवि+सप्त० + द्वि०), कविषु (कवि+ सप्त० बहु० ) ॥ ३७ - ४० ॥

इसी प्रकार सुसृति, अभ्रान्ति, सुकीर्ति और सुधृति आदि शब्दोंके रूप जानने चाहिये। यहाँ इन सबका प्रथमाका एकवचनान्त रूप दिया गया है । यथा - सुसृतिः, अभ्रान्तिः, सुकीर्तिः, सुधृतिः । अब 'सखि' शब्दके रूप दिये जाते हैं - १ - सखा सखायौ, सखायः । हे सखे! सत्पतिं व्रज (हे मित्र ! तुम अच्छे स्वामीके पास जाओ।) 'हे सखे' यह सखि शब्दका सम्बोधनमें एकवचनान्त रूप है। २ सखायम्, सखायौ, सखीन् । ३ सख्या आगतः (मित्र के साथ आया)। ४ सख्ये दद ( मित्रको दो ) । ५ सख्युः । ६ सख्युः, सख्योः, सखीनाम् । ७ सख्यौ, सख्योः सखिषु। शेष रूप 'कवि' शब्दके समान जानने चाहिये। पत्या ( पति तृ० एक०), पत्ये (पति+च० एक०), + पत्युः ( पति पञ्च० एक०), पत्युः (पति षष्ठी + एक०), पत्योः (पति + षष्ठी द्वि०), पत्यौ ( पति सप्त० एक०) । 'पति' शब्दके शेष रूप 'अग्नि' शब्दके समान जानने चाहिये। (यदि 'पति' शब्द समासमें आबद्ध हो तो उसके सम्पूर्ण रूप 'कवि' शब्दके समान ही होंगे। ) अब 'द्वि' शब्दके पुल्लिङ्ग रूप दिये जाते हैं, यह नित्य द्विवचनान्त है । १, २ द्वौ ३, ४, ५ द्वाभ्याम् । ६, ७ द्वयोः । यह दो संख्याका वाचक है ॥ ४१-४३ ॥

अब संख्या तीनके वाचक नित्य बहुवचनान्त पुल्लिङ्ग 'त्रि' शब्दके रूप दिये जाते हैं-१ त्रयः । २ त्रीन् । ३ त्रिभिः । ४, ५ त्रिभ्यः । ६ त्रयाणाम् । ७ त्रिषु । – ये क्रमशः सात विभक्तियोंके रूप हैं। अब 'कति' शब्दके रूप दिये जाते हैं १ कति । २ कति। शेष रूप 'कवि' शब्दके समान होते हैं। यह नित्य बहुवचनान्त शब्द है । अब 'नेता' के अर्थमें प्रयुक्त होनेवाले 'नी' शब्दके रूप उद्धृत किये जाते हैं-

१ नीः, नियौ, नियः । सम्बोधन- हे नीः, हे नियाँ, हे नियः । २ नियम्, नियौ, नियः । ३ निया, नीभ्याम् नीभिः । ४-निये, नीभ्याम्, नीभ्यः । ५ नियः, नीभ्याम् नीभ्यः । ६ नियः, नियोः, नियाम् । ७ नियि, नियोः नीषु । सुश्रीः (सुश्री प्र० एक०) । इसी तरह 'सुधीः' आदि शब्दोंके रूप जानने चाहिये । 'ग्रामणीः पूजयेद्धरिम्' गाँवका मुखिया श्रीहरिका पूजन करे। 'ग्रामणी' शब्दके रूप इस प्रकार हैं-१ ग्रामणीः, ग्रामण्यौ, ग्रामण्यः । २ ग्रामण्यम् ग्रामण्यौ, ग्रामण्यः । ३ ग्रामण्या, ग्रामणीभ्याम्, ग्रामणीभिः । ४ ग्रामण्ये, ग्रामणीभ्याम्, ग्रामणीभ्यः । ५ ग्रामण्यः, ग्रामणीभ्याम्, ग्रामणीभ्यः । ६ ग्रामण्यः, ग्रामण्योः, ग्रामण्याम् । ७ ग्रामण्याम्, ग्रामण्योः, ग्रामणीषु। इसी तरह 'सेनानी' आदि शब्दोंके रूप जानने चाहिये। 