अग्निदेव कहते हैं-
वसिष्ठ ! अब मैं भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले एकादशी व्रतका वर्णन करूंगा। व्रत करनेवाला दशमीको मांस और मैथुनका परित्याग कर दे एवं भजन भी नियमित करे। दोनों पक्षोंकी एकादशीको भोजन न करे ॥ १३ ॥
द्वादशी-विद्धा एकादशीमें स्वयं श्रीहरि स्थित होते हैं, इसलिये द्वादशी-विद्धा एकादशी के व्रतका त्रयोदशीको पारण करनेसे मनुष्य सौ यज्ञोंका पुण्यफल प्राप्त करता है। जिस दिनके पूर्वभागमें एकादशी कलामात्र अवशिष्ट हो और शेषभागमें द्वादशी व्याप्त हो, उस दिन एकादशीका व्रत करके त्रयोदशीमें पारण करनेसे सौ यज्ञोंका पुण्य प्राप्त होता है। दशमी-विद्धा एकादशीको कभी उपवास नहीं करना चाहिये; क्योंकि वह नरककी प्राप्ति करानेवाली है। एकादशीको निराहार रहकर दूसरे दिन यह कहकर भोजन करे– 'पुण्डरीकाक्ष ! मैं आपकी शरण ग्रहण करता हूँ। अच्युत ! अब मैं भोजन करूँगा।' शुक्लपक्षकी एकादशीको जब पुष्यनक्षत्रका योग हो, उस दिन उपवास करना चाहिये। वह अक्षयफल प्रदान करनेवाली है और पापनाशिनी' कही जाती है। श्रवणनक्षत्रसे युक्त द्वादशीविद्धा एकादशी 'विजया' नामसे प्रसिद्ध है और भक्तोंको विजय देनेवाली है। फाल्गुन मासमें पुष्यनक्षत्रसे युक्त एकादशीको भी सत्पुरुषोंने 'विजया' कहा है। वह गुणोंमें कई करोड़गुना अधिक मानी जाती है। एकादशीको सबका उपकार करनेवाली विष्णुपूजा अवश्य करनी चाहिये। इससे मनुष्य इस लोकमें धन और पुत्रोंसे युक्त हो (मृत्युके पश्चात्) विष्णुलोकमें पूजित होता है ॥ २-९॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'एकादशीके व्रतोंका वर्णन' नामक एक सौ सतासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८७॥
Summary of chapter 189 of the Agni Mahā Purana is as follows:
The Śravaṇa-dvādaśī—Bhādrapada-śukla-dvādaśī when coinciding with Śravaṇa-nakṣatra—is described as one of the most meritorious of all vratas. Agni states that bathing at any river-confluence on this day equals the full Śravaṇa-dvādaśī phala, and that performing dāna on the Budha-vāra (Wednesday) Śravaṇa-dvādaśī yields mahā-phala. The complete Vāmana-pūjā liturgy is described: the deity is installed on a jalakumbha draped with śveta-vastra-dvaya; the aṅga-pūjā maps the twelve Keśavādi names to the body parts (Vāsudeva at the head, Śrīdhara at the face, Kṛṣṇa at the throat, etc.); midnight jāgaraṇa is observed; and the worshipper concludes by offering the entire pūjā-sāmagri to a brāhmaṇa with the words "Vāmano'smi, Vāmanam dadāmi."