'सुभू' शब्दके रूप - सुभूः, सुभुवौ इत्यादि हैं। 'स्वयम्भू' शब्दके रूप - १ - स्वयम्भुः, स्वयम्भुवौ, स्वयम्भुवः । २ स्वयम्भुवम्, स्वयम्भुवौ, स्वयम्भुवः । ३ स्वयम्भुवा । सप्तमीके एकवचनमें 'स्वयम्भुवि'। शेष 'सुभू' शब्दके समान। इसी तरह 'प्रतिभू' आदि शब्दोंके रूप जानने चाहिये। 'खलपू' शब्दके रूप-खलपूः, खलप्वौ, खल्पवः । खलप्वम् इत्यादि हैं। सप्तमी एकवचनमें 'खलवि' यह रूप होता है। इसी प्रकार 'शरपू' आदि शब्दोंके रूप जानने चाहिये । 'क्रोष्ट' शब्दके क्रमशः पाँच रूप इस प्रकार होते हैं- क्रोष्टा, क्रोष्टारौ, क्रोष्टारः । क्रोष्टारम्, क्रोष्टारौ । द्वितीयाके बहुवचनमें 'क्रोष्टन्'– यह रूप बनता - है। तृतीया आदिके स्वरादि प्रत्ययोंमें दो-दो रूप चलते हैं। एक 'क्रोष्टु' शब्दके, दूसरे 'क्रोष्ट' शब्दके। यथा- क्रोष्टुना कोष्टा, क्रोष्टवे क्रोष्टे, क्रोष्टोः क्रोष्टुः इत्यादि षष्ठीके बहुवचनमें 'क्रोष्टनाम्'– यह एक ही रूप होता है। सप्तमी एकवचनमें क्रोष्टौ, क्रोष्टरि— ये रूप होते हैं। - हलादि विभक्तियों में इसके रूप 'शम्भु' आदि शब्दोंके समान होते हैं। 'पितृ' शब्दके रूप - १ पिता, पितरौ, पितरः । सम्बोधनमें हे पितः ! हे पितरौ! हे पितरः ! २ पितरम्, पितरौ पितॄन् । ३ पित्रा, पितृभ्याम् पितृभिः । ४- पित्रे, पितृभ्याम् पितृभ्यः । ५ पितुः, पितृभ्याम् पितृभ्यः । ५ पितुः, पितृभ्याम् पितृभ्यः । ६ पितुः, पित्रोः, पितॄणाम् । ७ पितरि, पित्रोः, पितृषु ।। ४४–५० ।।

इसी प्रकार 'भ्रातृ' और 'जामातृ' आदि शब्दोंके रूप जानने चाहिये १ भ्राता, भ्रातरौ, भ्रातरः । जामाता, जामातरौ, जामातरः इत्यादि। 'नृ' शब्दके रूप 'पितृ' शब्दके समान होते हैं। केवल षष्ठीके बहुवचनमें उसके नृणाम् नृणाम् ये दो रूप होते हैं। 'कर्तृ' शब्दके प्रारम्भिक पाँच रूप इस प्रकार होते हैं-कर्त्ता, कर्त्तारौ, कर्त्तारः । कर्त्तारम् कर्त्तारौ। द्वितीयाके बहुवचनमें कर्तॄन, षष्ठीके बहुवचनमें कर्तॄणाम् और सप्तमीके एकवचनमें कर्त्तरि रूप होते हैं। शेष रूप 'पितृ' शब्दके समान जानने चाहिये। इसी तरह उद्गातृ, स्वस और नए आदि शब्दोंके रूप होते हैं। उद्गाता' उद्गातारौ उद्गातारः । स्वसार, स्वसारौ, स्वसारः । नप्ता, नप्तारौ, नप्तारः इत्यादि । शेष रूप 'कर्तृ' शब्दके समान होते हैं।

'स्वस्' शब्दका द्वितीयाके बहुवचनमें 'स्वसः ' रूप होता है। 'सुरै' शब्दके रूप इस प्रकार हैं सुराः, सुरायौ, सुरायः इत्यादि षष्ठीके बहुवचनमें सुरायाम् और सप्तमीके एकवचनमें सुरायि रूप होते हैं। 'गो' शब्दके रूप इस प्रकार होते हैं। १ गौः, गावौ, गावः । २ गाम्, गावौ, गाः । ३- गवा गोभ्याम्, गोभिः इत्यादि षष्ठी-गोः, गवोः, गवाम् सप्तमी-गवि, गवोः, गोषु। इसी प्रकार 'द्यौ' तथा 'ग्लौ' शब्दोंके रूप जानने चाहिये। ये स्वरान्त शब्द पुल्लिङ्गमें नायक (प्रधान) हैं ॥ ५१-५३॥

अब हलन्त पुल्लिङ्ग शब्दोंके सिद्ध रूप बताये जाते हैं। 'सुवाच्' शब्दके रूप यों जानने चाहिये-१ सुवाक्', सुवाग, सुवाचौ, सुवाचः । २ २ सुवाचम् सुवाचौ, सुवाचः । ३ सुवाचा, सुवाग्भ्याम् सुवाग्भिः । इत्यादि। (सप्त०) बहुवचनमें) सुवाक्षु । इसी तरह 'दिश्' आदि शब्दोंके रूप होते हैं। प्राञ्च शब्दके रूप-१ प्राइँ, प्राञ्चौ, प्राञ्चः । २ भोः प्राञ्चं व्रज (हे भाई! तुम प्राचीन महापुरुषोंके पथपर चलो) । यहाँ 'प्राञ्चम्' यह द्वितीया विभक्तिका एकवचनान्त रूप है। ३ प्राचा, प्राग्भ्याम् प्राग्भिः । षष्ठीके बहुवचनमें 'प्राचाम्' रूप होता है। सप्तमीके एकवचनमें 'प्राचि' द्विवचनमें 'प्राचो:' और बहुवचनमें 'प्राक्षु' पूजार्थक 'प्राञ्च' शब्दके सप्तमीके बहुवचनमें 'प्राड्यु' 'प्राइक्षु'। इसी प्रकार उदञ्च, सम्यञ्च और प्रत्यञ्च शब्दोंके भी रूप होते हैं। यथा— 'उदङ्', उदञ्चौ उदञ्चः इत्यादि । स्त्रीलिङ्गमें उदीची। सम्य सम्यचौ, सम्यञ्चः । स्त्रीलिङ्गमें समीची। प्रत्यड् प्रत्यञ्चौ, प्रत्यञ्चः । स्त्रीलिङ्गमें प्रतीची। इन सभी शब्दोंके 'शस्' आदि विभक्तियों में इस तरह रूप जानने चाहिये- उदीचः उदीचा। समीचः, समीचा प्रतीचः, प्रतीचा इत्यादि । तिर्य तिरश्चः । सध्यङ्', सधीचः । विश्वद्रयङ, विश्वद्रीचः इत्यादि रूप भी पूर्ववत् बनते हैं। 'अमुम् अञ्चति' – इस - विग्रहमें अमुमुयङ्, अदमुयङ, अदाङ् – ये - तीन रूप प्रथमा विभक्ति एकवचनमें होते हैं। प्रथमाके बहुवचनमें 'अद्र्यञ्चः' रूप होता हैं और द्वितीयाके बहुवचनमें अमुमुईचः तथा अमुद्रीचः– ये रूप होते हैं। 'भ्याम्' विभक्ति में पूर्ववत् 'अदद्र्यग्भ्याम्' रूपकी सिद्धि होती है। 'तत्त्वतृष्' शब्दके रूप इस प्रकार होते हैं-१ तत्त्वतृट् ' तत्त्वतृड, तत्त्वतृषौ, तत्त्वतृषः इत्यादि । तृतीया आदिके द्विवचनमें तत्त्वतृभ्याम् । 'तत्त्वतृभ्यां समागतः 'वह तत्त्वज्ञानकी पिपासावाले दो व्यक्तियोंके साथ आया।' सप्तमीके एकवचनमें तत्त्वतृषि और बहुवचनमें तत्त्वतृसु – ये रूप होते हैं। इसी तरह 'काष्ठतड्' आदि रूप होते हैं। यथा-काष्ठतद्, काष्ठतइ, काष्ठतक्षौ, काष्ठतक्षः इत्यादि । 'भिषज्' शब्दके रूप भिषक् भिषग् भिषजौ, भिषजः इत्यादि होते हैं। तृतीयाके द्विवचनमें 'भिषग्भ्याम्' और सप्तमीके एकवचनमें 'भिषजि' रूप होते हैं। इसी प्रकार 'जन्मभाक्' आदि भी जानने चाहिये। यथा - जन्मभाक्, जन्मभागू, जन्मभाजौ, जन्मभाजः इत्यादि । 'मरुत्' शब्दके रूप इस प्रकार जाने मरुत्', मरुद् मरुतौ मरुतः । मरुद्भ्याम् मरुति इत्यादि । इसी प्रकार 'शत्रुजित्' आदि शब्दोंके भी रूप होते हैं। पूजनीय व्यक्तिके लिये प्रयुक्त होनेवाले 'भवत्' शब्दके रूप इस प्रकार हैं भवान् भवन्तौ भवन्तः इत्यादि। षष्ठीके बहुवचनमें 'भवताम्'– यह रूप होता है। 'भू' धातुसे बननेवाले 'शतृ' प्रत्ययान्त 'भवत्' शब्दके रूप इस प्रकार होते हैं— भवन् २, भवन्तौ भवन्तः - इत्यादि । स्त्रीलिङ्गमें भवन्ती रूप होता है।

'महत्' शब्दके रूप - महान् , महान्तौ, महान्तः । महती, इत्यादि। 'भगवत्' आदि शब्दोंके रूप 'भवत्' शब्दकी तरह भगवान् भगवन्तौ - भगवन्तः इत्यादि होते हैं। इसी प्रकार 'मघवत्' शब्दके रूप जानने चाहिये। यथा- मघवान् ,मघवन्तौ मघवन्तः इत्यादि । 'अग्निचित्' शब्दके रूप- अग्निचित् द्, अग्निचितौ, अग्निचितः इत्यादि होते हैं। सप्तमीके एकवचनमें 'अग्निचिति' और बहुवचनमें 'अग्निचित्सु'– ये रूप होते हैं। इसी प्रकार अन्यान्य 'तत्त्ववित् ' 'वेदवित' तथा 'सर्ववित्' शब्दोंके रूप होते हैं ॥ ५४-६१॥

'राजन्' शब्दके सिद्ध रूप इस प्रकार जानने चाहिये। यथा - १ राजा, राजानौ, राजानः । २ राजानम् राजानौ राज्ञः । ३ राज्ञा राजभ्याम् राजभिः इत्यादि। सप्तमीके एकवचनमें 'राज्ञि' और 'राजनि'— ये दो रूप होते हैं। सम्बोधनमें— हे राजन्! इत्यादि। 'यज्वन्' शब्दके यज्वा यज्वानौ - यज्वानः इत्यादि रूप होते हैं। 'करिन्' और 'दण्डिन्' इत्यादि इनन्त शब्दोंके रूप इस प्रकार होते हैं-करी करिणौ करिणः । दण्डी दण्डिनौ दण्डिनः इत्यादि । 'पथिन्' शब्दके सिद्ध रूप यों हैं- १ पन्थाः पन्थानौ पन्थानः । २ पन्थानम् पन्थानौ पथः । ३ पथा पथिभ्याम् पथिभिः - इत्यादि। सप्तमीके एकवचनमें 'पथि' रूप होता है। इसी प्रकार 'मथिन्' शब्दका भी रूप जानना चाहिये। यथा मन्थाः, मन्थानौ, मन्थानः, इत्यादि । ऋभुक्षाः, ऋभुक्षाणौ, ऋभुक्षाणः इत्यादि । पथ्यादिमें पथिन्, मथिन् तथा ऋभुक्षन् ये तीन शब्द आते हैं। पाँच संख्याका वाचक 'पञ्चन्' शब्द नित्य बहुवचनान्त है। उसके रूप इस प्रकार होते हैं- १-२ पञ्च', ३ पञ्चभिः, ४-५ पञ्चभ्यः, ६ पञ्चानाम्, ७ पञ्चसु । 'प्रतान्' शब्दके रूप-प्रतान्, प्रतानौ, प्रतानः, इत्यादि हैं। तृतीया आदिके द्विवचनमें 'प्रतान्थ्यां' रूप होता है। सम्बोधनमें 'हे प्रतान् !' 'सुशर्मन्' शब्दके रूप- सुशर्मा सुशर्माणी, सुशर्माणः । - इत्यादि हैं। शस्, ङसि, डस् – इन विभक्तियोंमें - रूप होता है। अप् शब्द 'सुशर्मणः' रूप होता नित्यबहुवचनान्त और स्त्रीलिङ्ग है। इसके रूप यों जानने चाहिये - १ आपः । २ अपः । ३ अद्भिः। ४-५अद्भयः । ६ अपाम् । ७-अप्सु । 'प्रशाम्' शब्दके रूप प्रशान्, प्रशामी, प्रशामः इत्यादि हैं। सप्तमीके एकवचनमें 'प्रशामि' रूप 1 होता है। 'किम्' शब्दके रूप-१ कः, कौ, के २ कम्, कौ, कान् ३ केन, काभ्याम् कैः – इत्यादि । सप्तमी बहुवचनमें केषु । शेष - रूप सर्ववत् होते हैं। 'इदम्' शब्दके रूप इस प्रकार हैं-१-अयम्', इमौ, इमे २-इमम्, इमौ इमान्। 'इमान्नय' (अर्थात् इन्हें ले जाओ) ३ अनेन, आध्याम्, एभिः । ४ अस्मै, आभ्याम्, एभ्यः । ५-अस्मात्, आभ्याम्, एभ्यः । ६-अस्य, अनयोः, एषाम् । ७ अस्मिन्, अनयोः एषु। 'चतुर्' , शब्द नित्य बहुवचनान्त है। पुल्लिङ्गमें इसके रूप यों होते हैं- १ चत्वारः , २ चतुरः । ३ चतुर्भिः। ४-५ चतुर्भ्यः । ६ चतुर्णाम् । ७ चतुर्षु। जिसकी वाणी अच्छी हो, वह पुरुष श्रेष्ठ माना जाता है। उसे 'सुगी' कहते हैं। यह प्रथमाका एकवचन है। 'सुगिर्' शब्दका सप्तमीके एकवचनमें 'सुगिरि ' रूप होता है। 'सुदिव्' शब्दके रूप इस प्रकार हैं- १ सुद्यौः, सुदिवा, सुदिवः इत्यादि । तृतीया आदिके द्विवचनमें 'सुद्युभ्याम्' रूप होता है। 'विश्' शब्दके रूप - विट्विड् १२, विशौ, विशः । विड्भ्याम् इत्यादि होते हैं। सप्तमीके बहुवचनमें 'विट्सु' रूप होता है। 'यादृश्' शब्दके रूप इस प्रकार हैं- यादृक्-ग्", यादृशौ, यादृशः। यादृशा, यादृग्भ्याम् इत्यादि । 'षष्' शब्द नित्य बहुवचनान्त है। इसके रूप यों हैं- १-२ षट् " षड् । ३ षड्भिः । ४-५ षड्भ्यः । ६ षण्णाम् । ७ षट्सु । 'सुवचस्' शब्दके रूप इस प्रकार हैं- १ सुवचाः १५, सुवचसौ, सुवचसः । २ सुवचसम् सुवचसौ, सुवचसः । ३ सुवचसा, सुवचोभ्याम्, सुवचोभिः इत्यादि । सम्बोधनमें- हे सुवचः ! 'उशनस्' शब्दके रूप यों हैं- १ उशना उशनसौ, उशनसः । हे उशनः इत्यादि । सप्तमीके एकवचनमें 'उशनसि' रूप होता है। 'पुरुदंशस्' और 'अनेहस्' शब्दोंके रूप भी इसी प्रकार होते हैं। यथा- १ पुरुदंशा, पुरुदंशसौ, पुरुदंशसः। अनेहा अनेहसौ, अनेहसः इत्यादि । 'विद्वस्' शब्दके रूप यों जानने चाहिये- विद्वान्, विद्वांसौ, विद्वांसः, हे विद्वन् इत्यादि । 'विद्वांस उत्तमाः' (विद्वान् पुरुष उत्तम होते हैं)। चतुर्थी विभक्ति एकवचनमें 'विदुषे ' रूप होता है। 'विदुषे नमः' (विद्वान्‌को नमस्कार है) । द्विवचनमें 'विद्वद्ध्याम्' और सप्तमीके बहुवचनमें 'विद्वत्सु' रूप होते हैं। 'स विद्वत्सु बभूविवान्' (वह विद्वानों में प्रकट हुआ।) 'बभूविवस्' शब्दके रूप इस प्रकार जानने चाहिये- बभूविवान्' बभूविवांसौ, बभूविवांसः - इत्यादि। इसी प्रकार 'पेचिवान्', पेचिवांसौ, पेचिवांसः । श्रेयान् श्रेयांसौ, श्रेयांसः – इत्यादि रूप जानने चाहिये। 'श्रेयस्' शब्दके द्वितीयाके बहुवचनमें 'श्रेयसः ' रूप होता है। अब 'अदस्' शब्दके पुल्लिङ्गमें रूप बताते हैं-१ असौ अमू, अमी २ अमुम् अमू अमून्। ३-अमुना, अमूभ्याम् अमीभिः । ४ अमुष्मै, अमूभ्याम् अमीभ्यः । ५ अमुष्मात् अमूभ्याम् अमीभ्यः । ६ अमुष्य, अमुयोः, अमीषाम् । ७ अमुष्मिन्, अमुयोः, अमीषु । 'गोधुग्भिरागतः' (वह गाय दुहनेवालोंके साथ आया)। 'गोदुह्' शब्दके रूप इस प्रकार हैं गोधुर्क्'-ग्, गोदुहौ, गोदुहः । गोधुक्षु इत्यादि। इसी प्रकार, 'दुह्' आदि अन्य शब्दोंसे रूप जानने चाहिये। 'मित्रगुह्' शब्दके रूप इस प्रकार जानने चाहिये-मित्रधुक्-ग्, मित्रधुद्- इ, मित्रद्रुहौ, मित्रद्रुहः । मित्रद्रुहा, मित्रधुग्भ्याम्, मित्रधुभ्याम्, मित्रधुग्भिः, मित्रधुभिः इत्यादि । इसी प्रकार 'चित्रगुह्' आदि शब्दोंके भी रूप जानने चाहिये। 'स्वलिह्' शब्दके रूप यों होते हैं- स्वलिट् स्वलिड्, स्वलिहौ, स्वलिहः । स्वलिहा, स्वलिड्भ्याम् इत्यादि। सप्तमी एकवचनमें 'स्वलिहि' रूप होता है। 'अनुड्डुह्' शब्दके रूप यों हैं- १ अनड्वान्', अनड्वाहौ, अनड्वाहः । २ अनड्वाहम्, अनड्वाहाँ, अनुडुहः, ३ अनडुहा, अनडुयाम्, अनडुद्धिः ।सप्तमीके बहुवचनमें 'अनडुत्सु' (सम्बोधनमें 'हे अनड्वन्')। अजन्त और हलन्त शब्द पुल्लिङ्गमें बताये गये। अब स्त्रीलिङ्गमें बताये जाते हैं ॥ ६२-७३ ॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'सामान्यतः सुब् विभक्तियोंके सिद्ध रूपोंका वर्णन' नामक तीन सौ इक्यावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३५१ ।।